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शल्य पर्व · अध्याय 62

दुर्योधन का कृष्ण को उलाहना

दुर्योधन के गिर जाने पर पाण्डव, पाञ्चाल और सृञ्जय हर्षित होकर भीम की प्रशंसा करते हैं; तब कृष्ण कहते हैं कि मरे हुए शत्रु को फिर नहीं मारना चाहिए। दुर्योधन उठकर कृष्ण पर उन छलों का आरोप लगाता है जिनसे भीष्म, द्रोण, भूरिश्रवा, कर्ण आदि मारे गए। कृष्ण उसके अपने अपराध गिनाकर उत्तर देते हैं; दुर्योधन अपने अन्त को श्रेष्ठ बताता है, आकाश से फूल बरसते हैं, और कृष्ण शोकाकुल पाण्डवों को सान्त्वना देते हैं। फिर शंख बजते हैं और सेना विश्राम के लिए जाती है।

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (9.62.1)

हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे । पाण्डवाः सृञ्जयाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

hataṃ duryodhanaṃ dṛṣṭvā bhīmasenena saṃyuge | pāṇḍavāḥ sṛñjayāścaiva kimakurvata sañjaya

संजय, भीमसेन के द्वारा युद्ध में दुर्योधन को मारा गया देखकर पाण्डवों और सृञ्जयों ने क्या किया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (9.62.2)

हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे । सिंहेनेव महाराज मत्तं वनगजं यथा ॥

hataṃ duryodhanaṃ dṛṣṭvā bhīmasenena saṃyuge | siṃheneva mahārāja mattaṃ vanagajaṃ yathā

महाराज, जैसे सिंह किसी मदमत्त वनगज को मार डाले, वैसे ही भीमसेन के द्वारा युद्ध में दुर्योधन को मारा गया देखकर—

श्लोक 3 (9.62.3)

प्रहृष्टमनसस्तत्र कृष्णेन सह पाण्डवाः । पाञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव निहते कुरुनन्दने । आविध्यन्नुत्तरीयाणि सिंहनादांश्च नेदिरे ॥

prahṛṣṭamanasastatra kṛṣṇena saha pāṇḍavāḥ | pāñcālāḥ sṛñjayāścaiva nihate kurunandane | āvidhyannuttarīyāṇi siṃhanādāṃśca nedire

वहाँ कुरुनन्दन के मारे जाने पर कृष्ण के साथ पाण्डव, पाञ्चाल और सृञ्जय हर्षित मन से अपने उत्तरीय वस्त्र लहराने लगे और सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 4 (9.62.4)

नैतान्हर्षसमाविष्टानियं सेहे वसुन्धरा ॥

naitānharṣasamāviṣṭāniyaṃ sehe vasundharā

वे हर्ष से इतने भर उठे थे कि यह पृथ्वी उन्हें सह नहीं पा रही थी।

श्लोक 5 (9.62.5)

धनूंष्येके व्याक्षिपन्त ज्याश्चाप्यन्ये तथाऽक्षिपन् । दध्मुरन्ये महाशङ्खानन्ये जघ्नुश्च दुन्दुभीन् ॥

dhanūṃṣyeke vyākṣipanta jyāścāpyanye tathā'kṣipan | dadhmuranye mahāśaṅkhānanye jaghnuśca dundubhīn

कुछ ने अपने धनुष फेंक दिए, दूसरों ने प्रत्यंचाएँ झंकारीं; कुछ ने बड़े-बड़े शंख बजाए और कुछ ने दुन्दुभियाँ पीटीं।

श्लोक 6 (9.62.6)

चिक्रीडुश्च तथैवान्ये जहसुश्च तवाहिताः । अब्रुवंश्चासकृद्वीरा भीमसेनमिदं वचः ॥

cikrīḍuśca tathaivānye jahasuśca tavāhitāḥ | abruvaṃścāsakṛdvīrā bhīmasenamidaṃ vacaḥ

आपके शत्रु बने हुए दूसरे लोग खेलने और हँसने लगे, और वे वीर बार-बार भीमसेन से यह वचन कहने लगे—

योधा ऊचुः

श्लोक 7 (9.62.7)

दुष्करं भवता कर्म रणेऽद्य सुमहत्कृतम् । कौरवेयं रणे हत्वा गदयाऽतिकृतश्रमम् ॥

duṣkaraṃ bhavatā karma raṇe'dya sumahatkṛtam | kauraveyaṃ raṇe hatvā gadayā'tikṛtaśramam

"आज तुमने युद्ध में अत्यन्त कठिन और बहुत महान् कार्य किया है; अपार परिश्रम कर चुके उस कौरव को तुमने गदा से रणभूमि में मार डाला।

श्लोक 8 (9.62.8)

इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वधं परमसंयुगे । त्वया कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जनाः ॥

indreṇeva hi vṛtrasya vadhaṃ paramasaṃyuge | tvayā kṛtamamanyanta śatrorvadhamimaṃ janāḥ

उस भीषण संग्राम में लोगों ने शत्रु के इस वध को तुम्हारा ही किया हुआ माना, जैसे इन्द्र द्वारा वृत्र का वध।

श्लोक 9 (9.62.9)

चरन्तं विविधान्मार्गान्मण्डलानि च सर्वशः । दुर्योधनमिमं शूरं कोऽन्यो हन्याद्वृकोदरात् ॥

carantaṃ vividhānmārgānmaṇḍalāni ca sarvaśaḥ | duryodhanamimaṃ śūraṃ ko'nyo hanyādvṛkodarāt

तरह-तरह के मार्गों से और चारों ओर मण्डल बाँधकर घूमते हुए इस शूर दुर्योधन को वृकोदर के सिवा और कौन मार सकता था?

