शान्ति पर्व · अध्याय 1
नारद का युधिष्ठिर से मिलना: कर्ण के जन्म का रहस्य
मृतकों को जलांजलि देने के बाद पाण्डव, धृतराष्ट्र और विदुर एक मास तक नगर के बाहर ठहरते हैं, और गंगा-तट पर व्यास, नारद, देवल आदि ऋषि युधिष्ठिर के पास आते हैं। नारद पूछते हैं कि क्या वे अपनी विजय से प्रसन्न हैं। युधिष्ठिर कहते हैं कि मारे गए बन्धुओं का शोक उन्हें दबाए है, और सबसे अधिक यह कि उन्होंने कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र कर्ण को भाई के रूप में पहचाने बिना मार डाला। वे बताते हैं कि कुन्ती कर्ण के पास कैसे गई और कर्ण ने उसे कैसे मना किया, और नारद से पूछते हैं कि कर्ण को शाप कैसे मिला तथा पृथ्वी ने उसके रथ का पहिया क्यों निगल लिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.1.1)
कृत्वोदकं ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः । विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥
kṛtvodakaṃ te suhṛdāṃ sarveṣāṃ pāṇḍunandanāḥ | viduro dhṛtarāṣṭraśca sarvāśca bharatastriyaḥ
सब सुहृदों के लिए जलांजलि देकर पाण्डव, विदुर, धृतराष्ट्र और भरतवंश की सब स्त्रियों के साथ—
श्लोक 2 (12.1.2)
तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन्कुरुनन्दनाः । शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिः पुरात् ॥
tatra te sumahātmāno nyavasankurunandanāḥ | śaucaṃ nirvartayiṣyanto māsamātraṃ bahiḥ purāt
वे महात्मा कुरुवंशी शुद्धि के दिन पूरे करने के लिए नगर के बाहर एक मास तक वहीं ठहरे रहे।
श्लोक 3 (12.1.3)
कृतोदकं तु राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । अभिजग्मुर्महात्मानः सिद्धा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥
kṛtodakaṃ tu rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | abhijagmurmahātmānaḥ siddhā brahmarṣisattamāḥ
तब जलांजलि दे चुके धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर के पास महात्मा सिद्ध और श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि आए।
श्लोक 4 (12.1.4)
द्वैपायनो नारदश्च देवलश्च महानृषिः । देवस्थानश्च कण्वश्च तेषां शिष्याश्च सत्तमाः ॥
dvaipāyano nāradaśca devalaśca mahānṛṣiḥ | devasthānaśca kaṇvaśca teṣāṃ śiṣyāśca sattamāḥ
द्वैपायन व्यास, नारद, महर्षि देवल, देवस्थान और कण्व, तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य—
श्लोक 5 (12.1.5)
अन्ये च वेदविद्वांसः कृतप्रज्ञा द्विजातयः । गृहस्थाः स्नातकाः सन्तो ददृशुः कुरुसत्तमम् ॥
anye ca vedavidvāṃsaḥ kṛtaprajñā dvijātayaḥ | gṛhasthāḥ snātakāḥ santo dadṛśuḥ kurusattamam
और वेदों के जानकार, प्रज्ञावान अन्य द्विज—गृहस्थ तथा स्नातक सज्जन—कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर से मिलने आए।
