Skip to main content

शल्य पर्व · अध्याय 59

भीम द्वारा दुर्योधन की जाँघों का भंग

गदायुद्ध के और तीव्र होने पर अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। कृष्ण बताते हैं कि भीम अधिक बलवान है पर दुर्योधन अधिक कुशल है, भीम धोखे से ही जीत सकता है, और युधिष्ठिर के दाँव से विजय फिर संकट में पड़ गई है। तब अर्जुन अपनी बाईं जाँघ पर थपकी देकर संकेत करते हैं। भीम चकमा देता है और जब दुर्योधन प्रहार से बचने को उछलता है, तब गदा से उसकी दोनों जाँघें तोड़ देता है। पृथ्वी और आकाश में भयंकर अपशकुन प्रकट होते हैं, और देवता तथा दिव्य प्राणी युद्ध की प्रशंसा करते हुए लौट जाते हैं।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.59.1)

समुदीर्णं ततो दृष्ट्वा सङ्ग्रामं कुरुमुख्ययोः । अब्रवीदर्जुनस्तत्र वासुदेवं यशस्विनम् ॥

samudīrṇaṃ tato dṛṣṭvā saṅgrāmaṃ kurumukhyayoḥ | abravīdarjunastatra vāsudevaṃ yaśasvinam

तब दोनों कुरुमुख्यों के संग्राम को उग्र होते देखकर अर्जुन ने यशस्वी वासुदेव से कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 2 (9.59.2)

अनयोर्वीरयोर्युद्धे को ज्यायान्भवतो मतः । कस्य वा को गुणो ज्यायानेतद्वद जनार्दन ॥

anayorvīrayoryuddhe ko jyāyānbhavato mataḥ | kasya vā ko guṇo jyāyānetadvada janārdana

इन दोनों वीरों के युद्ध में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं? और किसमें कौन-सा गुण अधिक है? हे जनार्दन! यह मुझे बताइए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 3 (9.59.3)

उपदेशोऽनयोस्तुल्यो भीमस्तु बलवत्तरः । कृती यत्नपरस्त्वेष धार्तराष्ट्रो वृकोदरात् ॥

upadeśo'nayostulyo bhīmastu balavattaraḥ | kṛtī yatnaparastveṣa dhārtarāṣṭro vṛkodarāt

शिक्षा में तो ये दोनों समान हैं, पर भीम अधिक बलवान है। किन्तु धृतराष्ट्र का यह पुत्र वृकोदर से अधिक कुशल और अधिक यत्नशील है।

श्लोक 4 (9.59.4)

भीमसेनस्तु धर्मेण युध्यमानो न जेष्यति । अन्यायेन तु युध्यन्वै हन्यादेव सुयोधनम् ॥

bhīmasenastu dharmeṇa yudhyamāno na jeṣyati | anyāyena tu yudhyanvai hanyādeva suyodhanam

धर्म के अनुसार लड़ने से भीमसेन नहीं जीतेगा; पर अन्याय से लड़कर वह सुयोधन को अवश्य मार सकता है।

श्लोक 5 (9.59.5)

मायया निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् । विरोचनस्तु शक्रेण मायया निर्जितः स वै ॥

māyayā nirjitā devairasurā iti naḥ śrutam | virocanastu śakreṇa māyayā nirjitaḥ sa vai

हमने सुना है कि देवताओं ने असुरों को माया से जीता था, और इन्द्र ने विरोचन को भी माया से ही जीता था।

श्लोक 6 (9.59.6)

मायया चाक्षिपत्तेजो वृत्रस्य बलसूदनः । तस्मान्मायामयं वीर आतिष्ठतु वृकोदरः ॥

māyayā cākṣipattejo vṛtrasya balasūdanaḥ | tasmānmāyāmayaṃ vīra ātiṣṭhatu vṛkodaraḥ

और बल के संहारक इन्द्र ने भी माया से वृत्र का तेज हर लिया था। इसलिए, हे वीर! वृकोदर भी मायापूर्ण मार्ग अपनाए।