श्लोक 10 (9.62.10)

वैरस्य च गतः पारं त्वमिहान्यैः सुदुर्गमम् । अशक्यमेतदन्येन सम्पादयितुमीदृशम् ॥

vairasya ca gataḥ pāraṃ tvamihānyaiḥ sudurgamam | aśakyametadanyena sampādayitumīdṛśam

जिस वैर का पार पाना दूसरों के लिए अत्यन्त कठिन था, उसके पार तुम पहुँच गए हो; ऐसा कार्य किसी और से हो ही नहीं सकता था।

श्लोक 11 (9.62.11)

कुञ्जरेणेव मत्तेन वीरसङ्ग्राममूर्धनि । दुर्योधनशिरो दिष्ट्या पादेन मृदितं त्वया ॥

kuñjareṇeva mattena vīrasaṅgrāmamūrdhani | duryodhanaśiro diṣṭyā pādena mṛditaṃ tvayā

वीरों के संग्राम के अग्रभाग में मदमत्त हाथी की भाँति तुमने सौभाग्य से दुर्योधन का सिर अपने पैर से कुचल डाला।

श्लोक 12 (9.62.12)

सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सङ्गरमुत्तमम् । दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वयाऽनघ ॥

siṃhena mahiṣasyeva kṛtvā saṅgaramuttamam | duḥśāsanasya rudhiraṃ diṣṭyā pītaṃ tvayā'nagha

हे निष्पाप, जैसे सिंह भैंसे के साथ करता है, वैसा उत्तम युद्ध करके तुमने सौभाग्य से दुःशासन का रक्त पी लिया।

श्लोक 13 (9.62.13)

ये विप्रकुर्वन्राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । मूर्ध्नि तेषां कृतः पादो दिष्ट्या ते स्वेन कर्मणा ॥

ye viprakurvanrājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | mūrdhni teṣāṃ kṛtaḥ pādo diṣṭyā te svena karmaṇā

जिन्होंने धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर के साथ बुरा बर्ताव किया, उनके सिरों पर तुमने सौभाग्य से अपने ही कर्म के द्वारा पैर रख दिया।

श्लोक 14 (9.62.14)

अमित्राणामधिष्ठानाद्वधाद्दुर्योधनस्य च । भीम दिष्ट्या पृथिव्यां ते प्रथितं सुमहद्यशः ॥

amitrāṇāmadhiṣṭhānādvadhādduryodhanasya ca | bhīma diṣṭyā pṛthivyāṃ te prathitaṃ sumahadyaśaḥ

भीम, शत्रुओं को दबाने और दुर्योधन का वध करने से सौभाग्य से पृथ्वी पर तुम्हारा बड़ा यश फैल गया है।

श्लोक 15 (9.62.15)

एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति बन्दिनः । तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत ॥

evaṃ nūnaṃ hate vṛtre śakraṃ nandanti bandinaḥ | tathā tvāṃ nihatāmitraṃ vayaṃ nandāma bhārata

भारत, जैसे वृत्र के मारे जाने पर बन्दीजन इन्द्र का गुणगान करके आनन्दित होते हैं, वैसे ही शत्रुओं का नाश करने वाले तुमको देखकर हम आनन्दित हैं।

श्लोक 16 (9.62.16)

दुर्योधनवधे यानि रोमाणि हृषितानि नः । अद्यापि न विकृष्यन्ते तानि तद्विद्धि भारत । इत्यब्रुवन्भीमसेनं वातिकास्तत्र सङ्गताः ॥

duryodhanavadhe yāni romāṇi hṛṣitāni naḥ | adyāpi na vikṛṣyante tāni tadviddhi bhārata | ityabruvanbhīmasenaṃ vātikāstatra saṅgatāḥ

दुर्योधन के वध पर हमारे जो रोएँ खड़े हुए थे, वे आज भी बैठे नहीं हैं—भारत, यह जान लो।" इस प्रकार वहाँ एकत्र हुए लोगों ने भीमसेन से कहा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (9.62.17)

तान्हृष्टान्पुरुषव्याघ्रान्पाञ्चालान्पाण्डवैः सह । ब्रुवतोऽसदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदनः ॥

tānhṛṣṭānpuruṣavyāghrānpāñcālānpāṇḍavaiḥ saha | bruvato'sadṛśaṃ tatra provāca madhusūdanaḥ

जब हर्ष में भरे हुए वे पुरुषव्याघ्र पाञ्चाल और पाण्डव अनुचित बातें कह रहे थे, तब मधुसूदन ने उनसे कहा—

वासुदेव उवाच

श्लोक 18 (9.62.18)

न न्याय्यं निहतं शत्रुं भूयो हन्तुं नराधिपाः । असकृद्वाग्भिरुग्राभिर्निहतो ह्येष मन्दधीः ॥

na nyāyyaṃ nihataṃ śatruṃ bhūyo hantuṃ narādhipāḥ | asakṛdvāgbhirugrābhirnihato hyeṣa mandadhīḥ

"नरेश्वरो, जो शत्रु मर चुका है, उसे फिर मारना उचित नहीं। इस मन्दबुद्धि को तो कठोर वचनों से बार-बार मारा जा चुका है।

श्लोक 19 (9.62.19)

तदैवैष हतः पापो यदैव निरपत्रपः । लुब्धः पापसहायश्च सुहृदां शासनातिगः ॥

tadaivaiṣa hataḥ pāpo yadaiva nirapatrapaḥ | lubdhaḥ pāpasahāyaśca suhṛdāṃ śāsanātigaḥ

यह पापी तो उसी क्षण मर गया था, जब यह निर्लज्ज, लोभी, पापियों का साथी और मित्रों की आज्ञा का उल्लंघन करने वाला बन गया था।

श्लोक 20 (9.62.20)

बहुशो विदुरद्रोणकृपगाङ्गेयसृञ्जयैः । पाण्डुभ्यः प्रार्थ्यमानोऽपि पित्र्यमंशं न दत्तवान् ॥

bahuśo viduradroṇakṛpagāṅgeyasṛñjayaiḥ | pāṇḍubhyaḥ prārthyamāno'pi pitryamaṃśaṃ na dattavān

विदुर, द्रोण, कृप, गंगापुत्र भीष्म और सृञ्जयों ने बहुत बार माँगा, फिर भी इसने पाण्डवों को उनके पिता का भाग नहीं दिया।

श्लोक 21 (9.62.21)

नैव तेभ्योऽद्य मित्रं वा शत्रुर्वा पुरुषाधमः । किमनेन वितुन्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा ॥

naiva tebhyo'dya mitraṃ vā śatrurvā puruṣādhamaḥ | kimanena vitunnena vāgbhiḥ kāṣṭhasadharmaṇā

आज यह नीच पुरुष उनके लिए न मित्र है, न शत्रु। काठ के समान बने इस मनुष्य को वचनों से कोंचने से क्या लाभ?

