शल्य पर्व · अध्याय 65
दुर्योधन का अन्तिम सन्देश
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि जंघाएँ टूटकर पड़े उनके पुत्र ने क्या कहा। सञ्जय बताते हैं कि धूल में छटपटाते दुर्योधन ने भीम द्वारा युद्ध-नियम तोड़े जाने की निन्दा की, कहा कि उसने एक राजा और क्षत्रिय की भाँति जीवन जिया और वैसी ही मृत्यु पाई, और अपने माता-पिता तथा अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा को सन्देश भेजा कि पाण्डवों पर विश्वास न करें। उसकी बात सुननेवाले संदेशवाहक यह समाचार अश्वत्थामा को देकर शोक में लौट जाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (9.65.1)
अधिष्ठितः पदा मूर्ध्नि भग्नसक्थो महीं गतः । शौटीर्यमानी पुत्रो मे किमभाषत सञ्जय ॥
adhiṣṭhitaḥ padā mūrdhni bhagnasaktho mahīṃ gataḥ | śauṭīryamānī putro me kimabhāṣata sañjaya
सिर पर पैर रखा गया था, जंघाएँ टूट चुकी थीं और वह भूमि पर पड़ा था। अपने को बड़ा शूरवीर माननेवाले मेरे पुत्र ने, हे सञ्जय, उस समय क्या कहा?
श्लोक 2 (9.65.2)
अत्यर्थं कोपनो राजा जातवैरश्च पाण्डुषु । व्यसनं परमं प्राप्तः किमाह परमाहवे ॥
atyarthaṃ kopano rājā jātavairaśca pāṇḍuṣu | vyasanaṃ paramaṃ prāptaḥ kimāha paramāhave
राजा अत्यन्त क्रोधी था और पाण्डवों से उसका वैर बहुत पुराना था। उस महायुद्ध में घोर विपत्ति में पड़कर उसने क्या कहा?
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (9.65.3)
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप । राज्ञा यदुक्तं मग्नेन तस्मिन्व्यसनसागरे ॥
śṛṇu rājanpravakṣyāmi yathāvṛttaṃ narādhipa | rājñā yaduktaṃ magnena tasminvyasanasāgare
हे राजन्, हे नरेश्वर, सुनिए; उस विपत्ति के सागर में डूबे हुए राजा ने जो कुछ कहा, वह जैसा हुआ था वैसा ही मैं आपको बताता हूँ।
श्लोक 4 (9.65.4)
भग्नसक्थो नृपो राजन्पांसुना सोऽवकुण्ठितः । यमयन्मूर्धजांस्तत्र वीक्ष्य चैव दिशो दश ॥
bhagnasaktho nṛpo rājanpāṃsunā so'vakuṇṭhitaḥ | yamayanmūrdhajāṃstatra vīkṣya caiva diśo daśa
हे राजन्, जंघाएँ टूट जाने पर राजा धूल से ढका पड़ा था; वह अपने केश समेटता हुआ दसों दिशाओं की ओर देख रहा था।
श्लोक 5 (9.65.5)
केशान्नियस्य यत्नेन निःश्वसन्नुरगो यथा । संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम् ॥
keśānniyasya yatnena niḥśvasannurago yathā | saṃrambhāśruparītābhyāṃ netrābhyāmabhivīkṣya mām
यत्न से अपने केश बाँधकर, साँप की तरह फुफकारते हुए, उसने क्रोध के आँसुओं से भरी आँखों से मेरी ओर देखा,
श्लोक 6 (9.65.6)
बाहू धरण्यां निष्पिष्य सुदुर्मत्त इव द्विपः । प्रकीर्णान्मूर्धजान्धुन्वन्दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् । गर्हयन्पाण्डवं ज्येष्ठं निःश्वस्येदमथाब्रवीत् ॥
bāhū dharaṇyāṃ niṣpiṣya sudurmatta iva dvipaḥ | prakīrṇānmūrdhajāndhunvandantairdantānupaspṛśan | garhayanpāṇḍavaṃ jyeṣṭhaṃ niḥśvasyedamathābravīt
मदमत्त हाथी की तरह दोनों भुजाओं से धरती को पीटा, बिखरे केशों को झटका, दाँतों से दाँत पीसे और पाण्डवों में ज्येष्ठ को धिक्कारते हुए निःश्वास लेकर यह कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 7 (9.65.7)
भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे । गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे ॥
bhīṣme śāntanave nāthe karṇe śastrabhṛtāṃ vare | gautame śakunau cāpi droṇe cāstrabhṛtāṃ vare