श्लोक 6 (12.1.6)
तेऽभिगम्य महात्मानं पूजिताश्च यथाविधि । आसनेषु महार्हेषु विविशुः परमर्षयः ॥
te'bhigamya mahātmānaṃ pūjitāśca yathāvidhi | āsaneṣu mahārheṣu viviśuḥ paramarṣayaḥ
उन महात्मा के पास पहुँचकर और विधिपूर्वक सम्मानित होकर वे परमर्षि बहुमूल्य आसनों पर बैठ गए।
श्लोक 7 (12.1.7)
प्रतिगृह्य ततः पूजां तत्कालसदृशीं तदा । पर्युपासन्यथान्यायं परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥
pratigṛhya tataḥ pūjāṃ tatkālasadṛśīṃ tadā | paryupāsanyathānyāyaṃ parivārya yudhiṣṭhiram
उस समय के योग्य सत्कार को स्वीकार करके वे युधिष्ठिर को चारों ओर से घेरकर यथोचित रीति से उनकी सेवा में बैठे।
श्लोक 8 (12.1.8)
पुण्ये भागीरथीतीरे शोकव्याकुलचेतसम् । आश्वासयन्तो राजेन्द्रं विप्राः शतसहस्रशः ॥
puṇye bhāgīrathītīre śokavyākulacetasam | āśvāsayanto rājendraṃ viprāḥ śatasahasraśaḥ
भागीरथी के पावन तट पर शोक से व्याकुल चित्त वाले राजेन्द्र को लाखों ब्राह्मण सान्त्वना दे रहे थे।
श्लोक 9 (12.1.9)
नारदस्त्वब्रवीत्काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । संभाष्य मुनिभिः सार्धं कृष्णद्वैपायनादिभिः ॥
nāradastvabravītkāle dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | saṃbhāṣya munibhiḥ sārdhaṃ kṛṣṇadvaipāyanādibhiḥ
तब उचित समय पर कृष्णद्वैपायन आदि मुनियों से परामर्श करके नारद ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहा।
नारद उवाच
श्लोक 10 (12.1.10)
पार्थस्य बाहुवीर्येण प्रसादान्माधवस्य च । जिता सेयं मही कृत्स्ना धर्मेण च युधिष्ठिर ॥
pārthasya bāhuvīryeṇa prasādānmādhavasya ca | jitā seyaṃ mahī kṛtsnā dharmeṇa ca yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! अर्जुन की भुजाओं के पराक्रम से, माधव की कृपा से और धर्म से भी यह सारी पृथ्वी जीती गई है।
श्लोक 11 (12.1.11)
दिष्ट्या मुक्ताः स्थ संग्रामादस्माल्लोकभयंकरात् । क्षत्रधर्मरतश्चासि कच्चिन्मोदसि पाण्डव ॥
diṣṭyā muktāḥ stha saṃgrāmādasmāllokabhayaṃkarāt | kṣatradharmarataścāsi kaccinmodasi pāṇḍava
सौभाग्य से तुम लोकों को भयभीत कर देने वाले उस संग्राम से बच निकले हो। हे पाण्डव! तुम क्षत्रिय-धर्म में निरत हो; क्या तुम प्रसन्न हो?
श्लोक 12 (12.1.12)
कच्चिच्च निहतामित्रः प्रीणासि सुहृदो नृप । कच्चिच्छ्रियमिमां प्राप्य न त्वां शोकः प्रबाधते ॥
kaccicca nihatāmitraḥ prīṇāsi suhṛdo nṛpa | kaccicchriyamimāṃ prāpya na tvāṃ śokaḥ prabādhate
हे राजन्! शत्रुओं के मारे जाने पर क्या तुम अपने सुहृदों को आनन्दित कर रहे हो? और इस राजलक्ष्मी को पाकर क्या शोक तुम्हें पीड़ा तो नहीं दे रहा?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (12.1.13)