श्लोक 7 (9.59.7)

प्रतिज्ञातं च भीमेन द्यूतकाले धनञ्जय । ऊरू भेत्स्यामि ते सङ्ख्ये गदयेति सुयोधनम् ॥

pratijñātaṃ ca bhīmena dyūtakāle dhanañjaya | ūrū bhetsyāmi te saṅkhye gadayeti suyodhanam

और हे धनञ्जय! द्यूत के समय भीम ने सुयोधन के विषय में प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्ध में गदा से तेरी जाँघें तोड़ दूँगा।"

श्लोक 8 (9.59.8)

सोऽयं प्रतिज्ञां तां चापि पारयत्वरिकर्शनः । मायाविनं तु राजानं माययैव निकृन्ततु ॥

so'yaṃ pratijñāṃ tāṃ cāpi pārayatvarikarśanaḥ | māyāvinaṃ tu rājānaṃ māyayaiva nikṛntatu

शत्रुओं को सन्तप्त करनेवाला वह भीम अपनी उस प्रतिज्ञा को भी पूरा करे, और मायावी राजा को माया से ही काट डाले।

श्लोक 9 (9.59.9)

यद्येष बलमास्थाय न्यायेन प्रहरिष्यति । विषमस्थस्ततो राजा भविष्यति युधिष्ठिरः ॥

yadyeṣa balamāsthāya nyāyena prahariṣyati | viṣamasthastato rājā bhaviṣyati yudhiṣṭhiraḥ

यदि वह बल का आश्रय लेकर न्यायपूर्वक प्रहार करेगा, तो राजा युधिष्ठिर संकट की स्थिति में पड़ जाएँगे।

श्लोक 10 (9.59.10)

पुनरेव तु वक्ष्यामि पाण्डवेय निबोध मे । धर्मराजापराधेन भयं नः पुनरागतम् ॥

punareva tu vakṣyāmi pāṇḍaveya nibodha me | dharmarājāparādhena bhayaṃ naḥ punarāgatam

हे पाण्डुपुत्र! मैं एक और बात कहूँगा, उसे सुनो। धर्मराज के दोष से हमारे ऊपर फिर भय आ गया है।

श्लोक 11 (9.59.11)

कृत्वा हि सुमहत्कर्म हत्वा भीष्ममुखान्कुरून् । जयः प्राप्तो यशः प्राग्र्यं वैरं च प्रतियातितम् । तदेवं विजयः प्राप्तः पुनः संशयितः कृतः ॥

kṛtvā hi sumahatkarma hatvā bhīṣmamukhānkurūn | jayaḥ prāpto yaśaḥ prāgryaṃ vairaṃ ca pratiyātitam | tadevaṃ vijayaḥ prāptaḥ punaḥ saṃśayitaḥ kṛtaḥ

भीष्म आदि कुरुओं का वध करके हमने बड़ा भारी कर्म किया, विजय और श्रेष्ठ यश पाया और वैर का बदला चुका लिया; फिर भी इस प्रकार पाई हुई विजय फिर संशय में डाल दी गई है।

श्लोक 12 (9.59.12)

अबुद्धिरेषां महती धर्मराजस्य पाण्डव । यदेकविजये वीर पणितं कृतमीदृशम् ॥

abuddhireṣāṃ mahatī dharmarājasya pāṇḍava | yadekavijaye vīra paṇitaṃ kṛtamīdṛśam

हे पाण्डव! यह धर्मराज की बड़ी भारी नासमझी है कि उन्होंने केवल एक युद्ध में विजय पर ऐसा दाँव लगा दिया।

श्लोक 13 (9.59.13)

सुयोधनः कृती वीर एकायनगतस्तथा ॥

suyodhanaḥ kṛtī vīra ekāyanagatastathā

सुयोधन कुशल वीर है, और उसने एक ही मार्ग का आश्रय ले रखा है।

श्लोक 14 (9.59.14)

