शल्य पर्व · अध्याय 66
अश्वत्थामा का सेनापति-पद पर अभिषेक
घायल अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा गिरे हुए दुर्योधन को पाते हैं और उसके लिए शोक करते हैं। मरणासन्न राजा कहता है कि सब प्राणियों का यही अन्त होता है और उसे कोई खेद नहीं, पर अश्वत्थामा क्रोध से जल उठता है और उसी रात पाञ्चालों तथा पाण्डवों को मारने की प्रतिज्ञा करके राजा से आज्ञा माँगता है। दुर्योधन कृप से जल मँगवाकर अश्वत्थामा को बची हुई सेना का सेनापति अभिषिक्त कराता है; अश्वत्थामा उसे गले लगाकर सिंहनाद करता हुआ चल पड़ता है और शेष लोग चिन्ता और शोक में रणभूमि छोड़ देते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.66.1)
वादिकानां सकाशात्तु श्रुत्वा दुर्योधनं हतम् । हतशिष्टास्तदा राजन्कौरवाणां महारथाः ॥
vādikānāṃ sakāśāttu śrutvā duryodhanaṃ hatam | hataśiṣṭāstadā rājankauravāṇāṃ mahārathāḥ
संदेशवाहकों से दुर्योधन के मारे जाने का समाचार सुनकर, हे राजन्, कौरवों के जो महारथी बचे थे,
श्लोक 2 (9.66.2)
विनिर्भिन्नाः शितैर्बाणैर्गदातोमरशक्तिभिः । अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । त्वरिता जवनैरश्वैरायोधनमुपागमन् ॥
vinirbhinnāḥ śitairbāṇairgadātomaraśaktibhiḥ | aśvatthāmā kṛpaścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ | tvaritā javanairaśvairāyodhanamupāgaman
तीखे बाणों, गदाओं, तोमरों और शक्तियों से बिंधे हुए अश्वत्थामा, कृप और सात्वत कृतवर्मा, तेज़ घोड़ों पर शीघ्रता से रणभूमि में आ पहुँचे।
श्लोक 3 (9.66.3)
तत्रापश्यन्महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् । प्रभग्नं वायुवेगेन महासालं यथा वने ॥
tatrāpaśyanmahātmānaṃ dhārtarāṣṭraṃ nipātitam | prabhagnaṃ vāyuvegena mahāsālaṃ yathā vane
वहाँ उन्होंने महात्मा धृतराष्ट्रपुत्र को गिरा हुआ देखा, जैसे वन में वायु के वेग से टूटा हुआ कोई विशाल शाल वृक्ष हो,
श्लोक 4 (9.66.4)
भूमौ विवेष्टमानं तं रुधिरेण समुक्षितम् । महागजमिवारण्ये व्याधेन विनिपातितम् ॥
bhūmau viveṣṭamānaṃ taṃ rudhireṇa samukṣitam | mahāgajamivāraṇye vyādhena vinipātitam
भूमि पर छटपटाता हुआ और रक्त से लथपथ, जैसे वन में व्याध द्वारा गिराया गया कोई महागज हो,
श्लोक 5 (9.66.5)
विवर्तमानं बहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् । यदृच्छया निपतितं चन्द्रमादित्यगोचरात् ॥
vivartamānaṃ bahuśo rudhiraughapariplutam | yadṛcchayā nipatitaṃ candramādityagocarāt
बार-बार करवटें बदलता हुआ, रक्त की धाराओं में डूबा हुआ, जैसे सूर्य के मार्ग, आकाश, से अकस्मात् गिरा हुआ चन्द्रमा हो,
श्लोक 6 (9.66.6)
युगान्तमारुतेनेव शोषितं मकरालयम् । पूर्णचन्द्रमिव व्योम्नि तुषारावृतमण्डलम् ॥
yugāntamāruteneva śoṣitaṃ makarālayam | pūrṇacandramiva vyomni tuṣārāvṛtamaṇḍalam
जैसे युगान्त की वायु से सोखा हुआ समुद्र हो, जैसे आकाश में पूर्णचन्द्र हो जिसका मण्डल पाले से ढक गया हो,