विजितेयं मही कृत्स्ना कृष्णबाहुबलाश्रयात् । ब्राह्मणानां प्रसादेन भीमार्जुनबलेन च ॥
vijiteyaṃ mahī kṛtsnā kṛṣṇabāhubalāśrayāt | brāhmaṇānāṃ prasādena bhīmārjunabalena ca
यह सारी पृथ्वी कृष्ण की भुजाओं के बल के आश्रय से, ब्राह्मणों की कृपा से तथा भीम और अर्जुन के बल से जीती गई है।
श्लोक 14 (12.1.14)
इदं तु मे महद्दुःखं वर्तते हृदि नित्यदा । कृत्वा ज्ञातिक्षयमिमं महान्तं घोरदर्शनम् ॥
idaṃ tu me mahadduḥkhaṃ vartate hṛdi nityadā | kṛtvā jñātikṣayamimaṃ mahāntaṃ ghoradarśanam
परन्तु मेरे हृदय में सदा यह बड़ा दुःख बना रहता है कि मैंने अपने ही बन्धुओं का यह भारी और भयंकर संहार करवाया।
श्लोक 15 (12.1.15)
सौभद्रं द्रौपदेयांश्च घातयित्वा सुतान्प्रियान् । जयोऽयमजयाकारो भगवन्प्रतिभाति मे ॥
saubhadraṃ draupadeyāṃśca ghātayitvā sutānpriyān | jayo'yamajayākāro bhagavanpratibhāti me
भगवन्! सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के प्रिय पुत्रों को मरवाकर यह विजय मुझे पराजय का ही रूप जान पड़ती है।
श्लोक 16 (12.1.16)
किंनु वक्ष्यति वार्ष्णेयी वधूर्मे मधुसूदनम् । द्वारकावासिनी कृष्णमितः प्रतिगतं हरिम् ॥
kiṃnu vakṣyati vārṣṇeyī vadhūrme madhusūdanam | dvārakāvāsinī kṛṣṇamitaḥ pratigataṃ harim
द्वारका में रहने वाली वृष्णिवंश की वह स्त्री, मेरे भाई की पत्नी, यहाँ से लौटे हुए मधुसूदन कृष्ण हरि से क्या कहेगी?
श्लोक 17 (12.1.17)
द्रौपदी हतपुत्रेयं कृपणा हतबान्धवा । अस्मत्प्रियहिते युक्ता भूयः पीडयतीव माम् ॥
draupadī hataputreyaṃ kṛpaṇā hatabāndhavā | asmatpriyahite yuktā bhūyaḥ pīḍayatīva mām
और यह द्रौपदी, जिसके पुत्र और बान्धव मारे गए हैं, दीन होकर भी हमारे प्रिय और हित में लगी रहती है; वह मुझे मानो और अधिक पीड़ा देती है।
श्लोक 18 (12.1.18)
इदमन्यच्च भगवन्यत्त्वां वक्ष्यामि नारद । मन्त्रसंवरणेनास्मि कुन्त्या दुःखेन योजितः ॥
idamanyacca bhagavanyattvāṃ vakṣyāmi nārada | mantrasaṃvaraṇenāsmi kuntyā duḥkhena yojitaḥ
भगवन् नारद! एक और बात भी मैं आपसे कहूँगा—कुन्ती के रहस्य को छिपाए रखने के कारण मुझे दुःख में डाल दिया गया।
श्लोक 19 (12.1.19)
यः स नागायुतप्राणो लोकेऽप्रतिरथो रणे । सिंहविक्रान्तगामी च जितकाशी यतव्रतः ॥
yaḥ sa nāgāyutaprāṇo loke'pratiratho raṇe | siṃhavikrāntagāmī ca jitakāśī yatavrataḥ
वह, जिसमें दस हज़ार हाथियों का बल था, जो संसार में युद्ध में अप्रतिम रथी था, सिंह जैसी चाल चलता था, तेज से विजयी और दृढ़व्रत था,
श्लोक 20 (12.1.20)
आश्रयो धार्तराष्ट्राणां मानी तीक्ष्णपराक्रमः । अमर्षी नित्यसंरम्भी क्षेप्ताऽस्माकं रणेरणे ॥
