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शल्य पर्व · अध्याय 61

नाभि के नीचे प्रहार पर बलराम का क्रोध

धृतराष्ट्र के प्रश्न पर सञ्जय बताते हैं कि भीम द्वारा दुर्योधन की नाभि के नीचे प्रहार करने पर क्रुद्ध बलराम हल उठाकर उस पर झपटे, तब कृष्ण ने भीम की प्रतिज्ञा और मैत्रेय के शाप का स्मरण दिलाकर उन्हें रोका। बलराम सन्तुष्ट नहीं हुए; उन्होंने इसे कपटपूर्ण विजय कहा और द्वारका चले गए। फिर कृष्ण युधिष्ठिर से पूछते हैं कि वे दुर्योधन के सिर के कुचले जाने को क्यों सहते हैं, युधिष्ठिर अपनी बात कहते हैं, और प्रसन्न भीम पृथ्वी उन्हें समर्पित करते हैं।

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (9.61.1)

अधर्मेण हतं दृष्ट्वा राजानं माधवोत्तमः । किमब्रवीत्तदा सूत बलदेवो महाबलः ॥

adharmeṇa hataṃ dṛṣṭvā rājānaṃ mādhavottamaḥ | kimabravīttadā sūta baladevo mahābalaḥ

हे सूत, राजा को अधर्म से मारा गया देखकर माधवों में श्रेष्ठ महाबली बलदेव ने उस समय क्या कहा?

श्लोक 2 (9.61.2)

गदायुद्धविशेषज्ञो गदायुद्धविशारदः । कृतवान्रौहिणेयो यत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

gadāyuddhaviśeṣajño gadāyuddhaviśāradaḥ | kṛtavānrauhiṇeyo yattanmamācakṣva sañjaya

गदायुद्ध की सूक्ष्मताओं के ज्ञाता और गदायुद्ध में निपुण रौहिणेय ने जो कुछ किया, हे सञ्जय, वह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (9.61.3)

शिरस्यभिहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन ते सुतम् । रामः प्रहरतां श्रेष्ठश्चुक्रोध बलवद्बली ॥

śirasyabhihataṃ dṛṣṭvā bhīmasenena te sutam | rāmaḥ praharatāṃ śreṣṭhaścukrodha balavadbalī

आपके पुत्र को भीमसेन के द्वारा सिर पर मारा गया देखकर योद्धाओं में श्रेष्ठ बलवान् राम अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 4 (9.61.4)

ततो मध्ये नरेन्द्राणामूर्ध्वबाहुर्हलायुधः । कुर्वन्नार्तस्वरं घोरं धिग्धिग्भीमेत्युवाच ह ॥

tato madhye narendrāṇāmūrdhvabāhurhalāyudhaḥ | kurvannārtasvaraṃ ghoraṃ dhigdhigbhīmetyuvāca ha

तब राजाओं के बीच में हलायुध ने दोनों भुजाएँ उठाकर घोर आर्तनाद करते हुए कहा, "धिक्कार है! भीम, तुझे धिक्कार है!"

राम उवाच

श्लोक 5 (9.61.5)

अहो धिग्यदधो नाभेः प्रहृतं धर्मविग्रहे । नैतद्दृष्टं गदायुद्धे कृतवान्यद्वृकोदरः ॥

aho dhigyadadho nābheḥ prahṛtaṃ dharmavigrahe | naitaddṛṣṭaṃ gadāyuddhe kṛtavānyadvṛkodaraḥ

"हाय, धिक्कार है! धर्मयुद्ध में नाभि के नीचे प्रहार किया गया। गदायुद्ध में जो वृकोदर ने किया, वह कभी देखा नहीं गया।"

श्लोक 6 (9.61.6)

अधो नाभ्या न हन्तव्यमिति शास्त्रस्य निश्चयः । अयं तु शास्त्रमुत्सृज्य स्वच्छन्दात्सम्प्रवर्तते ॥

adho nābhyā na hantavyamiti śāstrasya niścayaḥ | ayaṃ tu śāstramutsṛjya svacchandātsampravartate

"'नाभि के नीचे प्रहार नहीं करना चाहिए' - यही शास्त्र का निश्चय है। परन्तु यह शास्त्र को छोड़कर अपनी इच्छा से चल रहा है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (9.61.7)