श्लोक 7 (9.66.7)
रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गमिव विक्रमे । वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः ॥
reṇudhvastaṃ dīrghabhujaṃ mātaṅgamiva vikrame | vṛtaṃ bhūtagaṇairghoraiḥ kravyādaiśca samantataḥ
धूल से सना हुआ, लम्बी भुजाओंवाला, गजराज के समान पराक्रमी, और चारों ओर से भयंकर भूतगणों तथा मांसभक्षियों से घिरा हुआ,
श्लोक 8 (9.66.8)
यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् । भ्रुकुटीकृतवक्त्रान्तं क्रोधादुद्वृत्तचक्षुषम् । सामर्षं तं नरव्याघ्रं भौमं निपतितं तथा ॥
yathā dhanaṃ lipsamānairbhṛtyairnṛpatisattamam | bhrukuṭīkṛtavaktrāntaṃ krodhādudvṛttacakṣuṣam | sāmarṣaṃ taṃ naravyāghraṃ bhaumaṃ nipatitaṃ tathā
जैसे धन पाने की इच्छा रखनेवाले सेवकों से श्रेष्ठ राजा घिरा रहता है — भौंहें तनी हुईं, मुख के कोने टेढ़े, क्रोध से आँखें चढ़ी हुईं, अमर्ष से भरा वह नरव्याघ्र भूमि पर पड़ा था।
श्लोक 9 (9.66.9)
ते तं दृष्ट्वा महेष्वासं भूतले पतितं नृपम् । मोहमभ्यागमन्सर्वे कृपप्रभृतयो रथाः ॥
te taṃ dṛṣṭvā maheṣvāsaṃ bhūtale patitaṃ nṛpam | mohamabhyāgamansarve kṛpaprabhṛtayo rathāḥ
उस महाधनुर्धर राजा को भूमि पर गिरा देखकर कृप आदि सभी रथी मूर्च्छित-से हो गए।
श्लोक 10 (9.66.10)
अवतीर्य रथेभ्यश्च प्राद्रवन्राजसन्निधौ । दुर्योधनं च सम्प्राप्य सर्वे भूमावुपाविशन् ॥
avatīrya rathebhyaśca prādravanrājasannidhau | duryodhanaṃ ca samprāpya sarve bhūmāvupāviśan
वे रथों से उतरकर राजा के पास दौड़े और दुर्योधन के निकट पहुँचकर सब भूमि पर बैठ गए।
श्लोक 11 (9.66.11)
ततो द्रौणिर्महाराज बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् । उवाच भरतश्रेष्ठं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥
tato drauṇirmahārāja bāṣpapūrṇekṣaṇaḥ śvasan | uvāca bharataśreṣṭhaṃ sarvalokeśvareśvaram
तब, हे महाराज, आँखों में आँसू भरे और श्वास लेते हुए द्रोणपुत्र ने भरतश्रेष्ठ, सब लोकों के ईश्वरों के भी ईश्वर, दुर्योधन से कहा:
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 12 (9.66.12)
न नूनं विद्यते पुण्यं मानुषे किञ्चिदेव हि । यत्र त्वं पुरुषव्याघ्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥
na nūnaṃ vidyate puṇyaṃ mānuṣe kiñcideva hi | yatra tvaṃ puruṣavyāghra śeṣe pāṃsuṣu rūṣitaḥ
निश्चय ही मनुष्य-लोक में पुण्य नाम की कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि हे पुरुषव्याघ्र, आप धूल में लथपथ पड़े हैं।
श्लोक 13 (9.66.13)
भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् । कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने वने ॥
bhūtvā hi nṛpatiḥ pūrvaṃ samājñāpya ca medinīm | kathameko'dya rājendra tiṣṭhase nirjane vane
पहले राजा होकर और सारी पृथ्वी पर आज्ञा चलाकर, हे राजेन्द्र, आज आप अकेले निर्जन वन में कैसे पड़े हैं?
