शल्य पर्व · अध्याय 49
बदरपाचन में श्रुतावती और अरुन्धती
बलराम बदरपाचन पहुँचते हैं, जहाँ भरद्वाज की पुत्री श्रुतावती ने इन्द्र को पति रूप में पाने के लिए तप किया और बेर पकाए, जो पकते ही नहीं थे; इन्द्र ने प्रकट होकर उसे अपने लोक का वर दिया और उस तीर्थ को प्रसिद्ध किया। वैशम्पायन यह भी बताते हैं कि बारह वर्ष के अकाल में महादेव ने ब्राह्मण का रूप धरकर वहीं अरुन्धती की परीक्षा ली और उनके तप को सप्तर्षियों के तप से बढ़कर माना। जनमेजय के पूछने पर श्रुतावती के जन्म की कथा भी कही जाती है, और बलराम इन्द्र के तीर्थ को चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (9.49.1)
ततस्तीर्थवरं रामो ययौ बदरपाचनम् । तपस्विसिद्धचरितं यत्र कन्या धृतव्रता ॥
tatastīrthavaraṃ rāmo yayau badarapācanam | tapasvisiddhacaritaṃ yatra kanyā dhṛtavratā
तब बलराम तीर्थों में श्रेष्ठ बदरपाचन को गए, जो तपस्वियों और सिद्धों का निवास-स्थान है, जहाँ दृढ़ व्रत वाली एक कन्या ने
श्लोक 2 (9.49.2)
भरद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि । श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी ॥
bharadvājasya duhitā rūpeṇāpratimā bhuvi | śrutāvatī nāma vibho kumārī brahmacāriṇī
जो भरद्वाज की पुत्री थी, पृथ्वी पर रूप में अनुपम थी, ब्रह्मचारिणी कुमारी थी और हे विभो! श्रुतावती नाम की थी,
श्लोक 3 (9.49.3)
तपश्चचार सात्युग्रं नियमैर्बहुभिर्वृता । भर्ता मे देवराजः स्यादिति निश्चित्य भामिनी ॥
tapaścacāra sātyugraṃ niyamairbahubhirvṛtā | bhartā me devarājaḥ syāditi niścitya bhāminī
उसने अनेक नियमों में बँधकर अत्यन्त उग्र तप किया; उसने निश्चय कर लिया था कि "देवराज इन्द्र मेरे पति हों।"
श्लोक 4 (9.49.4)
समास्तस्या व्यतिक्रान्ता बह्व्यः कुरुकुलोद्वह । चरन्त्या नियमांस्तांस्तांस्त्रीभिस्तीव्रान्सुदुश्चरान् ॥
samāstasyā vyatikrāntā bahvyaḥ kurukulodvaha | carantyā niyamāṃstāṃstāṃstrībhistīvrānsuduścarān
हे कुरुकुल के वंशज! स्त्रियों के लिए कठिन और अत्यन्त दुष्कर उन-उन नियमों का पालन करते हुए उसके बहुत वर्ष बीत गए।
श्लोक 5 (9.49.5)
तस्यास्तु तेन वृत्तेन तपसा च विशाम्पते । भक्त्या च भगवान्प्रीतः परया पाकशासनः ॥
tasyāstu tena vṛttena tapasā ca viśāmpate | bhaktyā ca bhagavānprītaḥ parayā pākaśāsanaḥ
हे राजन्! उसके आचरण, तप और भक्ति से भगवान् पाकशासन (इन्द्र) अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 6 (9.49.6)
आजगामाश्रमं तस्यास्त्रिदशाधिपतिः प्रभुः । आस्थाय रूपं विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः ॥
ājagāmāśramaṃ tasyāstridaśādhipatiḥ prabhuḥ | āsthāya rūpaṃ viprarṣervasiṣṭhasya mahātmanaḥ
देवताओं के अधिपति प्रभु इन्द्र महात्मा ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का रूप धारण करके उसके आश्रम में आए।
श्लोक 7 (9.49.7)
सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम् । आचारैर्मुनिभिर्दृष्टैः पूजयामास भारत ॥
sā taṃ dṛṣṭvogratapasaṃ vasiṣṭhaṃ tapatāṃ varam | ācārairmunibhirdṛṣṭaiḥ pūjayāmāsa bhārata
हे भारत! तपस्वियों में श्रेष्ठ, उग्र तप वाले वसिष्ठ को देखकर उसने मुनियों द्वारा देखे हुए आचारों से उनकी पूजा की।
श्लोक 8 (9.49.8)
उवाच नियमज्ञा च कल्याणी सा प्रियंवदा । भगवन्मुनिशार्दूल किमाज्ञापयसि प्रभो ॥
uvāca niyamajñā ca kalyāṇī sā priyaṃvadā | bhagavanmuniśārdūla kimājñāpayasi prabho
नियमों को जानने वाली मधुर बोलने वाली उस कल्याणी ने कहा: "भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! प्रभो! आप क्या आज्ञा करते हैं?
