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शल्य पर्व · अध्याय 51

देवल और जैगीषव्य

वैशम्पायन गृहस्थ तपस्वी असित देवल और उनके आश्रम में रहने वाले मौनी भिक्षु जैगीषव्य की कथा सुनाते हैं। देवल समुद्र के तट पर जैगीषव्य को अपने से पहले पहुँचा देखते हैं और उनके पीछे एक के बाद एक लोकों को पार करते हुए ब्रह्मलोक तक पहुँचते हैं, जहाँ वे प्रवेश नहीं कर पाते। विनीत होकर वे जैगीषव्य से उपदेश माँगते हैं और अपने ऊपर निर्भर प्राणियों के रुदन के बावजूद गृहस्थ-धर्म छोड़कर सिद्धि पाते हैं। फिर बलराम वहाँ स्नान करके ब्राह्मणों को दान देते हैं और सोम के महान् तीर्थ को जाते हैं।

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.51.1)

तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः । गार्हस्थ्यं धर्ममास्थाय असितो देवलः पुरा ॥

tasminneva tu dharmātmā vasati sma tapodhanaḥ | gārhasthyaṃ dharmamāsthāya asito devalaḥ purā

उसी स्थान पर पूर्वकाल में धर्मात्मा और तपस्वी असित देवल रहते थे, जिन्होंने गृहस्थ-धर्म का आश्रय लिया था।

श्लोक 2 (9.51.2)

धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपाः । कर्मणा मनसा वाचा समः सर्वेषु जन्तुषु ॥

dharmanityaḥ śucirdānto nyastadaṇḍo mahātapāḥ | karmaṇā manasā vācā samaḥ sarveṣu jantuṣu

वे सदा धर्म में लगे रहने वाले, पवित्र और जितेन्द्रिय थे और उन्होंने हिंसा का त्याग कर दिया था। वे महातपस्वी कर्म, मन और वाणी से सभी प्राणियों के प्रति समभाव रखते थे।

श्लोक 3 (9.51.3)

अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दाप्रियाप्रियः । काञ्चने लोष्टके चैव समदर्शी महातपाः ॥

akrodhano mahārāja tulyanindāpriyāpriyaḥ | kāñcane loṣṭake caiva samadarśī mahātapāḥ

हे महाराज! वे क्रोधरहित थे; निन्दा और प्रशंसा तथा प्रिय और अप्रिय में उनके लिए कोई भेद नहीं था। वे महातपस्वी मिट्टी के ढेले और सोने को समान दृष्टि से देखते थे।

श्लोक 4 (9.51.4)

देवताः पूजयन्नित्यमतिथींश्च द्विजैः सह । ब्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपरायणः ॥

devatāḥ pūjayannityamatithīṃśca dvijaiḥ saha | brahmacaryarato nityaṃ sadā dharmaparāyaṇaḥ

वे देवताओं की पूजा करते थे और ब्राह्मणों के साथ अतिथियों का सत्कार करते थे; वे सदा ब्रह्मचर्य में रत और निरन्तर धर्म-परायण थे।

श्लोक 5 (9.51.5)

ततोऽभ्येत्य महाराज योगमास्थाय भिक्षुकः । जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः ॥

tato'bhyetya mahārāja yogamāsthāya bhikṣukaḥ | jaigīṣavyo munirdhīmāṃstasmiṃstīrthe samāhitaḥ

हे महाराज! तब बुद्धिमान् मुनि जैगीषव्य योग का आश्रय लेकर भिक्षुक के वेश में वहाँ आए और उसी तीर्थ में एकाग्रचित्त होकर रहने लगे।

श्लोक 6 (9.51.6)

देवलस्याश्रमे राजन्न्यवसत्स महाद्युतिः । योगनित्यो महाराज सिद्धिं प्राप्तो महातपाः ॥

devalasyāśrame rājannyavasatsa mahādyutiḥ | yoganityo mahārāja siddhiṃ prāpto mahātapāḥ

हे राजन्! वे महातेजस्वी मुनि देवल के आश्रम में रहते थे। हे महाराज! वे सदा योग में लगे रहते थे और उन महातपस्वी ने सिद्धि प्राप्त कर ली थी।

श्लोक 7 (9.51.7)

तं तत्र वसमानं तु जैगीषव्यं महामुनिम् । देवलो दर्शयन्नेव नैवायुञ्जत धर्मतः ॥

taṃ tatra vasamānaṃ tu jaigīṣavyaṃ mahāmunim | devalo darśayanneva naivāyuñjata dharmataḥ