श्लोक 14 (9.66.14)
दुःशासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम् । नापि तान्सुहृदः सर्वान्किमिदं भरतर्षभ ॥
duḥśāsanaṃ na paśyāmi nāpi karṇaṃ mahāratham | nāpi tānsuhṛdaḥ sarvānkimidaṃ bharatarṣabha
मैं न दुःशासन को देखता हूँ, न महारथी कर्ण को, और न आपके उन सब सुहृदों को। हे भरतर्षभ, यह क्या है?
श्लोक 15 (9.66.15)
दुःखं नूनं कृतान्तस्य गतिं ज्ञातुं कथञ्चन । लोकनाथो भवान्यत्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥
duḥkhaṃ nūnaṃ kṛtāntasya gatiṃ jñātuṃ kathañcana | lokanātho bhavānyatra śeṣe pāṃsuṣu rūṣitaḥ
भाग्य की गति को किसी प्रकार भी जान पाना कठिन है, तभी तो आप लोकनाथ होकर धूल में लथपथ पड़े हैं।
श्लोक 16 (9.66.16)
एष मूर्धाभिषिक्तानामग्रे गत्वा परन्तपः । सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ॥
eṣa mūrdhābhiṣiktānāmagre gatvā parantapaḥ | satṛṇaṃ grasate pāṃsuṃ paśya kālasya paryayam
जो शत्रुओं को तपानेवाले राजा सब मूर्धाभिषिक्त राजाओं के आगे चलते थे, वे आज तिनकों सहित धूल निगल रहे हैं — काल का फेर देखिए।
श्लोक 17 (9.66.17)
क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव । सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ॥
kva te tadamalaṃ chatraṃ vyajanaṃ kva ca pārthiva | sā ca te mahatī senā kva gatā pārthivottama
हे राजन्, आपका वह निर्मल छत्र कहाँ है, वह चँवर कहाँ है? और हे नृपश्रेष्ठ, आपकी वह विशाल सेना कहाँ चली गई?
श्लोक 18 (9.66.18)
दुर्विज्ञेया गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे । यो वै लोकगुरुर्नाथो भवानेतां दशां गतः ॥
durvijñeyā gatirnūnaṃ kāryāṇāṃ kāraṇāntare | yo vai lokagururnātho bhavānetāṃ daśāṃ gataḥ
जब कारण छिपे हों, तब घटनाओं की गति समझना निश्चय ही कठिन है; तभी तो आप, जो संसार के गुरु और स्वामी थे, इस दशा को पहुँचे हैं।
श्लोक 19 (9.66.19)
अध्रुवा सर्वमर्त्येषु ध्रुवैव श्रीर्विचिन्त्यते । भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ॥
adhruvā sarvamartyeṣu dhruvaiva śrīrvicintyate | bhavato vyasanaṃ dṛṣṭvā śakravispardhino bhṛśam
सब मनुष्यों के लिए लक्ष्मी अस्थिर है, फिर भी वह स्थिर मानी जाती है। इन्द्र से होड़ करनेवाले आपकी यह विपत्ति देखकर मैं बहुत व्यथित हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (9.66.20)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दुःखितस्य विशेषतः । उवाच राजन्पुत्रस्ते प्राप्तकालमिदं वचः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā duḥkhitasya viśeṣataḥ | uvāca rājanputraste prāptakālamidaṃ vacaḥ
अत्यन्त दुःखी अश्वत्थामा के वे वचन सुनकर, हे राजन्, आपके पुत्र ने समय के अनुरूप ये वचन कहे।
श्लोक 21 (9.66.21)
विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं बाष्पमुत्सृजन् । कृपादीन्स तदा वीरान्सर्वानेव नराधिपः ॥
vimṛjya netre pāṇibhyāṃ śokajaṃ bāṣpamutsṛjan | kṛpādīnsa tadā vīrānsarvāneva narādhipaḥ
दोनों हाथों से आँखें पोंछकर और शोक के आँसू बहाते हुए राजा ने तब कृप आदि सब वीरों से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 22 (9.66.22)