तस्य तत्तद्ब्रुवाणस्य रोषः समभवन्महान् । ततो राजानमालोक्य रोषसंरक्तलोचनः । बलदेवो महाराज ततो वचनमब्रवीत् ॥

tasya tattadbruvāṇasya roṣaḥ samabhavanmahān | tato rājānamālokya roṣasaṃraktalocanaḥ | baladevo mahārāja tato vacanamabravīt

इस प्रकार तरह-तरह की बातें कहते हुए उनके भीतर बड़ा क्रोध उठा। तब राजा की ओर देखकर, क्रोध से लाल आँखों वाले बलदेव ने, हे महाराज, ये वचन कहे।

राम उवाच

श्लोक 8 (9.61.8)

न चैष पतितः कृष्ण केवलं मत्समोऽसमः । आश्रितस्य तु दौर्बल्यादाश्रयः परिभर्त्स्यते ॥

na caiṣa patitaḥ kṛṣṇa kevalaṃ matsamo'samaḥ | āśritasya tu daurbalyādāśrayaḥ paribhartsyate

"कृष्ण, यह अकेला नहीं गिरा है; यह मेरे समान था और वह इसके समान नहीं है। आश्रित की दुर्बलता के कारण आश्रय देने वाले की निन्दा होती है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (9.61.9)

ततो लाङ्गलमुद्यम्य भीममभ्यद्रवद्बली ॥

tato lāṅgalamudyamya bhīmamabhyadravadbalī

फिर हल उठाकर उस बली ने भीम पर धावा किया।

श्लोक 10 (9.61.10)

तस्योर्ध्वबाहोः सदृशं रूपमासीन्महात्मनः । बहुधातुविचित्रस्य श्वेतस्येव महागिरेः ॥

tasyordhvabāhoḥ sadṛśaṃ rūpamāsīnmahātmanaḥ | bahudhātuvicitrasya śvetasyeva mahāgireḥ

भुजाएँ उठाए खड़े उन महात्मा का रूप अनेक धातुओं से चित्रित श्वेत महापर्वत के समान लग रहा था।

श्लोक 11 (9.61.11)

भ्रातृभिः सहितो वीरैः सार्जुनैरस्त्रकोविदैः । न विव्यथे महाराज दृष्ट्वा हलधरं बली ॥

bhrātṛbhiḥ sahito vīraiḥ sārjunairastrakovidaiḥ | na vivyathe mahārāja dṛṣṭvā haladharaṃ balī

अर्जुन-सहित अस्त्रविद्या में निपुण वीर भाइयों के साथ खड़े (भीम) बलवान् हलधर को देखकर भी, हे महाराज, विचलित नहीं हुए।

श्लोक 12 (9.61.12)

अथ रामं निजग्राह केशवो विनयान्वितः । बाहुभ्यां पीनवृत्ताभ्यां प्रयत्नाद्बलवद्बली ॥

atha rāmaṃ nijagrāha keśavo vinayānvitaḥ | bāhubhyāṃ pīnavṛttābhyāṃ prayatnādbalavadbalī

तब विनयशील केशव ने अपनी मोटी गोल भुजाओं से बलराम को प्रयत्नपूर्वक कसकर पकड़ लिया, क्योंकि वे स्वयं भी बलवान् थे।

श्लोक 13 (9.61.13)

सितासितौ यदुवरौ शुशुभातेऽधिकं तदा । सङ्गताविव राजेन्द्र कैलासाञ्जनपर्वतौ । नभोगतौ यथा राजंश्चन्द्रसूर्यौ दिनक्षये ॥

sitāsitau yaduvarau śuśubhāte'dhikaṃ tadā | saṅgatāviva rājendra kailāsāñjanaparvatau | nabhogatau yathā rājaṃścandrasūryau dinakṣaye

गौर और श्याम वे दोनों यदुश्रेष्ठ तब और भी शोभित हुए, मानो, हे राजेन्द्र, कैलास और अञ्जन पर्वत मिल गए हों, या दिन ढलने पर आकाश में चन्द्रमा और सूर्य साथ-साथ हों।

श्लोक 14 (9.61.14)

उवाच चैनं संरब्धं शमयन्निव केशवः ॥

uvāca cainaṃ saṃrabdhaṃ śamayanniva keśavaḥ

और केशव ने क्रोध से भरे उनको मानो शान्त करते हुए कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 15 (9.61.15)

