शल्य पर्व · अध्याय 52
दधीचि और सारस्वत
बलराम मुनि सारस्वत के तीर्थ में पहुँचते हैं, और जनमेजय पूछते हैं कि बारह वर्ष के अकाल में सारस्वत ने वेद कैसे पढ़ाए। वैशम्पायन बताते हैं कि अप्सरा अलम्बुसा को देखकर मुनि दधीचि का वीर्य सरस्वती में गिर गया; नदी ने उनके पुत्र सारस्वत को जन्म दिया और दधीचि से वर पाया। आगे दधीचि ने अपनी हड्डियाँ दीं, जिनसे इन्द्र ने दानवों के विरुद्ध वज्र बनवाया। इसके बाद पड़े अकाल में माता सरस्वती से मछलियों का आहार पाकर सारस्वत ने वेदों को सुरक्षित रखा और साठ हज़ार ऋषियों को उनका अध्ययन कराया। फिर बलराम वृद्धकन्या के आश्रम की ओर जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (9.52.1)
यत्रेजिवानुडुपती राजसूयेन भारत । यस्मिन्वृत्ते महानासीत्सङ्ग्रामस्तारकामयः ॥
yatrejivānuḍupatī rājasūyena bhārata | yasminvṛtte mahānāsītsaṅgrāmastārakāmayaḥ
हे भारत! जहाँ नक्षत्रों के स्वामी चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया था, और उसके पूरा होने पर तारा को लेकर महान् संग्राम हुआ था,
श्लोक 2 (9.52.2)
तत्राप्युपस्पृश्य बलो दत्त्वा दानानि चात्मवान् । सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ॥
tatrāpyupaspṛśya balo dattvā dānāni cātmavān | sārasvatasya dharmātmā munestīrthaṃ jagāma ha
वहाँ भी स्नान करके और दान देकर धर्मात्मा बलराम मुनि सारस्वत के तीर्थ को गए,
श्लोक 3 (9.52.3)
यत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् । वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ॥
yatra dvādaśavārṣikyāmanāvṛṣṭyāṃ dvijottamān | vedānadhyāpayāmāsa purā sārasvato muniḥ
जहाँ बारह वर्ष के अकाल में मुनि सारस्वत ने पूर्वकाल में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वेद पढ़ाए थे।
जनमेजय उवाच
श्लोक 4 (9.52.4)
कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् । वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ॥
kathaṃ dvādaśavārṣikyāmanāvṛṣṭyāṃ dvijottamān | vedānadhyāpayāmāsa purā sārasvato muniḥ
"बारह वर्ष के अकाल में मुनि सारस्वत ने पूर्वकाल में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वेद कैसे पढ़ाए?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (9.52.5)
आसीत्पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान्महातपाः । दधीचिरिति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥
āsītpūrvaṃ mahārāja munirdhīmānmahātapāḥ | dadhīciriti vikhyāto brahmacārī jitendriyaḥ
हे महाराज! पूर्वकाल में दधीचि नाम से प्रसिद्ध एक बुद्धिमान् और महातपस्वी मुनि थे, जो ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय थे।
श्लोक 6 (9.52.6)
तस्यातितपसः शक्रो बिभेति सततं विभो । न स लोभयितुं शक्यः फलैर्बहुविधैरपि ॥
tasyātitapasaḥ śakro bibheti satataṃ vibho | na sa lobhayituṃ śakyaḥ phalairbahuvidhairapi
हे विभो! उनकी महान् तपस्या से इन्द्र सदा डरते थे; अनेक प्रकार के फलों से भी उन्हें लुभाया नहीं जा सकता था।