ईदृशो लोकधर्मोऽयं धात्रा निर्दिष्ट उच्यते । विनाशः सर्वभूतानां कालपर्यायकारितः ॥
īdṛśo lokadharmo'yaṃ dhātrā nirdiṣṭa ucyate | vināśaḥ sarvabhūtānāṃ kālaparyāyakāritaḥ
यह संसार की रीति है, जिसे विधाता ने ठहराया है कि काल के चक्र से सब प्राणियों का नाश होता है।
श्लोक 23 (9.66.23)
सोऽयं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षो भवतां हि यः । पृथिवीं पालयित्वाऽहमेतां निष्ठामुपागतः ॥
so'yaṃ māṃ samanuprāptaḥ pratyakṣo bhavatāṃ hi yaḥ | pṛthivīṃ pālayitvā'hametāṃ niṣṭhāmupāgataḥ
वही अब आप लोगों के सामने मुझ पर आ पड़ा है; इस पृथ्वी का पालन करके मैं इस अन्त को पहुँचा हूँ।
श्लोक 24 (9.66.24)
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि । दिष्ट्याऽहं निहतः पापैश्चलेनैव विशेषतः ॥
diṣṭyā nāhaṃ parāvṛtto yuddhe kasyāṃcidāpadi | diṣṭyā'haṃ nihataḥ pāpaiścalenaiva viśeṣataḥ
सौभाग्य से मैं युद्ध में किसी भी संकट में पीछे नहीं हटा; सौभाग्य से मुझे पापियों ने मारा, और विशेषकर छल से।
श्लोक 25 (9.66.25)
उत्साहश्च कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता । दिष्ट्या चास्मिन्हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धवः ॥
utsāhaśca kṛto nityaṃ mayā diṣṭyā yuyutsatā | diṣṭyā cāsminhato yuddhe nihatajñātibāndhavaḥ
सौभाग्य से मैंने सदा युद्ध की इच्छा से उत्साह दिखाया; सौभाग्य से मैं इस युद्ध में मारा गया हूँ, जबकि मेरे जाति-बन्धु पहले ही मारे जा चुके हैं।
श्लोक 26 (9.66.26)
दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षयात् । स्वस्तियुक्तांश्च कल्याणांस्तन्मे प्रियमनुत्तमम् ॥
diṣṭyā ca vo'haṃ paśyāmi muktānasmājjanakṣayāt | svastiyuktāṃśca kalyāṇāṃstanme priyamanuttamam
सौभाग्य से मैं आप सबको इस जनसंहार से बचा हुआ, कुशल और सुरक्षित देख रहा हूँ; यह मुझे सबसे अधिक प्रिय है।
श्लोक 27 (9.66.27)
मा भवन्तोऽत्र तप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे । यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मयाऽक्षयाः ॥
mā bhavanto'tra tapyantāṃ sauhṛdānnidhanena me | yadi vedāḥ pramāṇaṃ vo jitā lokā mayā'kṣayāḥ
मेरी मृत्यु पर स्नेहवश आप लोग शोक न करें। यदि आपके लिए वेद प्रमाण हैं, तो मैंने अक्षय लोक जीत लिए हैं।
श्लोक 28 (9.66.28)
जानमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः । तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात्स्वनुष्ठितात् ॥
jānamānaḥ prabhāvaṃ ca kṛṣṇasyāmitatejasaḥ | tena na cyāvitaścāhaṃ kṣatradharmātsvanuṣṭhitāt
अपार तेजस्वी कृष्ण के प्रभाव को जानते हुए भी मैं अपने भली-भाँति पाले हुए क्षत्रिय-धर्म से विचलित नहीं हुआ; उन्होंने मुझे उससे डिगाया नहीं।
श्लोक 29 (9.66.29)
स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथञ्चन । कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः । यतितं विजये शक्त्या दैवं तु दुरतिक्रमम् ॥
sa mayā samanuprāpto nāsmi śocyaḥ kathañcana | kṛtaṃ bhavadbhiḥ sadṛśamanurūpamivātmanaḥ | yatitaṃ vijaye śaktyā daivaṃ tu duratikramam