श्रुतावत्युवाच
श्लोक 9 (9.49.9)
सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत । शक्रभक्त्या च ते पाणिं न दास्यामि कथञ्चन ॥
sarvamadya yathāśakti tava dāsyāmi suvrata | śakrabhaktyā ca te pāṇiṃ na dāsyāmi kathañcana
हे सुव्रत! मैं आज अपनी शक्ति भर आपको सब कुछ दूँगी, परन्तु इन्द्र के प्रति भक्ति के कारण मैं किसी भी प्रकार आपको विवाह में अपना हाथ नहीं दूँगी।
श्लोक 10 (9.49.10)
व्रतैश्च नियमैश्चैव तपसा च तपोधन । शक्रस्तोषयितव्यो वै मया त्रिभुवनेश्वरः ॥
vrataiśca niyamaiścaiva tapasā ca tapodhana | śakrastoṣayitavyo vai mayā tribhuvaneśvaraḥ
हे तपोधन! मुझे तो व्रतों, नियमों और तप से तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र को ही प्रसन्न करना है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (9.49.11)
इत्युक्तो भगवान्देवः स्मयन्निव निरीक्ष्य ताम् । उवाच नियमं ज्ञात्वा सांत्वयन्निव भारत ॥
ityukto bhagavāndevaḥ smayanniva nirīkṣya tām | uvāca niyamaṃ jñātvā sāṃtvayanniva bhārata
यह सुनकर भगवान् देव ने मानो मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा और हे भारत! उसके नियम को जानकर मानो सांत्वना देते हुए बोले।
इन्द्र उवाच
श्लोक 12 (9.49.12)
उग्रं तपश्चरसि वै विदिता मेऽसि सुव्रते । यदर्थमयमारम्भस्तव कल्याणि हृद्गतः ॥
ugraṃ tapaścarasi vai viditā me'si suvrate | yadarthamayamārambhastava kalyāṇi hṛdgataḥ
"हे सुव्रते! तुम उग्र तप कर रही हो, और हे कल्याणी! तुमने जिस उद्देश्य से यह आरम्भ किया है जो तुम्हारे हृदय में है, उसे मैं जानता हूँ।
श्लोक 13 (9.49.13)
तच्च सर्वं यथाभूतं भविष्यति वरानने । तपसा लभ्यते सर्वं सर्वं तपसि तिष्ठति ॥
tacca sarvaṃ yathābhūtaṃ bhaviṣyati varānane | tapasā labhyate sarvaṃ sarvaṃ tapasi tiṣṭhati
हे सुमुखी! वह सब ठीक वैसा ही होगा। तप से सब कुछ प्राप्त होता है; सब कुछ तप में ही स्थित है।
श्लोक 14 (9.49.14)
यानि स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने । तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत्सुखम् ॥
yāni sthānāni divyāni vibudhānāṃ śubhānane | tapasā tāni prāpyāṇi tapomūlaṃ mahatsukham
हे शुभानने! देवताओं के जो दिव्य स्थान हैं, वे सब तप से प्राप्त किए जा सकते हैं; तप ही महान् सुख का मूल है।
श्लोक 15 (9.49.15)
इति कृत्वा तपो घोरं देहं सन्न्यस्य मानवाः । देवत्वं यान्ति कल्याणि शृणुष्वैकं वचो मम ॥
iti kṛtvā tapo ghoraṃ dehaṃ sannyasya mānavāḥ | devatvaṃ yānti kalyāṇi śṛṇuṣvaikaṃ vaco mama
इस प्रकार घोर तप करके और देह का त्याग करके मनुष्य देवत्व को प्राप्त होते हैं, हे कल्याणी! अब मेरी एक बात सुनो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (9.49.16)
पच चैतानि सुभगे बदराणि शुभव्रते । पचेत्युक्त्वा तु भगवाञ्जगाम बलसूदनः ॥
paca caitāni subhage badarāṇi śubhavrate | pacetyuktvā tu bhagavāñjagāma balasūdanaḥ
"हे सुन्दरी शुभव्रते! इन बेरों को पकाओ।" 'पकाओ' ऐसा कहकर भगवान् बलसूदन (इन्द्र) चले गए।
श्लोक 17 (9.49.17)
आमन्त्र्य तां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः । अविदूरे ततस्तस्मादाश्रमात्तीर्थमुत्तमम् ॥