श्लोक 7 (9.52.7)
प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत्पाकशासनः । दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुसाम् ॥
pralobhanārthaṃ tasyātha prāhiṇotpākaśāsanaḥ | divyāmapsarasaṃ puṇyāṃ darśanīyāmalambusām
उन्हें लुभाने के लिए पाकशासन इन्द्र ने दिव्य, पवित्र और सुन्दर अप्सरा अलम्बुसा को भेजा।
श्लोक 8 (9.52.8)
तस्य तर्पयतो देवान्सरस्वत्यां महात्मनः । समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भामिनी ॥
tasya tarpayato devānsarasvatyāṃ mahātmanaḥ | samīpato mahārāja sopātiṣṭhata bhāminī
हे महाराज! जब वे महात्मा सरस्वती में देवताओं का तर्पण कर रहे थे, तब वह सुन्दरी उनके समीप आकर खड़ी हो गई।
श्लोक 9 (9.52.9)
तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः । रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत्सा जग्राह निम्नगा ॥
tāṃ divyavapuṣaṃ dṛṣṭvā tasyarṣerbhāvitātmanaḥ | retaḥ skannaṃ sarasvatyāṃ tatsā jagrāha nimnagā
उसके दिव्य रूप को देखकर उन संयतचित्त ऋषि का वीर्य सरस्वती में गिर पड़ा, और उस नदी ने उसे ग्रहण कर लिया।
श्लोक 10 (9.52.10)
कुक्षौ चाप्यदधद्दृष्ट्वा तद्रेतः पुरुषर्षभ । सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महात्मनः ॥
kukṣau cāpyadadhaddṛṣṭvā tadretaḥ puruṣarṣabha | sā dadhāra ca taṃ garbhaṃ putrahetormahātmanaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ! उस वीर्य को देखकर नदी ने उसे अपने गर्भ में धारण कर लिया और उन महात्मा के पुत्र के लिए उस गर्भ को धारण किए रही।
श्लोक 11 (9.52.11)
सुषुवे चापि समये पुत्रं सारस्वतं वरम् । जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥
suṣuve cāpi samaye putraṃ sārasvataṃ varam | jagāma putramādāya tamṛṣiṃ prati ca prabho
हे प्रभो! समय आने पर उसने श्रेष्ठ पुत्र सारस्वत को जन्म दिया और पुत्र को लेकर उन ऋषि के पास गई।
श्लोक 12 (9.52.12)
ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् । ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् । ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया ॥
ṛṣisaṃsadi taṃ dṛṣṭvā sā nadī munisattamam | tataḥ provāca rājendra dadatī putramasya tam | brahmarṣe tava putro'yaṃ tvadbhaktyā dhārito mayā
ऋषियों की सभा में उन मुनिश्रेष्ठ को देखकर वह नदी, हे राजेन्द्र! उन्हें उनका पुत्र देती हुई बोली, "हे ब्रह्मर्षि! यह आपका पुत्र है, जिसे मैंने आपके प्रति भक्ति से धारण किया है।
सरस्वत्युवाच
श्लोक 13 (9.52.13)
दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत्स्कन्नं प्रागलम्बुसाम् । तत्कुक्षिणाऽहं ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् ॥
dṛṣṭvā te'psarasaṃ reto yatskannaṃ prāgalambusām | tatkukṣiṇā'haṃ brahmarṣe tvadbhaktyā dhṛtavatyaham
हे ब्रह्मर्षि! अप्सरा अलम्बुसा को देखकर आपका जो वीर्य गिरा था, उसे मैंने आपके प्रति भक्ति से अपने गर्भ में धारण किया।
श्लोक 14 (9.52.14)
