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शल्य पर्व · अध्याय 8

युद्ध का आरम्भ; रक्त की नदी

कुरु और सृञ्जय सेनाओं की भिड़न्त शुरू होती है; हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल भयंकर कोलाहल के साथ एक-दूसरे पर टूटते हैं। सञ्जय रणभूमि के संहार का और उससे बहती रक्त की नदी का वर्णन करते हैं। अर्जुन और भीम कौरव-सेना को मोहित कर शंख बजाते हैं, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और युधिष्ठिर शल्य पर चढ़ते हैं और माद्री के दोनों पुत्र आक्रमण करते हैं। कौरव-सेना पीछे हटती है और चारों दिशाओं में भाग खड़ी होती है.

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.8.1)

ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां भयवर्धनम् । सृञ्जयैः सह राजेन्द्र घोरं देवासुरोपमम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ kurūṇāṃ bhayavardhanam | sṛñjayaiḥ saha rājendra ghoraṃ devāsuropamam

तब कुरुओं और सृञ्जयों के बीच युद्ध छिड़ गया, हे राजेन्द्र — कुरुओं का भय बढ़ाने वाला भयंकर युद्ध, देवासुर-संग्राम के समान।

श्लोक 2 (9.8.2)

नरा रथा गजौघाश्च वाजिनश्च सहस्रशः । वाजिनश्च पराक्रान्ताः समाजग्मुः परस्परम् ॥

narā rathā gajaughāśca vājinaśca sahasraśaḥ | vājinaśca parākrāntāḥ samājagmuḥ parasparam

मनुष्य, रथ, हाथियों के झुण्ड और सहस्रों घोड़े — पराक्रमी घोड़े — एक-दूसरे से भिड़ गए।

श्लोक 3 (9.8.3)

गजानां भीमरूपाणां द्रवतां निःस्वनो महान् । अश्रूयत यथा काले जलदानां नभस्तले ॥

gajānāṃ bhīmarūpāṇāṃ dravatāṃ niḥsvano mahān | aśrūyata yathā kāle jaladānāṃ nabhastale

दौड़ते हुए भयंकर रूप वाले हाथियों का महान् घोष ऐसा सुनाई देता था जैसे ऋतु-काल में आकाश में बादलों की गर्जना।

श्लोक 4 (9.8.4)

नागैरभ्याहताः केचित्सरथा रथिनोऽपतन् । व्यद्रवन्त रणे भीता द्राव्यमाणा मदोत्कटैः ॥

nāgairabhyāhatāḥ kecitsarathā rathino'patan | vyadravanta raṇe bhītā drāvyamāṇā madotkaṭaiḥ

कुछ रथी हाथियों की मार खाकर रथों सहित गिर पड़े; दूसरे भयभीत होकर, मदमत्त हाथियों से खदेड़े जाने पर, रण से भाग निकले।

श्लोक 5 (9.8.5)

हयौघान्पादरक्षांश्च रथिनस्तत्र शिक्षिताः । शरैः सम्प्रेषयामासुः परलोकाय भारत ॥

hayaughānpādarakṣāṃśca rathinastatra śikṣitāḥ | śaraiḥ sampreṣayāmāsuḥ paralokāya bhārata

वहाँ कुशल रथी घोड़ों के झुण्डों और पैदल रक्षकों को बाणों से परलोक भेज रहे थे, हे भारत।

श्लोक 6 (9.8.6)

सादिनः शिक्षिता राजन्परिवार्य महारथान् । विचरन्तो रणेऽभ्यघ्नन्प्रासशक्त्यृष्टिभिस्तथा ॥

sādinaḥ śikṣitā rājanparivārya mahārathān | vicaranto raṇe'bhyaghnanprāsaśaktyṛṣṭibhistathā

हे राजन्, प्रशिक्षित घुड़सवार महारथियों को घेरकर रण में विचरते हुए उन्हें प्रास, शक्ति और ऋष्टि से मारते थे।

श्लोक 7 (9.8.7)

धन्विनः पुरुषाः केचित्परिवार्य महारथान् । एकं बहव आसाद्य प्रैषयन्यमसादनम् ॥

dhanvinaḥ puruṣāḥ kecitparivārya mahārathān | ekaṃ bahava āsādya praiṣayanyamasādanam