अपि चोशनसा गीतः श्रूयतेऽयं पुरातनः । श्लोकस्तत्त्वार्थसहितस्तन्मे निगदतः शृणु ॥

api cośanasā gītaḥ śrūyate'yaṃ purātanaḥ | ślokastattvārthasahitastanme nigadataḥ śṛṇu

इसके अतिरिक्त उशना का गाया हुआ एक पुरातन श्लोक सुना जाता है, जो तत्त्व के अर्थ से भरा है; मैं उसे कहता हूँ, तुम मुझसे सुनो।

श्लोक 15 (9.59.15)

पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम् । भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हि ते ॥

punarāvartamānānāṃ bhagnānāṃ jīvitaiṣiṇām | bhetavyamariśeṣāṇāmekāyanagatā hi te

"जो टूटकर भी जीवन की इच्छा से फिर लौट पड़ते हैं, उनसे शत्रु के बचे हुए लोगों को डरना चाहिए; क्योंकि वे एक ही मार्ग पर चल पड़े हैं।"

श्लोक 16 (9.59.16)

साहसोत्पतितानां च निराशानां च जीविते । न शक्यमग्रतः स्थातुं शक्रेणापि धनञ्जय ॥

sāhasotpatitānāṃ ca nirāśānāṃ ca jīvite | na śakyamagrataḥ sthātuṃ śakreṇāpi dhanañjaya

"जो जीवन से निराश होकर साहस के आवेश में उठ खड़े हुए हों, उनके सामने इन्द्र भी नहीं ठहर सकता, हे धनञ्जय!"

श्लोक 17 (9.59.17)

सुयोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं ह्रदं गतम् । पराजितं वनप्रेप्सुं निराशं राज्यलम्भने । कोऽन्विष्य संयुगे प्राज्ञः पुनर्द्वन्द्वे समाह्वयेत् ॥

suyodhanamimaṃ bhagnaṃ hatasainyaṃ hradaṃ gatam | parājitaṃ vanaprepsuṃ nirāśaṃ rājyalambhane | ko'nviṣya saṃyuge prājñaḥ punardvandve samāhvayet

यह सुयोधन टूट चुका है, उसकी सेना मारी जा चुकी है, वह सरोवर में चला गया है, पराजित है, वन जाना चाहता है और राज्य पाने से निराश है। ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो युद्ध में उसे खोजकर फिर द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारे?

श्लोक 18 (9.59.18)

अपि नो निर्जितं राज्यं न हरेत सुयोधनः । यस्त्रयोदशवर्षाणि गदया कृतनिश्रमः । चरत्यूर्ध्वं च तिर्यक्च भीमसेनजिघांसया ॥

api no nirjitaṃ rājyaṃ na hareta suyodhanaḥ | yastrayodaśavarṣāṇi gadayā kṛtaniśramaḥ | caratyūrdhvaṃ ca tiryakca bhīmasenajighāṃsayā

क्या सुयोधन हमारा जीता हुआ राज्य भी वापस नहीं ले लेगा? वही जिसने तेरह वर्षों तक अथक गदा का अभ्यास किया है और भीमसेन को मारने की इच्छा से ऊपर-नीचे और आड़े-तिरछे घूमता रहा है।

श्लोक 19 (9.59.19)

एनं चेन्न महाबाहुरन्यायेन हनिष्यति । एष वः कौरवो राजा धार्तराष्ट्रो भविष्यति ॥

enaṃ cenna mahābāhuranyāyena haniṣyati | eṣa vaḥ kauravo rājā dhārtarāṣṭro bhaviṣyati

यदि महाबाहु भीम इसे अन्याय से नहीं मारेगा, तो यही कौरव राजा, धृतराष्ट्र का पुत्र, तुम्हारा राजा हो जाएगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (9.59.20)

धनञ्जयस्तु श्रुत्वैतत्केशवस्य महात्मनः । प्रेक्षतो भीमसेनस्य सव्यमूरुमताडयत् ॥

dhanañjayastu śrutvaitatkeśavasya mahātmanaḥ | prekṣato bhīmasenasya savyamūrumatāḍayat

