शल्य पर्व · अध्याय 7
अन्तिम दिन के युद्ध के लिए सेनाओं की व्यूह-रचना
प्रभात होते ही दुर्योधन सेना को सन्नद्ध होने का आदेश देता है और कौरव-नायक यह नियम बाँधते हैं कि कोई अकेला पाण्डवों से नहीं लड़ेगा। धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि शल्य और दुर्योधन कैसे मारे गए। सञ्जय व्यूहों का वर्णन करते हैं — कौरव-सेना के अग्र में शल्य, पार्श्वों और पीछे अन्य नायक, और तीन टुकड़ियों में बढ़ते पाण्डव। वे दोनों ओर शेष बची सेनाओं की गणना बताते हैं और युद्ध आरम्भ हो जाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.7.1)
व्यतीतायां रजन्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा । अब्रवीत्तावकान्सर्वान्सन्नह्यन्तां महारथाः ॥
vyatītāyāṃ rajanyāṃ tu rājā duryodhanastadā | abravīttāvakānsarvānsannahyantāṃ mahārathāḥ
रात बीत जाने पर राजा दुर्योधन ने तुम्हारे सब योद्धाओं से कहा, "महारथी लोग कवच धारण करें।"
श्लोक 2 (9.7.2)
राज्ञश्च मतमाज्ञाय समनह्यत सा चमूः । अयोजयन्रथांस्तूर्णं पर्यधावंस्तथा परे ॥
rājñaśca matamājñāya samanahyata sā camūḥ | ayojayanrathāṃstūrṇaṃ paryadhāvaṃstathā pare
राजा का अभिप्राय जानकर वह सेना सन्नद्ध हो गई; रथ शीघ्र जोते गए और दूसरे लोग इधर-उधर दौड़ने लगे।
श्लोक 3 (9.7.3)
अकल्प्यन्त च मातङ्गाः समनह्यन्त पत्तयः । हयानास्तरणोपेतांश्चक्रुरन्ये सहस्रशः ॥
akalpyanta ca mātaṅgāḥ samanahyanta pattayaḥ | hayānāstaraṇopetāṃścakruranye sahasraśaḥ
हाथी सजाए गए, पैदल सैनिक कवचधारी हुए, और दूसरे सहस्रों लोगों ने घोड़ों पर झूलें डाल दीं।
श्लोक 4 (9.7.4)
वादित्राणां च निनदः प्रादुरासीद्विशाम्पते । योधानां सैन्यमुख्यानामन्योन्यं प्रतिगर्जताम् ॥
vāditrāṇāṃ ca ninadaḥ prādurāsīdviśāmpate | yodhānāṃ sainyamukhyānāmanyonyaṃ pratigarjatām
हे स्वामी, बाजों की ध्वनि उठी, और सेना के प्रमुख योद्धा एक-दूसरे को ललकारते हुए गरजने लगे।
श्लोक 5 (9.7.5)
ततो बलानि सर्वाणि हतशिष्टानि भारत । सन्नद्धानि व्यदृश्यन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
tato balāni sarvāṇi hataśiṣṭāni bhārata | sannaddhāni vyadṛśyanta mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
तब, हे भारत, संहार से बची हुई सारी सेनाएँ युद्ध के लिए सन्नद्ध दिखाई दीं; उन्होंने मृत्यु को ही अपना लौटना ठहरा लिया था।
श्लोक 6 (9.7.6)
शल्यं सेनापतिं कृत्वा मद्रराजं महारथाः । प्रविभज्य बलं सर्वमनीकेषु व्यवस्थिताः ॥
śalyaṃ senāpatiṃ kṛtvā madrarājaṃ mahārathāḥ | pravibhajya balaṃ sarvamanīkeṣu vyavasthitāḥ
मद्रराज शल्य को सेनापति बनाकर महारथियों ने सारी सेना को बाँटा और उसकी टुकड़ियों में अपने-अपने स्थान ग्रहण कर लिए।
श्लोक 7 (9.7.7)