आत्मवृद्धिर्मित्रवृद्धिर्मित्रमित्रोदयस्तथा । विपरीतं द्विषत्स्वेतत्षड्विधा वृद्धिरात्मनः ॥

ātmavṛddhirmitravṛddhirmitramitrodayastathā | viparītaṃ dviṣatsvetatṣaḍvidhā vṛddhirātmanaḥ

"अपनी उन्नति, मित्रों की उन्नति, मित्रों के मित्रों की उन्नति, और शत्रुओं में इनके विपरीत स्थिति - यही अपनी छह प्रकार की वृद्धि है।"

श्लोक 16 (9.61.16)

आत्मन्यपि च मित्रे च विपरीतं यदा भवेत् । तदा विद्यान्मनोग्लानिमाशु शान्तिकरो भवेत् ॥

ātmanyapi ca mitre ca viparītaṃ yadā bhavet | tadā vidyānmanoglānimāśu śāntikaro bhavet

"जब अपने या अपने मित्रों के साथ इसके विपरीत हो, तब उसे मन की ग्लानि का कारण समझे और शीघ्र शान्ति का उपाय करे।"

श्लोक 17 (9.61.17)

अस्माकं सहजं मित्रं पाण्डवाः शुद्धपौरुषाः । स्वकाः पितृष्वसुः पुत्रास्ते परैर्निकृता भृशम् ॥

asmākaṃ sahajaṃ mitraṃ pāṇḍavāḥ śuddhapauruṣāḥ | svakāḥ pitṛṣvasuḥ putrāste parairnikṛtā bhṛśam

"शुद्ध पौरुष वाले पाण्डव हमारे स्वाभाविक मित्र हैं; वे हमारी बुआ के पुत्र हैं, और शत्रुओं ने उनके साथ बहुत छल किया है।"

श्लोक 18 (9.61.18)

प्रतिज्ञापालनं धर्मः क्षत्रियस्येति वेत्थ तत् ॥

pratijñāpālanaṃ dharmaḥ kṣatriyasyeti vettha tat

"तुम जानते हो कि प्रतिज्ञा का पालन क्षत्रिय का धर्म है।"

श्लोक 19 (9.61.19)

सुयोधनस्य गदया भङ्क्ताऽस्म्यूरू महाहवे । इति पूर्वं प्रतिज्ञातं भीमेन हि सभातले ॥

suyodhanasya gadayā bhaṅktā'smyūrū mahāhave | iti pūrvaṃ pratijñātaṃ bhīmena hi sabhātale

"'महायुद्ध में मैं गदा से सुयोधन की जाँघें तोड़ूँगा' - यह प्रतिज्ञा भीम ने पहले सभा के बीच की थी।"

श्लोक 20 (9.61.20)

मैत्रेयेणाभिशप्तश्च पूर्वमेव महर्षिणा । ऊरू ते भेत्स्यते भीमो गदयेति परन्तप । अतो दोषं न पश्यामि मा क्रुध्यस्व प्रलम्बहन् ॥

maitreyeṇābhiśaptaśca pūrvameva maharṣiṇā | ūrū te bhetsyate bhīmo gadayeti parantapa | ato doṣaṃ na paśyāmi mā krudhyasva pralambahan

"और बहुत पहले महर्षि मैत्रेय ने भी शाप दिया था कि 'भीम गदा से तेरी जाँघें तोड़ेगा, हे परंतप।' इसलिए मुझे इसमें दोष नहीं दिखता। हे प्रलम्बहन्ता, क्रोध न करो।"

श्लोक 21 (9.61.21)

यौनः स्वैः सुखहार्दैश्च सम्बन्धः सह पाण्डवैः । तेषां वृद्ध्या हि वृद्धिर्नो मा क्रुधः पुरुषर्षभ ॥

yaunaḥ svaiḥ sukhahārdaiśca sambandhaḥ saha pāṇḍavaiḥ | teṣāṃ vṛddhyā hi vṛddhirno mā krudhaḥ puruṣarṣabha

"पाण्डवों के साथ हमारा सम्बन्ध जन्म और विवाह का है और सुखद आत्मीयता से भरा है; उनकी उन्नति से ही हमारी उन्नति है। हे पुरुषश्रेष्ठ, क्रोध न करो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 22 (9.61.22)