āmantrya tāṃ tu kalyāṇīṃ tato japyaṃ jajāpa saḥ | avidūre tatastasmādāśramāttīrthamuttamam
उस कल्याणी से विदा लेकर उन्होंने उसके आश्रम से थोड़ी ही दूर एक उत्तम तीर्थ में जप किया।
श्लोक 18 (9.49.18)
तच्च तीर्थं महाराज यत्र जप्यं जजाप सः । इन्द्रतीर्थेतिविख्यातं त्रिषु लोकेषु मानद ॥
tacca tīrthaṃ mahārāja yatra japyaṃ jajāpa saḥ | indratīrthetivikhyātaṃ triṣu lokeṣu mānada
हे महाराज! हे मानद! जहाँ उन्होंने जप किया था, वह तीर्थ तीनों लोकों में इन्द्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 19 (9.49.19)
तस्य जिज्ञासनार्थं स भगवान्पाकशासनः । बदराणामपचनं चकार विबुधाधिपः ॥
tasya jijñāsanārthaṃ sa bhagavānpākaśāsanaḥ | badarāṇāmapacanaṃ cakāra vibudhādhipaḥ
उसकी परीक्षा लेने के लिए देवाधिपति भगवान् पाकशासन ने बेरों को ऐसा कर दिया कि वे पकें ही नहीं।
श्लोक 20 (9.49.20)
ततः प्रतप्ता सा राजन्वाग्यता विगतक्लमा । तत्परा शुचिसंवीता पावके समधिश्रयत् । अपचद्राजशार्दूल बदराणि महाव्रता ॥
tataḥ prataptā sā rājanvāgyatā vigataklamā | tatparā śucisaṃvītā pāvake samadhiśrayat | apacadrājaśārdūla badarāṇi mahāvratā
हे राजन्! तब वह तप से तपी हुई कन्या मौन रहकर, थकान से रहित, एकाग्र और शुद्ध वस्त्र पहने, बेरों को अग्नि पर चढ़ाकर पकाने लगी; हे राजशार्दूल! वह महान् व्रत वाली थी।
श्लोक 21 (9.49.21)
तस्याः पचन्त्याः सुमहान्कालोऽगात्पुरुषर्षभ । न च स्म तान्यपच्यन्त दिनं च क्षयमभ्यगात् ॥
tasyāḥ pacantyāḥ sumahānkālo'gātpuruṣarṣabha | na ca sma tānyapacyanta dinaṃ ca kṣayamabhyagāt
हे पुरुषश्रेष्ठ! उसे पकाते हुए बहुत लम्बा समय बीत गया, पर वे बेर नहीं पके और दिन समाप्त हो गया।
श्लोक 22 (9.49.22)
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्याः काष्ठसञ्चयः । अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत् ॥
hutāśanena dagdhaśca yastasyāḥ kāṣṭhasañcayaḥ | akāṣṭhamagniṃ sā dṛṣṭvā svaśarīramathādahat
उसके पास लकड़ियों का जो ढेर था, उसे अग्नि ने जला डाला; तब अग्नि को बिना ईंधन का देखकर उसने अपना ही शरीर जलाना आरम्भ किया।
श्लोक 23 (9.49.23)
पादौ प्रक्षिप्य सा पूर्वं पावके चारुदर्शना । दग्धौ दग्धौ पुनः पादावुपावर्तयतानघ ॥
pādau prakṣipya sā pūrvaṃ pāvake cārudarśanā | dagdhau dagdhau punaḥ pādāvupāvartayatānagha
उस सुन्दर रूप वाली निष्कलंक कन्या ने पहले अपने पैर अग्नि में डाले, और जब वे जल जाते तो फिर-फिर उन्हें आगे बढ़ा देती थी।
श्लोक 24 (9.49.24)
चरणे दह्यमाने च नाचिन्तयदनिन्दिता । दुःखं कमलपत्राक्षी महर्षिप्रियकाम्यया ॥
caraṇe dahyamāne ca nācintayadaninditā | duḥkhaṃ kamalapatrākṣī maharṣipriyakāmyayā
पैरों के जलते रहने पर भी उस निन्दारहित कमलनयनी को महर्षि को प्रसन्न करने की इच्छा से तनिक भी दुःख नहीं हुआ।
श्लोक 25 (9.49.25)
न वैमनस्यं तस्यास्तु मुखभेदोऽथवाऽभवत् । शरीरमग्निना दीप्य जलमध्ये यथा स्थिता ॥
na vaimanasyaṃ tasyāstu mukhabhedo'thavā'bhavat | śarīramagninā dīpya jalamadhye yathā sthitā
उसके मन में न उदासी आई, न मुख पर कोई विकार हुआ; अग्नि से देह जलती रहने पर भी वह ऐसी स्थिर रही मानो जल के बीच खड़ी हो।
श्लोक 26 (9.49.26)