āśrayo dhārtarāṣṭrāṇāṃ mānī tīkṣṇaparākramaḥ | amarṣī nityasaṃrambhī kṣeptā'smākaṃ raṇeraṇe
जो धृतराष्ट्र के पुत्रों का आश्रय, मानी, तीक्ष्ण पराक्रम वाला, असहिष्णु, सदा क्रोध में उबलने वाला और युद्ध-युद्ध में हमारा तिरस्कार करने वाला था,
श्लोक 21 (12.1.21)
शीघ्रास्त्रश्चित्रयोधी च कृती चाद्भुतविक्रमः । गूढोत्पन्नः सुतः कुन्त्या भ्राताऽस्माकमसौ किल ॥
śīghrāstraścitrayodhī ca kṛtī cādbhutavikramaḥ | gūḍhotpannaḥ sutaḥ kuntyā bhrātā'smākamasau kila
शीघ्र अस्त्र चलाने वाला, विचित्र युद्ध करने वाला, कुशल और अद्भुत पराक्रमी—वह, कहते हैं, कुन्ती का गुप्त रूप से उत्पन्न पुत्र और हमारा भाई था।
श्लोक 22 (12.1.22)
तोयकर्मणि तं कुन्ती कथयामास मे तदा । पुत्रं सर्वगुणोपेतं कर्णं त्यक्तं जले पुरा ॥
toyakarmaṇi taṃ kuntī kathayāmāsa me tadā | putraṃ sarvaguṇopetaṃ karṇaṃ tyaktaṃ jale purā
जलदान के समय कुन्ती ने तब मुझे उसके विषय में बताया: सब गुणों से युक्त वह पुत्र कर्ण था, जिसे उसने बहुत पहले जल में त्याग दिया था।
श्लोक 23 (12.1.23)
मञ्जूषायां समाधाय गङ्गास्रोतस्यमज्जयत् । यं सूतपुत्रं लोकोऽयं राधेयं चाभ्यमन्यत ॥
mañjūṣāyāṃ samādhāya gaṅgāsrotasyamajjayat | yaṃ sūtaputraṃ loko'yaṃ rādheyaṃ cābhyamanyata
उसे पिटारी में रखकर उसने गंगा की धारा में छोड़ दिया—जिसे यह संसार सूतपुत्र और राधेय मानता रहा।
श्लोक 24 (12.1.24)
स सूर्यपुत्रः कुन्त्या वै भ्राताऽस्माकं च मातृतः । अजानता मया सङ्ख्ये राज्यलुब्धेन घातितः । तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ॥
sa sūryaputraḥ kuntyā vai bhrātā'smākaṃ ca mātṛtaḥ | ajānatā mayā saṅkhye rājyalubdhena ghātitaḥ | tanme dahati gātrāṇi tūlarāśimivānalaḥ
वह सूर्यपुत्र कुन्ती का ही पुत्र था और माता की ओर से हमारा भाई था। उसे मैंने अनजाने में, राज्य के लोभ से, युद्ध में मरवा दिया। वही मेरे अंगों को वैसे जला रहा है जैसे आग रुई के ढेर को।
श्लोक 25 (12.1.25)
न हि तं वेद पार्थोऽपि भ्रातरं श्वेतवाहनः । नाहं न भीमो न यमौ स त्वस्मान्वेद तत्त्वतः ॥
na hi taṃ veda pārtho'pi bhrātaraṃ śvetavāhanaḥ | nāhaṃ na bhīmo na yamau sa tvasmānveda tattvataḥ
श्वेत घोड़ों वाला अर्जुन भी उसे अपना भाई नहीं जानता था; न मैं, न भीम, न नकुल-सहदेव। परन्तु वह हमें सचमुच जानता था।
श्लोक 26 (12.1.26)
गता किल पृथा तस्य सकाशमिति नः श्रुतम् । अस्माकं शमकामा वै त्वं च पुत्रो ममेत्यथ ॥
gatā kila pṛthā tasya sakāśamiti naḥ śrutam | asmākaṃ śamakāmā vai tvaṃ ca putro mametyatha
हमने सुना है कि पृथा हमारे लिए शान्ति चाहती हुई उसके पास गई थी और उससे कहा था, 'तू भी मेरा पुत्र है।'
श्लोक 27 (12.1.27)
पृथाया न कृतः कामस्तेन चापि महात्मना । अतीवानुचितं मातरवोच इति सोऽब्रवीत् ॥