श्लोक 22 (9.62.22)

रथेष्वारोहत क्षिप्रं गच्छामो वसुधाधिपाः । दिष्ट्या हतोऽयं पापात्मा सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥

ratheṣvārohata kṣipraṃ gacchāmo vasudhādhipāḥ | diṣṭyā hato'yaṃ pāpātmā sāmātyajñātibāndhavaḥ

पृथ्वी के स्वामियो, शीघ्र रथों पर चढ़ो, हम चलें। सौभाग्य से यह पापात्मा अपने मन्त्रियों, जातिजनों और बन्धुओं सहित मारा गया।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (9.62.23)

इति श्रुत्वा त्वधिक्षेपं कृष्णाद्दुर्योधनो नृपः । अमर्षवशमापन्न उदतिष्ठद्विशाम्पते ॥

iti śrutvā tvadhikṣepaṃ kṛṣṇādduryodhano nṛpaḥ | amarṣavaśamāpanna udatiṣṭhadviśāmpate

प्रजापालक राजन्, कृष्ण की यह फटकार सुनकर राजा दुर्योधन क्रोध के वश में होकर उठ बैठा।

श्लोक 24 (9.62.24)

स्फिग्देशेनोपविष्टः स दोर्भ्यां विष्टभ्य मेदिनीम् । दृष्टिं भ्रूसङ्कटां कृत्वा वासुदेवे न्यपातयत् ॥

sphigdeśenopaviṣṭaḥ sa dorbhyāṃ viṣṭabhya medinīm | dṛṣṭiṃ bhrūsaṅkaṭāṃ kṛtvā vāsudeve nyapātayat

वह कूल्हों के बल बैठकर दोनों भुजाओं से धरती को थामे हुए भौंहें चढ़ाकर वासुदेव पर दृष्टि गड़ाए रहा।

श्लोक 25 (9.62.25)

अर्धोन्नतशरीरस्य रूपमासीन्नृपस्य तु । क्रुद्धस्याशीविषस्येव च्छिन्नपुच्छस्य भोगिनः ॥

ardhonnataśarīrasya rūpamāsīnnṛpasya tu | kruddhasyāśīviṣasyeva cchinnapucchasya bhoginaḥ

आधा शरीर उठाए हुए राजा का रूप ऐसा लग रहा था जैसे पूँछ कटा हुआ कोई क्रुद्ध विषधर सर्प हो।

श्लोक 26 (9.62.26)

प्राणान्तकरिणीं घोरां वेदनामप्यचिन्तयन् । दुर्योधनो वासुदेवं वाग्भिरुग्राभिरार्दयत् ॥

prāṇāntakariṇīṃ ghorāṃ vedanāmapyacintayan | duryodhano vāsudevaṃ vāgbhirugrābhirārdayat

प्राण ले लेने वाली भयंकर पीड़ा की भी परवाह न करके दुर्योधन कठोर वचनों से वासुदेव को पीड़ित करने लगा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 27 (9.62.27)

कंसदासस्य दायाद न ते लज्जाऽस्त्यनेन वै । अधर्मेण गदायुद्धे यदहं विनिपातितः । ऊरूभिन्धीति भीमस्य स्मृतिं मिथ्याप्रयच्छता ॥

kaṃsadāsasya dāyāda na te lajjā'styanena vai | adharmeṇa gadāyuddhe yadahaṃ vinipātitaḥ | ūrūbhindhīti bhīmasya smṛtiṃ mithyāprayacchatā

"कंस के दास के पुत्र, क्या तुम्हें इसकी लज्जा नहीं कि गदायुद्ध में मैं अधर्म से गिराया गया—तुमने ही छल से भीम को 'जाँघें तोड़ दो' यह संकेत याद दिलाया था?

श्लोक 28 (9.62.28)

किं न विज्ञातमेतन्मे यदर्जुनमवोचथाः । घातयित्वा महीपालानृजुयुद्धान्सहस्रशः । जिह्मैरुपायैर्बहुभिर्न ते लज्जा न ते घृणा ॥

kiṃ na vijñātametanme yadarjunamavocathāḥ | ghātayitvā mahīpālānṛjuyuddhānsahasraśaḥ | jihmairupāyairbahubhirna te lajjā na te ghṛṇā

तुमने अर्जुन से जो कहा था, क्या वह भी मुझे ज्ञात नहीं? सीधे युद्ध करने वाले हजारों राजाओं को तुमने अनेक कुटिल उपायों से मरवाया; तुममें न लज्जा है, न दया।

श्लोक 29 (9.62.29)

अहन्यहनि शूराणां कुर्वाणः कदनं महत् । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य घातितस्ते पितामहः ॥

ahanyahani śūrāṇāṃ kurvāṇaḥ kadanaṃ mahat | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya ghātitaste pitāmahaḥ

प्रतिदिन शूरवीरों का महान् संहार करते हुए तुम्हारे पितामह को तुमने शिखण्डी को आगे करके मरवा दिया।

श्लोक 30 (9.62.30)

अश्वत्थाम्नः सनामानं हत्वा नागं सुदुर्मते । आचार्यो न्यासितः शस्त्रं किं तन्न विदितं मया ॥

aśvatthāmnaḥ sanāmānaṃ hatvā nāgaṃ sudurmate | ācāryo nyāsitaḥ śastraṃ kiṃ tanna viditaṃ mayā

दुर्बुद्धि, अश्वत्थामा के नाम वाले हाथी को मारकर तुमने आचार्य से शस्त्र रखवा दिया—क्या यह मुझे मालूम नहीं?