वहाँ रहते हुए महामुनि जैगीषव्य को देवल देखते तो थे, परन्तु धर्मानुसार उनसे कोई व्यवहार नहीं करते थे।

श्लोक 8 (9.51.8)

एवं तयोर्महाराज दीर्घकालो व्यतिक्रमत् । जैगीषव्यं मुनिं चैव न ददर्शाथ देवलः ॥

evaṃ tayormahārāja dīrghakālo vyatikramat | jaigīṣavyaṃ muniṃ caiva na dadarśātha devalaḥ

हे महाराज! इस प्रकार दीर्घ काल बीत गया, और देवल को मुनि जैगीषव्य दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 9 (9.51.9)

आहारकाले मतिमान्परिव्राड्जनमेजय । उपातिष्ठत धर्मज्ञो भैक्षकाले स देवलम् ॥

āhārakāle matimānparivrāḍjanamejaya | upātiṣṭhata dharmajño bhaikṣakāle sa devalam

हे जनमेजय! भोजन के समय वे बुद्धिमान् धर्मज्ञ परिव्राजक भिक्षा के समय देवल के पास आया करते थे।

श्लोक 10 (9.51.10)

स दृष्ट्वा भिक्षुरूपेण प्राप्तं तत्र महामुनिम् । गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा ॥

sa dṛṣṭvā bhikṣurūpeṇa prāptaṃ tatra mahāmunim | gauravaṃ paramaṃ cakre prītiṃ ca vipulāṃ tathā

भिक्षु के रूप में आए हुए उन महामुनि को देखकर देवल ने उनका बहुत आदर किया और उन पर बड़ा स्नेह प्रकट किया।

श्लोक 11 (9.51.11)

देवलस्तु यथाशक्ति पूजयामास भारत । ऋषिदृष्टेन विधिना समा बह्व्यः समाहितः ॥

devalastu yathāśakti pūjayāmāsa bhārata | ṛṣidṛṣṭena vidhinā samā bahvyaḥ samāhitaḥ

हे भारत! देवल ने ऋषियों द्वारा बताई हुई विधि से, एकाग्र मन के साथ, अपनी शक्ति के अनुसार अनेक वर्षों तक उनकी पूजा की।

श्लोक 12 (9.51.12)

कदाचित्तस्य नृपते देवलस्य महात्मनः । चिन्ता सुमहती जाता मुनिं दृष्ट्वा महाद्युतिम् ॥

kadācittasya nṛpate devalasya mahātmanaḥ | cintā sumahatī jātā muniṃ dṛṣṭvā mahādyutim

हे राजन्! एक बार उन तेजस्वी मुनि को देखकर महात्मा देवल के मन में बड़ी चिन्ता उत्पन्न हुई।

श्लोक 13 (9.51.13)

समास्तु समतिक्रान्ता बह्व्यः पूजयतो मम । न चायमलसो भिक्षुरभ्यभाषत किञ्चन ॥

samāstu samatikrāntā bahvyaḥ pūjayato mama | na cāyamalaso bhikṣurabhyabhāṣata kiñcana

"मुझे उनका सत्कार करते हुए बहुत वर्ष बीत गए, फिर भी इस आलसी भिक्षु ने मुझसे एक शब्द भी नहीं कहा।"

श्लोक 14 (9.51.14)

एवं विगणयन्नेव स जगाम महोदधिम् । अन्तरिक्षचरः श्रीमान्कलशं गृह्य देवलः ॥

evaṃ vigaṇayanneva sa jagāma mahodadhim | antarikṣacaraḥ śrīmānkalaśaṃ gṛhya devalaḥ

इस प्रकार सोचते हुए तेजस्वी देवल घड़ा लेकर आकाश-मार्ग से महासागर की ओर चल पड़े।

श्लोक 15 (9.51.15)

गच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां पतिम् । जैगीषव्यं ततोऽपश्यद्गतं प्रागेव भारत ॥

gacchanneva sa dharmātmā samudraṃ saritāṃ patim | jaigīṣavyaṃ tato'paśyadgataṃ prāgeva bhārata

हे भारत! नदियों के स्वामी समुद्र के पास पहुँचते ही धर्मात्मा देवल ने देखा कि जैगीषव्य पहले से ही वहाँ पहुँचे हुए हैं।

श्लोक 16 (9.51.16)

ततः सविस्मयश्चिन्तां जगामाथासितः प्रभुः । कथं भिक्षुरयं प्राप्तः समुद्रे स्नात एव च ॥

tataḥ savismayaścintāṃ jagāmāthāsitaḥ prabhuḥ | kathaṃ bhikṣurayaṃ prāptaḥ samudre snāta eva ca

तब प्रभु असित विस्मय से चिन्ता में पड़ गए और सोचने लगे, "यह भिक्षु यहाँ कैसे आ गया, और समुद्र में स्नान भी कर चुका!"

