शल्य पर्व · अध्याय 60
भीम का दुर्योधन के सिर पर पैर रखना; युधिष्ठिर का विलाप
दुर्योधन के गिर जाने पर पाण्डव और सोमक हर्षित होते हैं; भीमसेन उसे ताने देते हैं, द्रौपदी के अपमान का स्मरण करते हैं और राजा के सिर पर बायाँ पैर रख देते हैं। युधिष्ठिर पतित राजा और बन्धु पर प्रहार के लिए उन्हें टोकते हैं, फिर आँसू भरकर दुर्योधन के पास जाकर कहते हैं कि दोष उसी का था, अब शोक के पात्र पाण्डव हैं, और घर की विधवाओं का सामना करने की चिन्ता से वे व्याकुल हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.60.1)
तं पातितं ततो दृष्ट्वा महासालमिवोद्गतम् । प्रहृष्टमनसः सर्वे बभूवुस्तत्र पाण्डवाः ॥
taṃ pātitaṃ tato dṛṣṭvā mahāsālamivodgatam | prahṛṣṭamanasaḥ sarve babhūvustatra pāṇḍavāḥ
उसे ऊँचे विशाल साल वृक्ष की भाँति गिरा हुआ देखकर वहाँ उपस्थित सभी पाण्डव मन में प्रसन्न हो उठे।
श्लोक 2 (9.60.2)
उन्मत्तमिव मातङ्गं सिंहेन विनिपातितम् । ददृशुर्हृष्टरोमाणः सर्वे ते चापि सोमकाः ॥
unmattamiva mātaṅgaṃ siṃhena vinipātitam | dadṛśurhṛṣṭaromāṇaḥ sarve te cāpi somakāḥ
सिंह के द्वारा गिराए गए मतवाले हाथी की तरह उसे पड़ा देखकर सभी सोमक भी हर्ष से रोमांचित हो उठे।
श्लोक 3 (9.60.3)
ततो दुर्योधनं हत्वा भीमसेनः प्रतापवान् । पातितं कौरवेन्द्रं तमुपगम्येदमब्रवीत् ॥
tato duryodhanaṃ hatvā bhīmasenaḥ pratāpavān | pātitaṃ kauravendraṃ tamupagamyedamabravīt
तब प्रतापी भीमसेन ने दुर्योधन को मारकर, गिरे हुए उस कुरुराज के पास जाकर यह कहा।
भीमसेन उवाच
श्लोक 4 (9.60.4)
गौर्गौरिति पुरा मन्द द्रौपदीमेकवाससम् । यत्सभायां हसन्नस्मांस्तदा वदसि दुर्मते । तस्यावहासस्य फलमद्य त्वं समवाप्नुहि ॥
gaurgauriti purā manda draupadīmekavāsasam | yatsabhāyāṃ hasannasmāṃstadā vadasi durmate | tasyāvahāsasya phalamadya tvaṃ samavāpnuhi
"गाय! गाय!" - रे मूर्ख दुर्मते, पहले सभा में एक वस्त्र पहने द्रौपदी को और हमें देखकर हँसते हुए तू यही कहता था। उस उपहास का फल आज तू पा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (9.60.5)
एवमुक्त्वा स वामेन पदा मौलिमुपास्पृशत् । शिरश्च राजसिंहस्य पादेन समलोडयत् ॥
evamuktvā sa vāmena padā maulimupāspṛśat | śiraśca rājasiṃhasya pādena samaloḍayat
यह कहकर उसने बाएँ पैर से उसके मस्तक को छुआ और उस राजसिंह के सिर को पैर से इधर-उधर लुढ़काया।
श्लोक 6 (9.60.6)
तथैव क्रोधसंरक्तो भीमः परबलार्दनः । पुनरेवाब्रवीद्वाक्यं यत्तच्छृणु नराधिप ॥
tathaiva krodhasaṃrakto bhīmaḥ parabalārdanaḥ | punarevābravīdvākyaṃ yattacchṛṇu narādhipa
क्रोध से लाल हुए शत्रुसेना को कुचलने वाले भीम ने फिर यह कहा; हे नराधिप, उसे सुनिए।
भीमसेन उवाच
श्लोक 7 (9.60.7)
येऽस्मान्पुरा प्रनृत्यन्ति मूढा गौरिति गौरिति । तान्वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ॥