ततः सर्वे समागम्य पुत्रेण तव सैनिकाः । कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिः शल्योऽथ सौबलः । अन्ये च पार्थिवाः शेषाः समयं चक्रुरादृताः ॥
tataḥ sarve samāgamya putreṇa tava sainikāḥ | kṛpaśca kṛtavarmā ca drauṇiḥ śalyo'tha saubalaḥ | anye ca pārthivāḥ śeṣāḥ samayaṃ cakrurādṛtāḥ
तब तुम्हारे पुत्र के साथ तुम्हारे सब योद्धाओं — कृप, कृतवर्मा, द्रोणपुत्र, शल्य और सौबल — तथा शेष अन्य राजाओं ने एकत्र होकर उत्साहपूर्वक एक नियम बाँधा।
श्लोक 8 (9.7.8)
अद्याचार्यसुतो द्रौणिर्नैको युध्येत शत्रुभिः । न न एकेन योद्धव्यं कथञ्चिदपि पाण्डवैः ॥
adyācāryasuto drauṇirnaiko yudhyeta śatrubhiḥ | na na ekena yoddhavyaṃ kathañcidapi pāṇḍavaiḥ
"आज आचार्य-पुत्र द्रोणि शत्रुओं से अकेला न लड़े।" हममें से किसी को भी पाण्डवों से किसी प्रकार अकेले नहीं लड़ना है।
श्लोक 9 (9.7.9)
यो ह्येकः पाण्डवैर्युध्येद्यो वा युध्यन्तमुत्सृजेत् । स पञ्चभिर्भवेद्युक्तः पातकैश्चोपपातकैः । अन्योन्यं परिरक्षद्भिर्योद्धव्यं सहितैश्च नः ॥
yo hyekaḥ pāṇḍavairyudhyedyo vā yudhyantamutsṛjet | sa pañcabhirbhavedyuktaḥ pātakaiścopapātakaiḥ | anyonyaṃ parirakṣadbhiryoddhavyaṃ sahitaiśca naḥ
जो पाण्डवों से अकेला लड़े, या लड़ते हुए साथी को छोड़ दे, वह पाँच महापातकों और उपपातकों से युक्त हो। हमें एक-दूसरे की रक्षा करते हुए मिलकर लड़ना है।"
श्लोक 10 (9.7.10)
एवं ते समयं कृत्वा सर्वे तत्र महारथाः । मद्रराजं पुरस्कृत्य तूर्णमभ्यद्रवन्परान् ॥
evaṃ te samayaṃ kṛtvā sarve tatra mahārathāḥ | madrarājaṃ puraskṛtya tūrṇamabhyadravanparān
इस प्रकार नियम बाँधकर वे सब महारथी मद्रराज को आगे करके शीघ्र ही शत्रुओं पर टूट पड़े।
श्लोक 11 (9.7.11)
तथैव पाण्डवा राजन्व्यूह्य सैन्यं महारणे । अभ्ययुः कौरवान्युद्धे योत्स्यमानाः समन्ततः ॥
tathaiva pāṇḍavā rājanvyūhya sainyaṃ mahāraṇe | abhyayuḥ kauravānyuddhe yotsyamānāḥ samantataḥ
उसी प्रकार हे राजन्, पाण्डवों ने महायुद्ध में अपनी सेना की व्यूह-रचना करके चारों ओर से कौरवों पर चढ़ाई की; वे युद्ध के लिए उत्सुक थे।
श्लोक 12 (9.7.12)
ततो बलं समभवत्क्षुब्धार्णवसमस्वनम् । समुद्भूतार्णवाकारमुदीर्णरथकुञ्जरम् ॥
tato balaṃ samabhavatkṣubdhārṇavasamasvanam | samudbhūtārṇavākāramudīrṇarathakuñjaram
तब वह सेना क्षुब्ध समुद्र के समान गर्जने लगी; वह उमड़े हुए सागर जैसी थी, जिसमें रथ और हाथी ऊँचे उठे हुए थे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 13 (9.7.13)
द्रोणस्य चैव भीष्मस्य राधेयस्य च मे श्रुतम् । पातनं शंस मे भूयः शल्यस्याथ सुतस्य मे ॥
droṇasya caiva bhīṣmasya rādheyasya ca me śrutam | pātanaṃ śaṃsa me bhūyaḥ śalyasyātha sutasya me
"द्रोण, भीष्म और राधेय के पतन की बात मैं सुन चुका हूँ। अब शल्य के और मेरे पुत्र के पतन की बात मुझे फिर बताओ।