श्लोक 17 (9.51.17)

इत्येवं चिन्तयामास महर्षिरसितस्तदा । स्नात्वा समुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप ह ॥

ityevaṃ cintayāmāsa maharṣirasitastadā | snātvā samudre vidhivacchucirjapyaṃ jajāpa ha

महर्षि असित इस प्रकार सोचते रहे; फिर उन्होंने समुद्र में विधिपूर्वक स्नान किया और पवित्र होकर जप किया।

श्लोक 18 (9.51.18)

कृतजप्याह्निकः श्रीमानाश्रमं च जगाम ह । कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय ॥

kṛtajapyāhnikaḥ śrīmānāśramaṃ ca jagāma ha | kalaśaṃ jalapūrṇaṃ vai gṛhītvā janamejaya

हे जनमेजय! अपना नित्य जप पूरा करके वे तेजस्वी मुनि जल से भरा घड़ा लेकर आश्रम लौट आए।

श्लोक 19 (9.51.19)

ततः स प्रविशन्नेव स्वमाश्रमपदं मुनिः । आसीनमाश्रमे तत्र जैगीषव्यमपश्यत ॥

tataḥ sa praviśanneva svamāśramapadaṃ muniḥ | āsīnamāśrame tatra jaigīṣavyamapaśyata

अपने आश्रम में प्रवेश करते ही मुनि ने जैगीषव्य को वहाँ बैठे हुए देखा।

श्लोक 20 (9.51.20)

न व्याहरति चैवैनं जैगीषव्यः कथञ्चन । काष्ठभूतोऽऽश्रमपदे वसति स्म महातपाः ॥

na vyāharati caivainaṃ jaigīṣavyaḥ kathañcana | kāṣṭhabhūto''śramapade vasati sma mahātapāḥ

जैगीषव्य ने उनसे कुछ भी नहीं कहा; वे महातपस्वी आश्रम में काठ की तरह निश्चल बने रहे।

श्लोक 21 (9.51.21)

तं दृष्ट्वा चाप्लुतं तोये सागरे सागरोपमम् । प्रविष्टमाश्रमं चापि पूर्वमेव ददर्श सः ॥

taṃ dṛṣṭvā cāplutaṃ toye sāgare sāgaropamam | praviṣṭamāśramaṃ cāpi pūrvameva dadarśa saḥ

उन्होंने समुद्र के जल में स्नान करते हुए समुद्र-जैसे गम्भीर जैगीषव्य को देखा था, और अब यह भी देखा कि वे उनसे पहले ही आश्रम में प्रवेश कर चुके हैं।

श्लोक 22 (9.51.22)

असितो देवलो राजंश्चिन्तयामास बुद्धिमान् । दृष्टः प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ॥

asito devalo rājaṃścintayāmāsa buddhimān | dṛṣṭaḥ prabhāvaṃ tapaso jaigīṣavyasya yogajam

हे राजन्! बुद्धिमान् असित देवल ने सोचा, "मैंने जैगीषव्य की योग से उत्पन्न तपस्या का प्रभाव देख लिया।"

श्लोक 23 (9.51.23)

चिन्तयामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः । मया दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथं त्वयम् ॥

cintayāmāsa rājendra tadā sa munisattamaḥ | mayā dṛṣṭaḥ samudre ca āśrame ca kathaṃ tvayam

हे राजेन्द्र! उन मुनिश्रेष्ठ ने फिर सोचा, "मैंने इन्हें समुद्र में देखा और आश्रम में भी देख रहा हूँ; यह कैसे सम्भव है?"