श्लोक 31 (9.62.31)

स चानेन नृशंसेन धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान् । पात्यमानस्त्वया दृष्टो न चैनं त्वमवारयः ॥

sa cānena nṛśaṃsena dhṛṣṭadyumnena vīryavān | pātyamānastvayā dṛṣṭo na cainaṃ tvamavārayaḥ

और उस पराक्रमी आचार्य को इस क्रूर धृष्टद्युम्न के द्वारा गिराया जाते हुए तुमने देखा, फिर भी उसे रोका नहीं।

श्लोक 32 (9.62.32)

वधार्थं पाण्डुपुत्रस्य याचितां शक्तिमेव च । घटोत्कचे व्यंसयतः कस्त्वत्तः पापकृत्तमः ॥

vadhārthaṃ pāṇḍuputrasya yācitāṃ śaktimeva ca | ghaṭotkace vyaṃsayataḥ kastvattaḥ pāpakṛttamaḥ

पाण्डुपुत्र को मारने के लिए माँगी गई उस शक्ति को तुमने घटोत्कच पर व्यर्थ करवा दिया; तुमसे बढ़कर पाप करने वाला कौन है?

श्लोक 33 (9.62.33)

छिन्नहस्तः प्रायगतस्तथा भूरिश्रवा बली । त्वयाऽभिसृष्टेन हतः शैनेयेन दुरात्मना ॥

chinnahastaḥ prāyagatastathā bhūriśravā balī | tvayā'bhisṛṣṭena hataḥ śaineyena durātmanā

जिसकी भुजा कट चुकी थी और जो प्रायोपवेशन में बैठा था, उस बलवान् भूरिश्रवा को तुम्हारे उकसाने पर दुष्ट शैनेय ने मार डाला।

श्लोक 34 (9.62.34)

कुर्वाणश्चोत्तमं कर्म कर्णः पार्थजिगीषया । व्यंसनेनाश्वसेनस्य पन्नगेन्द्रस्य वै पुनः ॥

kurvāṇaścottamaṃ karma karṇaḥ pārthajigīṣayā | vyaṃsanenāśvasenasya pannagendrasya vai punaḥ

और कर्ण, पार्थ को जीतने की इच्छा से उत्तम कर्म करते हुए, सर्पराज अश्वसेन के फिर विफल कर दिए जाने पर बाधित हुआ—

श्लोक 35 (9.62.35)

पुनश्च पतिते चक्रे व्यसनार्तः पराजितः । पातितः समरे कर्णश्चक्रव्यग्रोऽग्रणीर्नृणाम् ॥

punaśca patite cakre vyasanārtaḥ parājitaḥ | pātitaḥ samare karṇaścakravyagro'graṇīrnṛṇām

और पहिया फिर धँस जाने पर विपत्ति से पीड़ित और पराजित हुआ, पहिये में उलझा हुआ मनुष्यों का अग्रणी कर्ण रणभूमि में गिरा दिया गया।

श्लोक 36 (9.62.36)

यदि मां चापि कर्णं च भीष्मद्रोणौ च संयुगे । ऋजुना प्रतियुध्येथा न ते स्याद्विजयो ध्रुवम् ॥

yadi māṃ cāpi karṇaṃ ca bhīṣmadroṇau ca saṃyuge | ṛjunā pratiyudhyethā na te syādvijayo dhruvam

यदि तुम मुझसे, कर्ण से और भीष्म तथा द्रोण से युद्ध में सीधे ढंग से लड़ते, तो तुम्हारी विजय निश्चय ही न होती।

श्लोक 37 (9.62.37)

त्वया पुनरनार्येण जिह्ममार्गेण पार्थिवाः । स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो वयं चान्ये च घातिताः ॥

tvayā punaranāryeṇa jihmamārgeṇa pārthivāḥ | svadharmamanutiṣṭhanto vayaṃ cānye ca ghātitāḥ

किन्तु तुम जैसे अनार्य ने कुटिल मार्ग से राजाओं को मरवा दिया—हमें और दूसरों को भी, जो अपने धर्म का पालन कर रहे थे।

श्लोक 38 (9.62.38)

त्वया मायाविना कृष्ण मायां कर्मप्रमोषिणीम् । कृत्वा हतः सिन्धुपतिः किं तन्न विदितं मम ॥

tvayā māyāvinā kṛṣṇa māyāṃ karmapramoṣiṇīm | kṛtvā hataḥ sindhupatiḥ kiṃ tanna viditaṃ mama

कृष्ण, तुम मायावी ने कर्म को हर लेने वाली माया रचकर सिन्धुराज को मरवाया—क्या यह मुझे ज्ञात नहीं?"

वासुदेव उवाच

श्लोक 39 (9.62.39)

हतस्त्वमसि गान्धारे सभ्रातृसुतबान्धवः । सगणः ससुहृच्चैव पापं मार्गमनुष्ठितः ॥

hatastvamasi gāndhāre sabhrātṛsutabāndhavaḥ | sagaṇaḥ sasuhṛccaiva pāpaṃ mārgamanuṣṭhitaḥ

"गान्धारीपुत्र, पाप के मार्ग पर चलने के कारण तुम भाइयों, पुत्रों और बन्धुओं सहित, अपने गणों और मित्रों के साथ मारे गए हो।

श्लोक 40 (9.62.40)

तवैव दुष्कृतैर्वीरौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ । कर्णश्च निहतः सङ्ख्ये तव शीलानुवर्तकः ॥

tavaiva duṣkṛtairvīrau bhīṣmadroṇau nipātitau | karṇaśca nihataḥ saṅkhye tava śīlānuvartakaḥ

तुम्हारे ही दुष्कर्मों से वीर भीष्म और द्रोण गिराए गए, और तुम्हारे स्वभाव का अनुसरण करने वाला कर्ण युद्ध में मारा गया।

श्लोक 41 (9.62.41)

याच्यमानं मया मूढ पित्र्यमंशं न दित्ससि । पाण्डवेभ्यः स्वराज्यं च लोभाच्छकुनिनिश्चयात् ॥

yācyamānaṃ mayā mūḍha pitryamaṃśaṃ na ditsasi | pāṇḍavebhyaḥ svarājyaṃ ca lobhācchakuniniścayāt

मूर्ख, मेरे माँगने पर भी तुमने लोभ से और शकुनि के निश्चय पर पाण्डवों को उनके पिता का भाग, उनका अपना राज्य, नहीं दिया।