श्लोक 14 (9.7.14)
कथं रणे हतः शल्यो धर्मराजेन सञ्जय । भीमेन च महाबाहुः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥
kathaṃ raṇe hataḥ śalyo dharmarājena sañjaya | bhīmena ca mahābāhuḥ putro duryodhano mama
सञ्जय, धर्मराज के हाथों शल्य युद्ध में कैसे मारा गया, और भीम के हाथों मेरा महाबाहु पुत्र दुर्योधन कैसे मारा गया?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (9.7.15)
क्षयं मनुष्यदेहानां तथा नागाश्वसङ्क्षयम् । शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा सङ्ग्रामं शंसतो मम ॥
kṣayaṃ manuṣyadehānāṃ tathā nāgāśvasaṅkṣayam | śṛṇu rājansthiro bhūtvā saṅgrāmaṃ śaṃsato mama
राजन्, स्थिर होकर सुनिए, मैं युद्ध का वर्णन करता हूँ — मनुष्य-शरीरों का विनाश और हाथी-घोड़ों का संहार।
श्लोक 16 (9.7.16)
आशा बलवती राजन्पुत्राणां तेऽभवत्तदा ॥
āśā balavatī rājanputrāṇāṃ te'bhavattadā
राजन्, उस समय आपके पुत्रों में प्रबल आशा थी।
श्लोक 17 (9.7.17)
हते द्रोणे च भीष्मे च सूतपुत्रे च पातिते । शल्यः पार्थान्रणे सर्वान्निहनिष्यति मारिष ॥
hate droṇe ca bhīṣme ca sūtaputre ca pātite | śalyaḥ pārthānraṇe sarvānnihaniṣyati māriṣa
द्रोण और भीष्म के मारे जाने तथा सूतपुत्र के गिर जाने पर शल्य रण में सब पार्थों को मार डालेगा, हे माननीय।
श्लोक 18 (9.7.18)
तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत । मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् । नाथवन्तं तदाऽऽत्मानममन्यत सुतस्तव ॥
tāmāśāṃ hṛdaye kṛtvā samāśvasya ca bhārata | madrarājaṃ ca samare samāśritya mahāratham | nāthavantaṃ tadā''tmānamamanyata sutastava
उस आशा को हृदय में रखकर और आश्वस्त होकर, हे भारत, तथा समर में महारथी मद्रराज का आश्रय लेकर आपका पुत्र अपने को सनाथ समझने लगा।
श्लोक 19 (9.7.19)
यदा कर्णे हते पार्थाः सिंहनादं प्रचक्रिरे । तदा राजन्धार्तराष्ट्रान्प्रविवेश महद्भयम् ॥
yadā karṇe hate pārthāḥ siṃhanādaṃ pracakrire | tadā rājandhārtarāṣṭrānpraviveśa mahadbhayam
जब कर्ण के मारे जाने पर पार्थों ने सिंहनाद किया, तब, हे राजन्, धृतराष्ट्र के पुत्रों के भीतर बड़ा भय समा गया।
श्लोक 20 (9.7.20)
तान्समाश्वास्य तु तदा मद्रराजः प्रतापवान् । व्यूह्य व्यूहं महाराज सर्वतोभद्रमृद्धिमत् ॥
tānsamāśvāsya tu tadā madrarājaḥ pratāpavān | vyūhya vyūhaṃ mahārāja sarvatobhadramṛddhimat
उन्हें आश्वासन देकर प्रतापी मद्रराज ने, हे महाराज, समृद्ध सर्वतोभद्र नामक व्यूह की रचना की।
श्लोक 21 (9.7.21)
प्रत्युद्ययौ रणे पार्थान्मद्रराजः प्रतापवान् । विधून्वन्कार्मुकं चित्रं भारघ्नं वेगवत्तरम् । रथप्रवरमास्थाय सैन्धवाश्वं महारथः ॥
pratyudyayau raṇe pārthānmadrarājaḥ pratāpavān | vidhūnvankārmukaṃ citraṃ bhāraghnaṃ vegavattaram | rathapravaramāsthāya saindhavāśvaṃ mahārathaḥ