वासुदेववचः श्रुत्वा सीरभृत्प्राह धर्मवित् ॥

vāsudevavacaḥ śrutvā sīrabhṛtprāha dharmavit

वासुदेव के वचन सुनकर धर्म को जानने वाले हलधर बोले।

राम उवाच

श्लोक 23 (9.61.23)

धर्मश्च धारितः सद्भिः स च द्वाभ्यां नियच्छति । अर्थश्चाप्यतिलुब्धस्य कामश्चातिप्रसङ्गिणः ॥

dharmaśca dhāritaḥ sadbhiḥ sa ca dvābhyāṃ niyacchati | arthaścāpyatilubdhasya kāmaścātiprasaṅgiṇaḥ

"सज्जनों के द्वारा भली-भाँति आचरित धर्म को दो बातें रोकती हैं: अत्यन्त लोभी का अर्थ और अत्यन्त आसक्त का काम।"

श्लोक 24 (9.61.24)

धर्मार्थौ धर्मकामौ च कामार्थौ चाप्यपीडयन् । धर्मार्थकामान्योऽभ्येति सोत्यन्तं सुखमश्नुते ॥

dharmārthau dharmakāmau ca kāmārthau cāpyapīḍayan | dharmārthakāmānyo'bhyeti sotyantaṃ sukhamaśnute

"जो धर्म-अर्थ, धर्म-काम और काम-अर्थ को एक-दूसरे से पीड़ित किए बिना साधता है और धर्म, अर्थ तथा काम तीनों को पाता है, वह अनन्त सुख भोगता है।"

श्लोक 25 (9.61.25)

तदिदं व्याकुलं सर्वं कृतं धर्मस्य पीडनात् । भीमसेनेन गोविन्द कामं त्वं तु यथाऽऽत्थ माम् ॥

tadidaṃ vyākulaṃ sarvaṃ kṛtaṃ dharmasya pīḍanāt | bhīmasenena govinda kāmaṃ tvaṃ tu yathā''ttha mām

"गोविन्द, भीमसेन ने धर्म को पीड़ित करके यह सारी गड़बड़ी खड़ी की है। फिर भी तुम मुझसे जैसा चाहो कहो।"

कृष्ण उवाच

श्लोक 26 (9.61.26)

अरोषणो हि धर्मात्मा सततं धर्मवत्सलः । भवान्प्रख्यायते लोके तस्मात्संशाम्य मा क्रुधः ॥

aroṣaṇo hi dharmātmā satataṃ dharmavatsalaḥ | bhavānprakhyāyate loke tasmātsaṃśāmya mā krudhaḥ

"संसार में आप क्रोधरहित, धर्मात्मा और सदा धर्म से प्रेम करने वाले प्रसिद्ध हैं; इसलिए शान्त हो जाइए, क्रोध मत कीजिए।"

श्लोक 27 (9.61.27)

प्राप्तं कलियुगं विद्वि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च । आनृण्यं यातु वैरस्य प्रतिज्ञायाश्च पाण्डवः । ततः पुरुषशार्दूलो हत्वा नैकृतिकं रणे ॥

prāptaṃ kaliyugaṃ vidvi pratijñāṃ pāṇḍavasya ca | ānṛṇyaṃ yātu vairasya pratijñāyāśca pāṇḍavaḥ | tataḥ puruṣaśārdūlo hatvā naikṛtikaṃ raṇe

"जान लीजिए कि कलियुग आ गया है और पाण्डव की प्रतिज्ञा भी। पाण्डव वैर के और अपनी प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्त हो जाए। इस प्रकार उस पुरुषसिंह ने छली को रण में मारकर -"

श्लोक 28 (9.61.28)

निकृत्या निकृतिप्रज्ञं यो हन्याद्वैरिणं रणे । अधर्मो विद्यते नात्र यद्भीमो हतवान्रिपुम् ॥

nikṛtyā nikṛtiprajñaṃ yo hanyādvairiṇaṃ raṇe | adharmo vidyate nātra yadbhīmo hatavānripum

"जो छल में चतुर शत्रु को रण में छल से मारे, उसमें अधर्म नहीं है; अतः भीम ने जो शत्रु को मारा, उसमें कोई अधर्म नहीं।"