pṛthāyā na kṛtaḥ kāmastena cāpi mahātmanā | atīvānucitaṃ mātaravoca iti so'bravīt
परन्तु उस महात्मा ने भी पृथा की इच्छा पूरी नहीं की। उसने कहा, 'माता! आपने अत्यन्त अनुचित बात कही है।'
कर्ण उवाच
श्लोक 28 (12.1.28)
न हि शक्ष्यामि संत्यक्तुमहं दुर्योधनं रणे । अनार्यत्वं नृशंसत्वं कृतघ्नत्वं च मे भवेत् ॥
na hi śakṣyāmi saṃtyaktumahaṃ duryodhanaṃ raṇe | anāryatvaṃ nṛśaṃsatvaṃ kṛtaghnatvaṃ ca me bhavet
मैं युद्ध में दुर्योधन को नहीं छोड़ सकता; ऐसा करने से मैं अनार्य, निर्दय और कृतघ्न ठहरूँगा।
श्लोक 29 (12.1.29)
युधिष्ठिरेण सन्धिं हि यदि कुर्यां मते तव । भीतो रणे श्वेतवाहादिति मां मंस्यते जनः ॥
yudhiṣṭhireṇa sandhiṃ hi yadi kuryāṃ mate tava | bhīto raṇe śvetavāhāditi māṃ maṃsyate janaḥ
यदि आपके कहने से मैं युधिष्ठिर से सन्धि कर लूँ, तो लोग समझेंगे कि मैं युद्ध में श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन से डर गया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 30 (12.1.30)
सोऽहं निर्जित्य समरे विजयं सहकेशवम् । संधास्ये धर्मपुत्रेण पश्चादिति च सोऽब्रवीत् ॥
so'haṃ nirjitya samare vijayaṃ sahakeśavam | saṃdhāsye dharmaputreṇa paścāditi ca so'bravīt
'पहले रण में केशव सहित विजय को जीतकर ही मैं बाद में धर्मपुत्र से सन्धि करूँगा'—ऐसा उसने कहा।
श्लोक 31 (12.1.31)
तमवोचत्किल पृथा पुनः पृथुलवक्षसम् । चतुर्णामभयं देहि कामं युध्यस्व फल्गुनम् ॥
tamavocatkila pṛthā punaḥ pṛthulavakṣasam | caturṇāmabhayaṃ dehi kāmaṃ yudhyasva phalgunam
तब पृथा ने उस विशाल वक्ष वाले से फिर कहा, 'चार को अभय दे दो; चाहो तो अर्जुन से युद्ध करो।'
श्लोक 32 (12.1.32)
सोऽब्रवीन्मातरं धीमान्वेपमानां कृताञ्जलिः । प्राप्तान्विषह्यांश्चतुरो न हनिष्यामि ते सुतान् ॥
so'bravīnmātaraṃ dhīmānvepamānāṃ kṛtāñjaliḥ | prāptānviṣahyāṃścaturo na haniṣyāmi te sutān
बुद्धिमान कर्ण ने काँपती हुई माता को हाथ जोड़कर उत्तर दिया, 'मेरे वश में आए हुए आपके चार पुत्रों को मैं नहीं मारूँगा।'
कर्ण उवाच
श्लोक 33 (12.1.33)
पञ्चैव हि सुता देवि भविष्यन्ति तव ध्रुवाः । सार्जुना वा हते कर्णे सकर्णा वा हतेऽर्जुने ॥
pañcaiva hi sutā devi bhaviṣyanti tava dhruvāḥ | sārjunā vā hate karṇe sakarṇā vā hate'rjune
हे देवी! आपके पाँच ही पुत्र निश्चित रहेंगे—या तो कर्ण के मारे जाने पर अर्जुन के साथ, या अर्जुन के मारे जाने पर कर्ण के साथ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 34 (12.1.34)
तं पुत्रगृद्धिनी भूयो माता पुत्रमथाब्रवीत् । भ्रातॄणां स्वस्ति कुर्वीथा येषां स्वस्ति चिकीर्षसि ॥
taṃ putragṛddhinī bhūyo mātā putramathābravīt | bhrātṝṇāṃ svasti kurvīthā yeṣāṃ svasti cikīrṣasi