तच्चास्याः पचने यत्नं न न्यवर्तत भारत । सर्वथा बदराण्येव पक्तव्यानीति कन्यका ॥
taccāsyāḥ pacane yatnaṃ na nyavartata bhārata | sarvathā badarāṇyeva paktavyānīti kanyakā
हे भारत! पकाने का उसका प्रयत्न ढीला नहीं पड़ा; उस कन्या ने ठान लिया था कि बेर किसी भी प्रकार पकाने ही हैं।
श्लोक 27 (9.49.27)
सा तन्मनसि कृत्वैव महर्षेर्वचनं शुभा । अपचद्बदराण्येव न चापच्यन्त भारत ॥
sā tanmanasi kṛtvaiva maharṣervacanaṃ śubhā | apacadbadarāṇyeva na cāpacyanta bhārata
हे भारत! महर्षि के वचन को मन में रखकर वह शुभ कन्या बेर पकाती ही रही, पर वे पके नहीं।
श्लोक 28 (9.49.28)
तस्यास्तु चरणौ वह्निर्ददाह भगवान्स्वयम् । न च तस्या मनोदुःखं स्वल्पमप्यभवत्तदा ॥
tasyāstu caraṇau vahnirdadāha bhagavānsvayam | na ca tasyā manoduḥkhaṃ svalpamapyabhavattadā
भगवान् अग्नि ने स्वयं उसके चरणों को जला डाला, फिर भी उसके मन को तनिक भी दुःख नहीं हुआ।
श्लोक 29 (9.49.29)
अथ तत्कर्म दृष्ट्वाऽस्याः प्रीतस्त्रिभुवनेश्वरः । ततः सन्दर्शयामास कन्यायै रूपमात्मनः ॥
atha tatkarma dṛṣṭvā'syāḥ prītastribhuvaneśvaraḥ | tataḥ sandarśayāmāsa kanyāyai rūpamātmanaḥ
उसके इस कर्म को देखकर त्रिभुवन के स्वामी प्रसन्न हुए और तब उन्होंने उस कन्या को अपना स्वरूप दिखाया।
श्लोक 30 (9.49.30)
उवाच च सुरश्रेष्ठस्तां कन्यां सुदृढव्रताम् । प्रीतोऽस्मि ते शुभे भक्त्या तपसा नियमेन च ॥
uvāca ca suraśreṣṭhastāṃ kanyāṃ sudṛḍhavratām | prīto'smi te śubhe bhaktyā tapasā niyamena ca
सुरश्रेष्ठ ने दृढ़ व्रत वाली उस कन्या से कहा: "हे शुभे! मैं तुम्हारी भक्ति, तप और नियम से प्रसन्न हूँ।
इन्द्र उवाच
श्लोक 31 (9.49.31)
तस्माद्योऽभिमतः कामः स ते सम्पत्स्यते शुभे । देहं त्यक्त्वा महाभागे त्रिदिवे मयि वत्स्यसि ॥
tasmādyo'bhimataḥ kāmaḥ sa te sampatsyate śubhe | dehaṃ tyaktvā mahābhāge tridive mayi vatsyasi
इसलिए हे शुभे! तुम्हारा जो मनचाहा काम है, वह पूरा होगा; हे महाभागे! देह छोड़ने पर तुम स्वर्ग में मेरे साथ रहोगी।
श्लोक 32 (9.49.32)
इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति । सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना बदरपाचनम् । विख्यातं त्रिषु लोकेषु ब्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम् ॥
idaṃ ca te tīrthavaraṃ sthiraṃ loke bhaviṣyati | sarvapāpāpahaṃ subhru nāmnā badarapācanam | vikhyātaṃ triṣu lokeṣu brahmarṣibhirabhiplutam
और तुम्हारा यह उत्तम तीर्थ लोक में स्थिर रहेगा, हे सुभ्रु! यह सब पापों को नष्ट करने वाला, बदरपाचन नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध और ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित होगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (9.49.33)
अस्मिन्खलु महाभागे शुभे तीर्थवरेऽनघे । त्यक्त्वा सप्तर्षयो जग्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम् ॥
asminkhalu mahābhāge śubhe tīrthavare'naghe | tyaktvā saptarṣayo jagmurhimavantamarundhatīm
प्राचीन काल में इसी उत्तम, शुभ और निष्पाप तीर्थ में सप्तर्षि अरुन्धती को छोड़कर हिमालय चले गए थे।
श्लोक 34 (9.49.34)