श्लोक 29 (9.61.29)

युध्यमानं रणे वीरं कुरुवृष्णियशस्करम् । अनेन कर्णः सन्दिष्टः पृष्ठतो धनुरच्छिनत् ॥

yudhyamānaṃ raṇe vīraṃ kuruvṛṣṇiyaśaskaram | anena karṇaḥ sandiṣṭaḥ pṛṣṭhato dhanuracchinat

"कुरुओं और वृष्णियों का यश बढ़ाने वाले उस वीर के रण में लड़ते समय, इसी के संकेत पर कर्ण ने पीछे से उसका धनुष काट दिया।"

श्लोक 30 (9.61.30)

ततः सञ्छिन्नधन्वानं विरथं पौरुषे स्थितम् । व्यायुधीकृत्य बहवः सौभद्रमपलायिनम् ॥

tataḥ sañchinnadhanvānaṃ virathaṃ pauruṣe sthitam | vyāyudhīkṛtya bahavaḥ saubhadramapalāyinam

"तब धनुष कट जाने पर, रथहीन होकर भी पुरुषार्थ में डटे हुए, भागते न हुए सौभद्र को बहुत-से योद्धाओं ने निःशस्त्र करके मार डाला।"

श्लोक 31 (9.61.31)

जन्मप्रभृति लुब्धश्च पापात्मा चैष दुर्मतिः । निहतो भीमसेनेन दुर्बुद्धिः कुलपांसनः ॥

janmaprabhṛti lubdhaśca pāpātmā caiṣa durmatiḥ | nihato bhīmasenena durbuddhiḥ kulapāṃsanaḥ

"जन्म से ही लोभी, पापात्मा और दुर्मति वह कुलकलंक दुर्बुद्धि भीमसेन के द्वारा मारा गया है।"

श्लोक 32 (9.61.32)

प्रतिज्ञां भीमसेनेन त्रयोदशसमार्जिताम् । किमर्थं नाभिजानाति युध्यमानो हि शत्रुभिः ॥

pratijñāṃ bhīmasenena trayodaśasamārjitām | kimarthaṃ nābhijānāti yudhyamāno hi śatrubhiḥ

"शत्रुओं से लड़ते समय उसने तेरह वर्षों से पाली हुई भीमसेन की उस प्रतिज्ञा पर ध्यान क्यों नहीं दिया?"

श्लोक 33 (9.61.33)

ऊर्ध्वमाक्रम्य वेगेन जिघांसन्तं वृकोदरः । बिभेद गदया चोरू न स्थाने न च मण्डले ॥

ūrdhvamākramya vegena jighāṃsantaṃ vṛkodaraḥ | bibheda gadayā corū na sthāne na ca maṇḍale

"जब वह वेग से ऊपर उछलकर उसे मारना चाहता था, तब न स्थान में स्थित और न मण्डल में चलते हुए उसकी जाँघों को वृकोदर ने गदा से तोड़ दिया।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 34 (9.61.34)

धर्मच्छलमिमं श्रुत्वा केशवात्स विशाम्पते । नैव प्रीतमना रामो वचनं प्राह संसदि ॥

dharmacchalamimaṃ śrutvā keśavātsa viśāmpate | naiva prītamanā rāmo vacanaṃ prāha saṃsadi

केशव से यह धर्म का बहाना सुनकर, हे राजन्, राम ने प्रसन्न मन के बिना सभा में यह वचन कहा।

राम उवाच

श्लोक 35 (9.61.35)

हत्वाऽधर्मेण राजानं धर्मात्मानं सुयोधनम् । जिह्मयोधीति लोकेऽस्मिन्ख्यातिं यास्यति पाण्डवः ॥

hatvā'dharmeṇa rājānaṃ dharmātmānaṃ suyodhanam | jihmayodhīti loke'sminkhyātiṃ yāsyati pāṇḍavaḥ

"धर्मात्मा राजा सुयोधन को अधर्म से मारकर पाण्डव इस लोक में कपटपूर्वक लड़ने वाले के रूप में प्रसिद्ध होगा।"

श्लोक 36 (9.61.36)

