Skip to main content

शल्य पर्व · अध्याय 64

कृष्ण द्वारा धृतराष्ट्र और गान्धारी को सान्त्वना

जनमेजय पूछते हैं कि युधिष्ठिर ने कृष्ण को गान्धारी के पास क्यों भेजा। वैशम्पायन बताते हैं कि दुर्योधन के अन्यायपूर्ण वध से तपस्विनी गान्धारी के क्रोध की आशङ्का से युधिष्ठिर ने कृष्ण से उन्हें शान्त करने जाने को कहा। कृष्ण हस्तिनापुर पहुँचते हैं, जहाँ व्यास धृतराष्ट्र के पास बैठे हैं; वे धृतराष्ट्र को युद्ध में उनके अपने दोष का स्मरण कराकर पाण्डवों से द्वेष न करने को कहते हैं, फिर गान्धारी से मृदु वचन कहते हैं, जो उनकी बात मान लेती हैं और रो पड़ती हैं। अश्वत्थामा की दुष्ट योजना का आभास पाकर कृष्ण विदा लेकर पाण्डवों के शिविर को लौट जाते हैं।

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (9.64.1)

किमर्थं द्विजशार्दूल धर्मराजो युधिष्ठिरः । गान्धार्याः प्रेषयामास वासुदेवं परन्तपम् ॥

kimarthaṃ dvijaśārdūla dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | gāndhāryāḥ preṣayāmāsa vāsudevaṃ parantapam

जनमेजय ने कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिर ने शत्रुओं को तपाने वाले वासुदेव को गान्धारी के पास किसलिए भेजा?

श्लोक 2 (9.64.2)

यदा पूर्वं गतः कृष्णः शमार्थं कौरवान्प्रति । न च तं लब्धवान्कामं ततो युद्धमभूदिदम् ॥

yadā pūrvaṃ gataḥ kṛṣṇaḥ śamārthaṃ kauravānprati | na ca taṃ labdhavānkāmaṃ tato yuddhamabhūdidam

पहले जब कृष्ण शान्ति के लिए कौरवों के पास गए थे, तब उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई थी; इसी से यह युद्ध हुआ।

श्लोक 3 (9.64.3)

निहतेषु तु योधेषु हते दुर्योधने तदा । पृथिव्यां पाण्डवेयस्य निःसपत्ने कृते युधि ॥

nihateṣu tu yodheṣu hate duryodhane tadā | pṛthivyāṃ pāṇḍaveyasya niḥsapatne kṛte yudhi

जब योद्धा मारे जा चुके थे, दुर्योधन मर चुका था और युद्ध में पाण्डव के लिए पृथ्वी निष्कण्टक कर दी गई थी,

श्लोक 4 (9.64.4)

विद्रुते शिबिरे शून्ये प्राप्ते यशसि चोत्तमे । किं तु तत्कारणं ब्रह्मन्येन कृष्णो गतः पुनः ॥

vidrute śibire śūnye prāpte yaśasi cottame | kiṃ tu tatkāraṇaṃ brahmanyena kṛṣṇo gataḥ punaḥ

जब शिविर उजड़कर सूना हो गया था और परम यश प्राप्त हो चुका था, तब हे ब्रह्मन्! ऐसा क्या कारण था जिससे कृष्ण फिर वहाँ गए?

श्लोक 5 (9.64.5)

न चैतत्कारणं ब्रह्मन्नल्पं विप्रतिभाति मे । यत्रागमदमेयात्मा स्वयमेव जनार्दनः ॥

na caitatkāraṇaṃ brahmannalpaṃ vipratibhāti me | yatrāgamadameyātmā svayameva janārdanaḥ

हे ब्रह्मन्! मुझे यह कारण छोटा नहीं लगता कि अमेयात्मा जनार्दन स्वयं ही वहाँ गए।

श्लोक 6 (9.64.6)

तत्त्वतो वै समाचक्ष्व सर्वमध्वर्युसत्तम । यच्चात्र कारणं ब्रह्मन्कार्यस्यास्य विनिश्चये ॥

tattvato vai samācakṣva sarvamadhvaryusattama | yaccātra kāraṇaṃ brahmankāryasyāsya viniścaye

हे अध्वर्युश्रेष्ठ! हे ब्रह्मन्! इस कार्य का निश्चय करने में जो भी कारण था, वह सब मुझे ठीक-ठीक बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (9.64.7)

त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यथावद्भरतर्षभ ॥

tvadyukto'yamanupraśno yanmāṃ pṛcchasi pārthiva | tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi yathāvadbharatarṣabha

वैशम्पायन ने कहा, "हे राजन्! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो वह प्रश्न उचित है; हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें यथावत् बताऊँगा।

श्लोक 8 (9.64.8)

हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे । व्युत्क्रम्य समयं राजन्धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥

hataṃ duryodhanaṃ dṛṣṭvā bhīmasenena saṃyuge | vyutkramya samayaṃ rājandhārtarāṣṭraṃ mahābalam

हे राजन्! समझौते का उल्लंघन करके भीमसेन द्वारा युद्ध में महाबली धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन को मारा गया देखकर,

