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शल्य पर्व · अध्याय 50

इन्द्रतीर्थ, रामतीर्थ और आदित्यतीर्थ

बलराम इन्द्रतीर्थ जाते हैं, जहाँ इन्द्र ने सौ यज्ञ करके शतक्रतु नाम पाया, फिर भृगुवंशी राम (परशुराम) के तीर्थ में पहुँचते हैं, जहाँ उन्होंने क्षत्रियों का संहार करके यज्ञ किया था। इसके बाद वे यमुनातीर्थ में जाते हैं, जहाँ वरुण ने कभी राजसूय यज्ञ किया था, और सरस्वती तट के आदित्यतीर्थ में, जहाँ विष्णु, द्वैपायन, असित देवल और अन्य बहुतों ने स्नान करके योग में सिद्धि पाई।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.50.1)

इन्द्रतीर्थं ततो गत्वा यदूनां प्रवरो बली । विप्रेभ्यो धनरत्नानि ददौ स्नात्वा यथाविधि ॥

indratīrthaṃ tato gatvā yadūnāṃ pravaro balī | viprebhyo dhanaratnāni dadau snātvā yathāvidhi

तब यदुवंशियों में श्रेष्ठ बलशाली बलराम इन्द्रतीर्थ गए और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके ब्राह्मणों को धन और रत्न दिए।

श्लोक 2 (9.50.2)

तत्र ह्यमरराजो वै ईजे क्रतुशतेन ह । बृहस्पतेश्च देवेशः प्रददौ विपुलं धनम् ॥

tatra hyamararājo vai īje kratuśatena ha | bṛhaspateśca deveśaḥ pradadau vipulaṃ dhanam

वहीं देवराज इन्द्र ने सौ यज्ञ किए, और देवेश ने बृहस्पति को प्रचुर धन दिया।

श्लोक 3 (9.50.3)

अनर्गलान्सजारूथ्यान्सर्वान्विविधदक्षिणान् । आजहार क्रतूंस्तत्र यथोक्तं वेदपारगैः ॥

anargalānsajārūthyānsarvānvividhadakṣiṇān | ājahāra kratūṃstatra yathoktaṃ vedapāragaiḥ

वेदों के पारंगत विद्वानों के बताए अनुसार उसने वहाँ वे सब यज्ञ किए, जो निर्बाध थे, सजारूथ्य से युक्त थे और जिनमें नाना प्रकार की दक्षिणाएँ दी गईं।

श्लोक 4 (9.50.4)

तान्क्रतून्भरतश्रेष्ठ शतकृत्वो महाद्युतिः । पूरयामास विधिवत्ततः ख्यातः शतक्रतुः ॥

tānkratūnbharataśreṣṭha śatakṛtvo mahādyutiḥ | pūrayāmāsa vidhivattataḥ khyātaḥ śatakratuḥ

हे भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी इन्द्र ने उन यज्ञों को विधिपूर्वक सौ बार पूरा किया, इसीलिए वे शतक्रतु नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 5 (9.50.5)

तस्य नाम्ना तु तत्तीर्थं शिवं पुण्यं सनातनम् । इन्द्रतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥

tasya nāmnā tu tattīrthaṃ śivaṃ puṇyaṃ sanātanam | indratīrthamiti khyātaṃ sarvapāpapramocanam

उन्हीं के नाम से वह शुभ, पवित्र और सनातन तीर्थ इन्द्रतीर्थ कहलाता है, जो सब पापों से मुक्त करने वाला है।

श्लोक 6 (9.50.6)

उपस्पृश्य च तत्रापि विधिवन्मुसलायुधः । ब्राह्मणान्पूजयित्वा च पानाच्छादनभोजनैः ॥

upaspṛśya ca tatrāpi vidhivanmusalāyudhaḥ | brāhmaṇānpūjayitvā ca pānācchādanabhojanaiḥ

मूसलधारी बलराम ने वहाँ भी विधिपूर्वक स्नान किया और पेय, वस्त्र और भोजन से ब्राह्मणों का सत्कार किया।

श्लोक 7 (9.50.7)

शुभं तीर्थवरं तस्माद्रामतीर्थं जगाम ह । यत्र रामो महाभागो भार्गवः सुमहातपाः ॥

śubhaṃ tīrthavaraṃ tasmādrāmatīrthaṃ jagāma ha | yatra rāmo mahābhāgo bhārgavaḥ sumahātapāḥ