प्रतापी महारथी मद्रराज अपने विचित्र, वेगवान् और भार को तोड़ने वाले धनुष को हिलाता हुआ, सिन्धु देश के घोड़ों वाले उत्तम रथ पर चढ़कर रण में पार्थों के सामने चला।
श्लोक 22 (9.7.22)
तस्य सूतो महाराज रथस्थोऽशोभयद्रथम् । स तेन संवृतो वीरो रथेनामित्रकर्शनः । तस्थौ शूरो महाराज पुत्राणां ते भयप्रणुत् ॥
tasya sūto mahārāja rathastho'śobhayadratham | sa tena saṃvṛto vīro rathenāmitrakarśanaḥ | tasthau śūro mahārāja putrāṇāṃ te bhayapraṇut
हे महाराज, उसके सारथि ने रथ पर खड़े होकर रथ को शोभित किया; उस रथ से घिरा हुआ शत्रुसंहारक शूर वीर, हे महाराज, आपके पुत्रों का भय दूर करता हुआ खड़ा रहा।
श्लोक 23 (9.7.23)
प्रयाणे मद्रराजोऽभून्मुखं व्यूहस्य दंशितः । मद्रकैः सहितो वीरैः कर्णपुत्रैश्च दुर्जयैः ॥
prayāṇe madrarājo'bhūnmukhaṃ vyūhasya daṃśitaḥ | madrakaiḥ sahito vīraiḥ karṇaputraiśca durjayaiḥ
प्रयाण के समय कवचधारी मद्रराज व्यूह के अग्रभाग में था; उसके साथ मद्रक वीर और कर्ण के दुर्जय पुत्र थे।
श्लोक 24 (9.7.24)
सव्येऽभूत्कृतवर्मा च त्रिगर्तैः परिवारितः । गौतमो दक्षिणे पार्श्वे शकैश्च यवनैः सह ॥
savye'bhūtkṛtavarmā ca trigartaiḥ parivāritaḥ | gautamo dakṣiṇe pārśve śakaiśca yavanaiḥ saha
बाईं ओर त्रिगर्तों से घिरा हुआ कृतवर्मा था, और दाहिने पार्श्व में शकों और यवनों के साथ गौतम (कृप) था।
श्लोक 25 (9.7.25)
अश्वत्थामा पृष्ठतोऽभूत्काम्भोजैः परिवारितः । दुर्योधनोऽभवन्मध्ये रक्षितः कुरुपुङ्गवैः ॥
aśvatthāmā pṛṣṭhato'bhūtkāmbhojaiḥ parivāritaḥ | duryodhano'bhavanmadhye rakṣitaḥ kurupuṅgavaiḥ
अश्वत्थामा पीछे था, काम्बोजों से घिरा हुआ; दुर्योधन बीच में था, श्रेष्ठ कुरुओं से रक्षित।
श्लोक 26 (9.7.26)
हयानीकेन महता सौबलश्चापि संवृतः । प्रययौ सर्वसैन्येन कैतव्यश्च महारथः ॥
hayānīkena mahatā saubalaścāpi saṃvṛtaḥ | prayayau sarvasainyena kaitavyaśca mahārathaḥ
विशाल अश्वसेना से घिरा हुआ सौबल भी, और महारथी कैतव्य भी, पूरी सेना के साथ चला।
श्लोक 27 (9.7.27)
पाण्डवाश्च महेष्वासा व्यूह्य सैन्यमरिन्दमाः । त्रिधाभूता महाराज तव सैन्यमुपाद्रवन् ॥
pāṇḍavāśca maheṣvāsā vyūhya sainyamarindamāḥ | tridhābhūtā mahārāja tava sainyamupādravan
महाधनुर्धर शत्रुदमन पाण्डव भी अपनी सेना की व्यूह-रचना करके तीन भागों में बँटकर, हे महाराज, आपकी सेना पर टूट पड़े।
श्लोक 28 (9.7.28)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः । शल्यस्य वाहिनीं हन्तुमभिदुद्रुवुराहवे ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca sātyakiśca mahārathaḥ | śalyasya vāhinīṃ hantumabhidudruvurāhave
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और महारथी सात्यकि शल्य की सेना का संहार करने के लिए युद्ध में दौड़ पड़े।
