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शल्य पर्व · अध्याय 6

शल्य का सेनापति-अभिषेक; कृष्ण की शल्यवध-प्रेरणा

शल्य दुर्योधन से कहता है कि वह सेना का नेतृत्व करेगा और पाण्डवों को जीत लेगा; दुर्योधन सेना के बीच उसका सेनापति-पद पर अभिषेक करता है और सैनिक जयकार करते हैं। कोलाहल सुनकर युधिष्ठिर कृष्ण से करणीय पूछते हैं। कृष्ण शल्य को भीष्म, द्रोण और कर्ण के समान बताते हैं और युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे मामा होने पर भी दया न करके उसे मारें। कृष्ण अपने शिविर को लौट जाते हैं और दोनों सेनाएँ उस रात सोती हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.6.1)

एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो मद्रराजः प्रतापवान् । दुर्योधनं तदा राजन्वाक्यमेतदुवाच ह ॥

etacchrutvā vaco rājño madrarājaḥ pratāpavān | duryodhanaṃ tadā rājanvākyametaduvāca ha

राजा की यह बात सुनकर प्रतापी मद्रराज ने तब, हे राजन्, दुर्योधन से यह वचन कहा।

शल्य उवाच

श्लोक 2 (9.6.2)

दुर्योधन महाबाहो शृणु वाक्यविदां वर । यावेतौ मन्यसे कृष्णौ रथस्थौ रथिनांवरौ । न मे तुल्यावुभावेतौ बाहुवीर्ये कथञ्चन ॥

duryodhana mahābāho śṛṇu vākyavidāṃ vara | yāvetau manyase kṛṣṇau rathasthau rathināṃvarau | na me tulyāvubhāvetau bāhuvīrye kathañcana

"हे महाबाहु दुर्योधन, वक्ताओं में श्रेष्ठ, सुनो। रथ पर खड़े जिन दोनों कृष्णों को तुम श्रेष्ठ रथी मानते हो, वे दोनों भुजबल में किसी भी प्रकार मेरे समान नहीं हैं।

श्लोक 3 (9.6.3)

उद्यतां पृथिवीं सर्वां ससुरासुरमानवाम् । योधयेयं रणमुखे सङ्क्रुद्धः किमु पाण्डवान् ॥

udyatāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ sasurāsuramānavām | yodhayeyaṃ raṇamukhe saṅkruddhaḥ kimu pāṇḍavān

देवता, असुर और मनुष्यों सहित सारी पृथ्वी भी यदि उठ खड़ी हो, तो मैं क्रुद्ध होकर रण के अग्रभाग में उससे भी लड़ूँगा; फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या।

श्लोक 4 (9.6.4)

विजेष्यामि रणे पार्थान्सोमकांश्च समागतान् । अहं सेनाप्रमेता ते भविष्यामि न संशयः ॥

vijeṣyāmi raṇe pārthānsomakāṃśca samāgatān | ahaṃ senāprametā te bhaviṣyāmi na saṃśayaḥ

मैं युद्ध में एकत्र हुए पार्थों और सोमकों को जीत लूँगा। मैं तुम्हारी सेना का नेता बनूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 5 (9.6.5)

तं च व्यूहं विधास्यामि न तरिष्यन्ति यं परे । इति सत्यं ब्रवीम्येष दुर्योधन न संशयः ॥

taṃ ca vyūhaṃ vidhāsyāmi na tariṣyanti yaṃ pare | iti satyaṃ bravīmyeṣa duryodhana na saṃśayaḥ

और मैं ऐसा व्यूह रचूँगा जिसे शत्रु पार नहीं कर सकेंगे। दुर्योधन, मैं यह सत्य कहता हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 6 (9.6.6)

अद्यैवाहं रणे सर्वान्पाञ्चालान्सह पाण्डवैः । निहनिष्यामि वा राजन्स्वर्गं यास्यामि वा हतः ॥

adyaivāhaṃ raṇe sarvānpāñcālānsaha pāṇḍavaiḥ | nihaniṣyāmi vā rājansvargaṃ yāsyāmi vā hataḥ

आज मैं युद्ध में पाण्डवों सहित सब पाञ्चालों को मार डालूँगा, हे राजन्, अथवा स्वयं मारा जाकर स्वर्ग जाऊँगा।