न विनाशमिदं गच्छेत्त्वत्तेज इति निश्चयात् । प्रतिगृह्णीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ॥
na vināśamidaṃ gacchettvatteja iti niścayāt | pratigṛhṇīṣva putraṃ svaṃ mayā dattamaninditam
"आपका तेज नष्ट न हो" — इसी निश्चय से मैंने ऐसा किया। यह आपका अपना निर्दोष पुत्र है, जिसे मैं आपको देती हूँ; इसे ग्रहण कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (9.52.15)
इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् । पितृवच्चोपजिघ्रत्तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ॥
ityuktaḥ pratijagrāha prītiṃ cāvāpa puṣkalām | pitṛvaccopajighrattaṃ mūrdhni premṇā dvijottamaḥ
ऐसा कहे जाने पर उन्होंने बालक को ग्रहण किया और उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई; उन द्विजश्रेष्ठ ने प्रेम से पिता की भाँति उसका मस्तक सूँघा।
श्लोक 16 (9.52.16)
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम । सरस्वत्यै वरं प्रादात्प्रीयमाणो महामुनिः ॥
pariṣvajya ciraṃ kālaṃ tadā bharatasattama | sarasvatyai varaṃ prādātprīyamāṇo mahāmuniḥ
हे भरतश्रेष्ठ! बहुत देर तक उसे गले लगाकर प्रसन्न हुए उन महामुनि ने सरस्वती को वर दिया:
दधीचिरुवाच
श्लोक 17 (9.52.17)
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः । तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ॥
viśvedevāḥ sapitaro gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | tṛptiṃ yāsyanti subhage tarpyamāṇāstavāmbhasā
"हे सौभाग्यवती! विश्वेदेव, पितर तथा गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह तुम्हारे जल से तर्पण पाकर तृप्त होंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (9.52.18)
इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् । प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ॥
ityuktvā sa tu tuṣṭāva vacobhirvai mahānadīm | prītaḥ paramahṛṣṭātmā yathāvacchṛṇu pārthiva
यह कहकर प्रसन्न और अत्यन्त हर्षित हृदय से उन्होंने उस महानदी की वचनों से स्तुति की। हे राजन्! वह जैसी थी, वैसी सुनिए।
दधीचिरुवाच
श्लोक 19 (9.52.19)
प्रस्रुताऽसि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा । जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ॥
prasrutā'si mahābhāge saraso brahmaṇaḥ purā | jānanti tvāṃ saricchreṣṭhe munayaḥ saṃśitavratāḥ
"हे महाभागे! तुम आदि काल में ब्रह्मा के सरोवर से प्रवाहित हुई थीं; हे सरिताओं में श्रेष्ठ! दृढ़ व्रत वाले मुनि तुम्हें जानते हैं।
श्लोक 20 (9.52.20)
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने । तस्मात्सारस्वतं पुत्रमदधा वरवर्णिनि ॥
mama priyakarī cāpi satataṃ priyadarśane | tasmātsārasvataṃ putramadadhā varavarṇini
हे प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा प्रिय करती आई हो; इसलिए, हे सुन्दरी! तुमने सारस्वत पुत्र को धारण किया।
श्लोक 21 (9.52.21)
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः । सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ॥