ye'smānpurā pranṛtyanti mūḍhā gauriti gauriti | tānvayaṃ pratinṛtyāmaḥ punargauriti gauriti
"जो मूर्ख पहले 'गाय! गाय!' कहते हुए हमारे सामने नाचते थे, उन्हीं के सामने अब हम भी 'गाय! गाय!' कहते हुए नाचते हैं।"
श्लोक 8 (9.60.8)
नास्माकं निकृतिर्वह्निर्नाक्षद्यूतं न वञ्चना । स्वबाहुबलमाश्रित्य प्रबाधामो वयं रिपून् ॥
nāsmākaṃ nikṛtirvahnirnākṣadyūtaṃ na vañcanā | svabāhubalamāśritya prabādhāmo vayaṃ ripūn
"हमारे पास न छल है, न आग लगाना, न द्यूत, न धोखा। हम अपनी भुजाओं के बल के सहारे शत्रुओं को कुचलते हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (9.60.9)
सोऽवाप्य वैरस्य चिरस्य पारं । वृकोदरः प्राह शनैः प्रहस्य । युधिष्ठिरं केशवसृञ्जयांश्च । धनञ्जयं माद्रवतीसुतौ च ॥
so'vāpya vairasya cirasya pāraṃ | vṛkodaraḥ prāha śanaiḥ prahasya | yudhiṣṭhiraṃ keśavasṛñjayāṃśca | dhanañjayaṃ mādravatīsutau ca
चिरकाल के वैर का पार पाकर वृकोदर ने मुस्कराकर धीरे से युधिष्ठिर, केशव, सृंजयों, धनंजय और माद्री के दोनों पुत्रों से कहा:
भीमसेन उवाच
श्लोक 10 (9.60.10)
रजस्वलां द्रौपदीमानयन्ते । ये चाप्यकुर्वन्त सदस्यवस्त्राम् । तान्पश्यध्वं पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रान् । रणे हतांस्तपसा याज्ञसेन्याः ॥
rajasvalāṃ draupadīmānayante | ye cāpyakurvanta sadasyavastrām | tānpaśyadhvaṃ pāṇḍavairdhārtarāṣṭrān | raṇe hatāṃstapasā yājñasenyāḥ
"देखो उन धृतराष्ट्र-पुत्रों को, जो रजस्वला द्रौपदी को घसीट लाए थे और जिन्होंने भरी सभा में उसका वस्त्र भी उतारना चाहा; याज्ञसेनी के तप के प्रभाव से पाण्डवों ने उन्हें युद्ध में मार डाला है।"
श्लोक 11 (9.60.11)
ये नः पुरा षण्ढतिलानवोचन् । क्रूरा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्राः । ते नो हताः सगणाः सानुबन्धाः । कामं स्वर्गं नरकं वा व्रजामः ॥
ye naḥ purā ṣaṇḍhatilānavocan | krūrā rājño dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ | te no hatāḥ sagaṇāḥ sānubandhāḥ | kāmaṃ svargaṃ narakaṃ vā vrajāmaḥ
"धृतराष्ट्र के जिन क्रूर पुत्रों ने पहले हमें 'निःसार तिल' कहा था, वे अपने गणों और बन्धुओं सहित मारे गए। अब हम चाहे स्वर्ग जाएँ या नरक, कोई चिन्ता नहीं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (9.60.12)
पुनश्च राज्ञः पतितस्य भूमौ । स तां गदां स्कन्धगतां प्रगृह्य । वामेन पादेन शिरः प्रमृद्य । दुर्योधनं नैकृतिकेत्यवोचत् ॥
punaśca rājñaḥ patitasya bhūmau | sa tāṃ gadāṃ skandhagatāṃ pragṛhya | vāmena pādena śiraḥ pramṛdya | duryodhanaṃ naikṛtiketyavocat
फिर कन्धे पर रखी उस गदा को थामे हुए उसने भूमि पर पड़े राजा के सिर को बाएँ पैर से कुचलकर दुर्योधन से कहा, "अरे छली!"