श्लोक 29 (9.7.29)
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वेनानीकेन संवृतः । शल्यमेवाभिदुद्राव जिघांसुर्भरतर्षभः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā svenānīkena saṃvṛtaḥ | śalyamevābhidudrāva jighāṃsurbharatarṣabhaḥ
तब राजा युधिष्ठिर अपनी सेना से घिरे हुए, शल्य को मारने की इच्छा से, हे भरतश्रेष्ठ, सीधे उसी की ओर दौड़े।
श्लोक 30 (9.7.30)
हार्दिक्यं च महेष्वासमर्जुनः शत्रुपूगहा । संशप्तकगणांश्चैव वेगितोऽभिविदुद्रुवे ॥
hārdikyaṃ ca maheṣvāsamarjunaḥ śatrupūgahā | saṃśaptakagaṇāṃścaiva vegito'bhividudruve
शत्रु-समूहों का संहार करने वाला अर्जुन महाधनुर्धर हार्दिक्य (कृतवर्मा) और संशप्तकों के गणों पर वेग से टूट पड़ा।
श्लोक 31 (9.7.31)
गौतमं भीमसेनो वै सोमकाश्च महारथाः । अभ्यद्रवन्त राजेन्द्र जिघांसन्तः परान्युधि ॥
gautamaṃ bhīmaseno vai somakāśca mahārathāḥ | abhyadravanta rājendra jighāṃsantaḥ parānyudhi
भीमसेन और सोमक महारथी, हे राजेन्द्र, युद्ध में शत्रुओं को मारने की इच्छा से गौतम (कृप) पर टूट पड़े।
श्लोक 32 (9.7.32)
माद्रीपुत्रौ तु शकुनिमुलूकं च महारथम् । ससैन्यौ सहसैन्यौ तावुपतस्थतुराहवे ॥
mādrīputrau tu śakunimulūkaṃ ca mahāratham | sasainyau sahasainyau tāvupatasthaturāhave
माद्री के दोनों पुत्र अपनी-अपनी सेना सहित युद्ध में शकुनि और महारथी उलूक के सामने जा डटे।
श्लोक 33 (9.7.33)
तथैवायुतशो योधास्तावकाः पाण्डवान्रणे । अभ्यवर्तन्त सङ्क्रुद्धा विविधायुधपाणयः ॥
tathaivāyutaśo yodhāstāvakāḥ pāṇḍavānraṇe | abhyavartanta saṅkruddhā vividhāyudhapāṇayaḥ
उसी प्रकार आपके दसियों सहस्र योद्धा क्रोध से भरे, नाना प्रकार के आयुध हाथों में लिए, युद्ध में पाण्डवों के सामने बढ़े।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 34 (9.7.34)
हते भीष्मे महेष्वासे द्रोणे कर्णे जयद्रथे । कुरुष्वल्पावशिष्टेषु पाण्डवेषु च संयुगे ॥
hate bhīṣme maheṣvāse droṇe karṇe jayadrathe | kuruṣvalpāvaśiṣṭeṣu pāṇḍaveṣu ca saṃyuge
"महाधनुर्धर भीष्म, द्रोण, कर्ण और जयद्रथ के मारे जाने पर, कुरुओं में थोड़े ही बचे रहने पर, और पाण्डवों के युद्ध में —
श्लोक 35 (9.7.35)
संरब्धेषु च पार्थेषु पराक्रान्तेषु सञ्जय । मामकानां परेषां च किं शिष्टमभवद्बलम् ॥
saṃrabdheṣu ca pārtheṣu parākrānteṣu sañjaya | māmakānāṃ pareṣāṃ ca kiṃ śiṣṭamabhavadbalam
पार्थों के क्रुद्ध और पराक्रम में बढ़े हुए होने पर, सञ्जय, मेरी और शत्रुओं की कौन-सी सेना शेष बची थी?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 36 (9.7.36)
यथा वयं परे राजन्युद्धाय समुपस्थिताः । यावच्चासीद्बलं शिष्टं सङ्ग्रामे तन्निबोध मे ॥