कुछ धनुर्धारी, बहुत-से मिलकर एक महारथी को घेरकर उसे यमलोक भेज देते थे।

श्लोक 8 (9.8.8)

नागान्रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सोत्तरा युधि निर्जघ्नुर्द्रवमाणं महारथम् ॥

nāgānrathavarāṃścānye parivārya mahārathāḥ | sottarā yudhi nirjaghnurdravamāṇaṃ mahāratham

दूसरे महारथियों ने हाथियों और श्रेष्ठ रथों को घेर लिया, और युद्ध में भागते हुए एक महारथी को उसके आवरण सहित मार गिराया।

श्लोक 9 (9.8.9)

तथा च रथिनं क्रुद्धं विकिरन्तं शरान्बहून् । नागा जघ्नुर्महाराज परिवार्य समन्ततः ॥

tathā ca rathinaṃ kruddhaṃ vikirantaṃ śarānbahūn | nāgā jaghnurmahārāja parivārya samantataḥ

इसी प्रकार हाथियों ने, हे महाराज, बहुत-से बाण बरसाते हुए क्रुद्ध रथी को चारों ओर से घेरकर मार डाला।

श्लोक 10 (9.8.10)

नागा नागमभिद्रुत्य रथी च रथिनं रणे । शक्तितोमरनाराचैर्निजघ्नुस्तत्र भारत ॥

nāgā nāgamabhidrutya rathī ca rathinaṃ raṇe | śaktitomaranārācairnijaghnustatra bhārata

हाथी हाथी पर और रथी रथी पर टूट पड़े, और शक्ति, तोमर और नाराचों से वहाँ एक-दूसरे को मारने लगे, हे भारत।

श्लोक 11 (9.8.11)

पादातानवमृद्गन्तो रथवारणवाजिनः । रणमध्ये व्यदृश्यन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥

pādātānavamṛdganto rathavāraṇavājinaḥ | raṇamadhye vyadṛśyanta kurvanto mahadākulam

पैदल सैनिकों को रौंदते हुए रथ, हाथी और घोड़े रण के बीच दिखाई देते थे, और भारी उथल-पुथल मचा रहे थे।

श्लोक 12 (9.8.12)

हयाश्च पर्यधावन्त चामरैरुपशोभिताः । हंसा हिमवतः प्रस्थे पिबन्त इव मेदिनीम् ॥

hayāśca paryadhāvanta cāmarairupaśobhitāḥ | haṃsā himavataḥ prasthe pibanta iva medinīm

चँवरों से सजे घोड़े इधर-उधर दौड़ रहे थे, जैसे हिमालय के ढलान पर हंस दौड़ते हुए मानो धरती को पी रहे हों।

श्लोक 13 (9.8.13)

तेषां तु वाजिनां भूमिः खुरैश्चित्रा विशाम्पते । अशोभत यथा नारी करजैः क्षतविक्षता ॥

teṣāṃ tu vājināṃ bhūmiḥ khuraiścitrā viśāmpate | aśobhata yathā nārī karajaiḥ kṣatavikṣatā

हे स्वामी, उन घोड़ों के खुरों से चित्रित हुई भूमि ऐसी शोभित होती थी जैसे नखों से क्षत-विक्षत हुई स्त्री।

श्लोक 14 (9.8.14)

वाजिनां खुरशब्देन रथनेमिस्वनेन च । पत्तीनां चापि शब्देन नागानां बृंहितेन च ॥

vājināṃ khuraśabdena rathanemisvanena ca | pattīnāṃ cāpi śabdena nāgānāṃ bṛṃhitena ca

घोड़ों के खुरों की ध्वनि, रथ के पहियों की घर्घर, पैदलों के कोलाहल और हाथियों की चिंघाड़ से,

श्लोक 15 (9.8.15)

वादित्राणां च घोषेण शङ्खानां निनदेन च । अभवन्नादिता भूमिर्निर्घातैरिव भारत ॥

vāditrāṇāṃ ca ghoṣeṇa śaṅkhānāṃ ninadena ca | abhavannāditā bhūmirnirghātairiva bhārata

बाजों के घोष और शंखों के नाद से पृथ्वी मानो वज्रपातों से गूँज उठी, हे भारत।

श्लोक 16 (9.8.16)