श्लोक 9 (9.64.9)

अन्यायेन हतं दृष्ट्वा गदायुद्धेन भारत । युधिष्ठिरं महाराज महद्भयमथाविशत् ॥

anyāyena hataṃ dṛṣṭvā gadāyuddhena bhārata | yudhiṣṭhiraṃ mahārāja mahadbhayamathāviśat

और हे भारत! गदायुद्ध में उसे अन्याय से मारा गया देखकर, हे महाराज! युधिष्ठिर के मन में बड़ा भय समा गया।

श्लोक 10 (9.64.10)

सोऽचिन्तयन्महाभागां गान्धारीं तपसान्विताम् । घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत् ॥

so'cintayanmahābhāgāṃ gāndhārīṃ tapasānvitām | ghoreṇa tapasā yuktāṃ trailokyamapi sā dahet

उसने तप से सम्पन्न महाभागा गान्धारी का विचार किया: "घोर तप से युक्त होने के कारण वह तीनों लोकों को भी जला सकती है।"

श्लोक 11 (9.64.11)

तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धिः समभवत्तदा । गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः पूर्वं प्रशमनं भवेत् ॥

tasya cintayamānasya buddhiḥ samabhavattadā | gāndhāryāḥ krodhadīptāyāḥ pūrvaṃ praśamanaṃ bhavet

इस प्रकार विचार करते हुए उसे यह बुद्धि सूझी कि क्रोध से जलती हुई गान्धारी को पहले शान्त करना चाहिए।

श्लोक 12 (9.64.12)

सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभिरीदृशम् । मानसेनाग्निना क्रुद्धा भस्मसान्नः करिष्यति ॥

sā hi putravadhaṃ śrutvā kṛtamasmābhirīdṛśam | mānasenāgninā kruddhā bhasmasānnaḥ kariṣyati

"क्योंकि पुत्र का वध और हमारा किया हुआ ऐसा कर्म सुनकर वह क्रुद्ध होकर अपने मन की अग्नि से हमें भस्म कर देगी।

श्लोक 13 (9.64.13)

कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी सम्प्रशक्ष्यति । श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मयोधिनम् ॥

kathaṃ duḥkhamidaṃ tīvraṃ gāndhārī sampraśakṣyati | śrutvā vinihataṃ putraṃ chalenājihmayodhinam

अपने छलरहित योद्धा पुत्र को छल से मारा गया सुनकर गान्धारी यह तीव्र दुःख कैसे सहेगी?"

श्लोक 14 (9.64.14)

एवं विचिन्त्य बहुधा भयशोकसमन्वितः । वासुदेवमिदं वाक्यं धर्मराजोऽभ्यभाषत ॥

evaṃ vicintya bahudhā bhayaśokasamanvitaḥ | vāsudevamidaṃ vākyaṃ dharmarājo'bhyabhāṣata

इस प्रकार अनेक रूप से विचार करके भय और शोक से भरे हुए धर्मराज ने वासुदेव से ये वचन कहे:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (9.64.15)

तव प्रसादाद्गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम् । अप्राप्यं मनसाऽपीदं प्राप्तमस्माभिरच्युत ॥

tava prasādādgovinda rājyaṃ nihatakaṇṭakam | aprāpyaṃ manasā'pīdaṃ prāptamasmābhiracyuta

"हे गोविन्द! आपकी कृपा से हमें निष्कण्टक राज्य मिल गया है, जिसकी मन से भी आशा नहीं की जा सकती थी, हे अच्युत!

श्लोक 16 (9.64.16)

प्रत्यक्षं मे महाबाहो सङ्ग्रामे रोमहर्षणे । विमर्दः सुमहान्प्राप्तस्त्वया यादवनन्दन ॥

pratyakṣaṃ me mahābāho saṅgrāme romaharṣaṇe | vimardaḥ sumahānprāptastvayā yādavanandana

हे महाबाहो! रोंगटे खड़े कर देने वाले उस संग्राम में मेरी आँखों के सामने आपने बहुत बड़ी पीड़ा सही, हे यादवनन्दन!

श्लोक 17 (9.64.17)

त्वया देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम् । यथा साह्यं पुरा दत्तं हताश्च विबुधद्विषः ॥

tvayā devāsure yuddhe vadhārthamamaradviṣām | yathā sāhyaṃ purā dattaṃ hatāśca vibudhadviṣaḥ

जैसे आपने पहले देवासुर-संग्राम में देवशत्रुओं के विनाश के लिए सहायता दी थी और देवशत्रु मारे गए थे,

श्लोक 18 (9.64.18)

साह्यं तथा महाबाहो दत्तमस्माकमच्युत । सारथ्येन च वार्ष्णेय भवता हि धृता वयम् ॥

sāhyaṃ tathā mahābāho dattamasmākamacyuta | sārathyena ca vārṣṇeya bhavatā hi dhṛtā vayam

वैसे ही हे महाबाहो अच्युत! आपने हमें भी सहायता दी; हे वार्ष्णेय! आपके सारथ्य से ही हम सँभले रहे।

श्लोक 19 (9.64.19)

यदि न त्वं भवेन्नाथः फल्गुनस्य महारणे । कथं शक्यो रणे जेतुं भवेदेष बलार्णवः ॥

yadi na tvaṃ bhavennāthaḥ phalgunasya mahāraṇe | kathaṃ śakyo raṇe jetuṃ bhavedeṣa balārṇavaḥ

यदि महायुद्ध में आप फल्गुन के रक्षक न होते, तो बल के इस समुद्र को युद्ध में कैसे जीता जा सकता था?