श्लोक 42 (9.62.42)

विषं ते भीमसेनाय दत्तं सर्वे च पाण्डवाः । प्रदीपिता जतुगृहे मात्रा सह सुदुर्मते ॥

viṣaṃ te bhīmasenāya dattaṃ sarve ca pāṇḍavāḥ | pradīpitā jatugṛhe mātrā saha sudurmate

दुर्बुद्धि, भीमसेन को विष दिया गया, और माता के साथ सब पाण्डव लाक्षागृह में आग लगाकर जलाए गए।

श्लोक 43 (9.62.43)

सभायां याज्ञसेनी च कृष्टा द्यूते रजस्वला । तदैव तावद्दुष्टात्मन्वध्यस्त्वं निरपत्रप ॥

sabhāyāṃ yājñasenī ca kṛṣṭā dyūte rajasvalā | tadaiva tāvadduṣṭātmanvadhyastvaṃ nirapatrapa

और रजस्वला याज्ञसेनी को द्यूत के समय सभा में घसीटा गया; दुष्टात्मा, निर्लज्ज, उसी समय तुम वध के योग्य हो गए थे।

श्लोक 44 (9.62.44)

अनक्षज्ञं च धर्मज्ञं सौबलेनाक्षवेदिना । निकृत्या यत्पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे ॥

anakṣajñaṃ ca dharmajñaṃ saubalenākṣavedinā | nikṛtyā yatparājaiṣīstasmādasi hato raṇe

क्योंकि तुमने पासों के जानकार सुबलपुत्र के द्वारा छल से उस मनुष्य को हराया जो धर्म जानता था पर पासे नहीं जानता था, इसलिए तुम युद्ध में मारे गए हो।

श्लोक 45 (9.62.45)

जयद्रथेन पापेन यत्कृष्णा क्लेशिता वने । यातेषु मृगयां चैव तृणबिन्दोरथाश्रमम् ॥

jayadrathena pāpena yatkṛṣṇā kleśitā vane | yāteṣu mṛgayāṃ caiva tṛṇabindorathāśramam

क्योंकि जब पाण्डव शिकार के लिए गए हुए थे, तब तृणबिन्दु के आश्रम में पापी जयद्रथ ने वन में कृष्णा को क्लेश पहुँचाया—

श्लोक 46 (9.62.46)

अभिमन्युश्च यद्बाल एको बहुभिराहवे । त्वद्दोषैर्निहतः पाप तस्मादसि हतो रणे ॥

abhimanyuśca yadbāla eko bahubhirāhave | tvaddoṣairnihataḥ pāpa tasmādasi hato raṇe

और क्योंकि बालक अभिमन्यु युद्ध में अकेला होकर बहुतों के द्वारा, पापी, तुम्हारे दोषों से मारा गया—इसलिए तुम युद्ध में मारे गए हो।

श्लोक 47 (9.62.47)

कुर्वाणं कर्म समरे पाण्डवानर्थकाङ्क्षिणम् । यच्छिखण्ड्यवधीद्भीष्मं मित्रार्थे न व्यतिक्रमः ॥

kurvāṇaṃ karma samare pāṇḍavānarthakāṅkṣiṇam | yacchikhaṇḍyavadhīdbhīṣmaṃ mitrārthe na vyatikramaḥ

भीष्म युद्ध में अपना कर्म कर रहे थे और पाण्डवों का अनिष्ट चाहते थे; शिखण्डी ने जो उन्हें मारा, वह मित्र के हित के लिए था—उसमें कोई मर्यादा-भंग नहीं।

श्लोक 48 (9.62.48)

स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा आचार्यस्त्वत्प्रियेप्सया । पार्षतेन हतः सङ्ख्ये वर्तमानोऽसतां पथि ॥

svadharmaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā ācāryastvatpriyepsayā | pārṣatena hataḥ saṅkhye vartamāno'satāṃ pathi

आचार्य ने तुम्हें प्रसन्न करने के लिए अपने धर्म को पीछे छोड़ दिया था और वे दुष्टों के मार्ग पर चल रहे थे; पृषत के पुत्र ने उन्हें युद्ध में मार डाला।

श्लोक 49 (9.62.49)

प्रतिज्ञामात्मनः सत्यां चिकीर्षन्समरे रिपुम् । हतवान्सात्वतो विद्वान्सौमदत्तिं महारथम् ॥

pratijñāmātmanaḥ satyāṃ cikīrṣansamare ripum | hatavānsātvato vidvānsaumadattiṃ mahāratham

अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करना चाहते हुए विद्वान् सात्वत ने युद्ध में अपने शत्रु, महारथी सोमदत्तपुत्र को मार डाला।

श्लोक 50 (9.62.50)

अर्जुनः समरे राजन्युध्यमानः कदाचन । निन्दितं पुरुषव्याघ्रः करोति न कथञ्चन ॥

arjunaḥ samare rājanyudhyamānaḥ kadācana | ninditaṃ puruṣavyāghraḥ karoti na kathañcana

राजन्, वह पुरुषव्याघ्र अर्जुन युद्ध करते समय कभी किसी प्रकार भी निन्दित कर्म नहीं करता।

श्लोक 51 (9.62.51)

लब्ध्वाऽपि बहुधा छिद्रं वीरवृत्तमनुस्मरन् । न जघान रणे कर्णं मैवं वोचः सुदुर्मते ॥

labdhvā'pi bahudhā chidraṃ vīravṛttamanusmaran | na jaghāna raṇe karṇaṃ maivaṃ vocaḥ sudurmate

बहुत बार अवसर पाकर भी वीरों के आचरण को स्मरण करते हुए उसने रणभूमि में कर्ण को नहीं मारा। मूर्ख, ऐसा मत कह।

श्लोक 52 (9.62.52)

देवानां मतमाज्ञाय तेषां प्रियहितेप्सया । अर्जुनस्य महानागं मया व्यंसितमस्त्रजम् ॥

devānāṃ matamājñāya teṣāṃ priyahitepsayā | arjunasya mahānāgaṃ mayā vyaṃsitamastrajam