जब शान्तनु के पुत्र भीष्म मेरे रक्षक थे, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ कर्ण थे, गौतम (कृपाचार्य) और शकुनि थे, और अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण थे,
श्लोक 8 (9.65.8)
अश्वत्थाम्नि यथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि । अन्येष्वपि च शूरेषु न्यस्तभारो महात्मसु । इमामवस्थां प्राप्तोऽस्मि कालो हि दुरतिक्रमः ॥
aśvatthāmni yathā śalye śūre ca kṛtavarmaṇi | anyeṣvapi ca śūreṣu nyastabhāro mahātmasu | imāmavasthāṃ prāpto'smi kālo hi duratikramaḥ
तथा अश्वत्थामा, शल्य, शूर कृतवर्मा और अन्य महात्मा वीरों पर भी मैंने अपना भार रख दिया था — फिर भी मैं इस दशा को पहुँच गया हूँ। काल को लाँघना वास्तव में कठिन है।
श्लोक 9 (9.65.9)
एकादशचमूभर्ता सोऽहमेतां दशां गतः । कालं प्राप्य महाबाहो न कश्चिदतिवर्तते ॥
ekādaśacamūbhartā so'hametāṃ daśāṃ gataḥ | kālaṃ prāpya mahābāho na kaścidativartate
ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं का स्वामी मैं आज इस दशा को पहुँचा हूँ। हे महाबाहो, काल आ जाने पर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
श्लोक 10 (9.65.10)
आख्यातव्यं मदीयानां येऽस्मिञ्जीवन्ति संयुगे । यथाऽहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः ॥
ākhyātavyaṃ madīyānāṃ ye'smiñjīvanti saṃyuge | yathā'haṃ bhīmasenena vyutkramya samayaṃ hataḥ
इस युद्ध में जो मेरे लोग अभी जीवित हैं, उन्हें बता देना कि समझौते को तोड़कर भीमसेन ने मुझे कैसे मारा।
श्लोक 11 (9.65.11)
बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवैः । भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च धीमति ॥
bahūni sunṛśaṃsāni kṛtāni khalu pāṇḍavaiḥ | bhūriśravasi karṇe ca bhīṣme droṇe ca dhīmati
पाण्डवों ने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म और बुद्धिमान द्रोण के साथ बहुत से अत्यन्त क्रूर कर्म किए हैं।
श्लोक 12 (9.65.12)
इदं च गर्हितं कर्म नृशंसैः पाण्डवैः कृतम् । येन ते वाच्यतां सत्सु गमिष्यन्तीति मे मतिः ॥
idaṃ ca garhitaṃ karma nṛśaṃsaiḥ pāṇḍavaiḥ kṛtam | yena te vācyatāṃ satsu gamiṣyantīti me matiḥ
और यह भी निन्दनीय कर्म उन क्रूर पाण्डवों ने किया है; मेरा विचार है कि इसी के कारण सज्जनों में उनकी निन्दा होगी।
श्लोक 13 (9.65.13)
का प्रीतिः सत्वयुक्तस्य कृत्वोपाधिकृतं जयम् । को वा समयभेत्तारं बुधः सम्मन्तुमर्हति ॥
kā prītiḥ satvayuktasya kṛtvopādhikṛtaṃ jayam | ko vā samayabhettāraṃ budhaḥ sammantumarhati
छल से प्राप्त की हुई विजय में सत्त्वगुण से युक्त पुरुष को क्या प्रसन्नता हो सकती है? और कौन विद्वान् समझौता तोड़नेवाले का समर्थन कर सकता है?
श्लोक 14 (9.65.14)
अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः । यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ॥
adharmeṇa jayaṃ labdhvā ko nu hṛṣyeta paṇḍitaḥ | yathā saṃhṛṣyate pāpaḥ pāṇḍuputro vṛkodaraḥ
अधर्म से विजय पाकर कौन पण्डित इस प्रकार हर्षित होगा, जैसे पापी पाण्डुपुत्र वृकोदर हर्षित हो रहा है?
श्लोक 15 (9.65.15)
किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम । क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः ॥
kinnu citramitastvadya bhagnasakthasya yanmama | kruddhena bhīmasenena pādena mṛditaṃ śiraḥ
इसमें अब आश्चर्य ही क्या है कि जंघाएँ टूट जाने पर क्रुद्ध भीमसेन ने मेरा सिर पैर से कुचल दिया?