श्लोक 20 (9.64.20)

गदाप्रहारा विपुलाः परिघैश्चापि ताडनम् । शक्तिभिर्भिण्डिपालैश्च तोमरैः सपरश्वथैः ॥

gadāprahārā vipulāḥ parighaiścāpi tāḍanam | śaktibhirbhiṇḍipālaiśca tomaraiḥ saparaśvathaiḥ

गदाओं के भीषण प्रहार, परिघों की मार, शक्तियाँ, भिन्दिपाल, तोमर और फरसे —

श्लोक 21 (9.64.21)

अस्मत्कृते त्वया कृष्ण वाचः सुपरुषाः श्रुताः । शस्त्राणां च निपाता वै वज्रस्पर्शोपमा रणे ॥

asmatkṛte tvayā kṛṣṇa vācaḥ suparuṣāḥ śrutāḥ | śastrāṇāṃ ca nipātā vai vajrasparśopamā raṇe

हे कृष्ण! हमारे लिए आपने कठोर वचन सुने और युद्ध में वज्र के स्पर्श के समान शस्त्रों की मार सही।

श्लोक 22 (9.64.22)

ते च ते सफला जाता हते दुर्योधनेऽच्युत । तत्सर्वं न यथा नश्येत्पुनः कृष्ण तथा कुरु ॥

te ca te saphalā jātā hate duryodhane'cyuta | tatsarvaṃ na yathā naśyetpunaḥ kṛṣṇa tathā kuru

हे अच्युत! दुर्योधन के मारे जाने पर आपके वे सब कष्ट सफल हो गए। हे कृष्ण! ऐसा कीजिए कि वह सब फिर नष्ट न हो।

श्लोक 23 (9.64.23)

सन्देहडोलां प्राप्तं नश्चेतः कृष्ण जये सति । गान्धार्या हि महाबाहो क्रोधं शमय माधव ॥

sandehaḍolāṃ prāptaṃ naścetaḥ kṛṣṇa jaye sati | gāndhāryā hi mahābāho krodhaṃ śamaya mādhava

हे कृष्ण! विजय हो जाने पर भी हमारा चित्त सन्देह के झूले में पड़ा है। हे महाबाहो माधव! गान्धारी का क्रोध शान्त कीजिए।

श्लोक 24 (9.64.24)

सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता । पुत्रपौत्रवधं श्रुत्वा ध्रुवं नः सम्प्रधक्ष्यति । तस्याः प्रसादनं वीर प्राप्तकालं मतं मम ॥

sā hi nityaṃ mahābhāgā tapasogreṇa karśitā | putrapautravadhaṃ śrutvā dhruvaṃ naḥ sampradhakṣyati | tasyāḥ prasādanaṃ vīra prāptakālaṃ mataṃ mama

वह महाभागा बहुत समय से उग्र तप से कृश हो चुकी है; पुत्रों और पौत्रों का वध सुनकर वह निश्चय ही हमें भस्म कर देगी। हे वीर! मेरे मत में उसे शान्त करने का समय आ गया है।

श्लोक 25 (9.64.25)

कश्च तां क्रोधसन्दीप्तां पुत्रव्यसनकर्शिताम् । वीक्षितुं पुरुषः शक्तस्त्वामृते पुरुषोत्तम ॥

kaśca tāṃ krodhasandīptāṃ putravyasanakarśitām | vīkṣituṃ puruṣaḥ śaktastvāmṛte puruṣottama

हे पुरुषोत्तम! क्रोध से जलती आँखों वाली, पुत्रशोक से कृश उस देवी की ओर आपके सिवा कौन पुरुष देखने का साहस कर सकता है?

श्लोक 26 (9.64.26)

तत्र मे गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव । गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः प्रशमार्थमरिन्दम ॥

tatra me gamanaṃ prāptaṃ rocate tava mādhava | gāndhāryāḥ krodhadīptāyāḥ praśamārthamarindama

हे माधव! मुझे लगता है कि अब वहाँ जाने का समय आ गया है, ताकि क्रोध से जलती हुई गान्धारी शान्त हो जाएँ, हे अरिन्दम!