देवताओं का मत जानकर और उनका प्रिय तथा हित चाहकर मैंने अर्जुन पर चलाए गए, अस्त्र से उत्पन्न उस महानाग को विफल कर दिया।

श्लोक 53 (9.62.53)

त्वं च भीष्मश्च कर्णश्च द्रोणो द्रौणायनिस्तथा । विराटनगरे तस्य ह्यानृशंस्येन जीविताः ॥

tvaṃ ca bhīṣmaśca karṇaśca droṇo drauṇāyanistathā | virāṭanagare tasya hyānṛśaṃsyena jīvitāḥ

विराटनगर में तुम, भीष्म, कर्ण, द्रोण और द्रोणपुत्र—सब उसकी दयालुता से ही जीवित बचे थे।

श्लोक 54 (9.62.54)

स्मर पार्थस्य विक्रान्तं गन्धर्वेषु कृतं तथा । अधर्मं नात्र गान्धारे पाण्डवैर्यत्कृतं त्वयि ॥

smara pārthasya vikrāntaṃ gandharveṣu kṛtaṃ tathā | adharmaṃ nātra gāndhāre pāṇḍavairyatkṛtaṃ tvayi

गन्धर्वों के बीच पार्थ ने जो पराक्रम किया था, उसे भी याद करो। गान्धारीपुत्र, पाण्डवों ने तुम्हारे साथ जो किया, उसमें कोई अधर्म नहीं है।

श्लोक 55 (9.62.55)

स्वबाहुबलमास्थाय स्वधर्मेण परन्तपाः । जितवन्तो रणे वीराः पापोऽसि निधनं गतः ॥

svabāhubalamāsthāya svadharmeṇa parantapāḥ | jitavanto raṇe vīrāḥ pāpo'si nidhanaṃ gataḥ

शत्रुओं को तपाने वाले उन वीरों ने अपने बाहुबल और अपने धर्म का आश्रय लेकर युद्ध में विजय पाई; तुम पापी हो और मृत्यु को प्राप्त हुए हो।"

श्लोक 56 (9.62.56)

यान्यकार्याणि चास्माकं कृतानिति प्रभाषसे । वैगुण्येन तवात्यर्थं सर्वं हि तदनुष्ठितम् ॥

yānyakāryāṇi cāsmākaṃ kṛtāniti prabhāṣase | vaiguṇyena tavātyarthaṃ sarvaṃ hi tadanuṣṭhitam

तुम जो कहते हो कि हमारे द्वारा अनुचित कार्य किए गए, वह सब तुम्हारी ही भारी त्रुटि के कारण किया गया था।

श्लोक 57 (9.62.57)

बृहस्पतेरुशनसो नोपदेशः श्रुतस्त्वया । वृद्धा नोपासिताश्चैव हितं वाक्यं न ते श्रुतम् ॥

bṛhaspateruśanaso nopadeśaḥ śrutastvayā | vṛddhā nopāsitāścaiva hitaṃ vākyaṃ na te śrutam

तुमने बृहस्पति और उशना के उपदेश नहीं सुने, वृद्धजनों की सेवा नहीं की, और अपने हित की बात नहीं सुनी।

श्लोक 58 (9.62.58)

लोभेनातिबलेन त्वं तृष्णया च वशीकृतः । कृतवानस्यकार्याणि विपाकस्तस्य भुज्यताम् ॥

lobhenātibalena tvaṃ tṛṣṇayā ca vaśīkṛtaḥ | kṛtavānasyakāryāṇi vipākastasya bhujyatām

प्रबल लोभ और तृष्णा के वश में होकर तुमने न करने योग्य कर्म किए; अब उनका फल भोगो।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 59 (9.62.59)

अधीतं विधिवद्दत्तं भूः प्रभुक्ता ससागरा । मूर्ध्नि स्थितममित्राणां को नु स्वन्ततरो मया ॥

adhītaṃ vidhivaddattaṃ bhūḥ prabhuktā sasāgarā | mūrdhni sthitamamitrāṇāṃ ko nu svantataro mayā

"मैंने विधिपूर्वक अध्ययन किया, दान दिया, समुद्र सहित पृथ्वी का भोग किया और शत्रुओं के मस्तक पर स्थित रहा। मुझसे अच्छा अन्त किसका है?

श्लोक 60 (9.62.60)

यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुपश्यताम् । तदिदं निधनं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ॥

yadiṣṭaṃ kṣatrabandhūnāṃ svadharmamanupaśyatām | tadidaṃ nidhanaṃ prāptaṃ ko nu svantataro mayā

अपने धर्म को देखने वाले क्षत्रियों को जो इष्ट है, वही यह मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है। मुझसे अच्छा अन्त किसका है?

श्लोक 61 (9.62.61)

देवार्हा मानुषा भोगाः प्राप्ता असुलभा नृपैः । ऐश्वर्यं चोत्तमं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ॥

devārhā mānuṣā bhogāḥ prāptā asulabhā nṛpaiḥ | aiśvaryaṃ cottamaṃ prāptaṃ ko nu svantataro mayā

देवताओं के योग्य मानवीय भोग, जो राजाओं को कठिनता से मिलते हैं, मुझे मिले और उत्तम ऐश्वर्य भी मिला। मुझसे अच्छा अन्त किसका है?