श्लोक 24 (9.51.24)

एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः । उत्पपाताश्रमात्तस्मादन्तरिक्षं विशां पते ॥

evaṃ vigaṇayanneva sa munirmantrapāragaḥ | utpapātāśramāttasmādantarikṣaṃ viśāṃ pate

हे प्रजापालक! इस प्रकार विचार करते हुए मन्त्रों के पारंगत वे मुनि आश्रम से उठकर आकाश में उड़ गए,

श्लोक 25 (9.51.25)

जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ॥

jijñāsārthaṃ tadā bhikṣorjaigīṣavyasya devalaḥ

भिक्षु जैगीषव्य के विषय में सत्य जानने के लिए।

श्लोक 26 (9.51.26)

सोऽन्तरिक्षचरान्सिद्धान्समपश्यत्समाहितान् । जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ॥

so'ntarikṣacarānsiddhānsamapaśyatsamāhitān | jaigīṣavyaṃ ca taiḥ siddhaiḥ pūjyamānamapaśyata

उन्होंने आकाश में विचरने वाले, एकाग्रचित्त सिद्धों को देखा और देखा कि उन सिद्धों के द्वारा जैगीषव्य का सम्मान हो रहा है।

श्लोक 27 (9.51.27)

ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः । अपश्यद्वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ॥

tato'sitaḥ susaṃrabdho vyavasāyī dṛḍhavrataḥ | apaśyadvai divaṃ yāntaṃ jaigīṣavyaṃ sa devalaḥ

तब अत्यन्त व्याकुल, किन्तु निश्चयी और दृढ़ व्रत वाले असित देवल ने जैगीषव्य को स्वर्ग की ओर जाते देखा।

श्लोक 28 (9.51.28)

तस्माच्च पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत । पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ॥

tasmācca pitṛlokaṃ taṃ vrajantaṃ so'nvapaśyata | pitṛlokācca taṃ yāntaṃ yāmyaṃ lokamapaśyata

वहाँ से उन्होंने उन्हें पितृलोक की ओर जाते देखा, और पितृलोक से यमलोक की ओर जाते देखा।

श्लोक 29 (9.51.29)

तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिष्टुतम् । व्रजन्तमन्वपश्यत्स जैगीषव्यं महामुनिम् ॥

tasmādapi samutpatya somalokamabhiṣṭutam | vrajantamanvapaśyatsa jaigīṣavyaṃ mahāmunim

वहाँ से भी ऊपर उठकर उन्होंने महामुनि जैगीषव्य को स्तुत सोमलोक की ओर जाते देखा।

श्लोक 30 (9.51.30)

लोकान्समुत्पतन्तं च शुभानेकान्तयाजिनाम् । ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्तेभ्यश्चाप्युत्पपात ह ॥

lokānsamutpatantaṃ ca śubhānekāntayājinām | tato'gnihotriṇāṃ lokāṃstebhyaścāpyutpapāta ha

उन्होंने देखा कि जैगीषव्य एकनिष्ठ भाव से यज्ञ करने वालों के शुभ लोकों में ऊपर उठते हुए, फिर अग्निहोत्रियों के लोकों में पहुँचे, और उनसे भी आगे निकल गए।

श्लोक 31 (9.51.31)

दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः । तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुयाजिनाम् ॥

darśaṃ ca paurṇamāsaṃ ca ye yajanti tapodhanāḥ | tebhyaḥ sa dadṛśe dhīmām̐llokebhyaḥ paśuyājinām

फिर जो तपस्वी दर्श और पौर्णमास याग करते हैं और जो पशुयाग करते हैं, उनके लोकों से भी बुद्धिमान् देवल ने उन्हें आगे जाते देखा,

श्लोक 32 (9.51.32)

व्रजन्तं लोकममलमपश्यद्देवपूजितम् ॥

vrajantaṃ lokamamalamapaśyaddevapūjitam

एक निर्मल लोक की ओर, जो देवताओं से पूजित था।

श्लोक 33 (9.51.33)

चातुर्मास्यैर्बहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः । तेषां स्थानं तथा यान्तं तथाग्निष्टोमयाजिनाम् ॥

cāturmāsyairbahuvidhairyajante ye tapodhanāḥ | teṣāṃ sthānaṃ tathā yāntaṃ tathāgniṣṭomayājinām

जो तपस्वी अनेक प्रकार के चातुर्मास्य यज्ञ करते हैं और जो अग्निष्टोम यज्ञ करने वाले हैं, उनके स्थानों की ओर भी उन्हें जाते देखा।

श्लोक 34 (9.51.34)

अग्निष्टुतेन च तथा ये यजन्ति तपोधनाः । तत्स्थानमनुसम्प्राप्तमन्वपश्यत देवलः ॥

agniṣṭutena ca tathā ye yajanti tapodhanāḥ | tatsthānamanusamprāptamanvapaśyata devalaḥ