श्लोक 27 (9.64.27)

त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः । हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैः कालसमीरितैः ॥

tvaṃ hi kartā vikartā ca lokānāṃ prabhavāvyayaḥ | hetukāraṇasaṃyuktairvākyaiḥ kālasamīritaiḥ

क्योंकि आप ही लोकों के कर्ता और विकर्ता, उनकी उत्पत्ति और लय हैं। कारण और हेतु से युक्त तथा समय के अनुकूल वचनों से

श्लोक 28 (9.64.28)

क्षिप्रमेव महाबाहो गान्धारीं शमयिष्यसि । पितामहश्च भगवान्कृष्णस्तत्र भविष्यति ॥

kṣiprameva mahābāho gāndhārīṃ śamayiṣyasi | pitāmahaśca bhagavānkṛṣṇastatra bhaviṣyati

आप शीघ्र ही गान्धारी को शान्त कर देंगे, हे महाबाहो! और पितामह भगवान् कृष्ण (द्वैपायन) भी वहाँ होंगे।

श्लोक 29 (9.64.29)

सर्वथा ते महाबाहो गान्धार्याः क्रोधनाशनम् । कर्तव्यं सात्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितार्थिना ॥

sarvathā te mahābāho gāndhāryāḥ krodhanāśanam | kartavyaṃ sātvatāṃ śreṣṭha pāṇḍavānāṃ hitārthinā

हे महाबाहो! हे सात्वतश्रेष्ठ! पाण्डवों का हित चाहने वाले आपको हर प्रकार से गान्धारी के क्रोध का शमन करना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (9.64.30)

धर्मराजस्य वचनं श्रुत्वा यदुकुलोद्वहः । आमन्त्र्य दारुकं प्राह रथः सज्जो विधीयताम् ॥

dharmarājasya vacanaṃ śrutvā yadukulodvahaḥ | āmantrya dārukaṃ prāha rathaḥ sajjo vidhīyatām

धर्मराज के वचन सुनकर यदुकुल के धुरन्धर कृष्ण ने दारुक को बुलाकर कहा, "रथ तैयार किया जाए।"

श्लोक 31 (9.64.31)

केशवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणोऽथ दारुकः । न्यवेदयद्रथं सज्जं केशवाय महात्मने ॥

keśavasya vacaḥ śrutvā tvaramāṇo'tha dārukaḥ | nyavedayadrathaṃ sajjaṃ keśavāya mahātmane

केशव के वचन सुनकर दारुक ने शीघ्रता से महात्मा केशव को सूचना दी कि रथ तैयार है।

श्लोक 32 (9.64.32)

तं रथं यादवश्रेष्ठः समारुह्य परन्तपः । जगाम हास्तिनपुरं त्वरितः केशवो विभुः ॥

taṃ rathaṃ yādavaśreṣṭhaḥ samāruhya parantapaḥ | jagāma hāstinapuraṃ tvaritaḥ keśavo vibhuḥ

उस रथ पर चढ़कर यादवश्रेष्ठ, शत्रुतापन, सर्वव्यापी केशव शीघ्र ही हस्तिनापुर को चल पड़े।

श्लोक 33 (9.64.33)

ततः प्रायान्महाराज माधवो भगवान्रथी । नागसाह्वयमासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान् ॥

tataḥ prāyānmahārāja mādhavo bhagavānrathī | nāgasāhvayamāsādya praviveśa ca vīryavān

हे महाराज! तब भगवान् माधव रथ में बैठकर आगे बढ़े और पराक्रमी वे नागसाह्वय (हस्तिनापुर) पहुँचकर उसमें प्रविष्ट हुए।

श्लोक 34 (9.64.34)

प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादयन् । विदितो धृतराष्ट्रस्य सोऽवतीर्य रथोत्तमात् । अभ्यगच्छददीनात्मा धृतराष्ट्रनिवेशनम् ॥

praviśya nagaraṃ vīro rathaghoṣeṇa nādayan | vidito dhṛtarāṣṭrasya so'vatīrya rathottamāt | abhyagacchadadīnātmā dhṛtarāṣṭraniveśanam

नगर में प्रवेश करके रथ की घरघराहट से उसे गुँजाते हुए वीर कृष्ण ने अपने आने की सूचना धृतराष्ट्र तक पहुँचाई; और उत्तम रथ से उतरकर वे अदीन-चित्त धृतराष्ट्र के भवन में गए।

श्लोक 35 (9.64.35)

पूर्वं चाभिगतं तत्र सोऽपश्यदृषिसत्तमम् ॥

pūrvaṃ cābhigataṃ tatra so'paśyadṛṣisattamam

वहाँ उन्होंने देखा कि ऋषिश्रेष्ठ (व्यास) पहले से ही वहाँ आए हुए हैं।

श्लोक 36 (9.64.36)

पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्चापि जनार्दनः । अभ्यवादयदव्यग्रो गान्धारीं चापि केशवः ॥

pādau prapīḍya kṛṣṇasya rājñaścāpi janārdanaḥ | abhyavādayadavyagro gāndhārīṃ cāpi keśavaḥ

जनार्दन ने कृष्ण (व्यास) और राजा के चरण दबाकर शान्त भाव से उन्हें प्रणाम किया, और केशव ने गान्धारी को भी प्रणाम किया।

श्लोक 37 (9.64.37)

ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षजः । पाणिमालम्ब्य राजेन्द्र सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥

tatastu yādavaśreṣṭho dhṛtarāṣṭramadhokṣajaḥ | pāṇimālambya rājendra susvaraṃ praruroda ha

तब यादवश्रेष्ठ अधोक्षज ने, हे राजेन्द्र! धृतराष्ट्र का हाथ पकड़कर ऊँचे स्वर में रुदन किया।