tavaiva nāmnā prathitaḥ putraste lokabhāvanaḥ | sārasvata iti khyāto bhaviṣyati mahātapāḥ
तुम्हारा पुत्र, जो लोकों को धारण करने वाला होगा, तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा; वह महातपस्वी सारस्वत नाम से विख्यात होगा।
श्लोक 22 (9.52.22)
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् । सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ॥
eṣa dvādaśavārṣikyāmanāvṛṣṭyāṃ dvijarṣabhān | sārasvato mahābhāge vedānadhyāpayiṣyati
हे महाभागे! यही सारस्वत बारह वर्ष के अकाल में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वेद पढ़ाएगा।
श्लोक 23 (9.52.23)
पुण्याभ्यश्च सरिद्भ्यस्त्वं सदा पुण्यतमा शुभे । भविष्यसि महाभागे मत्प्रसादात्सरस्वति ॥
puṇyābhyaśca saridbhyastvaṃ sadā puṇyatamā śubhe | bhaviṣyasi mahābhāge matprasādātsarasvati
और हे शुभे सरस्वती! मेरी कृपा से तुम सदा अन्य सब पवित्र नदियों से अधिक पवित्र होओगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (9.52.24)
एवं सा संस्तुता तेन वरं लब्ध्वा महानदी । पुत्रमादाय मुदिता जगाम भरतर्षभ ॥
evaṃ sā saṃstutā tena varaṃ labdhvā mahānadī | putramādāya muditā jagāma bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उनसे स्तुति पाकर और वर प्राप्त करके वह महानदी प्रसन्न होकर पुत्र को लेकर चली गई।
श्लोक 25 (9.52.25)
एतस्मिन्नेव काले तु विरोधे देवदानवैः । शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन्विचचार ह ॥
etasminneva kāle tu virodhe devadānavaiḥ | śakraḥ praharaṇānveṣī lokāṃstrīnvicacāra ha
उसी समय, जब देवताओं और दानवों में वैर चल रहा था, इन्द्र शस्त्रों की खोज में तीनों लोकों में घूमे।
श्लोक 26 (9.52.26)
न चोपलेभे भगवाञ्शक्रः प्रहरणं तदा । यद्वै तेषां भवेद्योग्यं वधाय विबुधद्विषाम् ॥
na copalebhe bhagavāñśakraḥ praharaṇaṃ tadā | yadvai teṣāṃ bhavedyogyaṃ vadhāya vibudhadviṣām
परन्तु भगवान् इन्द्र को ऐसा कोई शस्त्र नहीं मिला जो देवताओं के उन शत्रुओं का वध करने के योग्य हो।
श्लोक 27 (9.52.27)
ततोऽब्रवीत्सुराञ्शक्रो न मे शक्याः सुरारयः । ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः ॥
tato'bravītsurāñśakro na me śakyāḥ surārayaḥ | ṛte'sthibhirdadhīcasya nihantuṃ tridaśadviṣaḥ
तब इन्द्र ने देवताओं से कहा, "देवताओं के इन शत्रुओं को मैं दधीच की हड्डियों के बिना नहीं मार सकता।
शक्र उवाच
श्लोक 28 (9.52.28)
तस्माद्यत्नादृषिश्रेष्ठो याच्यतां कार्यसिद्धये । दधीचास्थीनि देहीति तैर्वधिष्यामहे रिपून् ॥
tasmādyatnādṛṣiśreṣṭho yācyatāṃ kāryasiddhaye | dadhīcāsthīni dehīti tairvadhiṣyāmahe ripūn
इसलिए हमारे कार्य की सिद्धि के लिए उन ऋषिश्रेष्ठ से यत्नपूर्वक याचना की जाए, 'दधीच! अपनी हड्डियाँ दीजिए' — उनसे हम शत्रुओं को मारेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (9.52.29)
स च तैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा । साहाय्यं नः कुरुष्वेति चकारैवाविचारयन् ॥