श्लोक 16 (9.65.16)
प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु । एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै सञ्जय पूरुषः ॥
pratapantaṃ śriyā juṣṭaṃ vartamānaṃ ca bandhuṣu | evaṃ kuryānnaro yo hi sa vai sañjaya pūruṣaḥ
जो पुरुष तेज और श्री से दीप्त, बन्धु-बान्धवों के बीच रहनेवाले के साथ ऐसा करे — हे सञ्जय, वही सचमुच पुरुष है!
श्लोक 17 (9.65.17)
अभिज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च यौ । तौ हि सञ्जय दुःखार्तौ विज्ञाप्यौ वचनाद्धि मे ॥
abhijñau yuddhadharmasya mama mātā pitā ca yau | tau hi sañjaya duḥkhārtau vijñāpyau vacanāddhi me
मेरे माता और पिता, जो दोनों युद्ध के धर्म को जानते हैं, हे सञ्जय, दुःख से पीड़ित होंगे; मेरी ओर से उन्हें यह समाचार देना।
श्लोक 18 (9.65.18)
इष्टं भृत्या भृताः सम्यग्भूः प्रशास्ता ससागरा । मूर्ध्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव सञ्जय ॥
iṣṭaṃ bhṛtyā bhṛtāḥ samyagbhūḥ praśāstā sasāgarā | mūrdhni sthitamamitrāṇāṃ jīvatāmeva sañjaya
मैंने यज्ञ किए, सेवकों का भली-भाँति भरण-पोषण किया, समुद्रों सहित पृथ्वी पर शासन किया, और हे सञ्जय, शत्रुओं के जीवित रहते ही उनके सिरों पर पैर रखकर खड़ा रहा।
श्लोक 19 (9.65.19)
दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम् । अमित्रा बाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मया ॥
dattā dāyā yathāśakti mitrāṇāṃ ca priyaṃ kṛtam | amitrā bādhitāḥ sarve ko nu svantataro mayā
मैंने शक्ति भर दान दिए, मित्रों का प्रिय किया और सब शत्रुओं को पीड़ित किया। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 20 (9.65.20)
मानिता बान्धवाः सर्वे मान्यः सम्पूजितो जनः । त्रितयं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मया ॥
mānitā bāndhavāḥ sarve mānyaḥ sampūjito janaḥ | tritayaṃ sevitaṃ sarvaṃ ko nu svantataro mayā
मैंने बन्धुओं का मान किया, माननीय जनों का सत्कार किया और तीनों पुरुषार्थों का सेवन किया। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 21 (9.65.21)
आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः । आजानेयैस्तथा यातं को नु स्वन्ततरो मया ॥
ājñaptaṃ nṛpamukhyeṣu mānaḥ prāptaḥ sudurlabhaḥ | ājāneyaistathā yātaṃ ko nu svantataro mayā
श्रेष्ठ राजाओं के बीच मेरी आज्ञा चली, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान मुझे मिला और मैं उत्तम जाति के घोड़ों पर सवार होकर चला। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 22 (9.65.22)
यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् । प्रियेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया ॥
yātāni pararāṣṭrāṇi nṛpā bhuktāśca dāsavat | priyebhyaḥ prakṛtaṃ sādhu ko nu svantataro mayā
मैंने शत्रुओं के राज्यों पर चढ़ाई की, राजाओं को दासों की तरह काम में लिया और अपने प्रियजनों का भला किया। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 23 (9.65.23)
अधीतं विधिवद्दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम् । स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मया ॥
adhītaṃ vidhivaddattaṃ prāptamāyurnirāmayam | svadharmeṇa jitā lokāḥ ko nu svantataro mayā
मैंने विधिपूर्वक अध्ययन किया, दान दिया, रोगरहित दीर्घ आयु पाई और अपने धर्म से लोकों को जीता। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 24 (9.65.24)
दिष्ट्या नाहं जितः सङ्ख्ये परान्प्रेष्यवदाश्रितः । दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यगता विभो ॥
diṣṭyā nāhaṃ jitaḥ saṅkhye parānpreṣyavadāśritaḥ | diṣṭyā me vipulā lakṣmīrmṛte tvanyagatā vibho
सौभाग्य से मैं युद्ध में हारकर सेवक की तरह शत्रुओं के अधीन नहीं हुआ; सौभाग्य से, हे प्रभो, मेरी विशाल राजलक्ष्मी मेरी मृत्यु के बाद ही दूसरे के पास गई।
श्लोक 25 (9.65.25)
यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् । निधनं तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ॥
yadiṣṭaṃ kṣatrabandhūnāṃ svadharmamanutiṣṭhatām | nidhanaṃ tanmayā prāptaṃ ko nu svantataro mayā
अपने धर्म का पालन करनेवाले क्षत्रियों को जो मृत्यु अभीष्ट है, वही मुझे मिली है। मुझसे बढ़कर उत्तम अन्त किसका है?