श्लोक 38 (9.64.38)

स मुहूर्तादिवोत्सृज्य बाष्पं शोकसमुद्भवम् । प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे ह्याचम्य च यथाविधि । उवाच प्रश्रितं वाक्यं धृतराष्ट्रमरिन्दमः ॥

sa muhūrtādivotsṛjya bāṣpaṃ śokasamudbhavam | prakṣālya vāriṇā netre hyācamya ca yathāvidhi | uvāca praśritaṃ vākyaṃ dhṛtarāṣṭramarindamaḥ

थोड़ी देर बाद शोक से उमड़े आँसुओं को रोककर, जल से आँखें धोकर और विधिपूर्वक आचमन करके उस शत्रुदमन ने धृतराष्ट्र से विनयपूर्ण वचन कहे:

वासुदेव उवाच

श्लोक 39 (9.64.39)

न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्भूतं भव्यं च भारत । कालस्य च यथावृत्तं तत्ते सुविदितं प्रभो ॥

na te'styaviditaṃ kiñcidbhūtaṃ bhavyaṃ ca bhārata | kālasya ca yathāvṛttaṃ tatte suviditaṃ prabho

"हे भारत! जो हो चुका है और जो होने वाला है, उसमें आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है; और काल की गति कैसी होती है, यह भी हे प्रभो! आप भली-भाँति जानते हैं।

श्लोक 40 (9.64.40)

यदिदं पाण्डवैः सर्वैस्तव चित्तानुरोधिभिः । कथं कुलक्षयो न स्यात्तथा क्षत्रस्य भारत ॥

yadidaṃ pāṇḍavaiḥ sarvaistava cittānurodhibhiḥ | kathaṃ kulakṣayo na syāttathā kṣatrasya bhārata

जो कुछ हुआ है, उसके विषय में: सब पाण्डव तो आपकी इच्छा के अनुसार चलते थे; फिर भी हे भारत! कुल और क्षत्रिय-वर्ग का विनाश कैसे टाला जा सकता था?

श्लोक 41 (9.64.41)

भ्रातृभिः समयं कृत्वा क्षान्तवान्धर्मवत्सलः । द्यूतच्छलजितैः शुद्धैर्वनवासो ह्युपागतः ॥

bhrātṛbhiḥ samayaṃ kṛtvā kṣāntavāndharmavatsalaḥ | dyūtacchalajitaiḥ śuddhairvanavāso hyupāgataḥ

भाइयों के साथ प्रतिज्ञा करके धर्मप्रेमी युधिष्ठिर ने सब सहा; जुए के छल से हारे हुए उन निर्मल-हृदय पाण्डवों को वनवास स्वीकार करना पड़ा।

श्लोक 42 (9.64.42)

अज्ञातवासचर्या च नानावेषसमावृतैः । अन्ये च बहवः क्लेशास्त्वशक्तैरिव सर्वदा ॥

ajñātavāsacaryā ca nānāveṣasamāvṛtaiḥ | anye ca bahavaḥ kleśāstvaśaktairiva sarvadā

फिर नाना वेश धारण करके अज्ञातवास बिताना पड़ा, और अन्य भी बहुत-से क्लेश सहने पड़े, मानो वे सदा असमर्थ हों।

श्लोक 43 (9.64.43)

मया च स्वयमागम्य युद्धकाल उपस्थिते । सर्वलोकस्य सान्निध्ये ग्रामांस्त्वं पञ्चयाचितः ॥

mayā ca svayamāgamya yuddhakāla upasthite | sarvalokasya sānnidhye grāmāṃstvaṃ pañcayācitaḥ

और जब युद्ध का समय निकट आया, तब मैंने स्वयं आकर सब लोकों के सामने आपसे पाँच गाँव माँगे।

श्लोक 44 (9.64.44)

त्वया कालोपसृष्टेन लोभतो नापवर्जिताः । तवापराधान्नृपते सर्वं क्षत्रं क्षयं गतम् ॥

tvayā kālopasṛṣṭena lobhato nāpavarjitāḥ | tavāparādhānnṛpate sarvaṃ kṣatraṃ kṣayaṃ gatam

परन्तु काल से ग्रस्त होकर आपने लोभवश उन्हें नहीं दिया। हे राजन्! आपके ही अपराध से सारा क्षत्रिय-वर्ग नाश को प्राप्त हो गया।

श्लोक 45 (9.64.45)

भीष्मेण सोमदत्तेन बाह्लीकेन कृपेण च । द्रोणेन च सपुत्रेण विदुरेण च धीमता । याचितस्त्वं शमं नित्यं न च तत्कृतवानसि ॥

bhīṣmeṇa somadattena bāhlīkena kṛpeṇa ca | droṇena ca saputreṇa vidureṇa ca dhīmatā | yācitastvaṃ śamaṃ nityaṃ na ca tatkṛtavānasi

भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, कृप, पुत्र सहित द्रोण और बुद्धिमान् विदुर ने सदा आपसे शान्ति की याचना की, पर आपने वैसा नहीं किया।

श्लोक 46 (9.64.46)

कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत । यथा मूढो भवान्पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते ॥

kālopahatacittā hi sarve muhyanti bhārata | yathā mūḍho bhavānpūrvamasminnarthe samudyate

हे भारत! जिनका चित्त काल से मारा गया हो वे सभी मोह में पड़ जाते हैं, जैसे इस विषय के उठने पर आप पहले मोहित हो गए थे।

श्लोक 47 (9.64.47)

किमन्यत्कालयोगाद्धि द्विष्टमेव परायणम् । मा च दोषान्महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय ॥

kimanyatkālayogāddhi dviṣṭameva parāyaṇam | mā ca doṣānmahāprājña pāṇḍaveṣu niveśaya

काल के योग के सिवा और क्या है? दैव ही अन्तिम आश्रय है। और हे महाप्राज्ञ! पाण्डवों पर दोष न डालिए।

श्लोक 48 (9.64.48)

अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् । धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च परन्तप ॥

alpo'pyatikramo nāsti pāṇḍavānāṃ mahātmanām | dharmato nyāyataścaiva snehataśca parantapa

हे परन्तप! महात्मा पाण्डवों का धर्म, न्याय या स्नेह की दृष्टि से थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है।

श्लोक 49 (9.64.49)

एतत्सर्वं तु विज्ञाय ह्यात्मदोषकृतं फलम् । तन्मन्युं पाण्डुपुत्रेषु न भवान्कर्तुमर्हति ॥

etatsarvaṃ tu vijñāya hyātmadoṣakṛtaṃ phalam | tanmanyuṃ pāṇḍuputreṣu na bhavānkartumarhati

यह सब अपने ही दोषों का फल जानकर आपको पाण्डुपुत्रों पर क्रोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 50 (9.64.50)

कुलं वंशश्च पिण्डाश्च यच्च पुत्रकृतं फलम् । गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ॥

kulaṃ vaṃśaśca piṇḍāśca yacca putrakṛtaṃ phalam | gāndhāryāstava vai nātha pāṇḍaveṣu pratiṣṭhitam

कुल, वंश, पिण्ड, और पुत्रों से मिलने वाला जो भी फल है — हे नाथ! गान्धारी और आपके लिए वह सब अब पाण्डवों पर ही टिका है।

श्लोक 51 (9.64.51)

त्वं चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी । मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान्प्रति किल्बिषम् ॥

tvaṃ caiva kuruśārdūla gāndhārī ca yaśasvinī | mā śuco naraśārdūla pāṇḍavānprati kilbiṣam

हे कुरुशार्दूल! आप और यशस्विनी गान्धारी शोक न कीजिए, हे नरशार्दूल! और पाण्डवों के प्रति कोई दोष-भावना न रखिए।

श्लोक 52 (9.64.52)

एतत्सर्वमनुध्याय आत्मनश्च व्यतिक्रमम् । शिवेन पाण्डवान्ध्याहि नमस्ते भरतर्षभ ॥

etatsarvamanudhyāya ātmanaśca vyatikramam | śivena pāṇḍavāndhyāhi namaste bharatarṣabha

यह सब और अपना अपराध सोचकर पाण्डवों के प्रति शुभ भाव रखिए। हे भरतश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है।

श्लोक 53 (9.64.53)

जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि । भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ॥

jānāsi ca mahābāho dharmarājasya yā tvayi | bhaktirbharataśārdūla snehaścāpi svabhāvataḥ

हे महाबाहो भरतशार्दूल! आप जानते हैं कि धर्मराज की आपके प्रति कैसी भक्ति है और उसका स्नेह कितना स्वाभाविक है।

श्लोक 54 (9.64.54)

एतच्च कदनं कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम् । दह्यते स दिवारात्रौ न च शर्माधिगच्छति ॥

etacca kadanaṃ kṛtvā śatrūṇāmapakāriṇām | dahyate sa divārātrau na ca śarmādhigacchati

अपकार करने वाले शत्रुओं का यह संहार करके वह दिन-रात जलता रहता है और शान्ति नहीं पाता।

श्लोक 55 (9.64.55)

त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् । स शोचन्नरशार्दूलः शान्तिं नैवाधिगच्छति ॥

tvāṃ caiva naraśārdūla gāndhārīṃ ca yaśasvinīm | sa śocannaraśārdūlaḥ śāntiṃ naivādhigacchati

हे नरशार्दूल! आपके और यशस्विनी गान्धारी के लिए शोक करता हुआ वह नरश्रेष्ठ शान्ति नहीं पाता।

श्लोक 56 (9.64.56)

हिया च परयाऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति । पुत्रशोकाभिसन्तप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम् ॥

hiyā ca parayā'viṣṭo bhavantaṃ nādhigacchati | putraśokābhisantaptaṃ buddhivyākulitendriyam

अत्यन्त लज्जा से भरा वह आपके सामने नहीं आता, क्योंकि आप पुत्रशोक से सन्तप्त हैं और आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ व्याकुल हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (9.64.57)

एवमुक्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तमः । उवाच परमं वाक्यं गान्धारीं शोककर्शिताम् ॥

evamuktvā mahārāja dhṛtarāṣṭraṃ yadūttamaḥ | uvāca paramaṃ vākyaṃ gāndhārīṃ śokakarśitām