फिर वे वहाँ से रामतीर्थ गए, जो उत्तम तीर्थ है, जहाँ महाभाग भृगुवंशी महातपस्वी राम (परशुराम) ने

श्लोक 8 (9.50.8)

असकृत्पृथिवीं कृत्वा हतक्षत्रियपुङ्गवाम् । उपाध्यायं पुरस्कृत्य काश्यपं मुनिसत्तमम् ॥

asakṛtpṛthivīṃ kṛtvā hatakṣatriyapuṅgavām | upādhyāyaṃ puraskṛtya kāśyapaṃ munisattamam

बार-बार पृथ्वी को श्रेष्ठ क्षत्रियों से रहित करके और मुनिश्रेष्ठ कश्यप को अपना उपाध्याय बनाकर

श्लोक 9 (9.50.9)

अयजद्वाजपेयेन सोऽश्वमेधशतेन च । प्रददौ दक्षिणार्थं च पृथिवीं सागराम्बराम् ॥

ayajadvājapeyena so'śvamedhaśatena ca | pradadau dakṣiṇārthaṃ ca pṛthivīṃ sāgarāmbarām

वाजपेय यज्ञ और सौ अश्वमेध यज्ञ किए तथा दक्षिणा में समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी दे दी।

श्लोक 10 (9.50.10)

रामो दत्त्वा धनं तत्र द्विजेभ्यो जनमेजय । उपस्पृश्य यथान्यायं पूजयित्वा तथा द्विजान् ॥

rāmo dattvā dhanaṃ tatra dvijebhyo janamejaya | upaspṛśya yathānyāyaṃ pūjayitvā tathā dvijān

हे जनमेजय! वहाँ बलराम ने ब्राह्मणों को धन दिया, विधि के अनुसार स्नान किया और उसी प्रकार ब्राह्मणों की पूजा की।

श्लोक 11 (9.50.11)

पुण्यतीर्थे शुभे देशे वसु दत्त्वा हलायुधः । मुनींश्चैवाभिवाद्याथ यमुनातीर्थमागमत् । यत्रानयामास तदा राजसूयमपाम्पतिः ॥

puṇyatīrthe śubhe deśe vasu dattvā halāyudhaḥ | munīṃścaivābhivādyātha yamunātīrthamāgamat | yatrānayāmāsa tadā rājasūyamapāmpatiḥ

उस पवित्र तीर्थ में, उस शुभ स्थान पर धन देकर और मुनियों को प्रणाम करके हलधर बलराम यमुनातीर्थ गए, जहाँ जल के स्वामी वरुण ने पहले राजसूय यज्ञ कराया था।

श्लोक 12 (9.50.12)

दितेः सुतान्महाभागो वरुणो वै सितप्रभः । यत्र निर्जित्य सङ्ग्रामे मानुषान्दानवांस्तथा । गन्धर्वान्राक्षसांश्चैव वरुणः परवीरहा ॥

diteḥ sutānmahābhāgo varuṇo vai sitaprabhaḥ | yatra nirjitya saṅgrāme mānuṣāndānavāṃstathā | gandharvānrākṣasāṃścaiva varuṇaḥ paravīrahā

वहाँ महाभाग, श्वेत कान्ति वाले, शत्रुवीरों के संहारक वरुण ने युद्ध में दिति के पुत्रों को, मनुष्यों और दानवों को, तथा गन्धर्वों और राक्षसों को भी जीता था।

श्लोक 13 (9.50.13)

तस्मिन्क्रतुवरे वृत्ते सङ्ग्रामः समजायत । देवानां दानवानां च त्रैलोक्यस्य भयावहः ॥

tasminkratuvare vṛtte saṅgrāmaḥ samajāyata | devānāṃ dānavānāṃ ca trailokyasya bhayāvahaḥ

उस श्रेष्ठ यज्ञ के सम्पन्न होने पर देवताओं और दानवों में तीनों लोकों को भयभीत करने वाला युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 14 (9.50.14)

राजसूये क्रतुश्रेष्ठे निवृत्ते जनमेजय । जायते सुमहाघोरः संक्षयः क्षत्रियान्प्रति ॥

rājasūye kratuśreṣṭhe nivṛtte janamejaya | jāyate sumahāghoraḥ saṃkṣayaḥ kṣatriyānprati

हे जनमेजय! श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय के पूर्ण होने पर क्षत्रियों पर महान् और भयंकर संहार आ पड़ता है।

श्लोक 15 (9.50.15)