श्लोक 26 (9.65.26)
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात्प्राकृतवज्जितः । दिष्ट्या न विमतिं काञ्चिद्भजित्वा तु पराजितः ॥
diṣṭyā nāhaṃ parāvṛtto vairātprākṛtavajjitaḥ | diṣṭyā na vimatiṃ kāñcidbhajitvā tu parājitaḥ
सौभाग्य से मैं शत्रु के भय से पीठ दिखाकर नहीं भागा और न साधारण मनुष्य की तरह हारा; सौभाग्य से मन में किसी प्रकार की डगमगाहट लाकर मैं पराजित नहीं हुआ।
श्लोक 27 (9.65.27)
सुप्तं वाऽथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद्विषेण वा । एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हतः ॥
suptaṃ vā'tha pramattaṃ vā yathā hanyādviṣeṇa vā | evaṃ vyutkrāntadharmeṇa vyutkramya samayaṃ hataḥ
जैसे सोए हुए या असावधान मनुष्य को, अथवा विष देकर, कोई मार डाले, वैसे ही धर्म की मर्यादा लाँघनेवाले ने समझौता तोड़कर मुझे मारा है।
श्लोक 28 (9.65.28)
अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः । कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ॥
aśvatthāmā mahābhāgaḥ kṛtavarmā ca sātvataḥ | kṛpaḥ śāradvataścaiva vaktavyā vacanānmama
महाभाग अश्वत्थामा, सात्वत कृतवर्मा और शरद्वान् के पुत्र कृप — इन्हें मेरी ओर से यह कहना:
श्लोक 29 (9.65.29)
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानामनेकशः । विश्वासं समयघ्नानां न यूयं गन्तुमर्हथ ॥
adharmeṇa pravṛttānāṃ pāṇḍavānāmanekaśaḥ | viśvāsaṃ samayaghnānāṃ na yūyaṃ gantumarhatha
बार-बार अधर्म से चलनेवाले और समझौते तोड़नेवाले पाण्डवों पर आपको विश्वास नहीं करना चाहिए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (9.65.30)
वार्तिकांश्चाब्रवीद्राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रमः । अधर्माद्भीमसेनेन निहतोऽहं यथा रणे ॥
vārtikāṃścābravīdrājā putraste satyavikramaḥ | adharmādbhīmasenena nihato'haṃ yathā raṇe
और आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा ने संदेशवाहकों से कहा: भीमसेन ने अधर्म से मुझे युद्ध में मारा है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 31 (9.65.31)
सोऽहं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा । वृषसेनं महावीर्यं शकुनिं चापि सौबलम् ॥
so'haṃ droṇaṃ svargagataṃ karṇaśalyāvubhau tathā | vṛṣasenaṃ mahāvīryaṃ śakuniṃ cāpi saubalam
इस प्रकार मैं स्वर्ग गए द्रोण के, कर्ण और शल्य दोनों के, महापराक्रमी वृषसेन के और सुबलपुत्र शकुनि के,
श्लोक 32 (9.65.32)
जलसन्धं महावीर्यं भगदत्तं च पार्थिवम् । सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् ॥
jalasandhaṃ mahāvīryaṃ bhagadattaṃ ca pārthivam | somadattaṃ maheṣvāsaṃ saindhavaṃ ca jayadratham
महापराक्रमी जलसन्ध के, राजा भगदत्त के, महाधनुर्धर सोमदत्त के और सिन्धुराज जयद्रथ के,
श्लोक 33 (9.65.33)
दुःशासनपुरोगांश्च भ्रातॄनात्मसमांस्तथा । दौःशासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ ॥
duḥśāsanapurogāṃśca bhrātṝnātmasamāṃstathā | dauḥśāsaniṃ ca vikrāntaṃ lakṣmaṇaṃ cātmajāvubhau
दुःशासन को आगे रखनेवाले, मेरे ही समान मेरे भाइयों के, और पराक्रमी दुःशासनपुत्र तथा लक्ष्मण के — जो दोनों मेरे अपने पुत्रों जैसे थे —
श्लोक 34 (9.65.34)
एतांश्चान्यांश्च सुबहून्मदीयांश्च सहस्रशः । पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाऽध्वगः ॥
etāṃścānyāṃśca subahūnmadīyāṃśca sahasraśaḥ | pṛṣṭhato'nugamiṣyāmi sārthahīno yathā'dhvagaḥ
इन सबके और अपने अन्य हज़ारों लोगों के पीछे-पीछे मैं जाऊँगा, जैसे काफ़िले से बिछड़ा हुआ राही चलता है।
श्लोक 35 (9.65.35)
कथं भ्रातॄन्हताञ्श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम । रोरूयामाणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति ॥
kathaṃ bhrātṝnhatāñśrutvā bhartāraṃ ca svasā mama | rorūyāmāṇā duḥkhārtā duḥśalā sā bhaviṣyati
अपने भाइयों और पति के मारे जाने का समाचार सुनकर मेरी बहन दुःशला दुःख से रोती हुई कैसी दशा में होगी?