श्लोक 13 (9.60.13)
हृष्टेन राजन्कुरुपार्थिवस्य । क्षुद्रात्मना भीमसेनेन पादम् । दृष्ट्वा कृतं मूर्धनि नाभ्यनन्दन् । धर्मात्मानः सोमकानां प्रबर्हाः ॥
hṛṣṭena rājankurupārthivasya | kṣudrātmanā bhīmasenena pādam | dṛṣṭvā kṛtaṃ mūrdhani nābhyanandan | dharmātmānaḥ somakānāṃ prabarhāḥ
हे राजन्, हर्ष में भरे क्षुद्र हृदय वाले भीमसेन के द्वारा कुरुराज के मस्तक पर पैर रखा देखकर सोमकों के धर्मात्मा प्रधान वीरों ने उसका अभिनन्दन नहीं किया।
श्लोक 14 (9.60.14)
तव पुत्रं तथा हत्वा कत्थमानं वृकोदरम् । नृत्यमानं च बहुशो धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥
tava putraṃ tathā hatvā katthamānaṃ vṛkodaram | nṛtyamānaṃ ca bahuśo dharmarājo'bravīdidam
तुम्हारे पुत्र को मारकर वृकोदर जब बार-बार डींग मारता और नाचता रहा, तब धर्मराज ने उससे यह कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 15 (9.60.15)
गतोऽसि वैरस्यानृण्यं प्रतिज्ञा पूरिता त्वया । शुभेनाथाशुभेनैव कर्मणा विरमाधुना ॥
gato'si vairasyānṛṇyaṃ pratijñā pūritā tvayā | śubhenāthāśubhenaiva karmaṇā viramādhunā
"तुम वैर के ऋण से उऋण हो गए, तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी हो गई। अब इस शुभ या अशुभ कर्म से रुक जाओ।"
श्लोक 16 (9.60.16)
मा शिरोऽस्य पदाऽमर्दीर्मा धर्मस्तेऽतिगो भवेत् । राजा ज्ञातिर्हतश्चायं नैतन्न्याय्यं तवानघ ॥
mā śiro'sya padā'mardīrmā dharmaste'tigo bhavet | rājā jñātirhataścāyaṃ naitannyāyyaṃ tavānagha
"इसके सिर को पैर से मत कुचलो; तुम्हारे धर्म का उल्लंघन न हो। यह राजा है, तुम्हारा बन्धु है, और मारा जा चुका है; हे निष्पाप, तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है।"
श्लोक 17 (9.60.17)
एकादशचमूनाथं कुरूणामधिपं तथा । मास्प्राक्षीर्भीम पादेन राजानं ज्ञातिमेव च ॥
ekādaśacamūnāthaṃ kurūṇāmadhipaṃ tathā | māsprākṣīrbhīma pādena rājānaṃ jñātimeva ca
"ग्यारह अक्षौहिणियों के स्वामी और कुरुओं के अधिपति को, जो राजा भी है और बन्धु भी, हे भीम, पैर से मत छुओ।"
श्लोक 18 (9.60.18)
हतबन्धुर्हतामात्यो भ्रष्टसैन्यो हतो मृधे । सर्वाकारेण शोच्योऽयं नावहास्योऽयमीश्वरः ॥
hatabandhurhatāmātyo bhraṣṭasainyo hato mṛdhe | sarvākāreṇa śocyo'yaṃ nāvahāsyo'yamīśvaraḥ
"जिसके बन्धु मारे गए, मन्त्री मारे गए, सेना बिखर गई और जो स्वयं रण में मारा गया, वह सब प्रकार से शोक के योग्य है; यह राजा उपहास के योग्य नहीं है।"
श्लोक 19 (9.60.19)
विध्वस्तोऽयं हतामात्यो हतबन्धुर्हतात्मजः । उत्सन्नपिण्डो भ्राता च नैतन्न्याय्यं कृतं त्वया ॥