धनुषां कूजमानानां शस्त्रौघानां च पात्यताम् । कवचानां प्रभाभिश्च न प्राज्ञायत किञ्चन ॥

dhanuṣāṃ kūjamānānāṃ śastraughānāṃ ca pātyatām | kavacānāṃ prabhābhiśca na prājñāyata kiñcana

टंकारते धनुषों, गिरती हुई शस्त्रों की बाढ़ और कवचों की चमक के कारण कुछ भी पहचाना नहीं जाता था।

श्लोक 17 (9.8.17)

बहवो बाहवश्छिन्ना नागराजकरोपमाः । उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम् ॥

bahavo bāhavaśchinnā nāgarājakaropamāḥ | udveṣṭante viceṣṭante vegaṃ kurvanti dāruṇam

हाथियों की सूँड़ों जैसी बहुत-सी कटी हुई भुजाएँ तड़पतीं और छटपटाती थीं और भयंकर वेग से हिलती थीं।

श्लोक 18 (9.8.18)

शिरसां च महाराज पततां धरणीतले । च्युतानामिव तालेभ्यः फलानां श्रूयते स्वनः ॥

śirasāṃ ca mahārāja patatāṃ dharaṇītale | cyutānāmiva tālebhyaḥ phalānāṃ śrūyate svanaḥ

हे महाराज, भूमि पर गिरते हुए सिरों की ध्वनि ताड़ के पेड़ों से टूटकर गिरते फलों की ध्वनि जैसी सुनाई देती थी।

श्लोक 19 (9.8.19)

शिरोभिः पतितैर्भाति रुधिरार्द्रैर्वसुन्धरा । तपनीयनिभैः काले नलिनैरिव भारत ॥

śirobhiḥ patitairbhāti rudhirārdrairvasundharā | tapanīyanibhaiḥ kāle nalinairiva bhārata

रक्त से भीगे गिरे हुए सिरों से पृथ्वी ऐसी शोभित हुई जैसे ऋतु में सोने जैसे कमलों से भरा सरोवर, हे भारत।

श्लोक 20 (9.8.20)

उद्वृत्तनयनैस्तैस्तु गतसत्वैः सुविक्षतैः । व्यभ्राजत मही राजन्पुण्डरीकैरिवावृता ॥

udvṛttanayanaistaistu gatasatvaiḥ suvikṣataiḥ | vyabhrājata mahī rājanpuṇḍarīkairivāvṛtā

उलटी आँखों वाले, प्राणहीन और बुरी तरह कटे हुए उन सिरों से पृथ्वी, हे राजन्, मानो श्वेत कमलों से ढकी हुई सी चमक उठी।

श्लोक 21 (9.8.21)

बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः सकेयूरैर्महाधनैः । पतितैर्भाति राजेन्द्र महाशक्रध्वजैरिव ॥

bāhubhiścandanādigdhaiḥ sakeyūrairmahādhanaiḥ | patitairbhāti rājendra mahāśakradhvajairiva

चन्दन से लिपी, बाजूबन्दों वाली और बहुमूल्य आभूषणों से सजी गिरी हुई भुजाओं से, हे राजेन्द्र, पृथ्वी मानो इन्द्र की विशाल ध्वजाओं से शोभित हो रही थी।

श्लोक 22 (9.8.22)

ऊरुभिश्च नरेन्द्राणां विनिकृत्तैर्महाहवे । हस्तिहस्तोपमैर्जज्ञे संवृतं तद्रणाङ्कणम् ॥

ūrubhiśca narendrāṇāṃ vinikṛttairmahāhave | hastihastopamairjajñe saṃvṛtaṃ tadraṇāṅkaṇam

उस महायुद्ध में राजाओं की कटी हुई, हाथी की सूँड़ जैसी जाँघों से वह रणभूमि ढक गई।

श्लोक 23 (9.8.23)

कबन्धशतसङ्कीर्णं छत्रचामरसङ्कुलम् । सेनावनं तच्छुशुभे वनं पुष्पाचितं यथा ॥

kabandhaśatasaṅkīrṇaṃ chatracāmarasaṅkulam | senāvanaṃ tacchuśubhe vanaṃ puṣpācitaṃ yathā

सैकड़ों कबन्धों से बिछी हुई, छत्रों और चँवरों से भरी वह सेना-रूपी वन फूलों से लदे वन के समान शोभित हुआ।

श्लोक 24 (9.8.24)