महात्मा केशव की यह बात सुनकर धनञ्जय ने भीमसेन के देखते-देखते अपनी बाईं जाँघ पर थपकी दी।

श्लोक 21 (9.59.21)

गृह्य संज्ञां ततो भीमो गदया व्यचरद्रणे । मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ॥

gṛhya saṃjñāṃ tato bhīmo gadayā vyacaradraṇe | maṇḍalāni vicitrāṇi yamakānītarāṇi ca

संकेत समझकर भीम ने युद्ध में गदा लेकर विचित्र मण्डलों में, जोड़ीदार और अन्य प्रकार की गतियों में विचरना आरम्भ किया,

श्लोक 22 (9.59.22)

दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रिकमथापि च । व्यचरत्पाण्डवो राजन्नरिं सम्मोहयन्निव ॥

dakṣiṇaṃ maṇḍalaṃ savyaṃ gomūtrikamathāpi ca | vyacaratpāṇḍavo rājannariṃ sammohayanniva

दाहिने और बाएँ मण्डलों में तथा गोमूत्रिका की टेढ़ी-मेढ़ी गति में; हे राजन्! वह पाण्डव मानो शत्रु को भ्रम में डालता हुआ विचरता रहा।

श्लोक 23 (9.59.23)

तथैव तव पुत्रोऽपि गदामार्गविशारदः । व्यचरल्लघु चित्रं च भीमसेनजिघांसया ॥

tathaiva tava putro'pi gadāmārgaviśāradaḥ | vyacarallaghu citraṃ ca bhīmasenajighāṃsayā

उसी प्रकार गदा के मार्गों में निपुण तुम्हारा पुत्र भी भीमसेन को मारने की इच्छा से फुर्ती से और विचित्र ढंग से विचरता रहा।

श्लोक 24 (9.59.24)

आधुन्वन्तौ गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते । वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ॥

ādhunvantau gade ghore candanāgarurūṣite | vairasyāntaṃ parīpsantau raṇe kruddhāvivāntakau

चन्दन और अगरु से लिपी अपनी भयंकर गदाएँ घुमाते हुए, वैर का अन्त चाहते हुए, वे दोनों युद्ध में क्रुद्ध दो यमराजों जैसे लग रहे थे।

श्लोक 25 (9.59.25)

अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ । युयुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ॥

anyonyaṃ tau jighāṃsantau pravīrau puruṣarṣabhau | yuyudhāte garutmantau yathā nāgāmiṣaiṣiṇau

एक-दूसरे को मारने की इच्छा से वे दोनों श्रेष्ठ वीर, पुरुषों में श्रेष्ठ, सर्प के मांस के लोभी दो गरुड़ों की तरह लड़ रहे थे।

श्लोक 26 (9.59.26)

मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमयोः । गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञुः पावकार्चिषः ॥

maṇḍalāni vicitrāṇi caratornṛpabhīmayoḥ | gadāsampātajāstatra prajajñuḥ pāvakārciṣaḥ

राजा और भीम जब विचित्र मण्डलों में विचर रहे थे, तब उनकी गदाओं के टकराने से वहाँ अग्नि की चिनगारियाँ उत्पन्न हो रही थीं।

श्लोक 27 (9.59.27)

समं प्रहरतोस्तत्र शूरयोर्बलिनोर्मृधे । क्षुब्धयोर्वायुना राजन्द्वयोरिव समुद्रयोः ॥

samaṃ praharatostatra śūrayorbalinormṛdhe | kṣubdhayorvāyunā rājandvayoriva samudrayoḥ

हे राजन्! युद्ध में समान बल से प्रहार करते हुए वे दोनों बलवान शूरवीर वायु से क्षुब्ध दो समुद्रों जैसे थे।

श्लोक 28 (9.59.28)

तयोः प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुञ्जरयोरिव । गदानिर्घातसंह्रादः प्रहाराणामजायत ॥

tayoḥ praharatostulyaṃ mattakuñjarayoriva | gadānirghātasaṃhrādaḥ prahārāṇāmajāyata