वही अन्त मुझे प्राप्त हुआ है; मेरे लिए किसी प्रकार शोक नहीं करना चाहिए। आप लोगों ने अपने योग्य और अनुरूप कार्य किया, पूरी शक्ति से विजय के लिए प्रयत्न किया; किन्तु दैव को लाँघना कठिन है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (9.66.30)
एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पव्याकुललोचनः । तूष्णीबभूव राजेन्द्र रुजाऽसौ विह्वलो भृशम् ॥
etāvaduktvā vacanaṃ bāṣpavyākulalocanaḥ | tūṣṇībabhūva rājendra rujā'sau vihvalo bhṛśam
इतना कहकर, आँसुओं से भरी आँखोंवाला वह राजा, हे राजेन्द्र, पीड़ा से विह्वल होकर चुप हो गया।
श्लोक 31 (9.66.31)
तथा दृष्ट्वा तु राजानं बाष्पशोकसमन्वितम् । द्रौणिः क्रोधेन जज्वाल यथा वह्निर्जगत्क्षये ॥
tathā dṛṣṭvā tu rājānaṃ bāṣpaśokasamanvitam | drauṇiḥ krodhena jajvāla yathā vahnirjagatkṣaye
राजा को इस प्रकार आँसुओं और शोक से भरा देखकर द्रोणपुत्र जगत् के प्रलय की अग्नि के समान क्रोध से जल उठा।
श्लोक 32 (9.66.32)
स च क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च । बाष्पविह्वलया वाचा राजानमिदमब्रवीत् ॥
sa ca krodhasamāviṣṭaḥ pāṇau pāṇiṃ nipīḍya ca | bāṣpavihvalayā vācā rājānamidamabravīt
क्रोध से भरे हुए उसने हाथ पर हाथ मसलकर, आँसुओं से रुँधी वाणी में राजा से यह कहा:
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 33 (9.66.33)
पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा । न तथा तेन तप्यामि तथा राजंस्त्वयाऽद्य वै ॥
pitā me nihataḥ kṣudraiḥ sunṛśaṃsena karmaṇā | na tathā tena tapyāmi tathā rājaṃstvayā'dya vai
मेरे पिता को नीच लोगों ने अत्यन्त क्रूर कर्म से मारा, फिर भी हे राजन्, उसके लिए मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आज आपके लिए हूँ।
श्लोक 34 (9.66.34)
शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो । इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ॥
śṛṇu cedaṃ vaco mahyaṃ satyena vadataḥ prabho | iṣṭāpūrtena dānena dharmeṇa sukṛtena ca
हे प्रभो, मेरा यह वचन भी सुनिए, जो मैं सत्य के साथ कहता हूँ — यज्ञ और पूर्त कर्मों की, दान की, धर्म की और अपने सत्कर्मों की शपथ लेकर:
श्लोक 35 (9.66.35)
अद्याहं सर्वपाञ्चालान्वासुदेवस्य पश्यतः । अद्य रात्रौ महाराज निहनिष्यामि पाण्डवान् ॥
adyāhaṃ sarvapāñcālānvāsudevasya paśyataḥ | adya rātrau mahārāja nihaniṣyāmi pāṇḍavān
आज वासुदेव के देखते-देखते मैं सब पाञ्चालों को मारूँगा; आज रात, हे महाराज, मैं पाण्डवों का वध करूँगा।
श्लोक 36 (9.66.36)
अनुज्ञां तु महाराज भवान्मे दातुमर्हति ॥
anujñāṃ tu mahārāja bhavānme dātumarhati
किन्तु हे महाराज, आप मुझे आज्ञा दें।
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (9.66.37)
तच्छ्रुत्वा वचनं द्रौणेर्धृतराष्ट्र तवात्मजः । मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत् ॥
tacchrutvā vacanaṃ drauṇerdhṛtarāṣṭra tavātmajaḥ | manasaḥ prītijananaṃ kṛpaṃ vacanamabravīt
द्रोणपुत्र के वे वचन सुनकर, जिनसे उसका मन प्रसन्न हुआ, हे धृतराष्ट्र, आपके पुत्र ने कृपाचार्य से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 38 (9.66.38)