yathā vayaṃ pare rājanyuddhāya samupasthitāḥ | yāvaccāsīdbalaṃ śiṣṭaṃ saṅgrāme tannibodha me
राजन्, मुझसे सुनिए कि हम और शत्रु किस प्रकार युद्ध के लिए डटे थे और संग्राम में कितनी सेना शेष बची थी।
श्लोक 37 (9.7.37)
एकादश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ । दश दन्तिसहस्राणि सप्त चैव शतानि च ॥
ekādaśa sahasrāṇi rathānāṃ bharatarṣabha | daśa dantisahasrāṇi sapta caiva śatāni ca
हे भरतश्रेष्ठ, ग्यारह सहस्र रथ, दस सहस्र सात सौ हाथी,
श्लोक 38 (9.7.38)
पूर्णे शतसहस्रे द्वे हयानां तत्र भारत । पत्तिकोट्यस्तथा तिस्रो बलमेतत्तवाभवत् ॥
pūrṇe śatasahasre dve hayānāṃ tatra bhārata | pattikoṭyastathā tisro balametattavābhavat
पूरे दो लाख घोड़े और तीन करोड़ पैदल सैनिक — हे भारत, यही आपकी सेना थी।
श्लोक 39 (9.7.39)
रथानां षट्सहस्राणि षट्सहस्राश्च कुञ्जराः । दश चाश्वसहस्राणि पत्तिकोटी च भारत ॥
rathānāṃ ṣaṭsahasrāṇi ṣaṭsahasrāśca kuñjarāḥ | daśa cāśvasahasrāṇi pattikoṭī ca bhārata
छह सहस्र रथ, छह सहस्र हाथी, दस सहस्र घोड़े और दो करोड़ पैदल सैनिक, हे भारत —
श्लोक 40 (9.7.40)
एतद्बलं पाण्डवानामभवच्छेषमाहवे । एत एव समाजग्मुर्युद्धाय भरतर्षभ ॥
etadbalaṃ pāṇḍavānāmabhavaccheṣamāhave | eta eva samājagmuryuddhāya bharatarṣabha
युद्ध में पाण्डवों के पास यही सेना शेष बची थी; हे भरतश्रेष्ठ, ये ही लड़ने के लिए एकत्र हुए।
श्लोक 41 (9.7.41)
एवं विभज्य राजेन्द्र मद्रराजमते स्थिताः । पाण्डवान्प्रत्युदीयाम जयगृद्धाः प्रमन्यवः ॥
evaṃ vibhajya rājendra madrarājamate sthitāḥ | pāṇḍavānpratyudīyāma jayagṛddhāḥ pramanyavaḥ
हे राजेन्द्र, इस प्रकार बँटकर हम मद्रराज की सम्मति के अनुसार खड़े हुए और विजय की लालसा तथा क्रोध से भरकर पाण्डवों के सामने बढ़े।
श्लोक 42 (9.7.42)
तथैव पाण्डवाः शूराः समरे जितकाशिनः । उपयाता नरव्याघ्राः पाञ्चालाश्च यशस्विनः ॥
tathaiva pāṇḍavāḥ śūrāḥ samare jitakāśinaḥ | upayātā naravyāghrāḥ pāñcālāśca yaśasvinaḥ
उसी प्रकार युद्ध में विजय पाने वाले शूर पाण्डव और यशस्वी पाञ्चाल, ये पुरुषव्याघ्र, आगे बढ़े।
श्लोक 43 (9.7.43)
एवमेते बलौघेन परस्परवधैषिणः । उपयाता नरव्याघ्राः पूर्वां सन्ध्यां प्रति प्रभो ॥
evamete balaughena parasparavadhaiṣiṇaḥ | upayātā naravyāghrāḥ pūrvāṃ sandhyāṃ prati prabho
इस प्रकार सेनाओं के प्रवाह के साथ, एक-दूसरे का वध चाहने वाले वे पुरुषव्याघ्र, हे प्रभो, प्रभात की सन्ध्या के समय बढ़ आए।
श्लोक 44 (9.7.44)
ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयानकम् । तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayānakam | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca nighnatāmitaretaram
तब आपके और शत्रुओं के योद्धाओं के एक-दूसरे को मारने से भयंकर और डरावना युद्ध छिड़ गया।