मतवाले दो हाथियों की तरह समान बल से प्रहार करते हुए उन दोनों के प्रहारों से गदाओं की टक्कर का गर्जन उठता था।

श्लोक 29 (9.59.29)

तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे सङ्कुले भृशम् । उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिन्दमौ ॥

tasmiṃstadā samprahāre dāruṇe saṅkule bhṛśam | ubhāvapi pariśrāntau yudhyamānāvarindamau

उस भयंकर और घनघोर प्रहार-युद्ध में लड़ते-लड़ते दोनों शत्रुदमन थक गए।

श्लोक 30 (9.59.30)

तौ मुहूर्ते समाश्वस्य पुनरेव परन्तप । अभ्यहारयतां क्रुद्धौ प्रगृह्य महती गदे ॥

tau muhūrte samāśvasya punareva parantapa | abhyahārayatāṃ kruddhau pragṛhya mahatī gade

हे परन्तप! क्षण भर विश्राम करके उन दोनों ने क्रुद्ध होकर अपनी विशाल गदाएँ उठाईं और फिर एक-दूसरे पर प्रहार किया।

श्लोक 31 (9.59.31)

तयोः समभवद्युद्धं घोररूपमसंवृतम् । गदानिपातै राजेन्द्र तक्षतोर्वै परस्परम् ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ ghorarūpamasaṃvṛtam | gadānipātai rājendra takṣatorvai parasparam

हे राजेन्द्र! तब गदाओं के प्रहारों से एक-दूसरे को चीरते हुए उन दोनों में भयंकर और अनियन्त्रित युद्ध हुआ।

श्लोक 32 (9.59.32)

समरे प्रद्रुतौ तौ तु वृषभाक्षौ तरस्विनौ । अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ पङ्कस्थौ महिषाविव ॥

samare pradrutau tau tu vṛṣabhākṣau tarasvinau | anyonyaṃ jaghnaturvīrau paṅkasthau mahiṣāviva

युद्ध में एक-दूसरे पर झपटते हुए वे दोनों बलवान, बैल जैसी आँखोंवाले वीर दलदल में खड़े दो भैंसों की तरह एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 33 (9.59.33)

जर्झरीकृतसर्वाङ्गौ रुधिरेणाभिसंप्लुतौ । ददृशाते हिमवति पुष्पिताविव किंशुकौ ॥

jarjharīkṛtasarvāṅgau rudhireṇābhisaṃplutau | dadṛśāte himavati puṣpitāviva kiṃśukau

उनके सारे अंग छलनी हो गए थे और वे रक्त से नहा गए थे; वे हिमालय पर खिले हुए दो किंशुक वृक्षों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 34 (9.59.34)

दुर्योधनस्तु पार्थेन विवरे सम्प्रदर्शिते । ईषदुत्स्मयमानस्तु सहसा प्रससार ह ॥

duryodhanastu pārthena vivare sampradarśite | īṣadutsmayamānastu sahasā prasasāra ha

जब पृथापुत्र भीम ने छिद्र दिखाया, तब दुर्योधन कुछ मुसकराता हुआ सहसा आगे बढ़ा।

श्लोक 35 (9.59.35)

तमभ्याशगतं प्राज्ञः क्षणे प्रेक्ष्य वृकोदरः । अवाक्षिपद्गदां तस्मिन्वेगेन महता बली ॥

tamabhyāśagataṃ prājñaḥ kṣaṇe prekṣya vṛkodaraḥ | avākṣipadgadāṃ tasminvegena mahatā balī

उसे निकट आया देखकर बुद्धिमान और बलवान वृकोदर ने उसी क्षण बड़े वेग से उस पर अपनी गदा फेंकी।

श्लोक 36 (9.59.36)

अवक्षेपं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते । अपासर्पत्ततः स्थानात्सा मोघा न्यपतद्भुवि ॥

avakṣepaṃ tu taṃ dṛṣṭvā putrastava viśāmpate | apāsarpattataḥ sthānātsā moghā nyapatadbhuvi