vidhvasto'yaṃ hatāmātyo hatabandhurhatātmajaḥ | utsannapiṇḍo bhrātā ca naitannyāyyaṃ kṛtaṃ tvayā
"यह नष्ट हो गया, इसके मन्त्री, बन्धु और पुत्र मारे गए, इसके वंश का पिण्डदान भी उच्छिन्न हो गया, और यह तुम्हारा भाई भी है। तुमने यह उचित नहीं किया।"
श्लोक 20 (9.60.20)
धार्मिको भीमसेनोऽसावित्याहुस्त्वां पुरा जनाः । स कस्माद्भीमसेन त्वं राजानमधितिष्ठसि ॥
dhārmiko bhīmaseno'sāvityāhustvāṃ purā janāḥ | sa kasmādbhīmasena tvaṃ rājānamadhitiṣṭhasi
"लोग पहले तुम्हें 'भीमसेन धर्मात्मा है' कहा करते थे। फिर हे भीमसेन, तुम एक राजा के ऊपर पैर क्यों रखते हो?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (9.60.21)
इत्युक्त्वा भीमसेनं तु साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः । उपसृत्याब्रवीद्दीनो दुर्योधनमरिन्दमम् ॥
ityuktvā bhīmasenaṃ tu sāśrukaṇṭho yudhiṣṭhiraḥ | upasṛtyābravīddīno duryodhanamarindamam
भीमसेन से ऐसा कहकर आँसुओं से भरे कण्ठ वाले, दुःखी युधिष्ठिर शत्रुदमन दुर्योधन के पास गए और बोले:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 22 (9.60.22)
तात मन्युर्न ते कार्यो नात्मा शोच्यस्त्वया तथा । नूनं पूर्वकृतं कर्म सुघोरमनुभूयते ॥
tāta manyurna te kāryo nātmā śocyastvayā tathā | nūnaṃ pūrvakṛtaṃ karma sughoramanubhūyate
"तात, तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए और अपने लिए शोक भी नहीं करना चाहिए। निश्चय ही पहले किए हुए अत्यन्त भयंकर कर्म का फल अब भोगा जा रहा है।"
श्लोक 23 (9.60.23)
धात्रोपदिष्टं विषमं नूनं फलमसंस्कृतम् । यद्वयं त्वां जिघांसामस्त्वं चास्मान्कुरुसत्तम ॥
dhātropadiṣṭaṃ viṣamaṃ nūnaṃ phalamasaṃskṛtam | yadvayaṃ tvāṃ jighāṃsāmastvaṃ cāsmānkurusattama
"निश्चय ही विधाता ने यह कठोर और अपरिष्कृत फल ठहराया था कि हम तुम्हें मारना चाहें और तुम हमें, हे कुरुश्रेष्ठ।"
श्लोक 24 (9.60.24)
आत्मनो ह्यपराधेन महद्व्यसनमीदृशम् । प्राप्तवानसि यल्लोभान्मदाद्बाल्याच्च भारत ॥
ātmano hyaparādhena mahadvyasanamīdṛśam | prāptavānasi yallobhānmadādbālyācca bhārata
"हे भारत, अपने ही अपराध से, लोभ, मद और बचपने के कारण, तुम पर ऐसा महान् संकट आया है।"
श्लोक 25 (9.60.25)
घातयित्वा वयस्यांश्च भ्रातॄनथ पितॄंस्तथा । पुत्रान्पौत्रांस्तथा चान्यांस्ततोसि निधनं गतः ॥
ghātayitvā vayasyāṃśca bhrātṝnatha pitṝṃstathā | putrānpautrāṃstathā cānyāṃstatosi nidhanaṃ gataḥ
"अपने मित्रों, भाइयों, पितरों, पुत्रों, पौत्रों और दूसरों को मरवाकर अब तुम स्वयं मृत्यु को प्राप्त हुए हो।"