तत्र योधा महाराज विचरन्तो ह्यभीतवत् । दृश्यन्ते रुधिराक्ताङ्गाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥

tatra yodhā mahārāja vicaranto hyabhītavat | dṛśyante rudhirāktāṅgāḥ puṣpitā iva kiṃśukāḥ

वहाँ, हे महाराज, निर्भय विचरते हुए योद्धा रक्त से सने अंगों के साथ खिले हुए किंशुक (पलाश) के वृक्षों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 25 (9.8.25)

मातङ्गाश्चाप्यदृश्यन्त शरतोमरपीडिताः । पतन्तस्तत्र तत्रैव छिन्नाभ्रसदृशा रणे ॥

mātaṅgāścāpyadṛśyanta śaratomarapīḍitāḥ | patantastatra tatraiva chinnābhrasadṛśā raṇe

बाणों और तोमरों से पीड़ित हाथी भी रण में जहाँ-तहाँ गिरते हुए, फटे हुए बादलों के समान दिखाई देते थे।

श्लोक 26 (9.8.26)

गजानीकं महाराज वध्यमानं महात्मभिः । व्यदीर्यत दिशः सर्वा वातनुन्ना घना इव ॥

gajānīkaṃ mahārāja vadhyamānaṃ mahātmabhiḥ | vyadīryata diśaḥ sarvā vātanunnā ghanā iva

हे महाराज, महात्माओं के हाथों मारी जाती हुई हाथियों की सेना हवा से उड़ाए गए बादलों की भाँति सब दिशाओं में बिखर गई।

श्लोक 27 (9.8.27)

ते गजा घनसङ्काशाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः । वज्रनुन्ना इव बभुः पर्वता युगसङ्क्षये ॥

te gajā ghanasaṅkāśāḥ petururvyāṃ samantataḥ | vajranunnā iva babhuḥ parvatā yugasaṅkṣaye

बादलों जैसे वे हाथी चारों ओर भूमि पर गिर पड़े; वे युग के अन्त में वज्र से टूटे हुए पर्वतों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 28 (9.8.28)

हयानां सादिभिः सार्धं पतितानां महीतले । राशयः स्म प्रदृश्यन्ते गिरिमात्रास्ततस्ततः ॥

hayānāṃ sādibhiḥ sārdhaṃ patitānāṃ mahītale | rāśayaḥ sma pradṛśyante girimātrāstatastataḥ

सवारों सहित भूमि पर गिरे हुए घोड़ों की राशियाँ इधर-उधर दिखाई देती थीं, जिनमें से प्रत्येक पर्वत जितनी ऊँची थी।

श्लोक 29 (9.8.29)

सञ्जज्ञे रणभूमौ तु परलोकवहा नदी । शोणितोदा रथावर्ता ध्वजवृक्षास्थिशर्करा ॥

sañjajñe raṇabhūmau tu paralokavahā nadī | śoṇitodā rathāvartā dhvajavṛkṣāsthiśarkarā

रणभूमि में परलोक की ओर बहाने वाली एक नदी प्रकट हुई — रक्त उसका जल था, रथ उसके भँवर थे, ध्वज उसके वृक्ष थे और हड्डियाँ उसकी कंकड़ियाँ थीं।

श्लोक 30 (9.8.30)

भुजनक्रा धनुःस्रोता हस्तिशैला हयोपला । मेदोमज्जाकर्दमिनी छत्रहंसा गदोडुपा ॥

bhujanakrā dhanuḥsrotā hastiśailā hayopalā | medomajjākardaminī chatrahaṃsā gadoḍupā

भुजाएँ उसके मगर थीं, धनुष उसकी धाराएँ, हाथी उसकी चट्टानें और घोड़े उसके पत्थर; मेद और मज्जा उसकी कीचड़ थी, छत्र उसके हंस और गदाएँ उसकी नौकाएँ।

श्लोक 31 (9.8.31)

कवचोष्णीषसञ्छन्ना पताकारुचिरद्रुमा । चक्रचक्रावलीजुष्टा त्रिवेणूरगसंवृता ॥

kavacoṣṇīṣasañchannā patākāruciradrumā | cakracakrāvalījuṣṭā triveṇūragasaṃvṛtā

कवचों और पगड़ियों से ढकी, पताकाओं के सुन्दर वृक्षों वाली, चक्रों की पंक्तियों से सेवित और त्रिवेणुओं तथा सर्पों से घिरी हुई —