ततस्ते वै महाभागा गत्वा तत्र सुसंशिताः । वृत्त्यर्थं फलमूलानि समाहर्तुं ययुः किल ॥
tataste vai mahābhāgā gatvā tatra susaṃśitāḥ | vṛttyarthaṃ phalamūlāni samāhartuṃ yayuḥ kila
वे संयमी महाभाग ऋषि वहाँ पहुँचकर जीविका के लिए फल-मूल एकत्र करने निकल पड़े।
श्लोक 35 (9.49.35)
तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने । अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी ॥
teṣāṃ vṛttyarthināṃ tatra vasatāṃ himavadvane | anāvṛṣṭiranuprāptā tadā dvādaśavārṣikī
जब वे जीविका की खोज में हिमालय के वन में रह रहे थे, तब बारह वर्ष का अकाल पड़ा।
श्लोक 36 (9.49.36)
ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विनः । अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याऽभवत्तदा ॥
te kṛtvā cāśramaṃ tatra nyavasanta tapasvinaḥ | arundhatyapi kalyāṇī taponityā'bhavattadā
उन तपस्वियों ने वहाँ आश्रम बनाकर निवास किया, और कल्याणी अरुन्धती भी उस समय निरन्तर तप में लगी रही।
श्लोक 37 (9.49.37)
अरुन्धतीं ततो दृष्ट्वा तीव्रं नियममास्थिताम् । अथागमत्त्रिनयनः सुप्रीतो वरदस्तदा ॥
arundhatīṃ tato dṛṣṭvā tīvraṃ niyamamāsthitām | athāgamattrinayanaḥ suprīto varadastadā
अरुन्धती को कठोर नियम का पालन करते देखकर वरदाता त्रिनेत्र शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आए।
श्लोक 38 (9.49.38)
ब्राह्मं रूपं ततः कृत्वा महादेवो महायशाः । तामभ्येत्याब्रवीद्देवो भिक्षामिच्छाम्यहं शुभे ॥
brāhmaṃ rūpaṃ tataḥ kṛtvā mahādevo mahāyaśāḥ | tāmabhyetyābravīddevo bhikṣāmicchāmyahaṃ śubhe
महायशस्वी महादेव ब्राह्मण का रूप धरकर उसके पास आए और बोले, "हे शुभे! मुझे भिक्षा चाहिए।"
श्लोक 39 (9.49.39)
प्रत्युवाच ततः सा तं ब्राह्मणं चारुदर्शना । क्षीणोऽन्नसञ्चयो विप्र बदराणीह भक्षय ॥
pratyuvāca tataḥ sā taṃ brāhmaṇaṃ cārudarśanā | kṣīṇo'nnasañcayo vipra badarāṇīha bhakṣaya
उस सुन्दर रूप वाली ने उस ब्राह्मण को उत्तर दिया, "हे विप्र! मेरा अन्न का भण्डार समाप्त हो गया है; यहाँ ये बेर खा लीजिए।"
श्लोक 40 (9.49.40)
ततोऽब्रवीन्महादेवः पचस्वैतानि सुव्रते । इत्युक्ता साऽपचत्तानि ब्राह्मणप्रियकाम्यया । अधिश्रित्य समिद्धेऽग्नौ बदराणि यशस्विनी ॥
tato'bravīnmahādevaḥ pacasvaitāni suvrate | ityuktā sā'pacattāni brāhmaṇapriyakāmyayā | adhiśritya samiddhe'gnau badarāṇi yaśasvinī
तब महादेव ने कहा, "हे सुव्रते! इन्हें पकाओ।" यह सुनकर उस यशस्विनी ने ब्राह्मण को प्रसन्न करने की इच्छा से जलती हुई अग्नि पर बेर चढ़ाकर पकाए।
श्लोक 41 (9.49.41)
दिव्या मनोरमाः पुण्याः कथाः शुश्राव सा तदा । अतीता सा त्वनावृष्टिर्घोरा द्वादशवार्षिकी ॥
divyā manoramāḥ puṇyāḥ kathāḥ śuśrāva sā tadā | atītā sā tvanāvṛṣṭirghorā dvādaśavārṣikī
पकाते समय उसने दिव्य, मनोहर और पवित्र कथाएँ सुनीं, और वह भयंकर बारह वर्ष का अकाल बीत गया।
श्लोक 42 (9.49.42)
अनश्नन्त्याः पचन्त्याश्च शृण्वन्त्याश्च कथाः शुभाः । दिनोपमः स तस्याथ कालोऽतीतः सुदारुणः ॥
anaśnantyāḥ pacantyāśca śṛṇvantyāśca kathāḥ śubhāḥ | dinopamaḥ sa tasyātha kālo'tītaḥ sudāruṇaḥ
उपवास करते, पकाते और शुभ कथाएँ सुनते हुए उसका वह अत्यन्त कठिन समय एक दिन के समान बीत गया।