श्लोक 7 (9.6.7)

अद्य पश्यन्तु मां लोका विचरन्तमभीतवत् ॥

adya paśyantu māṃ lokā vicarantamabhītavat

आज लोग मुझे निर्भय होकर विचरते हुए देखें।

श्लोक 8 (9.6.8)

अद्य पाण्डुसुताः सर्वे वासुदेवः ससात्यकिः । पाञ्चालाश्चेदयश्चैव द्रौपदेयाश्च सर्वशः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सर्वे चापि प्रभद्रकाः ॥

adya pāṇḍusutāḥ sarve vāsudevaḥ sasātyakiḥ | pāñcālāścedayaścaiva draupadeyāśca sarvaśaḥ | dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca sarve cāpi prabhadrakāḥ

आज सभी पाण्डुपुत्र, सात्यकि सहित वासुदेव, पाञ्चाल और चेदि, द्रौपदी के सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सभी प्रभद्रक भी —

श्लोक 9 (9.6.9)

विक्रमं मम पश्यन्तु धनुषश्च महद्बलम् । लाघवं चास्त्रवीर्यं च भुजयोश्च बलं युधि ॥

vikramaṃ mama paśyantu dhanuṣaśca mahadbalam | lāghavaṃ cāstravīryaṃ ca bhujayośca balaṃ yudhi

— मेरा पराक्रम, मेरे धनुष का महान् बल, मेरी हस्तलाघवता, मेरे अस्त्रों की शक्ति और युद्ध में मेरी भुजाओं का बल देखें।

श्लोक 10 (9.6.10)

अद्य पश्यन्तु मे पार्थाः सिद्धाश्च सह चारणैः । यादृशं मे बलं बाह्वोः सम्पदस्त्रेषु या च मे ॥

adya paśyantu me pārthāḥ siddhāśca saha cāraṇaiḥ | yādṛśaṃ me balaṃ bāhvoḥ sampadastreṣu yā ca me

आज पार्थ तथा चारणों सहित सिद्ध देखें कि मेरी भुजाओं में कैसा बल है और अस्त्रों में मेरी कैसी निपुणता है।

श्लोक 11 (9.6.11)

अद्य मे विक्रमं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथाः । प्रतीकारपरा भूत्वा चेष्टन्ते विविधाः क्रियाः ॥

adya me vikramaṃ dṛṣṭvā pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ | pratīkāraparā bhūtvā ceṣṭante vividhāḥ kriyāḥ

आज मेरा पराक्रम देखकर पाण्डवों के महारथी उसका प्रतिकार करने में लगकर नाना प्रकार के उपाय करें।

श्लोक 12 (9.6.12)

अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावयिष्ये समन्ततः ॥

adya sainyāni pāṇḍūnāṃ drāvayiṣye samantataḥ

आज मैं पाण्डवों की सेनाओं को चारों ओर से भगा दूँगा।

श्लोक 13 (9.6.13)

द्रोणभीष्मावति विभो सूतपुत्रं च संयुगे । विचरिष्ये रणमुखे प्रियार्थं तव कौरव ॥

droṇabhīṣmāvati vibho sūtaputraṃ ca saṃyuge | vicariṣye raṇamukhe priyārthaṃ tava kaurava

हे विभो, मैं युद्ध में द्रोण, भीष्म और सूतपुत्र से भी बढ़कर रहूँगा; हे कौरव, तुम्हारे प्रिय के लिए मैं रणमुख में विचरूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (9.6.14)

एवमुक्तस्ततो राजा मद्राधिपतिमञ्जसा । अभ्यषिञ्चत सेनाया मध्ये भरतसत्तम । विधिना शास्त्रदृष्टेन क्लिष्टरूपो विशाम्पते ॥

evamuktastato rājā madrādhipatimañjasā | abhyaṣiñcata senāyā madhye bharatasattama | vidhinā śāstradṛṣṭena kliṣṭarūpo viśāmpate

यह सुनकर राजा ने तत्काल सेना के बीच मद्रराज का शास्त्रोक्त विधि से सेनापति-पद पर अभिषेक किया, हे भरतश्रेष्ठ; हे प्रजापालक, उस समय उसका मुख उदास था।

श्लोक 15 (9.6.15)