श्लोक 32 (9.8.32)

शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धनी । प्रावर्तत नदी रौद्रा कुरुसृञ्जयसङ्गमे ॥

śūrāṇāṃ harṣajananī bhīrūṇāṃ bhayavardhanī | prāvartata nadī raudrā kurusṛñjayasaṅgame

वह शूरों को हर्ष देने वाली और भीरुओं का भय बढ़ाने वाली भयानक नदी कुरुओं और सृञ्जयों के संगम पर बहने लगी।

श्लोक 33 (9.8.33)

तां नदीं परलोकाय वहन्तीमतिभैरवाम् । तेरुर्वाहननौभिस्ते शूराः परिघबाहवः ॥

tāṃ nadīṃ paralokāya vahantīmatibhairavām | terurvāhananaubhiste śūrāḥ parighabāhavaḥ

परलोक की ओर बहती उस अत्यन्त भयंकर नदी को परिघ जैसी भुजाओं वाले वे शूर अपने वाहनों की नौकाओं से पार करने लगे।

श्लोक 34 (9.8.34)

वर्तमाने तदा युद्धे निर्मर्यादे विशाम्पते । चतुरङ्गक्षये घोरे युद्धे देवासुरोपमे ॥

vartamāne tadā yuddhe nirmaryāde viśāmpate | caturaṅgakṣaye ghore yuddhe devāsuropame

हे प्रभो, जब वह युद्ध मर्यादा तोड़कर चल रहा था, चतुरंगिणी सेना का भयंकर संहार हो रहा था, देवासुर-संग्राम जैसा युद्ध था,

श्लोक 35 (9.8.35)

व्याक्रोशन्बान्धवानन्ये तत्र तत्र परन्तप । क्रोशद्भिर्दयितैरन्ये भयार्ता न निवर्तिरे ॥

vyākrośanbāndhavānanye tatra tatra parantapa | krośadbhirdayitairanye bhayārtā na nivartire

तब, हे परन्तप, कुछ लोग वहाँ जहाँ-तहाँ अपने बन्धुओं को पुकारते थे, और दूसरे भय से पीड़ित होकर, प्रियजनों के पुकारने पर भी, नहीं लौटे।

श्लोक 36 (9.8.36)

निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने भयानके । अर्जुनो भीमसेनश्च मोहयाञ्चक्रतुः परान् ॥

nirmaryāde tathā yuddhe vartamāne bhayānake | arjuno bhīmasenaśca mohayāñcakratuḥ parān

जब वह भयानक, मर्यादाहीन युद्ध चल रहा था, तब अर्जुन और भीमसेन ने शत्रुओं को मोहित कर दिया।

श्लोक 37 (9.8.37)

सा वध्यमाना महती सेना तव नराधिप । अमुह्यत्तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव ॥

sā vadhyamānā mahatī senā tava narādhipa | amuhyattatra tatraiva yoṣinmadavaśādiva

हे नराधिप, मारी जाती हुई आपकी वह विशाल सेना जहाँ-तहाँ मदवश स्त्री की भाँति मूढ़ हो गई।

श्लोक 38 (9.8.38)

मोहयित्वा च तां सेनां भीमसेनधनञ्जयौ । दध्मतुर्वारिजौ तत्र सिंहनादांश्च चक्रतुः ॥

mohayitvā ca tāṃ senāṃ bhīmasenadhanañjayau | dadhmaturvārijau tatra siṃhanādāṃśca cakratuḥ

उस सेना को मोहित करके भीमसेन और धनञ्जय ने वहाँ शंख बजाए और सिंहनाद किए।

श्लोक 39 (9.8.39)

श्रुत्वैव तु महाशब्दं धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । धर्मराजं पुरस्कृत्य मद्रराजमभिद्रुतौ ॥

śrutvaiva tu mahāśabdaṃ dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau | dharmarājaṃ puraskṛtya madrarājamabhidrutau

उस महान् नाद को सुनते ही धृष्टद्युम्न और शिखण्डी धर्मराज को आगे करके मद्रराज पर टूट पड़े।

श्लोक 40 (9.8.40)

तत्राश्चर्यमपश्याम घोररूपं महद्भयम् । शल्येन सङ्गताः शूरा यदयुध्यन्त भागशः ॥

tatrāścaryamapaśyāma ghorarūpaṃ mahadbhayam | śalyena saṅgatāḥ śūrā yadayudhyanta bhāgaśaḥ