श्लोक 62 (9.62.62)

ससुहृत्सानुबन्धश्च स्वर्गं गन्ताऽहमच्युत । यूयं गर्हितसङ्कल्पाः शोचन्तो वर्तयिष्यथ ॥

sasuhṛtsānubandhaśca svargaṃ gantā'hamacyuta | yūyaṃ garhitasaṅkalpāḥ śocanto vartayiṣyatha

अच्युत, मैं मित्रों और बन्धुओं सहित स्वर्ग जाऊँगा; तुम निन्दित संकल्प वाले लोग शोक करते हुए जीवन बिताओगे।

श्लोक 63 (9.62.63)

न मे विषादो भीमेन पादेन शिर आहतम् । काका वा कङ्कगृध्रा वा निधास्यन्ति पदं क्षणात् ॥

na me viṣādo bhīmena pādena śira āhatam | kākā vā kaṅkagṛdhrā vā nidhāsyanti padaṃ kṣaṇāt

मुझे इसका शोक नहीं कि भीम ने पैर से मेरे सिर पर प्रहार किया; कौए, कंक या गिद्ध क्षण भर में उस पर पैर रखेंगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 64 (9.62.64)

अस्य वाक्यस्य निधने कुरुराजस्य धीमतः । अपतत्सुमहद्वर्षं पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् ॥

asya vākyasya nidhane kururājasya dhīmataḥ | apatatsumahadvarṣaṃ puṣpāṇāṃ puṇyagandhinām

बुद्धिमान् कुरुराज के इन वचनों की समाप्ति पर पवित्र सुगन्ध वाले फूलों की बड़ी वर्षा हुई।

श्लोक 65 (9.62.65)

अवादयन्त गन्धर्वा वादित्रं सुमनोहरम् ॥

avādayanta gandharvā vāditraṃ sumanoharam

गन्धर्वों ने अत्यन्त मनोहर वाद्य बजाए।

श्लोक 66 (9.62.66)

जगुश्चाप्सरसो राज्ञो यशः सम्बद्धमेव च । सिद्धाश्च मुमुचुर्वाचः साधुसाध्विति पार्थिव ॥

jaguścāpsaraso rājño yaśaḥ sambaddhameva ca | siddhāśca mumucurvācaḥ sādhusādhviti pārthiva

अप्सराओं ने राजा के यश से जुड़े गीत गाए, और राजन्, सिद्धों ने 'साधु, साधु' की ध्वनि की।

श्लोक 67 (9.62.67)

ववौ च सुरभिर्वायुः पुण्यगन्धो मृदुःसुखः । व्यराजंश्च दिशः सर्वा नभो वैदूर्यसन्निभम् ॥

vavau ca surabhirvāyuḥ puṇyagandho mṛduḥsukhaḥ | vyarājaṃśca diśaḥ sarvā nabho vaidūryasannibham

पवित्र गन्ध से भरी, मृदु और सुखद सुगन्धित वायु बहने लगी, सब दिशाएँ चमक उठीं और आकाश वैदूर्य मणि के समान दिखाई देने लगा।

श्लोक 68 (9.62.68)

अत्यद्भुतानि ते दृष्ट्वा वासुदेवपुरोगमाः । दुर्योधनस्य पूजां तु दृष्ट्वा व्रीडामुपागमन् ॥

atyadbhutāni te dṛṣṭvā vāsudevapurogamāḥ | duryodhanasya pūjāṃ tu dṛṣṭvā vrīḍāmupāgaman

वे अद्भुत बातें और दुर्योधन का यह सम्मान देखकर वासुदेव को आगे रखने वाले वे सब लज्जित हो गए।

श्लोक 69 (9.62.69)

हतांश्चाधर्मतः श्रुत्वा शोकार्ताः शुशुचुर्हि ते । भीष्मं द्रोणं तथा कर्णं भूरिश्रवसमेव च ॥

hatāṃścādharmataḥ śrutvā śokārtāḥ śuśucurhi te | bhīṣmaṃ droṇaṃ tathā karṇaṃ bhūriśravasameva ca

और यह सुनकर कि भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवा अधर्म से मारे गए हैं, वे शोक से पीड़ित होकर दुःखी हो गए।

श्लोक 70 (9.62.70)

तांस्तु चिन्तापरान्दृष्ट्वा पाण्डवान्दीनचेतसः । प्रोवाचेदं वचः कृष्णो मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥

tāṃstu cintāparāndṛṣṭvā pāṇḍavāndīnacetasaḥ | provācedaṃ vacaḥ kṛṣṇo meghadundubhinisvanaḥ

पाण्डवों को चिन्ता में डूबा और खिन्न चित्त देखकर मेघ और दुन्दुभि के समान गम्भीर स्वर वाले कृष्ण ने यह कहा—

वासुदेव उवाच

श्लोक 71 (9.62.71)

नैष शक्योऽतिशीघ्रास्त्रस्ते च सर्वे महारथाः । ऋजुयुद्धेन विक्रान्ता हन्तुं युष्माभिराहवे ॥

naiṣa śakyo'tiśīghrāstraste ca sarve mahārathāḥ | ṛjuyuddhena vikrāntā hantuṃ yuṣmābhirāhave

"अत्यन्त शीघ्र अस्त्र चलाने वाला यह दुर्योधन और वे सब पराक्रमी महारथी तुम लोगों से युद्ध में सीधे युद्ध के द्वारा नहीं मारे जा सकते थे।

श्लोक 72 (9.62.72)

उपायान्निहता ह्येते मया तस्मान्नराधिपाः । अन्यथा पाण्डवेयानां नाभविष्यज्जयः क्वचित् ॥

upāyānnihatā hyete mayā tasmānnarādhipāḥ | anyathā pāṇḍaveyānāṃ nābhaviṣyajjayaḥ kvacit

इसलिए, नरेश्वरो, इन्हें मैंने उपायों से मरवाया; अन्यथा पाण्डवों की कभी विजय नहीं होती।

श्लोक 73 (9.62.73)

ते हि सर्वे महेष्वासाश्चत्वारोऽतिरथा भुवि । अशक्या धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वयम् ॥

te hi sarve maheṣvāsāścatvāro'tirathā bhuvi | aśakyā dharmato hantuṃ lokapālairapi svayam

क्योंकि वे सब चारों महाधनुर्धर, पृथ्वी के अतिरथी, धर्म के अनुसार लोकपालों द्वारा भी स्वयं नहीं मारे जा सकते थे।

श्लोक 74 (9.62.74)

तथैवायं गदापाणिर्धार्तराष्ट्रो गतश्रमः । अशक्यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना ॥

tathaivāyaṃ gadāpāṇirdhārtarāṣṭro gataśramaḥ | aśakyo dharmato hantuṃ kālenāpīha daṇḍinā

वैसे ही गदा हाथ में लिए, थकान से मुक्त यह धृतराष्ट्रपुत्र भी दण्डधारी काल के द्वारा भी धर्म से नहीं मारा जा सकता था।