sa ca tairyācito'sthīni yatnādṛṣivarastadā | sāhāyyaṃ naḥ kuruṣveti cakāraivāvicārayan
उन देवताओं ने जब यत्नपूर्वक उनसे हड्डियाँ माँगीं और कहा, "हमारी सहायता कीजिए," तब उन ऋषिश्रेष्ठ ने बिना विचार किए वैसा ही कर दिया।
श्लोक 30 (9.52.30)
स लोकानक्षयान्प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा । तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा ॥
sa lokānakṣayānprāpto devapriyakarastadā | tasyāsthibhiratho śakraḥ samprahṛṣṭamanāstadā
देवताओं का प्रिय करने वाले वे अक्षय लोकों को प्राप्त हुए; और उनकी हड्डियों से इन्द्र ने अत्यन्त प्रसन्न मन से
श्लोक 31 (9.52.31)
कारयामास दिव्यानि नानाप्रहरणान्युत । गदा वज्राणि चक्राणि गुरून्दण्डांश्च पुष्कलान् ॥
kārayāmāsa divyāni nānāpraharaṇānyuta | gadā vajrāṇi cakrāṇi gurūndaṇḍāṃśca puṣkalān
अनेक प्रकार के दिव्य शस्त्र बनवाए — गदाएँ, वज्र, चक्र और बहुत-से भारी दण्ड।
श्लोक 32 (9.52.32)
स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा । प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः ॥
sa hi tīvreṇa tapasā sambhṛtaḥ paramarṣiṇā | prajāpatisutenātha bhṛguṇā lokabhāvanaḥ
वह वज्र प्रजापति के पुत्र महर्षि भृगु ने तीव्र तपस्या से तैयार किया था; वह लोकों को धारण करने वाला था।
श्लोक 33 (9.52.33)
अतिकायः स तेजस्वी लोकसारो विनिर्मितः । जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः ॥
atikāyaḥ sa tejasvī lokasāro vinirmitaḥ | jajñe śailaguruḥ prāṃśurmahimnā prathitaḥ prabhuḥ
विशाल देह वाला, तेजस्वी, लोकों के सार से बना हुआ वह पर्वत-सा भारी और ऊँचा प्रकट हुआ, अपने प्रताप से प्रसिद्ध, समर्थ।
श्लोक 34 (9.52.34)
नित्यमुद्विजते चास्य तेजसः पाकशासनः ॥
nityamudvijate cāsya tejasaḥ pākaśāsanaḥ
पाकशासन इन्द्र उन मुनि के तेज से सदा भयभीत रहते थे।
श्लोक 35 (9.52.35)
तेन वज्रेण भगवान्मन्त्रयुक्तेन भारत । भृशं क्रोधविसृष्टेन ब्रह्मतेजोद्भवेन च । दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव ॥
tena vajreṇa bhagavānmantrayuktena bhārata | bhṛśaṃ krodhavisṛṣṭena brahmatejodbhavena ca | daityadānavavīrāṇāṃ jaghāna navatīrnava
मन्त्रों से अभिमन्त्रित, अत्यन्त क्रोध से छोड़े गए और ब्रह्मतेज से उत्पन्न उस वज्र से भगवान् इन्द्र ने दैत्यों और दानवों के नौ गुना नब्बे वीरों का संहार किया।
श्लोक 36 (9.52.36)
अथ काले व्यतिक्रान्ते महत्यतिभयङ्करी । अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन्द्वादशवार्षिकी ॥
atha kāle vyatikrānte mahatyatibhayaṅkarī | anāvṛṣṭiranuprāptā rājandvādaśavārṣikī
फिर समय बीतने पर, हे राजन्! बारह वर्ष की अत्यन्त भयंकर अनावृष्टि आ पड़ी।
श्लोक 37 (9.52.37)
तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षयः । वृत्त्यर्थं प्राद्रवन्राजन्क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् ॥
tasyāṃ dvādaśavārṣikyāmanāvṛṣṭyāṃ maharṣayaḥ | vṛttyarthaṃ prādravanrājankṣudhārtāḥ sarvatodiśam