वहाँ हमने एक भयंकर और अत्यन्त भयावह आश्चर्य देखा — शल्य से भिड़े हुए शूर अलग-अलग टोलियों में लड़ रहे थे।

श्लोक 41 (9.8.41)

माद्रीपुत्रौ तु रभसौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ । अभ्ययातां त्वरायुक्तौ जिगीषन्तौ बलं तव ॥

mādrīputrau tu rabhasau kṛtāstrau yuddhadurmadau | abhyayātāṃ tvarāyuktau jigīṣantau balaṃ tava

माद्री के दोनों पुत्र, वेगवान्, अस्त्रों में कुशल और युद्ध के मद में चूर, आपकी सेना को जीतने की इच्छा से शीघ्रता से आगे बढ़े।

श्लोक 42 (9.8.42)

ततोऽभ्यावर्तत बलं तावकं भरतर्षभ । शरैः प्रणुन्नं बहुधा पाण्डवैर्जितकाशिभिः ॥

tato'bhyāvartata balaṃ tāvakaṃ bharatarṣabha | śaraiḥ praṇunnaṃ bahudhā pāṇḍavairjitakāśibhiḥ

तब, हे भरतश्रेष्ठ, विजयी पाण्डवों के बाणों से नाना प्रकार से खदेड़ी जाकर आपकी सेना पलट पड़ी।

श्लोक 43 (9.8.43)

वध्यमाना चमूः सा तु पुत्राणां प्रेक्षतां तव । भेजे दश दिशो राजन्प्रणुन्ना शरवृष्टिभिः ॥

vadhyamānā camūḥ sā tu putrāṇāṃ prekṣatāṃ tava | bheje daśa diśo rājanpraṇunnā śaravṛṣṭibhiḥ

आपके पुत्रों के देखते-देखते, मारी जाती हुई और बाणों की वर्षा से खदेड़ी हुई वह सेना, हे राजन्, दसों दिशाओं में बिखर गई।

श्लोक 44 (9.8.44)

हाहाकारो महाञ्जज्ञे योधानां तत्र भारत । तिष्ठतिष्ठेति चाप्यासीद्द्रावितानां महात्मनाम् ॥

hāhākāro mahāñjajñe yodhānāṃ tatra bhārata | tiṣṭhatiṣṭheti cāpyāsīddrāvitānāṃ mahātmanām

वहाँ योद्धाओं में बड़ा हाहाकार मच गया, हे भारत, और भगाए जा रहे उन महात्माओं को 'ठहरो, ठहरो!' की पुकार सुनाई दी।

श्लोक 45 (9.8.45)

क्षत्रियाणां तथाऽन्योन्यं संयुगे जयमिच्छताम् । प्राद्रवन्नेव सम्भग्नाः पाण्डवैस्तव सैनिकाः ॥

kṣatriyāṇāṃ tathā'nyonyaṃ saṃyuge jayamicchatām | prādravanneva sambhagnāḥ pāṇḍavaistava sainikāḥ

जब विजय चाहने वाले क्षत्रिय युद्ध में एक-दूसरे को पुकार रहे थे, तभी पाण्डवों से टूटी हुई आपकी सेना भाग ही चली।

श्लोक 46 (9.8.46)

त्यक्त्वा युद्धे प्रियान्पुत्रान्भ्रातॄनथ पितामहान् । मातुलान्भागिनेयांश्च वयस्यानपि भारत ॥

tyaktvā yuddhe priyānputrānbhrātṝnatha pitāmahān | mātulānbhāgineyāṃśca vayasyānapi bhārata

हे भारत, युद्ध में अपने प्रिय पुत्रों, भाइयों, पितामहों, मामाओं, भाँजों और मित्रों को छोड़कर,

श्लोक 47 (9.8.47)

हयान्द्विपांस्त्वरयन्तो योधा जग्मुः समन्ततः । आत्मत्राणकृतोत्साहास्तावका भरतर्षभ ॥

hayāndvipāṃstvarayanto yodhā jagmuḥ samantataḥ | ātmatrāṇakṛtotsāhāstāvakā bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, आपके योद्धा हाथी-घोड़ों को हाँकते हुए अपनी रक्षा के उद्योग में चारों ओर चले गए।

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