हे प्रजापति! उस प्रहार को देखकर तुम्हारा पुत्र अपने स्थान से हट गया, और वह गदा व्यर्थ ही भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 37 (9.59.37)

मोक्षयित्वा प्रहारं तं सुतस्तव सुसम्भ्रमात् । भीमसेनं च गदया प्राहरत्कुरुसत्तम ॥

mokṣayitvā prahāraṃ taṃ sutastava susambhramāt | bhīmasenaṃ ca gadayā prāharatkurusattama

हे कुरुश्रेष्ठ! अत्यन्त उतावली से उस प्रहार को बचाकर तुम्हारे पुत्र ने भीमसेन पर गदा से प्रहार किया।

श्लोक 38 (9.59.38)

तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजसः । प्रहारगुरुपाताच्च मूर्छेव समजायत ॥

tasya visyandamānena rudhireṇāmitaujasaḥ | prahāragurupātācca mūrcheva samajāyata

उस अमित तेजस्वी भीम के शरीर से बहते रक्त और प्रहार की भारी चोट के कारण उसे मानो मूर्छा-सी आ गई।

श्लोक 39 (9.59.39)

तन्नावुध्यत पुत्रस्ते पीडितं पाण्डवं रणे । धारयामास भीमोऽपि शरीरमतिपीडितम् ॥

tannāvudhyata putraste pīḍitaṃ pāṇḍavaṃ raṇe | dhārayāmāsa bhīmo'pi śarīramatipīḍitam

तुम्हारे पुत्र ने नहीं जाना कि पाण्डव युद्ध में पीड़ित हो गया है, और भीम ने भी अपने अत्यन्त पीड़ित शरीर को सँभाल लिया।

श्लोक 40 (9.59.40)

अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे । अतो न प्राहरत्तस्मै पुनरेव तवात्मजः ॥

amanyata sthitaṃ hyenaṃ prahariṣyantamāhave | ato na prāharattasmai punareva tavātmajaḥ

यह सोचकर कि वह युद्ध में प्रहार करने को तैयार खड़ा है, तुम्हारे पुत्र ने उस पर फिर प्रहार नहीं किया।

श्लोक 41 (9.59.41)

ततो मुहूर्तमाश्वस्य दुर्योधनमुपस्थितम् । वेगेनाभ्ययतद्राजन्गदामादाय पाण्डवः ॥

tato muhūrtamāśvasya duryodhanamupasthitam | vegenābhyayatadrājangadāmādāya pāṇḍavaḥ

तब क्षण भर विश्राम करके पाण्डव गदा लेकर, हे राजन्! सामने खड़े दुर्योधन पर वेग से झपटा।

श्लोक 42 (9.59.42)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संरब्धममितौजसम् । मोघमस्य प्रहारं तं चिकीर्षुर्भरतर्षभ ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya saṃrabdhamamitaujasam | moghamasya prahāraṃ taṃ cikīrṣurbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! उसे क्रोध से भरा और अमित तेजवाला आते देखकर, उसके उस प्रहार को व्यर्थ कर देने की इच्छा से,

श्लोक 43 (9.59.43)

अवस्थाने मतिं कृत्वा पुत्रस्तव महामनाः । इयेषोत्पतितुं राजञ्छलयिष्यन्वृकोदरम् ॥

avasthāne matiṃ kṛtvā putrastava mahāmanāḥ | iyeṣotpatituṃ rājañchalayiṣyanvṛkodaram

तुम्हारे उदार मन के पुत्र ने डटे रहकर फिर उछलने का निश्चय किया और वृकोदर को छलने के लिए उछलना चाहा।

श्लोक 44 (9.59.44)

अबुध्यद्भीमसेनस्तु राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम् । अथास्य समभिद्रुत्य समुत्पत्य च सिंहवत् ॥

abudhyadbhīmasenastu rājñastasya cikīrṣitam | athāsya samabhidrutya samutpatya ca siṃhavat