हे महाराज! धृतराष्ट्र से ऐसा कहकर यदुश्रेष्ठ ने शोक से कृश गान्धारी से ये उत्तम वचन कहे:

वासुदेव उवाच

श्लोक 58 (9.64.58)

सौबलेयि निबोध त्वं यत्त्वां वक्ष्यामि सुव्रते । त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ॥

saubaleyi nibodha tvaṃ yattvāṃ vakṣyāmi suvrate | tvatsamā nāsti loke'sminnadya sīmantinī śubhe

"हे सुबलपुत्री! हे सुव्रते! मैं जो कहता हूँ उसे सुनो; हे शुभे! आज इस संसार में तुम्हारे समान कोई स्त्री नहीं है।

श्लोक 59 (9.64.59)

जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम सन्निधौ । धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षयोर्हितम् ॥

jānāsi ca yathā rājñi sabhāyāṃ mama sannidhau | dharmārthasahitaṃ vākyamubhayoḥ pakṣayorhitam

हे रानी! तुम जानती हो कि सभा में मेरे सामने तुमने धर्म और अर्थ से युक्त, दोनों पक्षों के लिए हितकर वचन कहे थे।

श्लोक 60 (9.64.60)

उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयैः कृतम् । दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वचः ॥

uktavatyasi kalyāṇi na ca te tanayaiḥ kṛtam | duryodhanastvayā cokto jayārthī paruṣaṃ vacaḥ

हे कल्याणि! तुमने वह कहा, पर तुम्हारे पुत्रों ने उसे नहीं किया; और तुमने विजय चाहने वाले दुर्योधन से कठोर वचन कहे थे:

श्लोक 61 (9.64.61)

शृणु मूढ वचो मह्यं यतो धर्मस्ततो जयः । तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्यं नृपात्मजे ॥

śṛṇu mūḍha vaco mahyaṃ yato dharmastato jayaḥ | tadidaṃ samanuprāptaṃ tava vākyaṃ nṛpātmaje

"मूढ़! मेरी बात सुन: जहाँ धर्म है वहीं विजय है।" हे राजकन्ये! तुम्हारा वह वचन अब सत्य होकर सामने आया है।

श्लोक 62 (9.64.62)

एवं विदित्वा कल्याणि मा स्म शोके मनः कृथाः । पाण्डवानां विनाशाय मा ते बुद्धिः कदाचन ॥

evaṃ viditvā kalyāṇi mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ | pāṇḍavānāṃ vināśāya mā te buddhiḥ kadācana

हे कल्याणि! यह जानकर शोक में मन न लगाओ, और पाण्डवों के विनाश की ओर तुम्हारी बुद्धि कभी न जाए।

श्लोक 63 (9.64.63)

शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम् । चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो बलात् ॥

śaktā cāsi mahābhāge pṛthivīṃ sacarācarām | cakṣuṣā krodhadīptena nirdagdhuṃ tapaso balāt

हे महाभागे! तुम तप के बल से, क्रोध से दहकती दृष्टि द्वारा, चर-अचर सहित पृथ्वी को भस्म कर देने में समर्थ हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 64 (9.64.64)

वासुदेववचः श्रुत्वा गान्धारी वाक्यमब्रवीत् । एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि केशव ॥

vāsudevavacaḥ śrutvā gāndhārī vākyamabravīt | evametanmahābāho yathā vadasi keśava

वासुदेव के वचन सुनकर गान्धारी ने कहा, "हे महाबाहो केशव! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही है।

गान्धार्युवाच

श्लोक 65 (9.64.65)

आधिभिर्दह्यमानाया मतिः सञ्चलिता मम । सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन ॥

ādhibhirdahyamānāyā matiḥ sañcalitā mama | sā me vyavasthitā śrutvā tava vākyaṃ janārdana

मानसिक पीड़ाओं से जलती हुई मेरी बुद्धि डगमगा गई थी; हे जनार्दन! आपके वचन सुनकर वह स्थिर हो गई है।

श्लोक 66 (9.64.66)

राज्ञस्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव । त्वं गतिः सहितैर्वीरैः पाण्डवैर्द्विपदां वर ॥

rājñastvandhasya vṛddhasya hataputrasya keśava | tvaṃ gatiḥ sahitairvīraiḥ pāṇḍavairdvipadāṃ vara

हे केशव! अन्धे, वृद्ध और पुत्रहीन राजा के लिए आप ही सहारा हैं — हे द्विपदों में श्रेष्ठ! आप, उन वीर पाण्डवों के साथ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 67 (9.64.67)

एतावदुक्त्वा वचनं मुखं प्रच्छाद्य वाससा । पुत्रशोकाभिसन्तप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह ॥

etāvaduktvā vacanaṃ mukhaṃ pracchādya vāsasā | putraśokābhisantaptā gāndhārī praruroda ha

इतना कहकर, वस्त्र से मुख ढककर, पुत्रशोक से सन्तप्त गान्धारी रो पड़ी।

श्लोक 68 (9.64.68)