हे राजन्! उस बारह वर्ष के अकाल में भूख से पीड़ित महर्षि जीविका के लिए चारों ओर भाग निकले।
श्लोक 38 (9.52.38)
दिग्भ्यस्तान्प्रद्रुतान्दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा । गमनाय मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती ॥
digbhyastānpradrutāndṛṣṭvā muniḥ sārasvatastadā | gamanāya matiṃ cakre taṃ provāca sarasvatī
उन्हें दिशा-दिशा में भागते देखकर मुनि सारस्वत ने भी जाने का विचार किया; तब सरस्वती ने उनसे कहा:
सरस्वत्युवाच
श्लोक 39 (9.52.39)
न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा । दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत ॥
na gantavyamitaḥ putra tavāhāramahaṃ sadā | dāsyāmi matsyapravarānuṣyatāmiha bhārata
"पुत्र! तुम्हें यहाँ से नहीं जाना चाहिए। मैं सदा तुम्हें भोजन के रूप में उत्तम मछलियाँ दूँगी। हे भारत! तुम यहीं रहो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (9.52.40)
इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन्देवतास्तथा । आहारमकरोन्नित्यं प्राणान्वेदांश्च धारयन् ॥
ityuktastarpayāmāsa sa pitṝndevatāstathā | āhāramakaronnityaṃ prāṇānvedāṃśca dhārayan
ऐसा कहे जाने पर उन्होंने पितरों और देवताओं का तर्पण किया और प्रतिदिन वही आहार करते हुए अपने प्राणों और वेदों को धारण किए रहे।
श्लोक 41 (9.52.41)
अथ तस्यामनावृष्ट्यामतीतायां महर्षयः । अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्यायकारणात् ॥
atha tasyāmanāvṛṣṭyāmatītāyāṃ maharṣayaḥ | anyonyaṃ paripapracchuḥ punaḥ svādhyāyakāraṇāt
फिर वह अकाल बीत जाने पर महर्षियों ने वेदाध्ययन के लिए फिर एक-दूसरे से पूछा।
श्लोक 42 (9.52.42)
तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदा विधावताम् । सर्वेषामेव राजेन्द्र न किञ्चित्प्रतिभाति ह ॥
teṣāṃ kṣudhāparītānāṃ naṣṭā vedā vidhāvatām | sarveṣāmeva rājendra na kiñcitpratibhāti ha
भूख से पीड़ित होकर भटकते हुए उन सबके वेद नष्ट हो गए थे; हे राजेन्द्र! उन सबमें से किसी को भी कुछ याद नहीं रहा।
श्लोक 43 (9.52.43)
अथ कश्चिदृषिस्तेषां सारस्वतमुपेयिवान् । कुर्वाणं संशितात्मानं स्वाध्यायमृषिसत्तमम् ॥
atha kaścidṛṣisteṣāṃ sārasvatamupeyivān | kurvāṇaṃ saṃśitātmānaṃ svādhyāyamṛṣisattamam
तब उनमें से एक ऋषि संयतचित्त होकर वेद-पाठ करते हुए ऋषिश्रेष्ठ सारस्वत के पास पहुँचा।
श्लोक 44 (9.52.44)
स गत्वाऽचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमृषिं प्रभुम् । स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने ॥
sa gatvā'caṣṭa tebhyaśca sārasvatamṛṣiṃ prabhum | svādhyāyamamaraprakhyaṃ kurvāṇaṃ vijane vane
उसने जाकर उन सबको बताया कि प्रभावशाली ऋषि सारस्वत निर्जन वन में देवता के समान वेद-पाठ कर रहे हैं।
श्लोक 45 (9.52.45)
ततः सर्वे समाजग्मुस्तत्र राजन्महर्षयः । सारस्वतं मुनिश्रेष्ठमिदमूचुः समागताः ॥
tataḥ sarve samājagmustatra rājanmaharṣayaḥ | sārasvataṃ muniśreṣṭhamidamūcuḥ samāgatāḥ