और जो तपस्वी अग्निष्टुत से यज्ञ करते हैं, उनके स्थान पर भी देवल ने उन्हें पहुँचते देखा।

श्लोक 35 (9.51.35)

वाजपेयं क्रतुवरं तथा बहुसुवर्णकम् । आहरन्ति महाप्राज्ञास्तेषां लोकेष्वपश्यत ॥

vājapeyaṃ kratuvaraṃ tathā bahusuvarṇakam | āharanti mahāprājñāsteṣāṃ lokeṣvapaśyata

बहुत स्वर्ण-दक्षिणा वाले श्रेष्ठ वाजपेय यज्ञ को जो महाज्ञानी करते हैं, उनके लोकों में भी उन्होंने उन्हें देखा।

श्लोक 36 (9.51.36)

यजन्ते पुण्डरीकेण राजसूयेन चैव ये । तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ॥

yajante puṇḍarīkeṇa rājasūyena caiva ye | teṣāṃ lokeṣvapaśyacca jaigīṣavyaṃ sa devalaḥ

जो पुण्डरीक और राजसूय यज्ञ से यजन करते हैं, उनके लोकों में भी देवल ने जैगीषव्य को देखा।

श्लोक 37 (9.51.37)

अश्वमेधं क्रतुवरं नरमेधं तथैव च । आहरन्ति नरश्रेष्ठास्तेषां लोकेष्वपश्यत ॥

aśvamedhaṃ kratuvaraṃ naramedhaṃ tathaiva ca | āharanti naraśreṣṭhāsteṣāṃ lokeṣvapaśyata

श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ और नरमेध यज्ञ को जो नरश्रेष्ठ करते हैं, उनके लोकों में भी उन्होंने उन्हें देखा।

श्लोक 38 (9.51.38)

सर्वमेधं च दुष्प्रापं तथा सौत्रामणिं च ये । तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ॥

sarvamedhaṃ ca duṣprāpaṃ tathā sautrāmaṇiṃ ca ye | teṣāṃ lokeṣvapaśyacca jaigīṣavyaṃ sa devalaḥ

जो दुर्लभ सर्वमेध और सौत्रामणि यज्ञ करते हैं, उनके लोकों में भी देवल ने जैगीषव्य को देखा।

श्लोक 39 (9.51.39)

द्वादशाहैश्च सत्रैर्ये यजन्ते विविधैर्नृप । तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ॥

dvādaśāhaiśca satrairye yajante vividhairnṛpa | teṣāṃ lokeṣvapaśyacca jaigīṣavyaṃ sa devalaḥ

हे राजन्! जो द्वादशाह तथा अनेक प्रकार के सत्रों से यजन करते हैं, उनके लोकों में भी देवल ने जैगीषव्य को देखा।

श्लोक 40 (9.51.40)

मित्रावरुणयोर्लोकानादित्यानां तथैव च । सलोकतामनुप्राप्तमपश्यत ततोऽसितः ॥

mitrāvaruṇayorlokānādityānāṃ tathaiva ca | salokatāmanuprāptamapaśyata tato'sitaḥ

तब असित ने उन्हें मित्र-वरुण और आदित्यों के लोकों में पहुँचकर उनके साथ एक ही लोक का निवासी होते देखा।

श्लोक 41 (9.51.41)

रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च बृहस्पतेः । तानि सर्वाण्यतीतं च समपश्यत्ततोऽसितः ॥

rudrāṇāṃ ca vasūnāṃ ca sthānaṃ yacca bṛhaspateḥ | tāni sarvāṇyatītaṃ ca samapaśyattato'sitaḥ

रुद्रों, वसुओं और बृहस्पति के जो स्थान हैं, उन सबको भी वे पार कर चुके हैं, यह असित ने देखा।

श्लोक 42 (9.51.42)

आरुह्य च गवां लोकं प्रयान्तं ब्रह्मसत्रिणाम् । लोकानपश्यद्गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः ॥

āruhya ca gavāṃ lokaṃ prayāntaṃ brahmasatriṇām | lokānapaśyadgacchantaṃ jaigīṣavyaṃ tato'sitaḥ

असित ने देखा कि ब्रह्मसत्र करने वालों के गौओं के लोक पर चढ़कर वे उन लोकों में आगे बढ़ते जा रहे हैं।