श्लोक 26 (9.60.26)
तवापराधादस्माभिर्भ्रातरस्ते निपातिताः । निहता ज्ञातयश्चापि दिष्टं मन्ये दुरत्ययम् ॥
tavāparādhādasmābhirbhrātaraste nipātitāḥ | nihatā jñātayaścāpi diṣṭaṃ manye duratyayam
"तुम्हारे अपराध से हमने तुम्हारे भाइयों को मार गिराया और हमारे सगे-सम्बन्धी भी मारे गए। मैं मानता हूँ कि दैव को लाँघना बहुत कठिन है।"
श्लोक 27 (9.60.27)
आत्मा न शोचनीयस्ते श्लाघ्यो मृत्युस्तवानघ । वयमेवाधुना शोच्याः सर्वावस्थासु कौरव ॥
ātmā na śocanīyaste ślāghyo mṛtyustavānagha | vayamevādhunā śocyāḥ sarvāvasthāsu kaurava
"तुम्हारे लिए शोक नहीं करना चाहिए; हे निर्दोष, तुम्हारी मृत्यु प्रशंसनीय है। अब तो हम ही सब अवस्थाओं में शोक के पात्र हैं, हे कौरव।"
श्लोक 28 (9.60.28)
कृपणं वर्तयिष्यामस्तैर्हीना बन्धुभिः प्रियैः । भ्रातॄणां चैव पुत्राणां तथा वै शोकविह्वलाः ॥
kṛpaṇaṃ vartayiṣyāmastairhīnā bandhubhiḥ priyaiḥ | bhrātṝṇāṃ caiva putrāṇāṃ tathā vai śokavihvalāḥ
"उन प्रिय बन्धुओं से रहित होकर हम दीन दशा में जीवन बिताएँगे, भाइयों और पुत्रों के शोक से व्याकुल होकर।"
श्लोक 29 (9.60.29)
कथं द्रक्ष्यामि विधवा वधूः शोकपरिप्लुताः । त्वमेकः सुस्थितो राजन्स्वर्गे ते निलयो ध्रुवः । वयं नरकसंज्ञं वै दुःखं प्राप्स्याम दारुणम् ॥
kathaṃ drakṣyāmi vidhavā vadhūḥ śokapariplutāḥ | tvamekaḥ susthito rājansvarge te nilayo dhruvaḥ | vayaṃ narakasaṃjñaṃ vai duḥkhaṃ prāpsyāma dāruṇam
"शोक में डूबी हुई विधवा वधुओं को मैं कैसे देखूँगा? हे राजन्, केवल तुम ही भली स्थिति में हो; स्वर्ग में तुम्हारा निवास निश्चित है। हम तो नरक कहलाने वाले दारुण दुःख को भोगेंगे।"
श्लोक 30 (9.60.30)
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य विह्वलाः । गर्हयिष्यन्ति नो नूनं विधवाः शोककर्शिताः ॥
snuṣāśca prasnuṣāścaiva dhṛtarāṣṭrasya vihvalāḥ | garhayiṣyanti no nūnaṃ vidhavāḥ śokakarśitāḥ
"धृतराष्ट्र की बहुएँ और पुत्रवधुएँ, विधवा, शोक से क्षीण और व्याकुल होकर निश्चय ही हमारी निन्दा करेंगी।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 31 (9.60.31)
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निशश्वास स पार्थिवः । विललाप चिरं चापि धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
evamuktvā suduḥkhārto niśaśvāsa sa pārthivaḥ | vilalāpa ciraṃ cāpi dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ
ऐसा कहकर अत्यन्त दुःख से पीड़ित वह राजा लम्बी साँस लेने लगा, और धर्मपुत्र युधिष्ठिर भी बहुत देर तक विलाप करते रहे।