अभिषिक्ते ततस्तस्मिन्सिंहनादो महानभूत् । तव सैन्येऽभ्यवाद्यन्त वादित्राणि च भारत ॥

abhiṣikte tatastasminsiṃhanādo mahānabhūt | tava sainye'bhyavādyanta vāditrāṇi ca bhārata

उसके अभिषिक्त होने पर बड़ा सिंहनाद हुआ और तुम्हारी सेना में, हे भारत, बाजे बजने लगे।

श्लोक 16 (9.6.16)

हृष्टाश्चासंस्तथा योधा मद्रकाश्च महारथाः । तुष्टुवुश्चैव राजानं शल्यमाहवशोभिनम् ॥

hṛṣṭāścāsaṃstathā yodhā madrakāśca mahārathāḥ | tuṣṭuvuścaiva rājānaṃ śalyamāhavaśobhinam

योद्धा हर्षित हुए और मद्रदेश के महारथी भी; वे रण में शोभा पाने वाले राजा शल्य की स्तुति करने लगे।

योधा ऊचुः

श्लोक 17 (9.6.17)

जय राजंश्चिरं जीव जहि शत्रून्समागतान् । तव बाहुबलं प्राप्य धार्तराष्ट्रो महाबलः । निखिलां पृथिवीं सर्वां प्रशास्तु निहतद्विषम् ॥

jaya rājaṃściraṃ jīva jahi śatrūnsamāgatān | tava bāhubalaṃ prāpya dhārtarāṣṭro mahābalaḥ | nikhilāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ praśāstu nihatadviṣam

"राजन्, आपकी जय हो! चिरंजीवी हों! एकत्र हुए शत्रुओं को मारिए! आपकी भुजाओं का बल पाकर महाबली धृतराष्ट्र-पुत्र शत्रुओं को नष्ट करके सारी पृथ्वी पर शासन करें।

श्लोक 18 (9.6.18)

त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानवान् । मर्त्यधर्माण इह तु किमु सृञ्जयसोमकान् ॥

tvaṃ hi śakto raṇe jetuṃ sasurāsuramānavān | martyadharmāṇa iha tu kimu sṛñjayasomakān

आप तो युद्ध में देवताओं, असुरों और मनुष्यों को भी जीतने में समर्थ हैं; फिर मर्त्यधर्मी सृञ्जयों और सोमकों की क्या गिनती!"

सञ्जय उवाच

श्लोक 19 (9.6.19)

एवं सम्पूज्यमानस्तु मद्राणामधिपो बली । हर्षं प्राप तदा वीरो दुरापमकृतात्मभिः ॥

evaṃ sampūjyamānastu madrāṇāmadhipo balī | harṣaṃ prāpa tadā vīro durāpamakṛtātmabhiḥ

इस प्रकार सम्मानित होकर बलवान् मद्रराज वीर शल्य को वह हर्ष प्राप्त हुआ जो अपरिपक्व आत्मा वालों को दुर्लभ है।

श्लोक 20 (9.6.20)

अभिषिक्ते तथा शल्ये तव सैन्येषु मानद । न कर्णव्यसनं किञ्चिन्मेनिरे तत्र भारत ॥

abhiṣikte tathā śalye tava sainyeṣu mānada | na karṇavyasanaṃ kiñcinmenire tatra bhārata

हे मानद, शल्य का अभिषेक हो जाने पर तुम्हारी सेनाओं ने कर्ण की मृत्यु को किसी प्रकार की हानि नहीं समझा, हे भारत।

श्लोक 21 (9.6.21)

हृष्टाः सुमनसश्चैव बभूवुस्तत्र सैनिकाः । मेनिरे निहतान्पार्थान्मद्रराजवशङ्गतान् ॥

hṛṣṭāḥ sumanasaścaiva babhūvustatra sainikāḥ | menire nihatānpārthānmadrarājavaśaṅgatān

वहाँ सैनिक हर्षित और प्रसन्नचित्त हो गए; वे मानने लगे कि पार्थ अब मद्रराज के वश में आकर मारे जा चुके हैं।

श्लोक 22 (9.6.22)