श्लोक 43 (9.51.43)

त्रीँल्लोकानपरान्विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा । पतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत ॥

trīm̐llokānaparānvipramutpatantaṃ svatejasā | pativratānāṃ lokāṃśca vrajantaṃ so'nvapaśyata

उन्होंने देखा कि वे विप्र अपने तेज से तीन और लोकों तक ऊपर उठे और पतिव्रताओं के लोकों में जा रहे हैं।

श्लोक 44 (9.51.44)

ततो मुनिवरं भूयो जैगीषव्यमथासितः । नान्वपश्यत योगस्थमन्तर्हितमरिंदम ॥

tato munivaraṃ bhūyo jaigīṣavyamathāsitaḥ | nānvapaśyata yogasthamantarhitamariṃdama

हे शत्रुदमन! फिर असित को योग में स्थित मुनिश्रेष्ठ जैगीषव्य दिखाई नहीं दिए; वे अन्तर्धान हो गए थे।

श्लोक 45 (9.51.45)

सोऽचिन्तयन्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः । प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम् ॥

so'cintayanmahābhāgo jaigīṣavyasya devalaḥ | prabhāvaṃ suvratatvaṃ ca siddhiṃ yogasya cātulām

महाभाग देवल जैगीषव्य के प्रभाव, उनके उत्तम व्रतों और उनके योग की अनुपम सिद्धि पर विचार करने लगे।

श्लोक 46 (9.51.46)

असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान् । प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान्ब्रह्मसत्रिणः ॥

asito'pṛcchata tadā siddhām̐llokeṣu sattamān | prayataḥ prāñjalirbhūtvā dhīrastānbrahmasatriṇaḥ

तब असित ने संयत और धीर होकर हाथ जोड़े और उन लोकों के श्रेष्ठ सिद्धों से, जो ब्रह्मसत्र करने वाले थे, पूछा:

देवल उवाच

श्लोक 47 (9.51.47)

जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसत महौजसम् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥

jaigīṣavyaṃ na paśyāmi taṃ śaṃsata mahaujasam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me

"मैं जैगीषव्य को नहीं देख पा रहा हूँ। उन महातेजस्वी के विषय में मुझे बताइए; मैं यह सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे बहुत कौतूहल है।"

सिद्धा ऊचुः

श्लोक 48 (9.51.48)

शृणु देवल भूतार्थं शंसतां नो दृढव्रत । जैगीषव्यो गतो लोकं शाश्वतं ब्रह्मणोऽव्ययम् ॥

śṛṇu devala bhūtārthaṃ śaṃsatāṃ no dṛḍhavrata | jaigīṣavyo gato lokaṃ śāśvataṃ brahmaṇo'vyayam

"हे दृढ़व्रत देवल! हम जो सच्ची बात बता रहे हैं, उसे सुनिए: जैगीषव्य ब्रह्मा के शाश्वत और अविनाशी लोक में चले गए हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 49 (9.51.49)

स श्रुत्वा वचनं तेषां सिद्धानां ब्रह्मसत्रिणाम् । असितो देवलस्तूर्णमुत्पपात पपात च ॥

sa śrutvā vacanaṃ teṣāṃ siddhānāṃ brahmasatriṇām | asito devalastūrṇamutpapāta papāta ca

ब्रह्मसत्र करने वाले उन सिद्धों की बात सुनकर असित देवल तुरन्त ऊपर उछले, किन्तु नीचे गिर पड़े।

श्लोक 50 (9.51.50)

ततः सिद्धास्त ऊचुर्हि देवलं पुनरेव ह । न देवल गतिस्तत्र तव गन्तुं तपोधन ॥

tataḥ siddhāsta ūcurhi devalaṃ punareva ha | na devala gatistatra tava gantuṃ tapodhana

तब उन सिद्धों ने देवल से फिर कहा, "हे तपस्वी देवल! आपके लिए वहाँ जाने का कोई मार्ग नहीं है,

सिद्धा ऊचुः

श्लोक 51 (9.51.51)

ब्रह्मणः सदनं विप्र जैगीषव्यो यदाप्तवान् ॥

brahmaṇaḥ sadanaṃ vipra jaigīṣavyo yadāptavān

हे विप्र! उस ब्रह्मलोक में, जिसे जैगीषव्य ने प्राप्त किया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (9.51.52)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सिद्धानां देवलः पुनः । आनुपूर्व्येण लोकांस्तान्सर्वानवततार ह ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā siddhānāṃ devalaḥ punaḥ | ānupūrvyeṇa lokāṃstānsarvānavatatāra ha