हलायुधस्तदा रामस्तस्मिंस्तीर्थवरे शुभे । तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च द्विजेभ्यो वसु माधवः ॥

halāyudhastadā rāmastasmiṃstīrthavare śubhe | tatra snātvā ca dattvā ca dvijebhyo vasu mādhavaḥ

तब हलधर राम माधव ने उस उत्तम और शुभ तीर्थ में स्नान किया और ब्राह्मणों को धन दिया।

श्लोक 16 (9.50.16)

वनमाली ततो हृष्टः स्तूयमानो द्विजातिभिः । तस्मादादित्यतीर्थं च जगाम कमलेक्षणः ॥

vanamālī tato hṛṣṭaḥ stūyamāno dvijātibhiḥ | tasmādādityatīrthaṃ ca jagāma kamalekṣaṇaḥ

तब वनमाली कमलनयन बलराम प्रसन्न होकर, द्विजातियों से स्तुति पाते हुए, वहाँ से आदित्यतीर्थ गए।

श्लोक 17 (9.50.17)

यत्रेष्ट्वा भगवाञ्ज्योतिर्भास्करो राजसत्तम । ज्योतिषामाधिपत्यं च प्रभावं चाभ्यपद्यत ॥

yatreṣṭvā bhagavāñjyotirbhāskaro rājasattama | jyotiṣāmādhipatyaṃ ca prabhāvaṃ cābhyapadyata

हे राजसत्तम! वहीं ज्योतिर्मय भगवान् सूर्य ने यज्ञ करके ज्योतियों का आधिपत्य और अपना प्रभाव पाया।

श्लोक 18 (9.50.18)

तस्या नद्यास्तु तीरे वै सर्वे देवाः सवासवाः । विश्वेदेवाः समरुतो गन्धर्वाप्सरसश्च ह ॥

tasyā nadyāstu tīre vai sarve devāḥ savāsavāḥ | viśvedevāḥ samaruto gandharvāpsarasaśca ha

उस नदी के तट पर इन्द्र सहित सब देवता, मरुतों सहित विश्वेदेव, और गन्धर्व तथा अप्सराएँ एकत्र थे,

श्लोक 19 (9.50.19)

द्वैपायनः शुकश्चैव कृष्णश्च मधुसूदनः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशाम्पते ॥

dvaipāyanaḥ śukaścaiva kṛṣṇaśca madhusūdanaḥ | yakṣāśca rākṣasāścaiva piśācāśca viśāmpate

और द्वैपायन, शुक, मधुसूदन कृष्ण, तथा यक्ष, राक्षस और पिशाच भी, हे राजन्!

श्लोक 20 (9.50.20)

एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः । तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये परन्तप ॥

ete cānye ca bahavo yogasiddhāḥ sahasraśaḥ | tasmiṃstīrthe sarasvatyāḥ śive puṇye parantapa

हे परंतप! ये और अन्य हज़ारों योगसिद्ध लोग सरस्वती के उस शुभ और पवित्र तीर्थ में थे।

श्लोक 21 (9.50.21)

तत्र हत्वा पुरा विष्णुरसुरौ मधुकैटभौ । आप्लुत्य भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उत्तमे ॥

tatra hatvā purā viṣṇurasurau madhukaiṭabhau | āplutya bharataśreṣṭha tīrthapravara uttame

वहीं पूर्वकाल में विष्णु ने मधु और कैटभ नामक दो असुरों को मारकर, हे भरतश्रेष्ठ! उस उत्तम और श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान किया था।

श्लोक 22 (9.50.22)

द्वैपायनश्च धर्मात्मा तत्रैवाप्लुत्य भारत । सम्प्राप्तः परमं योगं सिद्धिं च परमां गतः ॥

dvaipāyanaśca dharmātmā tatraivāplutya bhārata | samprāptaḥ paramaṃ yogaṃ siddhiṃ ca paramāṃ gataḥ

हे भारत! धर्मात्मा द्वैपायन ने भी उसी स्थान पर स्नान किया और परम योग तथा परम सिद्धि को प्राप्त किया।

श्लोक 23 (9.50.23)

असितो देवलश्चैव तस्मिन्नेव महातपाः । परमं योगमास्थाय ऋषिर्योगमवाप्तवान् ॥

asito devalaścaiva tasminneva mahātapāḥ | paramaṃ yogamāsthāya ṛṣiryogamavāptavān

महातपस्वी असित और देवल ने भी उसी स्थान पर परम योग का आश्रय लिया, और उस ऋषि ने योग-सिद्धि पाई।

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