दुर्योधनोऽपि धर्मात्मा गतिं यास्यति शाश्वतीम् । ऋजुयोधी हतो राजा धर्मराष्ट्रो नराधिपः ॥

duryodhano'pi dharmātmā gatiṃ yāsyati śāśvatīm | ṛjuyodhī hato rājā dharmarāṣṭro narādhipaḥ

"धर्मात्मा दुर्योधन भी शाश्वत गति को जाएगा; धर्ममय राष्ट्र का स्वामी वह नरेश सीधा युद्ध करने वाला होकर मारा गया।"

श्लोक 37 (9.61.37)

युद्धदीक्षां प्रविश्याजौ रणयज्ञं वितत्य च । हुत्वाऽऽत्मानममित्राग्नौ प्राप चावभृथं यशः । स्वर्गं गन्ता महाराजः ससुहृज्ज्ञातिबान्धवः ॥

yuddhadīkṣāṃ praviśyājau raṇayajñaṃ vitatya ca | hutvā''tmānamamitrāgnau prāpa cāvabhṛthaṃ yaśaḥ | svargaṃ gantā mahārājaḥ sasuhṛjjñātibāndhavaḥ

"युद्धरूपी दीक्षा में प्रवेश कर, रणयज्ञ का विस्तार कर, शत्रुरूपी अग्नि में स्वयं की आहुति देकर उसने अवभृथ-स्नान का यश पाया। वह महाराज सुहृदों, ज्ञातियों और बन्धुओं सहित स्वर्ग जाएगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (9.61.38)

इत्युक्त्वा रथमास्थाय रौहिणेयः प्रतापवान् । श्वेताभ्रशिखराकारः प्रययौ द्वारकां प्रति ॥

ityuktvā rathamāsthāya rauhiṇeyaḥ pratāpavān | śvetābhraśikharākāraḥ prayayau dvārakāṃ prati

यह कहकर प्रतापी रौहिणेय श्वेत मेघ के शिखर जैसे अपने रथ पर चढ़कर द्वारका की ओर चल दिए।

श्लोक 39 (9.61.39)

पाञ्चालाश्च सवार्ष्णेयाः पाण्डवाश्च विशाम्पते । रामे द्वारवतीं याते नातिप्रमनसोऽभवन् ॥

pāñcālāśca savārṣṇeyāḥ pāṇḍavāśca viśāmpate | rāme dvāravatīṃ yāte nātipramanaso'bhavan

हे राजन्, राम के द्वारवती चले जाने पर पाञ्चाल, वृष्णिवंशी और पाण्डव बहुत प्रसन्न मन के नहीं रहे।

श्लोक 40 (9.61.40)

ततो युधिष्ठिरं दीनं चिन्तापरमधोमुखम् । शोकोपहतसङ्कल्पं वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥

tato yudhiṣṭhiraṃ dīnaṃ cintāparamadhomukham | śokopahatasaṅkalpaṃ vāsudevo'bravīdidam

तब वासुदेव ने दीन, चिन्ता में डूबे, नीचे मुख किए, शोक से टूटे संकल्प वाले युधिष्ठिर से यह कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 41 (9.61.41)

धर्मराज किमर्थं त्वमधर्ममनुमन्यसे । हतबन्धोर्यदेतस्य पतितस्य विचेतसः ॥

dharmarāja kimarthaṃ tvamadharmamanumanyase | hatabandhoryadetasya patitasya vicetasaḥ

"हे धर्मराज, आप इस पतित, बन्धुहीन और अचेत मनुष्य के प्रति किए जा रहे अधर्म का अनुमोदन क्यों कर रहे हैं?"

श्लोक 42 (9.61.42)

दुर्योधनस्य भीमेन मृद्यमानं शिरः पदा । उपप्रेक्षसि कस्मात्त्वं धर्मज्ञः सन्नराधिप ॥

duryodhanasya bhīmena mṛdyamānaṃ śiraḥ padā | upaprekṣasi kasmāttvaṃ dharmajñaḥ sannarādhipa

"हे नराधिप, धर्म को जानते हुए भी आप दुर्योधन के सिर को भीम के पैर से कुचला जाता हुआ क्यों देख रहे हैं?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 43 (9.61.43)