प्रहर्षं प्राप्य सेना तु तावकी भरतर्षभ । तां रात्रिं सुखिता सुप्ता हर्षचित्ता च साभवत् ॥

praharṣaṃ prāpya senā tu tāvakī bharatarṣabha | tāṃ rātriṃ sukhitā suptā harṣacittā ca sābhavat

हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारी सेना हर्ष से भरकर उस रात प्रसन्नचित्त होकर सुख से सोई।

श्लोक 23 (9.6.23)

सैन्यस्य तव तं शब्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । वार्ष्णेयमब्रवीद्वाक्यं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥

sainyasya tava taṃ śabdaṃ śrutvā rājā yudhiṣṭhiraḥ | vārṣṇeyamabravīdvākyaṃ sarvakṣatrasya paśyataḥ

तुम्हारी सेना का वह कोलाहल सुनकर राजा युधिष्ठिर ने सब क्षत्रियों के देखते हुए वार्ष्णेय से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (9.6.24)

मद्रराजः कृतः शल्यो धार्तराष्ट्रेण माघव । सेनापतिर्महेष्वासः सर्वसैन्येषु पूजितः ॥

madrarājaḥ kṛtaḥ śalyo dhārtarāṣṭreṇa māghava | senāpatirmaheṣvāsaḥ sarvasainyeṣu pūjitaḥ

"हे माधव, धृतराष्ट्र के पुत्र ने मद्रराज शल्य को सेनापति बनाया है; वह महाधनुर्धर सब सेनाओं में सम्मानित है।

श्लोक 25 (9.6.25)

एतज्ज्ञात्वा यथाभूतं कुरु माधव यत्क्षमम् । भवान्नेता च गोप्ता च विधत्स्व यदनन्तरम् ॥

etajjñātvā yathābhūtaṃ kuru mādhava yatkṣamam | bhavānnetā ca goptā ca vidhatsva yadanantaram

हे माधव, यह यथार्थ जानकर जो उचित हो वह कीजिए। आप हमारे नेता और रक्षक हैं; आगे जो करना है उसका विधान कीजिए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (9.6.26)

तमब्रवीन्महाराज वासुदेवो जनाधिपम् । आर्तायनिमहं जाने यथातत्त्वेन भारत ॥

tamabravīnmahārāja vāsudevo janādhipam | ārtāyanimahaṃ jāne yathātattvena bhārata

हे महाराज, वासुदेव ने उस नरेश से कहा — "हे भारत, मैं आर्तायनि को यथार्थ रूप से जानता हूँ।

वासुदेव उवाच

श्लोक 27 (9.6.27)

वीर्यवांश्च महातेजा महात्मा च विशेषतः । कृती च चित्रयोधी च संयुक्तो लाघवेन च ॥

vīryavāṃśca mahātejā mahātmā ca viśeṣataḥ | kṛtī ca citrayodhī ca saṃyukto lāghavena ca

वह पराक्रमी और महातेजस्वी है, और विशेषकर महात्मा है; कुशल है, विचित्र ढंग से युद्ध करने वाला है और हस्तलाघव से युक्त है।

श्लोक 28 (9.6.28)

यादृग्भीष्मस्तथा द्रोणो यादृक्कर्णश्च संयुगे । तादृशस्तद्विशिष्टो वा मद्रराजो मतो मम ॥

yādṛgbhīṣmastathā droṇo yādṛkkarṇaśca saṃyuge | tādṛśastadviśiṣṭo vā madrarājo mato mama

युद्ध में मैं मद्रराज को वैसा ही मानता हूँ जैसे भीष्म थे, जैसे द्रोण और जैसे कर्ण थे — या उनसे भी बढ़कर।

श्लोक 29 (9.6.29)

युध्यमानस्य तस्याहं चिन्तयानश्च भारत । योद्धारं नाधिगच्छामि तुल्यरूपं जनाधिप ॥

yudhyamānasya tasyāhaṃ cintayānaśca bhārata | yoddhāraṃ nādhigacchāmi tulyarūpaṃ janādhipa

हे भारत, उसे युद्ध करते हुए सोचने पर मुझे उसके समान कोई योद्धा नहीं दिखाई देता, हे राजन्।

श्लोक 30 (9.6.30)