सिद्धों की वह बात सुनकर देवल क्रम से उन सब लोकों को पार करते हुए फिर नीचे उतर आए।

श्लोक 53 (9.51.53)

स्वमाश्रमपदं पुण्यमाजगाम पतङ्गवत् । प्रविशन्नेव चापश्यज्जैगीषव्यं स देवलः ॥

svamāśramapadaṃ puṇyamājagāma pataṅgavat | praviśanneva cāpaśyajjaigīṣavyaṃ sa devalaḥ

वे पक्षी की भाँति अपने पवित्र आश्रम में लौट आए और प्रवेश करते ही उन्होंने वहाँ जैगीषव्य को देखा।

श्लोक 54 (9.51.54)

ततो बुद्ध्या व्यगणयद्देवलो धर्मयुक्तया । दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ॥

tato buddhyā vyagaṇayaddevalo dharmayuktayā | dṛṣṭvā prabhāvaṃ tapaso jaigīṣavyasya yogajam

तब जैगीषव्य की योग से उत्पन्न तपस्या का प्रभाव देखकर देवल ने धर्म में लगी हुई बुद्धि से विचार किया।

श्लोक 55 (9.51.55)

ततोऽब्रवीन्महात्मानं जैगीषव्यं स देवलः । विनयावनतो राजन्नुपसर्प्य महामुनिम् ॥

tato'bravīnmahātmānaṃ jaigīṣavyaṃ sa devalaḥ | vinayāvanato rājannupasarpya mahāmunim

तब हे राजन्! देवल विनय से झुककर महामुनि जैगीषव्य के पास गए और उनसे बोले:

देवल उवाच

श्लोक 56 (9.51.56)

मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ॥

mokṣadharmaṃ samāsthātumiccheyaṃ bhagavannaham

"भगवन्! मैं मोक्ष-धर्म को अपनाना चाहता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (9.51.57)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः । विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यं च शास्त्रतः ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā upadeśaṃ cakāra saḥ | vidhiṃ ca yogasya paraṃ kāryākāryaṃ ca śāstrataḥ

उनकी यह बात सुनकर जैगीषव्य ने उन्हें उपदेश दिया: योग की श्रेष्ठ विधि और शास्त्र के अनुसार क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

श्लोक 58 (9.51.58)

संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः । सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

saṃnyāsakṛtabuddhiṃ taṃ tato dṛṣṭvā mahātapāḥ | sarvāścāsya kriyāścakre vidhidṛṣṭena karmaṇā

तब देवल को संन्यास का निश्चय किए हुए देखकर उन महातपस्वी ने विधि में बताए हुए ढंग से उनके सब कर्म सम्पन्न कराए।

श्लोक 59 (9.51.59)

संन्यासकृतबुद्धिं तं भूतानि पितृभिः सह । ततो दृष्ट्वा प्ररुरुदुः कोऽस्मान्संविभजिष्यति ॥

saṃnyāsakṛtabuddhiṃ taṃ bhūtāni pitṛbhiḥ saha | tato dṛṣṭvā praruruduḥ ko'smānsaṃvibhajiṣyati

उन्हें संन्यास का निश्चय किए देखकर प्राणी पितरों के साथ रो पड़े, "अब हमें हमारा भाग कौन बाँटकर देगा?"

श्लोक 60 (9.51.60)

देवलस्तु वचः श्रुत्वा भूतानां करुणं तथा । दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे ॥

devalastu vacaḥ śrutvā bhūtānāṃ karuṇaṃ tathā | diśo daśa vyāharatāṃ mokṣaṃ tyaktuṃ mano dadhe

दसों दिशाओं में पुकारते हुए प्राणियों की करुण बात सुनकर देवल ने मोक्ष-मार्ग को छोड़ देने का मन बना लिया।

श्लोक 61 (9.51.61)

ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत । पुष्पाण्योषधयश्चैव रोरूयन्ते सहस्रशः ॥

tatastu phalamūlāni pavitrāṇi ca bhārata | puṣpāṇyoṣadhayaścaiva rorūyante sahasraśaḥ

हे भारत! तब पवित्र फल-मूल, फूल और औषधियाँ हज़ारों की संख्या में विलाप करने लगीं:

फलमूलौषधय ऊचुः

श्लोक 62 (9.51.62)