न ममैतत्प्रियं कृष्ण यद्राजानं वृकोदरः । पदा मूर्ध्न्यस्पृशत्क्रोधान्न च हृष्ये कुलक्षये ॥

na mamaitatpriyaṃ kṛṣṇa yadrājānaṃ vṛkodaraḥ | padā mūrdhnyaspṛśatkrodhānna ca hṛṣye kulakṣaye

"कृष्ण, मुझे यह प्रिय नहीं कि वृकोदर ने क्रोध में राजा के मस्तक को पैर से छुआ, और अपने कुल के विनाश पर मैं प्रसन्न भी नहीं होता।"

श्लोक 44 (9.61.44)

निकृत्या निकृता नित्यं धृतराष्ट्रसुतैर्वयम् । बहूनि परुषाण्युक्त्वा वनं प्रस्थापिता वयम् ॥

nikṛtyā nikṛtā nityaṃ dhṛtarāṣṭrasutairvayam | bahūni paruṣāṇyuktvā vanaṃ prasthāpitā vayam

"धृतराष्ट्र के पुत्रों ने हमें सदा छल से ठगा और बहुत कठोर बातें कहकर वन में भेज दिया।"

श्लोक 45 (9.61.45)

भीमसेनस्य तद्दुःखमतीव हृदि वर्तते । इति सञ्चिन्त्य वार्ष्णेय मयैतत्समुपेक्षितम् ॥

bhīmasenasya tadduḥkhamatīva hṛdi vartate | iti sañcintya vārṣṇeya mayaitatsamupekṣitam

"उसका दुःख भीमसेन के हृदय में बहुत गहरा बैठा है; हे वार्ष्णेय, यही सोचकर मैंने इसकी उपेक्षा कर दी।"

श्लोक 46 (9.61.46)

तस्माद्धत्वाऽकृतप्रज्ञं लुब्धं कामवशानुगम् । लभतां पाण्डवः कामं धर्मोऽधर्मोऽथवा कृतः ॥

tasmāddhatvā'kṛtaprajñaṃ lubdhaṃ kāmavaśānugam | labhatāṃ pāṇḍavaḥ kāmaṃ dharmo'dharmo'thavā kṛtaḥ

"इसलिए अविवेकी, लोभी और कामना के वश में चलने वाले को मारकर पाण्डव अपनी इच्छा पूरी कर ले, चाहे जो किया गया वह धर्म हो या अधर्म।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (9.61.47)

इत्युक्तवति कौन्तेये धर्मराजे युधिष्ठिरे । वासुदेवो महाबाहुर्युधिष्ठिरमभाषत । काममस्त्वेतदिति वै कृच्छ्राद्यदुकुलोद्वहः ॥

ityuktavati kaunteye dharmarāje yudhiṣṭhire | vāsudevo mahābāhuryudhiṣṭhiramabhāṣata | kāmamastvetaditi vai kṛcchrādyadukulodvahaḥ

कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर यदुकुल के आधार महाबाहु वासुदेव ने कठिनाई से युधिष्ठिर से कहा, "ऐसा ही हो।"

श्लोक 48 (9.61.48)

इत्युक्त्वा वासुदेवोऽपि वायुपुत्रप्रियेप्सया । अन्वमोदत तत्सर्वं यद्भीमेन कृतं युधि ॥

ityuktvā vāsudevo'pi vāyuputrapriyepsayā | anvamodata tatsarvaṃ yadbhīmena kṛtaṃ yudhi

यह कहकर वासुदेव ने भी वायुपुत्र को प्रसन्न करने की इच्छा से युद्ध में भीम ने जो कुछ किया था, उस सबका अनुमोदन किया।

श्लोक 49 (9.61.49)

अर्जुनोऽपि महाबाहुरप्रीतेनान्तरात्मना । नोवाच किञ्चिद्वचनं भ्रातरं साध्वसाधु वा ॥

arjuno'pi mahābāhuraprītenāntarātmanā | novāca kiñcidvacanaṃ bhrātaraṃ sādhvasādhu vā

महाबाहु अर्जुन ने भी मन में अप्रसन्न होकर अपने भाई से भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा।

श्लोक 50 (9.61.50)

भीमसेनोऽपि हत्वाऽऽजौ तव पुत्रममर्षणः । अभिवाद्याग्रतः स्थित्वा सम्प्रहृष्टः कृताञ्जलिः ॥

bhīmaseno'pi hatvā''jau tava putramamarṣaṇaḥ | abhivādyāgrataḥ sthitvā samprahṛṣṭaḥ kṛtāñjaliḥ