शिखण्ड्यर्जुनभीमानां सात्वतस्य च भारत । धृष्टद्युम्नस्य च तथा बलेनाभ्यधिको रणे ॥

śikhaṇḍyarjunabhīmānāṃ sātvatasya ca bhārata | dhṛṣṭadyumnasya ca tathā balenābhyadhiko raṇe

हे भारत, युद्ध में वह बल में शिखण्डी, अर्जुन, भीम, सात्वत (सात्यकि) और धृष्टद्युम्न से भी बढ़कर है।

श्लोक 31 (9.6.31)

मद्रराजो महाराजः सिंहद्विरदविक्रमः । विचरिष्यत्यभीः काले कालः क्रुद्धः प्रजास्विव ॥

madrarājo mahārājaḥ siṃhadviradavikramaḥ | vicariṣyatyabhīḥ kāle kālaḥ kruddhaḥ prajāsviva

सिंह और हाथी के समान विक्रम वाला महाराज मद्रराज निर्भय होकर रण में विचरेगा, जैसे क्रुद्ध काल प्राणियों के बीच विचरता है।

श्लोक 32 (9.6.32)

तस्याद्य न प्रपश्यामि प्रतियोद्धारमाहने । त्वामृते पुरुषव्याघ्र शार्दूलसमविक्रमम् ॥

tasyādya na prapaśyāmi pratiyoddhāramāhane | tvāmṛte puruṣavyāghra śārdūlasamavikramam

हे पुरुषव्याघ्र, शार्दूल के समान पराक्रम वाले आपके सिवा आज रण में मुझे उसका सामना करने वाला कोई नहीं दिखाई देता।

श्लोक 33 (9.6.33)

स त्वमेको हि लोकेऽस्मिन्नान्यस्त्वत्तः पुमान्भवेत् । मद्रराजं रणे क्रुद्धं यो हन्यात्कुरुनन्दन ॥

sa tvameko hi loke'sminnānyastvattaḥ pumānbhavet | madrarājaṃ raṇe kruddhaṃ yo hanyātkurunandana

आप ही इस लोक में अकेले ऐसे हैं; आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं जो युद्ध में क्रुद्ध मद्रराज को मार सके, हे कुरुनन्दन।

श्लोक 34 (9.6.34)

अहन्यहनि युध्यन्तं क्षोभयन्तं बलं तव । तस्माज्जहि रणे शल्यं मघवानिव शम्बरम् ॥

ahanyahani yudhyantaṃ kṣobhayantaṃ balaṃ tava | tasmājjahi raṇe śalyaṃ maghavāniva śambaram

वह प्रतिदिन युद्ध करते हुए आपकी सेना को विचलित करता रहता है। इसलिए रण में शल्य को मार डालिए, जैसे इन्द्र ने शम्बर को मारा था।

श्लोक 35 (9.6.35)

सौतेः पश्चादसौ वीरो धार्तराष्ट्रेण सत्कृतः । तवैव हि जयो नूनं हते मद्रेश्वरे युधि ॥

sauteḥ paścādasau vīro dhārtarāṣṭreṇa satkṛtaḥ | tavaiva hi jayo nūnaṃ hate madreśvare yudhi

सूतपुत्र के बाद वह वीर धृतराष्ट्र के पुत्र से सम्मानित हुआ है। मद्रराज के युद्ध में मारे जाने पर निश्चय ही जय आपकी ही होगी।

श्लोक 36 (9.6.36)

तस्मिन्हते हतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् । एतच्छ्रुत्वा महाराज वचनं मम साम्प्रतम् ॥

tasminhate hataṃ sarvaṃ dhārtarāṣṭrabalaṃ mahat | etacchrutvā mahārāja vacanaṃ mama sāmpratam

उसके मारे जाने पर धृतराष्ट्र-पुत्रों की सारी विशाल सेना मारी जाएगी। मेरे ये वचन अभी सुनकर,

श्लोक 37 (9.6.37)

प्रत्युद्याहि रणे पार्थ मद्रराजं महारथम् । जहि चैनं महाबाहो वासवो नमुचिं यथा ॥

pratyudyāhi raṇe pārtha madrarājaṃ mahāratham | jahi cainaṃ mahābāho vāsavo namuciṃ yathā

हे पार्थ, युद्ध में महारथी मद्रराज का सामना कीजिए, और हे महाबाहु, उसे मार डालिए जैसे इन्द्र ने नमुचि को मारा था।