श्लोक 36 (9.65.36)
स्नुषाभिः प्रस्नुषाभिश्च वृद्धो राजा पिता मम । गान्धारीसहितश्चैव का गतिं प्रतिपत्स्यति ॥
snuṣābhiḥ prasnuṣābhiśca vṛddho rājā pitā mama | gāndhārīsahitaścaiva kā gatiṃ pratipatsyati
पुत्रवधुओं और पौत्रवधुओं के साथ तथा गान्धारी के साथ मेरे वृद्ध पिता राजा किस गति को पहुँचेंगे?
श्लोक 37 (9.65.37)
नूनं लक्ष्मणमाताऽपि हतपुत्रा हतेश्वरा । विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना ॥
nūnaṃ lakṣmaṇamātā'pi hataputrā hateśvarā | vināśaṃ yāsyati kṣipraṃ kalyāṇī pṛthulocanā
निश्चय ही पुत्र और स्वामी से हीन लक्ष्मण की माता भी, वह विशाल नेत्रोंवाली कल्याणी, शीघ्र नष्ट हो जाएगी।
श्लोक 38 (9.65.38)
यदि जानाति चार्वाकः परिव्राद्वाग्विशारदः । करिष्यति महाभागो ध्रुवं चापचितिं मम ॥
yadi jānāti cārvākaḥ parivrādvāgviśāradaḥ | kariṣyati mahābhāgo dhruvaṃ cāpacitiṃ mama
यदि वाक्पटु परिव्राजक चार्वाक को यह ज्ञात हो गया, तो वह महाभाग निश्चय ही मेरा प्रतिशोध लेगा।
श्लोक 39 (9.65.39)
समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते । अहं निधनमासाद्य लोकान्प्राप्स्यामि शाश्वतान् ॥
samantapañcake puṇye triṣu lokeṣu viśrute | ahaṃ nidhanamāsādya lokānprāpsyāmi śāśvatān
तीनों लोकों में प्रसिद्ध पवित्र समन्तपञ्चक में मृत्यु पाकर मैं शाश्वत लोकों को प्राप्त करूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (9.65.40)
ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि दिशो दश । ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा ॥
tato janasahasrāṇi bāṣpapūrṇāni diśo daśa | sasāgaravanā ghorā pṛthivī sacarācarā
तब हज़ारों लोग आँसुओं से भरे हुए दसों दिशाओं में खड़े रो रहे थे, और समुद्रों तथा वनों सहित, चर-अचर से भरी वह भयंकर पृथ्वी
श्लोक 41 (9.65.41)
चचालाथ सनिर्हादा दिशश्चैवाविलाऽभवन् । ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥
cacālātha sanirhādā diśaścaivāvilā'bhavan | te droṇaputramāsādya yathāvṛttaṃ nyavedayan
गर्जना के साथ काँप उठी और दिशाएँ धुँधली हो गईं। वे द्रोणपुत्र के पास पहुँचे और जैसा हुआ था वैसा ही उसे बताया —
श्लोक 42 (9.65.42)
व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्य च पातनम् । तदाख्याय ततः सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ॥
vyavahāraṃ gadāyuddhe pārthivasya ca pātanam | tadākhyāya tataḥ sarve droṇaputrasya bhārata
गदायुद्ध का ढंग और राजा का गिराया जाना। हे भारत, यह सब द्रोणपुत्र को बताकर
श्लोक 43 (9.65.43)
वादिका दुःखसन्तप्ताः शोकोपहतचेतसः । ध्यात्वा च सुचिरं कालं जग्मुरार्ता यथागतम् ॥
vādikā duḥkhasantaptāḥ śokopahatacetasaḥ | dhyātvā ca suciraṃ kālaṃ jagmurārtā yathāgatam
वे संदेशवाहक दुःख से संतप्त और शोक से व्याकुल चित्त होकर बहुत देर तक सोचते रहे, फिर दुःखी होकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।