पुनर्नो देवलः क्षुद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मतिः । अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा नावबुध्यते ॥

punarno devalaḥ kṣudro nūnaṃ chetsyati durmatiḥ | abhayaṃ sarvabhūtebhyo yo dattvā nāvabudhyate

"यह दुष्टबुद्धि क्षुद्र देवल निश्चय ही हमें फिर काटेगा; जो सब प्राणियों को अभय देकर भी इसे नहीं समझता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 63 (9.51.63)

ततो भूयो व्यगणयत्स्वबुद्ध्या मुनिसत्तमः । मोक्षे गार्हस्थ्यधर्मे वा किं नु श्रेयस्करं भवेत् ॥

tato bhūyo vyagaṇayatsvabuddhyā munisattamaḥ | mokṣe gārhasthyadharme vā kiṃ nu śreyaskaraṃ bhavet

तब उन मुनिश्रेष्ठ ने अपनी बुद्धि से फिर विचार किया, "मोक्ष और गृहस्थ-धर्म में से कौन-सा अधिक कल्याणकारी होगा?"

श्लोक 64 (9.51.64)

इति निश्चित्य मनसा देवलो राजसत्तम । त्यक्त्वा गार्हस्थ्यधर्मं स मोक्षधर्ममरोचयत् ॥

iti niścitya manasā devalo rājasattama | tyaktvā gārhasthyadharmaṃ sa mokṣadharmamarocayat

हे राजश्रेष्ठ! मन में निश्चय करके देवल ने गृहस्थ-धर्म को छोड़ दिया और मोक्ष-धर्म को ही पसन्द किया।

श्लोक 65 (9.51.65)

एवमादीनि सञ्चिन्त्य देवलो निश्चयात्ततः । प्राप्तवान्परमां सिद्धिं परं योगं च भारत ॥

evamādīni sañcintya devalo niścayāttataḥ | prāptavānparamāṃ siddhiṃ paraṃ yogaṃ ca bhārata

हे भारत! इन्हीं सब बातों पर विचार करके देवल ने अपने दृढ़ निश्चय से परम सिद्धि और श्रेष्ठ योग प्राप्त किया।

श्लोक 66 (9.51.66)

ततो देवाः समागम्य बृहस्पतिपुरोगमाः । जैगीषव्यं तपश्चास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः ॥

tato devāḥ samāgamya bṛhaspatipurogamāḥ | jaigīṣavyaṃ tapaścāsya praśaṃsanti tapasvinaḥ

तब बृहस्पति को आगे करके देवता एकत्र हुए और वे तपस्वी जैगीषव्य और उनकी तपस्या की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 67 (9.51.67)

अथाब्रवीदृषिवरो देवान्वै नारदस्तदा । जैगीषव्ये तपो नास्ति विस्मापयति योऽसितम् ॥

athābravīdṛṣivaro devānvai nāradastadā | jaigīṣavye tapo nāsti vismāpayati yo'sitam

तब ऋषिश्रेष्ठ नारद ने देवताओं से कहा, "जैगीषव्य में कोई तपस्या नहीं है, क्योंकि वे तो असित को केवल चकित करते हैं।"

श्लोक 68 (9.51.68)

तमेवंवादिनं धीरं प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः । मैवमित्येव शंसन्तो जैगीषव्यं महामुनिम् ॥

tamevaṃvādinaṃ dhīraṃ pratyūcuste divaukasaḥ | maivamityeva śaṃsanto jaigīṣavyaṃ mahāmunim

ऐसा कहने वाले उन धीर नारद को देवताओं ने उत्तर दिया, "ऐसा नहीं है", और वे महामुनि जैगीषव्य की प्रशंसा करते रहे।

श्लोक 69 (9.51.69)

तत्राप्युपस्पृश्य ततो महात्मा दत्त्वा च वित्तं हलभृद्द्विजेभ्यः । अवाप्य धर्मं परमार्यकर्मा जगाम सोमस्य महत्स तीर्थम् ॥

tatrāpyupaspṛśya tato mahātmā dattvā ca vittaṃ halabhṛddvijebhyaḥ | avāpya dharmaṃ paramāryakarmā jagāma somasya mahatsa tīrtham

वहाँ भी स्नान करके और ब्राह्मणों को धन देकर उत्तम कर्म करने वाले महात्मा हलधर परम धर्म का फल पाकर सोम के महान् तीर्थ को चले गए।

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