श्लोक 43 (9.49.43)
ततस्तु मुनयः प्राप्ताः फलान्यादाय पर्वतात् । ततः स भगवान्प्रीतः प्रोवाचारुन्धतीं ततः ॥
tatastu munayaḥ prāptāḥ phalānyādāya parvatāt | tataḥ sa bhagavānprītaḥ provācārundhatīṃ tataḥ
तब मुनि पर्वत से फल लेकर लौट आए, और प्रसन्न भगवान् ने अरुन्धती से कहा।
महादेव उवाच
श्लोक 44 (9.49.44)
उपसर्पस्व धर्मज्ञे यथापूर्वमिमानृषीन् । प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञे तपसा नियमेन च ॥
upasarpasva dharmajñe yathāpūrvamimānṛṣīn | prīto'smi tava dharmajñe tapasā niyamena ca
"हे धर्मज्ञे! पहले की तरह इन ऋषियों के पास जाओ। हे धर्मज्ञे! मैं तुम्हारे तप और नियम से प्रसन्न हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (9.49.45)
ततः सन्दर्शयामास स्वरूपं भगवान्हरः । ततोऽब्रवीत्तदा तेभ्यस्तस्याश्च चरितं महत् ॥
tataḥ sandarśayāmāsa svarūpaṃ bhagavānharaḥ | tato'bravīttadā tebhyastasyāśca caritaṃ mahat
तब भगवान् हर ने अपना स्वरूप दिखाया, और उन ऋषियों को उसके महान् चरित का वर्णन किया।
महादेव उवाच
श्लोक 46 (9.49.46)
भवद्भिर्हिमवत्पृष्ठे यत्तपः समुपार्जितम् । अस्याश्च यत्तपो विप्रा न समं तन्मतं मम ॥
bhavadbhirhimavatpṛṣṭhe yattapaḥ samupārjitam | asyāśca yattapo viprā na samaṃ tanmataṃ mama
"हे ब्राह्मणो! आप लोगों ने हिमालय के शिखर पर जो तप संचित किया है, वह मेरे मत में इसके तप के बराबर नहीं है।
श्लोक 47 (9.49.47)
अनया हि तपस्विन्या तपस्तप्तं सुदुश्चरम् । अनश्नन्त्या पचन्त्या च समा द्वादश पारिताः ॥
anayā hi tapasvinyā tapastaptaṃ suduścaram | anaśnantyā pacantyā ca samā dvādaśa pāritāḥ
इस तपस्विनी ने अत्यन्त कठिन तप किया है; उपवास करते और पकाते हुए इसने बारह वर्ष पूरे कर दिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (9.49.48)
ततः प्रोवाच भगवांस्तामेवारुन्धतीं पुनः । वरं वृणीष्व कल्याणि यत्तेऽभिलषितं हृदि ॥
tataḥ provāca bhagavāṃstāmevārundhatīṃ punaḥ | varaṃ vṛṇīṣva kalyāṇi yatte'bhilaṣitaṃ hṛdi
फिर भगवान् ने अरुन्धती से पुनः कहा, "हे कल्याणी! जो तुम्हारे हृदय को अभीष्ट हो, वह वर माँगो।"
श्लोक 49 (9.49.49)
साऽब्रवीत्पृथुताम्राक्षी देवं सप्तर्षिसंसदि । भगवान्यदि मे प्रीतस्तीर्थं स्यादिदमद्भुतम् ॥
sā'bravītpṛthutāmrākṣī devaṃ saptarṣisaṃsadi | bhagavānyadi me prītastīrthaṃ syādidamadbhutam
ताँबे के समान लाल नेत्रों वाली उस विशाल-नयना ने सप्तर्षियों की सभा में देव से कहा, "भगवन्! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो यह अद्भुत तीर्थ
अरुन्धत्युवाच
श्लोक 50 (9.49.50)
सिद्धदेवर्षिदयितं नाम्ना बदरपाचनम् । तथाऽस्मिन्देवदेवेश त्रिरात्रमुषितः शुचिः ॥
siddhadevarṣidayitaṃ nāmnā badarapācanam | tathā'smindevadeveśa trirātramuṣitaḥ śuciḥ
सिद्धों और देवर्षियों का प्रिय हो और बदरपाचन नाम से प्रसिद्ध हो; तथा हे देवदेवेश! जो यहाँ पवित्र होकर तीन रात निवास करे,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (9.49.51)
प्राप्नुयादुपवासेन फलं द्वादशवार्षिकम् । एवमस्त्विति तां देवः प्रत्युवाच तपस्विनीम् ॥
prāpnuyādupavāsena phalaṃ dvādaśavārṣikam | evamastviti tāṃ devaḥ pratyuvāca tapasvinīm