श्लोक 75 (9.62.75)

नैतन्मनसि कर्तव्यं यदयं निहतो नृपः । मिथ्याचर्याच्छलोपायैर्बहवः शत्रवो हताः ॥

naitanmanasi kartavyaṃ yadayaṃ nihato nṛpaḥ | mithyācaryācchalopāyairbahavaḥ śatravo hatāḥ

इस राजा के मारे जाने की बात को मन में न लाओ; मिथ्या आचरण, छल और उपायों से बहुत-से शत्रु मारे गए हैं।

श्लोक 76 (9.62.76)

पूर्वैरनुगतो मार्गो देवैरसुरघातिभिः । सद्भिश्चानुगतः पन्थाः सर्वैरनुगमिष्यते ॥

pūrvairanugato mārgo devairasuraghātibhiḥ | sadbhiścānugataḥ panthāḥ sarvairanugamiṣyate

असुरों का संहार करने वाले पूर्वकाल के देवताओं ने जिस मार्ग का अनुसरण किया और सज्जनों ने जिस पथ का, उसका सभी अनुसरण करेंगे।

श्लोक 77 (9.62.77)

एवं विधात्रा विहितं स्वयमेषां महात्मनाम् । दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ॥

evaṃ vidhātrā vihitaṃ svayameṣāṃ mahātmanām | daivaṃ puruṣakāreṇa na śakyamativartitum

विधाता ने स्वयं इन महात्माओं के लिए ऐसा ही विधान किया है; पुरुषार्थ से दैव का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।

श्लोक 78 (9.62.78)

भूतं भव्यं भविष्यच्च निमेषाद्यो हनिष्यति । कृतान्तमन्यथा कर्तुं नेच्छेत्सोऽयं धनञ्जय ॥

bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca nimeṣādyo haniṣyati | kṛtāntamanyathā kartuṃ necchetso'yaṃ dhanañjaya

जो पल भर में भूत, वर्तमान और भविष्य का संहार कर सकता है, वह नियति को अन्यथा करना नहीं चाहेगा—ऐसा ही है, धनञ्जय।

श्लोक 79 (9.62.79)

कृतकृत्याः स्म सायाह्ने निवासं रोचयामहे । साश्वनागरथाः सर्वे विश्राम्यन्तु नराधिपाः ॥

kṛtakṛtyāḥ sma sāyāhne nivāsaṃ rocayāmahe | sāśvanāgarathāḥ sarve viśrāmyantu narādhipāḥ

हमारा कार्य पूरा हो चुका है; सायंकाल में अब हम विश्राम-स्थान पर चलना चाहते हैं। राजागण अपने घोड़ों, हाथियों और रथों सहित विश्राम करें।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 80 (9.62.80)

वासुदेववचः श्रुत्वा तदानीं पाण्डवैः सह । पाञ्चाला भृशसंहृष्टा विनेदुः सिंहसङ्घवत् ॥

vāsudevavacaḥ śrutvā tadānīṃ pāṇḍavaiḥ saha | pāñcālā bhṛśasaṃhṛṣṭā vineduḥ siṃhasaṅghavat

वासुदेव के वचन सुनकर पाण्डवों के साथ पाञ्चाल अत्यन्त हर्षित हुए और उस समय सिंहों के समूह की तरह गरज उठे।

श्लोक 81 (9.62.81)

ततः प्राध्मापयच्छङ्खं पाञ्चजन्यं जनार्दनः । देवदत्तं प्रहृष्टात्मा शङ्खप्रवरमर्जुनः ॥

tataḥ prādhmāpayacchaṅkhaṃ pāñcajanyaṃ janārdanaḥ | devadattaṃ prahṛṣṭātmā śaṅkhapravaramarjunaḥ

तब जनार्दन ने पाञ्चजन्य शंख बजाया; और प्रसन्न मन अर्जुन ने श्रेष्ठ शंख देवदत्त बजाया;

श्लोक 82 (9.62.82)

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । पोण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

anantavijayaṃ rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | poṇḍraṃ dadhmau mahāśaṅkhaṃ bhīmakarmā vṛkodaraḥ

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय बजाया, और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर ने महाशंख पौण्ड्र बजाया;

श्लोक 83 (9.62.83)

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ । धृष्टद्युम्नस्तथा जैत्रं सात्यकिर्नन्दिवर्धनम् ॥

nakulaḥ sahadevaśca sughoṣamaṇipuṣpakau | dhṛṣṭadyumnastathā jaitraṃ sātyakirnandivardhanam

नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक बजाए, धृष्टद्युम्न ने जैत्र और सात्यकि ने नन्दिवर्धन बजाया।

श्लोक 84 (9.62.84)

तेषां नादेन महता शङ्खानां भरतर्षभ । आपुपूरे नभः सर्वं पृथिवी च चचाल ह ॥

teṣāṃ nādena mahatā śaṅkhānāṃ bharatarṣabha | āpupūre nabhaḥ sarvaṃ pṛthivī ca cacāla ha

भरतश्रेष्ठ, उन शंखों के महान् नाद से सारा आकाश भर गया और पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 85 (9.62.85)

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । पाण्डुसैन्येष्ववाद्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ | pāṇḍusainyeṣvavādyanta sa śabdastumulo'bhavat

तब पाण्डवों की सेनाओं में शंख, भेरियाँ, पणव, आनक और गोमुख बज उठे, और वह ध्वनि तुमुल हो गई।

श्लोक 86 (9.62.86)

अस्तुवन्पाण्डवानन्ये निर्भीश्च स्तुतिमङ्गलैः । हृष्टा दुर्योधनं दृष्ट्वा निहतं पुरुषर्षभाः ॥

astuvanpāṇḍavānanye nirbhīśca stutimaṅgalaiḥ | hṛṣṭā duryodhanaṃ dṛṣṭvā nihataṃ puruṣarṣabhāḥ

दूसरे निर्भय लोग मंगलमय स्तुतियों से पाण्डवों की प्रशंसा करने लगे, और दुर्योधन को मरा हुआ देखकर वे पुरुषश्रेष्ठ हर्षित हुए।

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