तत एनां महाबाहुः केशवः शोककर्शिताम् । हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैराश्वासयत्प्रभुः ॥

tata enāṃ mahābāhuḥ keśavaḥ śokakarśitām | hetukāraṇasaṃyuktairvākyairāśvāsayatprabhuḥ

तब महाबाहु प्रभु केशव ने शोक से कृश उस गान्धारी को कारण और हेतु से युक्त वचनों से आश्वासन दिया।

श्लोक 69 (9.64.69)

समाश्वास्य च गान्धारीं धृतराष्ट्रं च माधवः । द्रौणिसङ्कल्पितं भावमन्वबुध्यत केशवः ॥

samāśvāsya ca gāndhārīṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca mādhavaḥ | drauṇisaṅkalpitaṃ bhāvamanvabudhyata keśavaḥ

गान्धारी और धृतराष्ट्र को आश्वासन देकर माधव केशव को द्रोणपुत्र के सङ्कल्पित भाव का आभास हुआ।

श्लोक 70 (9.64.70)

ततस्त्वरित उत्थाय पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च । द्वैपायनस्य राजेन्द्र ततः कौरवमब्रवीत् ॥

tatastvarita utthāya pādau mūrdhnā praṇamya ca | dvaipāyanasya rājendra tataḥ kauravamabravīt

तब हे राजेन्द्र! वे शीघ्रता से उठे और द्वैपायन के चरणों में सिर झुकाकर कुरुराज से बोले:

वासुदेव उवाच

श्लोक 71 (9.64.71)

आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः । द्रौणेः पापोऽस्त्यभिप्रायस्तेनास्मि सहसोत्थितः ॥

āpṛcche tvāṃ kuruśreṣṭha mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ | drauṇeḥ pāpo'styabhiprāyastenāsmi sahasotthitaḥ

"हे कुरुश्रेष्ठ! मैं आपसे विदा माँगता हूँ; शोक में मन न लगाइए। द्रोणपुत्र का अभिप्राय पापपूर्ण है, इसीलिए मैं सहसा उठ खड़ा हुआ हूँ।

श्लोक 72 (9.64.72)

पाण्डवानां वधे रात्रौ बुद्धिस्तेन प्रदर्शिता ॥

pāṇḍavānāṃ vadhe rātrau buddhistena pradarśitā

उसने रात में पाण्डवों के वध का विचार किया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 73 (9.64.73)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं गान्धार्या सहितोऽब्रवीत् । धृतराष्ट्रो महाबाहुः केशवं केशिसूदनम् ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ gāndhāryā sahito'bravīt | dhṛtarāṣṭro mahābāhuḥ keśavaṃ keśisūdanam

ये वचन सुनकर महाबाहु धृतराष्ट्र ने गान्धारी के साथ केशिसूदन केशव से कहा:

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 74 (9.64.74)

शीघ्रं गच्छ महाबाहो पाण्डवान्परिपालय । भूयस्त्वया समेष्यामि क्षिप्रमेव जनार्दन ॥

śīghraṃ gaccha mahābāho pāṇḍavānparipālaya | bhūyastvayā sameṣyāmi kṣiprameva janārdana

"हे महाबाहो! शीघ्र जाइए और पाण्डवों की रक्षा कीजिए; हे जनार्दन! मैं फिर शीघ्र ही आपसे मिलूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 75 (9.64.75)

प्रायात्ततस्तु त्वरितो दारुकेण सहाच्युतः ॥

prāyāttatastu tvarito dārukeṇa sahācyutaḥ

तब अच्युत दारुक के साथ शीघ्रता से चल पड़े।

श्लोक 76 (9.64.76)

वासुदेवे गते राजन्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । आश्वासयदमेयात्मा व्यासो लोकनमस्कृतः ॥

vāsudeve gate rājandhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram | āśvāsayadameyātmā vyāso lokanamaskṛtaḥ

हे राजन्! वासुदेव के चले जाने पर अमेयात्मा, लोकपूज्य व्यास ने जनेश्वर धृतराष्ट्र को सान्त्वना दी।

श्लोक 77 (9.64.77)

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह । शिबिरं हास्तिनपुराद्दिदृक्षुः पाण्डवान्नृप ॥

vāsudevo'pi dharmātmā kṛtakṛtyo jagāma ha | śibiraṃ hāstinapurāddidṛkṣuḥ pāṇḍavānnṛpa

हे राजन्! धर्मात्मा वासुदेव भी कार्य पूर्ण करके पाण्डवों को देखने की इच्छा से हस्तिनापुर से शिविर की ओर गए।

श्लोक 78 (9.64.78)

आगम्य शिबिरं रात्रौ सोऽभ्यगच्छत पाण्डवान् । तच्च तेभ्यः समाख्याय सहितस्तैः समाहितः ॥

āgamya śibiraṃ rātrau so'bhyagacchata pāṇḍavān | tacca tebhyaḥ samākhyāya sahitastaiḥ samāhitaḥ

रात में शिविर पहुँचकर वे पाण्डवों के पास गए, और उन्हें यह सब बताकर उनके साथ सावधान होकर रहे।

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65