और असहनशील भीमसेन भी आपके पुत्र को युद्ध में मारकर प्रणाम करके, अत्यन्त प्रसन्न होकर हाथ जोड़े सामने खड़े हुए,

श्लोक 51 (9.61.51)

प्रोवाच सुमहातेजा धर्मराजं युधिष्ठिरम् । हर्षादुत्फुल्लनयनो जितकाशी विशाम्पते ॥

provāca sumahātejā dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | harṣādutphullanayano jitakāśī viśāmpate

और हर्ष से खिली आँखों वाले, विजय से दीप्त मुख वाले उन अत्यन्त तेजस्वी भीम ने, हे राजन्, धर्मराज युधिष्ठिर से कहा:

भीमसेन उवाच

श्लोक 52 (9.61.52)

तवाद्य पृथिवी सर्वा क्षेमा निहतकण्टका । तां प्रशाधि महाराज स्वधर्ममनुपालय ॥

tavādya pṛthivī sarvā kṣemā nihatakaṇṭakā | tāṃ praśādhi mahārāja svadharmamanupālaya

"आज यह सारी पृथ्वी आपकी है, शान्त है और इसके काँटे निकल चुके हैं। हे महाराज, इसका शासन कीजिए और अपने धर्म का पालन कीजिए।"

श्लोक 53 (9.61.53)

यस्तु कर्ताऽस्य वैरस्य निकृत्या निकृतिप्रियः । सोऽयं विनिहतः शेते पृथिव्यां पृथिवीपते ॥

yastu kartā'sya vairasya nikṛtyā nikṛtipriyaḥ | so'yaṃ vinihataḥ śete pṛthivyāṃ pṛthivīpate

"जो इस वैर का कर्ता था और छल से ठगने में आनन्द लेता था, वही यह, हे पृथ्वीपति, मारा जाकर भूमि पर पड़ा है।"

श्लोक 54 (9.61.54)

दुःशासनप्रभृतयः सर्वे ते चोग्रवादिनः । राधेयः शकुनिश्चैव हताश्च तव शत्रवः ॥

duḥśāsanaprabhṛtayaḥ sarve te cogravādinaḥ | rādheyaḥ śakuniścaiva hatāśca tava śatravaḥ

"दुःशासन आदि वे सब उग्र वचन बोलने वाले, और राधेय तथा शकुनि भी - आपके शत्रु मारे गए हैं।"

श्लोक 55 (9.61.55)

सेयं रत्नसमाकीर्णा मही सवनपर्वता । उपावृत्ता महाराज त्वामद्य निहतद्विषम् ॥

seyaṃ ratnasamākīrṇā mahī savanaparvatā | upāvṛttā mahārāja tvāmadya nihatadviṣam

"रत्नों से भरी, वनों और पर्वतों सहित यह पृथ्वी, हे महाराज, आज शत्रुओं के मारे जाने पर आपके पास लौट आई है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 56 (9.61.56)

गतो वैरस्य निधनं हतो राजा सुयोधनः । कृष्णस्य मतमास्थाय विजितेयं वसुन्धरा ॥

gato vairasya nidhanaṃ hato rājā suyodhanaḥ | kṛṣṇasya matamāsthāya vijiteyaṃ vasundharā

"वैर का अन्त हो गया, राजा सुयोधन मारा गया; कृष्ण के मत का आश्रय लेकर यह पृथ्वी जीत ली गई।"

श्लोक 57 (9.61.57)

दिष्ट्या गतस्त्वमानृण्यं मातुः कोपस्य चोभयोः । दिष्ट्या जयसि दुर्धर्ष दिष्ट्या शत्रुर्निपातितः ॥

diṣṭyā gatastvamānṛṇyaṃ mātuḥ kopasya cobhayoḥ | diṣṭyā jayasi durdharṣa diṣṭyā śatrurnipātitaḥ

"सौभाग्य से तुमने माता के क्रोध और अपने क्रोध, दोनों के ऋण से मुक्ति पा ली। हे दुर्धर्ष, सौभाग्य से तुम जीते, सौभाग्य से शत्रु गिरा दिया गया।"

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62