वह उपवास से बारह वर्ष का फल पाए।" "ऐसा ही हो," देव ने उस तपस्विनी से कहा।
श्लोक 52 (9.49.52)
सप्तर्षिभिः स्तुतो देवस्ततो लोकं ययौ तदा । ऋषयो विस्मयं जग्मुस्तां दृष्ट्वा चाप्यरुन्धतीम् । अश्रान्तां चाविवर्णां च क्षुत्पिपासाऽसमायुताम् ॥
saptarṣibhiḥ stuto devastato lokaṃ yayau tadā | ṛṣayo vismayaṃ jagmustāṃ dṛṣṭvā cāpyarundhatīm | aśrāntāṃ cāvivarṇāṃ ca kṣutpipāsā'samāyutām
सप्तर्षियों से स्तुति पाकर देव तब अपने लोक को चले गए। अरुन्धती को थकान, विवर्णता और भूख-प्यास से रहित देखकर ऋषि विस्मित हो गए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 53 (9.49.53)
एवं सिद्धिः परा प्राप्ता अरुन्धत्या विशुद्धया । यथा त्वया महाभागे मदर्थे संशितव्रते ॥
evaṃ siddhiḥ parā prāptā arundhatyā viśuddhayā | yathā tvayā mahābhāge madarthe saṃśitavrate
"इस प्रकार विशुद्ध अरुन्धती ने परम सिद्धि पाई; हे महाभागे! वैसे ही तुमने भी मेरे लिए संयमपूर्वक व्रत निभाया है।
श्लोक 54 (9.49.54)
विशेषो हि त्वया भद्रे व्रते ह्यस्मिन्समर्पितः । तथा चेदं ददाम्यद्य नियमेन सुतोषितः । विशेषं तव कल्याणि प्रयच्छामि वरं वरे ॥
viśeṣo hi tvayā bhadre vrate hyasminsamarpitaḥ | tathā cedaṃ dadāmyadya niyamena sutoṣitaḥ | viśeṣaṃ tava kalyāṇi prayacchāmi varaṃ vare
हे भद्रे! तुमने इस व्रत में एक विशेषता जोड़ी है, इसलिए तुम्हारे नियम से भलीभाँति सन्तुष्ट होकर आज मैं तुम्हें विशेष वर देता हूँ, हे कल्याणी!
श्लोक 55 (9.49.55)
अरुन्धत्या वरस्तस्या यो दत्तो वै महात्मना । तस्य चाहं प्रभावेन तव कल्याणि तेजसा । प्रवक्ष्यामि परं भूयो वरमत्र यथाविधि ॥
arundhatyā varastasyā yo datto vai mahātmanā | tasya cāhaṃ prabhāvena tava kalyāṇi tejasā | pravakṣyāmi paraṃ bhūyo varamatra yathāvidhi
महात्मा शिव ने अरुन्धती को जो वर दिया था, उसके प्रभाव से और हे कल्याणी! तुम्हारे तेज से मैं यहाँ विधिपूर्वक एक और वर कहूँगा।
श्लोक 56 (9.49.56)
यस्त्वेकां रजनीं तीर्थे वत्स्यते सुसमाहितः । सस्नात्वा प्राप्स्यते लोकान्देहन्यासात्सुदुर्लभान् ॥
yastvekāṃ rajanīṃ tīrthe vatsyate susamāhitaḥ | sasnātvā prāpsyate lokāndehanyāsātsudurlabhān
जो एकाग्र मन से इस तीर्थ में एक रात निवास करके स्नान करेगा, वह देह त्यागने पर अत्यन्त दुर्लभ लोकों को पाएगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 57 (9.49.57)
इत्युक्त्वा भगवान्देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् । श्रुतावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः ॥
ityuktvā bhagavāndevaḥ sahasrākṣaḥ pratāpavān | śrutāvatīṃ tataḥ puṇyāṃ jagāma tridivaṃ punaḥ
यह कहकर भगवान् प्रतापी सहस्राक्ष इन्द्र पुण्यशीला श्रुतावती से ऐसा कहकर पुनः स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 58 (9.49.58)
गते वज्रधरे राजंस्तत्र वर्षं पपात ह । पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां पुण्यगन्धिनाम् ॥
gate vajradhare rājaṃstatra varṣaṃ papāta ha | puṣpāṇāṃ bharataśreṣṭha divyānāṃ puṇyagandhinām
हे राजन्! हे भरतश्रेष्ठ! वज्रधारी इन्द्र के चले जाने पर वहाँ दिव्य और पवित्र सुगन्ध वाले पुष्पों की वर्षा हुई।