हे राजन्! तब सब महर्षि वहाँ एकत्र हुए और मुनिश्रेष्ठ सारस्वत से यह बोले:
श्लोक 46 (9.52.46)
अस्मानध्यापयस्वेति तानुवाच ततो मुनिः । शिष्यत्वमुपागच्छध्वं विधिना च ममेत्युत ॥
asmānadhyāpayasveti tānuvāca tato muniḥ | śiṣyatvamupāgacchadhvaṃ vidhinā ca mametyuta
"हमें पढ़ाइए।" तब मुनि ने उनसे कहा, "विधिपूर्वक मेरे शिष्य बन जाइए।"
श्लोक 47 (9.52.47)
तत्राब्रुवन्मुनिगणा बालस्त्वमसि पुत्रक । स तानाह न मे धर्मो नश्येदिति पुनर्मुनीन् ॥
tatrābruvanmunigaṇā bālastvamasi putraka | sa tānāha na me dharmo naśyediti punarmunīn
तब मुनियों के समूह ने कहा, "पुत्र! तुम तो बालक हो।" उसने उन मुनियों से फिर कहा, "मेरा धर्म नष्ट न हो।
सारस्वत उवाच
श्लोक 48 (9.52.48)
यो ह्यधर्मेण वै ब्रूयाद्गृह्णीयाद्योऽप्यधर्मतः । म्रियेतां तावुभौ क्षिप्रं स्यातां वा वैरिणावुभौ ॥
yo hyadharmeṇa vai brūyādgṛhṇīyādyo'pyadharmataḥ | mriyetāṃ tāvubhau kṣipraṃ syātāṃ vā vairiṇāvubhau
जो अधर्म से पढ़ाए, या जो अधर्म से ग्रहण करे, वे दोनों शीघ्र मर जाते हैं, अथवा दोनों एक-दूसरे के शत्रु बन जाते हैं।
श्लोक 49 (9.52.49)
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥
na hāyanairna palitairna vittena na bandhubhiḥ | ṛṣayaścakrire dharmaṃ yo'nūcānaḥ sa no mahān
ऋषियों ने वर्षों, सफ़ेद बालों, धन या बन्धुओं के आधार पर धर्म की व्यवस्था नहीं की; जो वेदों का ज्ञाता है, वही हममें महान् है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 50 (9.52.50)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य मुनयस्ते विधानतः । तस्माद्वेदाननुप्राप्य पुनर्धर्मं प्रचक्रिरे ॥
etacchrutvā vacastasya munayaste vidhānataḥ | tasmādvedānanuprāpya punardharmaṃ pracakrire
उसकी यह बात सुनकर उन मुनियों ने विधिपूर्वक उससे वेद प्राप्त किए और फिर धर्म का आचरण किया।
श्लोक 51 (9.52.51)
षष्टिर्मुनिसहस्राणि शिष्यत्वं प्रतिपेदिरे । सारस्वतस्य विप्रर्षेर्वेदस्वाध्यायकारणात् ॥
ṣaṣṭirmunisahasrāṇi śiṣyatvaṃ pratipedire | sārasvatasya viprarṣervedasvādhyāyakāraṇāt
साठ हज़ार मुनि वेदाध्ययन के लिए ब्रह्मर्षि सारस्वत के शिष्य बने।
श्लोक 52 (9.52.52)
मुष्टिं मुष्टिं ततः सर्वे दर्भाणां ते ह्युपाहरन् । तस्यासनार्थं विप्रर्षेर्बालस्यापि वशे स्थिताः ॥
muṣṭiṃ muṣṭiṃ tataḥ sarve darbhāṇāṃ te hyupāharan | tasyāsanārthaṃ viprarṣerbālasyāpi vaśe sthitāḥ
तब उन सबने उन बालक ऋषि के आसन के लिए मुट्ठी-मुट्ठी भर कुश लाकर दिए; वे उनके अधीन होकर रहे।
श्लोक 53 (9.52.53)
तत्रापि दत्त्वा वसु रौहिणेयो । महाबलः केशवपूर्वजोऽथ । जगाम तीर्थं मुदितः क्रमेण । तं वृद्धकन्याश्रममेव वीरः ॥
tatrāpi dattvā vasu rauhiṇeyo | mahābalaḥ keśavapūrvajo'tha | jagāma tīrthaṃ muditaḥ krameṇa | taṃ vṛddhakanyāśramameva vīraḥ
वहाँ भी धन दान करके केशव के बड़े भाई, महाबली रोहिणीपुत्र बलराम प्रसन्न होकर क्रम से उस तीर्थ को गए — उन वीर ने वृद्धकन्या के उसी आश्रम में प्रवेश किया।