श्लोक 38 (9.6.38)

न चैवात्र दया कार्या मातुलोऽयं ममेति वै । क्षत्रवर्त्म पुरस्कृत्य जहि मद्रजनेश्वरम् ॥

na caivātra dayā kāryā mātulo'yaṃ mameti vai | kṣatravartma puraskṛtya jahi madrajaneśvaram

और यहाँ यह सोचकर दया मत कीजिए कि 'ये मेरे मामा हैं।' क्षत्रिय के मार्ग को सामने रखकर मद्रराज को मार डालिए।

श्लोक 39 (9.6.39)

द्रोणभीष्मार्णवं तीर्त्वा कर्णपातालसम्भवम् । मा निमज्जस्व सगणः शल्यमासाद्य गोष्पदम् ॥

droṇabhīṣmārṇavaṃ tīrtvā karṇapātālasambhavam | mā nimajjasva sagaṇaḥ śalyamāsādya goṣpadam

कर्ण-रूपी पाताल वाले द्रोण और भीष्म के सागर को पार करके अब शल्य-रूपी गोखुर में अपने गणों सहित डूब मत जाइए।

श्लोक 40 (9.6.40)

यच्च ते तपसो वीर्यं यच्च क्षात्रं बलं तव । तद्दर्शय रणे सर्वं जहि चैनं महारथम् ॥

yacca te tapaso vīryaṃ yacca kṣātraṃ balaṃ tava | taddarśaya raṇe sarvaṃ jahi cainaṃ mahāratham

आपके तप का जो सामर्थ्य है और आपका जो क्षात्र बल है, वह सब अब रण में दिखाइए और इस महारथी को मार डालिए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 41 (9.6.41)

एतावदुक्त्वा वचनं केशवः परवीरहा । जगाम शिबिरं सायं पूज्यमानोऽथ पाण्डवैः ॥

etāvaduktvā vacanaṃ keśavaḥ paravīrahā | jagāma śibiraṃ sāyaṃ pūjyamāno'tha pāṇḍavaiḥ

इतना कहकर शत्रुवीरों के संहारक केशव पाण्डवों से सम्मानित होकर सायंकाल अपने शिविर को चले गए।

श्लोक 42 (9.6.42)

केशवे तु तदा याते धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । विसृज्य सर्वान्भ्रातॄंश्च पाञ्चालानथ सोमकान् । सुष्वाप रजनीं तां तु विशल्य इव कुञ्जरः ॥

keśave tu tadā yāte dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | visṛjya sarvānbhrātṝṃśca pāñcālānatha somakān | suṣvāpa rajanīṃ tāṃ tu viśalya iva kuñjaraḥ

केशव के चले जाने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने सब भाइयों, पाञ्चालों और सोमकों को विदा किया और बाण निकल जाने पर हाथी की भाँति उस रात सुख से सोए।

श्लोक 43 (9.6.43)

ते च सर्वे महेष्वासाः पाञ्चालाः पाण्डवास्तथा । कर्णस्य निधने हृष्टाः सुषुपुस्तां निशां तदा ॥

te ca sarve maheṣvāsāḥ pāñcālāḥ pāṇḍavāstathā | karṇasya nidhane hṛṣṭāḥ suṣupustāṃ niśāṃ tadā

और वे सब महाधनुर्धर पाञ्चाल तथा पाण्डव कर्ण के वध से हर्षित होकर उस रात सोए।

श्लोक 44 (9.6.44)

गतज्वरं महेष्वासं तीर्णपारं महारथम् । बभूव पाण्डवेयानां सैन्यं च मुदितं निशि । सूतपुत्रस्य निधनाज्जयं लब्ध्वा च मारिष ॥

gatajvaraṃ maheṣvāsaṃ tīrṇapāraṃ mahāratham | babhūva pāṇḍaveyānāṃ sainyaṃ ca muditaṃ niśi | sūtaputrasya nidhanājjayaṃ labdhvā ca māriṣa

पाण्डवों की सेना का ज्वर उतर गया था; वह महाधनुर्धरों और महारथियों से भरी थी और मानो पार पहुँच गई थी। सूतपुत्र के वध से विजय पाकर वह उस रात प्रसन्न हुई, हे माननीय।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7