श्लोक 59 (9.49.59)
देवदुन्दुभयश्चापि नेदुस्तत्र महास्वनाः । मारुतश्च ववौ पुण्यः पुण्यगन्धो विशाम्पते ॥
devadundubhayaścāpi nedustatra mahāsvanāḥ | mārutaśca vavau puṇyaḥ puṇyagandho viśāmpate
वहाँ देवताओं के नगाड़े जोर से बज उठे, और हे राजन्! पवित्र सुगन्ध वाली पुण्य वायु बहने लगी।
श्लोक 60 (9.49.60)
उत्सृज्य तु शुभा देहं जगामास्य च भार्यताम् । तपसोग्रेण तं लब्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत ॥
utsṛjya tu śubhā dehaṃ jagāmāsya ca bhāryatām | tapasogreṇa taṃ labdhvā tena reme sahācyuta
उस शुभ कन्या ने देह त्यागकर उनकी पत्नी का पद पाया; उग्र तप से उन्हें पाकर वह हे अच्युत! उनके साथ आनन्द करने लगी।
जनमेजय उवाच
श्लोक 61 (9.49.61)
का तस्या भगवन्माता क्व संवृद्धा च शोभना । श्रोतुमिच्छाम्यहं विप्र परं कौतूहलं हि मे ॥
kā tasyā bhagavanmātā kva saṃvṛddhā ca śobhanā | śrotumicchāmyahaṃ vipra paraṃ kautūhalaṃ hi me
"भगवन्! उसकी माता कौन थी और वह सुन्दरी कहाँ पली-बढ़ी? हे विप्र! मैं यह सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे बड़ी उत्सुकता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (9.49.62)
भरद्वाजस्य विप्रर्षेः स्कन्नं रेतो महात्मनः । दृष्ट्वाऽप्सरसमायान्तीं घृताचीं पृथुलोचनाम् ॥
bharadvājasya viprarṣeḥ skannaṃ reto mahātmanaḥ | dṛṣṭvā'psarasamāyāntīṃ ghṛtācīṃ pṛthulocanām
महात्मा विप्रर्षि भरद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया, जब उन्होंने विशाल नेत्रों वाली अप्सरा घृताची को आते देखा।
श्लोक 63 (9.49.63)
स तु जग्राह तद्रेतः करेण जपतां वरः । तदाऽपतत्पर्णपुटे तत्र सा सम्भवत्सुता ॥
sa tu jagrāha tadretaḥ kareṇa japatāṃ varaḥ | tadā'patatparṇapuṭe tatra sā sambhavatsutā
जप करने वालों में श्रेष्ठ उन मुनि ने उस वीर्य को हाथ में ले लिया और वह पत्तों के दोने में गिरा; वहीं वह कन्या उत्पन्न हुई।
श्लोक 64 (9.49.64)
तस्यास्तु जातकर्मादि कृत्वा सर्वं तपोधनः । नाम चास्याः स कृतवान्भरद्वाजो महामुनिः ॥
tasyāstu jātakarmādi kṛtvā sarvaṃ tapodhanaḥ | nāma cāsyāḥ sa kṛtavānbharadvājo mahāmuniḥ
तपोधन महामुनि भरद्वाज ने उसके जातकर्म आदि सब संस्कार किए और उसका नामकरण किया।
श्लोक 65 (9.49.65)
श्रुतावतीति धर्मात्मा देवर्षिगणसंसदि । स्वे च तामाश्रमे न्यस्य जगाम हिमवद्वनम् ॥
śrutāvatīti dharmātmā devarṣigaṇasaṃsadi | sve ca tāmāśrame nyasya jagāma himavadvanam
धर्मात्मा भरद्वाज ने देवर्षियों की सभा में उसका नाम श्रुतावती रखा और उसे अपने आश्रम में छोड़कर हिमालय के वन को चले गए।
श्लोक 66 (9.49.66)
तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो । वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्यः । जगाम तीर्थं सुसमाहितात्मा । शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम् ॥
tatrāpyupaspṛśya mahānubhāvo | vasūni dattvā ca mahādvijebhyaḥ | jagāma tīrthaṃ susamāhitātmā | śakrasya vṛṣṇipravarastadānīm
वहाँ भी स्नान करके और महान् ब्राह्मणों को धन देकर वृष्णिवंश के श्रेष्ठ, महानुभाव बलराम एकाग्रचित्त होकर उसी समय इन्द्र के तीर्थ को गए।