भीमसेन ने उस राजा के इरादे को समझ लिया। तब वह उस पर झपटा और सिंह की तरह उछल पड़ा,

श्लोक 45 (9.59.45)

सृत्या वञ्चयतो राजन्पुनरेवोत्पतिष्यतः । ऊरुभ्यां प्राहिणोद्राजन्गदां वेगेन पाण्डवः ॥

sṛtyā vañcayato rājanpunarevotpatiṣyataḥ | ūrubhyāṃ prāhiṇodrājangadāṃ vegena pāṇḍavaḥ

और हे राजन्! चाल से छलकर जब वह फिर उछलने ही वाला था, तभी पाण्डव ने बड़े वेग से उसकी जाँघों पर गदा चलाई।

श्लोक 46 (9.59.46)

सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा । ऊरू दुर्योधनस्याथ बभञ्ज प्रियदर्शनौ ॥

sā vajraniṣpeṣasamā prahitā bhīmakarmaṇā | ūrū duryodhanasyātha babhañja priyadarśanau

भयंकर कर्म करनेवाले भीम की चलाई हुई, वज्र के आघात जैसी उस गदा ने दुर्योधन की सुन्दर जाँघों को तोड़ डाला।

श्लोक 47 (9.59.47)

स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादयन् । भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ॥

sa papāta naravyāghro vasudhāmanunādayan | bhagnorurbhīmasenena putrastava mahīpate

हे पृथ्वीपति! भीमसेन से जाँघें टूट जाने पर वह नरव्याघ्र, तुम्हारा पुत्र, पृथ्वी को गुँजाता हुआ गिर पड़ा।

श्लोक 48 (9.59.48)

ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांसुवर्षं पपात च । चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ॥

vavurvātāḥ sanirghātāḥ pāṃsuvarṣaṃ papāta ca | cacāla pṛthivī cāpi savṛkṣakṣupaparvatā

घोर शब्दों के साथ आँधियाँ चलने लगीं, धूल की वर्षा हुई, और वृक्ष, झाड़ियों तथा पर्वतों सहित पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 49 (9.59.49)

तस्मिन्निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् । महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयङ्करी । पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ ॥

tasminnipatite vīre patyau sarvamahīkṣitām | mahāsvanā punardīptā sanirghātā bhayaṅkarī | papāta colkā mahatī patite pṛthivīpatau

जब सब राजाओं का स्वामी वह वीर गिरा, तब पृथ्वीपति के गिरने पर एक विशाल उल्का, जो जलती हुई, गड़गड़ाहट के साथ, भयंकर और घोर शब्द करती हुई थी, फिर गिरी।

श्लोक 50 (9.59.50)

तथा शोणितवर्षं च पांसुवर्षं च भारत । ववर्ष मघवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते ॥

tathā śoṇitavarṣaṃ ca pāṃsuvarṣaṃ ca bhārata | vavarṣa maghavāṃstatra tava putre nipātite

हे भारत! तुम्हारे पुत्र के गिरने पर वहाँ इन्द्र ने रक्त की वर्षा और धूल की वर्षा की।

श्लोक 51 (9.59.51)

यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च । अन्तरिक्षे महान्नादस्तत्र भारत शुश्रुवे ॥

yakṣāṇāṃ rākṣasānāṃ ca piśācānāṃ tathaiva ca | antarikṣe mahānnādastatra bhārata śuśruve

हे भारत! वहाँ आकाश में यक्षों, राक्षसों और पिशाचों का महान् नाद सुनाई दिया।

श्लोक 52 (9.59.52)

तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् । जज्ञे घोरतरः शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् ॥

tena śabdena ghoreṇa mṛgāṇāmatha pakṣiṇām | jajñe ghorataraḥ śabdo bahūnāṃ sarvatodiśam

उस भयंकर शब्द से पशुओं और पक्षियों का, बहुतों का, और भी भयंकर कोलाहल चारों दिशाओं में उठा।

श्लोक 53 (9.59.53)

ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह । मुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते ॥

ye tatra vājinaḥ śeṣā gajāśca manujaiḥ saha | mumucuste mahānādaṃ tava putre nipātite

वहाँ जो घोड़े बचे थे और मनुष्यों सहित हाथी थे, उन्होंने तुम्हारे पुत्र के गिरने पर बड़ा भारी नाद किया।

श्लोक 54 (9.59.54)

भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् । अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते ॥

bherīśaṅkhamṛdaṅgānāmabhavacca svano mahān | antarbhūmigataścaiva tava putre nipātite

और तुम्हारे पुत्र के गिरने पर पृथ्वी के भीतर से भी भेरी, शंख और मृदंगों का महान् शब्द उठा।

श्लोक 55 (9.59.55)

बहुपादैर्बहुभुजैः कबन्धैर्घोरदर्शनैः । नृत्यद्भिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्राभवन्नृप ॥

bahupādairbahubhujaiḥ kabandhairghoradarśanaiḥ | nṛtyadbhirbhayadairvyāptā diśastatrābhavannṛpa

हे राजन्! वहाँ दिशाएँ अनेक पैरों और अनेक भुजाओंवाले, भयंकर दिखनेवाले, नाचते हुए और भय उत्पन्न करते हुए कबन्धों से भर गईं।

श्लोक 56 (9.59.56)

ध्वजवन्तोऽस्त्रवन्तश्च शस्त्रवन्तस्तथैव च । प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते ॥

dhvajavanto'stravantaśca śastravantastathaiva ca | prākampanta tato rājaṃstava putre nipātite

हे राजन्! तुम्हारे पुत्र के गिरने पर ध्वजा, अस्त्र और शस्त्र धारण करनेवाले काँप उठे।

श्लोक 57 (9.59.57)

ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम । नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाऽभवन् ॥

hradāḥ kūpāśca rudhiramudvemurnṛpasattama | nadyaśca sumahāvegāḥ pratisrotovahā'bhavan

हे नृपश्रेष्ठ! सरोवर और कुएँ रक्त उगलने लगे, और अत्यन्त वेगवाली नदियाँ उलटी धारा में बहने लगीं।

श्लोक 58 (9.59.58)

पुल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गाः पुरुषाऽभवन् । दुर्योधने तदा राजन्पतिते तनये तव ॥

pulliṅgā iva nāryastu strīliṅgāḥ puruṣā'bhavan | duryodhane tadā rājanpatite tanaye tava

हे राजन्! तुम्हारे पुत्र दुर्योधन के गिरने पर स्त्रियाँ पुरुष-चिह्नोंवाली और पुरुष स्त्री-चिह्नोंवाले-से हो गए।

श्लोक 59 (9.59.59)

दृष्ट्वा तानद्भुतोत्पातान्पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । आविग्नमनसः सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ ॥

dṛṣṭvā tānadbhutotpātānpāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | āvignamanasaḥ sarve babhūvurbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! उन अद्भुत अपशकुनों को देखकर पाण्डवों सहित सब पाञ्चाल व्याकुल चित्त हो गए।

श्लोक 60 (9.59.60)

ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा । कथयन्तोऽद्भुतं युद्धं सुतयोस्तव भारत ॥

yayurdevā yathākāmaṃ gandharvāpsarasastathā | kathayanto'dbhutaṃ yuddhaṃ sutayostava bhārata

हे भारत! देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ तुम्हारे दोनों पुत्रों के उस अद्भुत युद्ध की चर्चा करते हुए इच्छानुसार चले गए।

श्लोक 61 (9.59.61)

तथैव सिद्धा राजेन्द्र तथा वातिकचारणाः । नरसिंहौ प्रशंसन्तौ विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥

tathaiva siddhā rājendra tathā vātikacāraṇāḥ | narasiṃhau praśaṃsantau viprajagmuryathāgatam

हे राजेन्द्र! उसी प्रकार सिद्ध तथा वातिक और चारण भी उन दोनों नरसिंहों की प्रशंसा करते हुए जैसे आए थे वैसे लौट गए।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60