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय ॥
ācārya śīghraṃ kalaśaṃ jalapūrṇaṃ samānaya
आचार्य, शीघ्र जल से भरा कलश ले आइए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 39 (9.66.39)
स तद्वचनमाज्ञाय राज्ञो ब्राह्मणसत्तमः । कलशं पूर्णमादाय राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् ॥
sa tadvacanamājñāya rājño brāhmaṇasattamaḥ | kalaśaṃ pūrṇamādāya rājño'ntikamupāgamat
राजा की बात समझकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जल से भरा कलश लेकर राजा के समीप आए।
श्लोक 40 (9.66.40)
तमब्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशाम्पते । ममाज्ञया द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् । सैनापत्येन भद्रं ते मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥
tamabravīnmahārāja putrastava viśāmpate | mamājñayā dvijaśreṣṭha droṇaputro'bhiṣicyatām | saināpatyena bhadraṃ te mama cedicchasi priyam
हे महाराज, हे प्रजापति, आपके पुत्र ने उनसे कहा: हे द्विजश्रेष्ठ, मेरी आज्ञा से द्रोणपुत्र का सेनापति के पद पर अभिषेक कीजिए, यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं; आपका कल्याण हो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 41 (9.66.41)
राज्ञो नियोगाद्योद्धव्यं ब्राह्मणेन विशेषतः । वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ॥
rājño niyogādyoddhavyaṃ brāhmaṇena viśeṣataḥ | vartatā kṣatradharmeṇa hyevaṃ dharmavido viduḥ
राजा की आज्ञा से, और विशेषकर ब्राह्मण को भी, क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध करना चाहिए; धर्म के जाननेवाले ऐसा ही कहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (9.66.42)
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्ततः । द्रौणिं राज्ञो नियोगेन सैनापत्येऽभ्यषेचयत् ॥
rājñastu vacanaṃ śrutvā kṛpaḥ śāradvatastataḥ | drauṇiṃ rājño niyogena saināpatye'bhyaṣecayat
राजा की बात सुनकर शरद्वान् के पुत्र कृप ने राजा के आदेश से द्रोणपुत्र को सेनापति के पद पर अभिषिक्त किया।
श्लोक 43 (9.66.43)
सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् । प्रययौ सिंहनादेन दिशः सर्वा विनादयन् ॥
so'bhiṣikto mahārāja pariṣvajya nṛpottamam | prayayau siṃhanādena diśaḥ sarvā vinādayan
अभिषिक्त होकर, हे महाराज, उसने नृपश्रेष्ठ को गले लगाया और सिंहनाद से सब दिशाओं को गुँजाता हुआ चल पड़ा।
श्लोक 44 (9.66.44)
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः । तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ॥
duryodhano'pi rājendra śoṇitena pariplutaḥ | tāṃ niśāṃ pratipede'tha sarvabhūtabhayāvahām
हे राजेन्द्र, रक्त से लथपथ दुर्योधन ने भी वह रात बिताई, जो सब प्राणियों के लिए भयावह थी।
श्लोक 45 (9.66.45)
अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादायोधनान्नृप । शोकसंविग्नमनसश्चिन्तामापेदिरे भृशम् ॥
apakramya tu te tūrṇaṃ tasmādāyodhanānnṛpa | śokasaṃvignamanasaścintāmāpedire bhṛśam
और वे सब, हे राजन्, शीघ्र उस रणभूमि से हटकर, शोक से व्याकुल मन से गहरी चिन्ता में डूब गए।