तब पुत्र के लिए आतुर माता ने अपने पुत्र से फिर कहा, 'जिन भाइयों का कल्याण तुम चाहते हो, उनका कल्याण करना।'
श्लोक 35 (12.1.35)
एवमुक्त्वा किल पृथा विसृज्योपययौ गृहान् । सोऽर्जुनेन हतो वीरो भ्रात्रा भ्राता सहोदरः ॥
evamuktvā kila pṛthā visṛjyopayayau gṛhān | so'rjunena hato vīro bhrātrā bhrātā sahodaraḥ
ऐसा कहकर पृथा, कहते हैं, उसे विदा करके घर लौट गई। और वह वीर, सहोदर भाई, अपने भाई अर्जुन के हाथों मारा गया।
श्लोक 36 (12.1.36)
न चैव निःसृतो मन्त्रः पृथायास्तस्य वा मुने । अथ शूरो महेष्वासः पार्थेनाजौ निपातितः ॥
na caiva niḥsṛto mantraḥ pṛthāyāstasya vā mune | atha śūro maheṣvāsaḥ pārthenājau nipātitaḥ
हे मुने! न पृथा से और न उससे वह रहस्य प्रकट हुआ। फिर वह शूर महाधनुर्धर युद्ध में पार्थ के हाथों गिरा दिया गया।
श्लोक 37 (12.1.37)
अहं त्वज्ञासिषं पश्चात्स्वसोदर्यं द्विजोत्तम । पूर्वजं भ्रातरं कर्णं पृथाया वचनात्प्रभो ॥
ahaṃ tvajñāsiṣaṃ paścātsvasodaryaṃ dvijottama | pūrvajaṃ bhrātaraṃ karṇaṃ pṛthāyā vacanātprabho
हे द्विजश्रेष्ठ! हे प्रभो! मैंने बाद में पृथा के कहने से जाना कि कर्ण मेरा बड़ा सहोदर भाई था।
श्लोक 38 (12.1.38)
तेन मे दूयते तीव्रं हृदयं भ्रातृघातिनः । कर्णार्जुनसहायोऽहं जयेयमपि वासवम् ॥
tena me dūyate tīvraṃ hṛdayaṃ bhrātṛghātinaḥ | karṇārjunasahāyo'haṃ jayeyamapi vāsavam
इसी से भाई के घातक मेरे हृदय में तीव्र पीड़ा होती है। कर्ण और अर्जुन के सहायक होने पर तो मैं इन्द्र को भी जीत सकता था।
श्लोक 39 (12.1.39)
सभायां क्लिश्यमानस्य धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः । सहसोत्पतितः क्रोधः कर्णं दृष्ट्वा प्रशाम्यति ॥
sabhāyāṃ kliśyamānasya dhārtarāṣṭrairdurātmabhiḥ | sahasotpatitaḥ krodhaḥ karṇaṃ dṛṣṭvā praśāmyati
सभा में दुष्ट धृतराष्ट्र-पुत्रों से सताए जाते समय अचानक उठा मेरा क्रोध कर्ण को देखकर शान्त हो जाता था।
श्लोक 40 (12.1.40)
यदा ह्यस्य गिरो रूक्षाः शृणोमि कटुकोदयाः । सभायां गदतो द्यूते दुर्योधनहितैषिणः ॥
yadā hyasya giro rūkṣāḥ śṛṇomi kaṭukodayāḥ | sabhāyāṃ gadato dyūte duryodhanahitaiṣiṇaḥ
क्योंकि जब मैं द्यूत की सभा में दुर्योधन का हित चाहने वाले उस कर्ण की रूखी और कटु परिणाम वाली बातें सुनता था,
श्लोक 41 (12.1.41)
तदा नश्यति मे रोषः पादौ तस्य निरीक्ष्य ह । कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम ॥
tadā naśyati me roṣaḥ pādau tasya nirīkṣya ha | kuntyā hi sadṛśau pādau karṇasyeti matirmama
तब उसके पैरों को देखकर मेरा रोष मिट जाता था। मुझे लगता था कि कर्ण के पैर कुन्ती के पैरों के समान हैं।
श्लोक 42 (12.1.42)
सादृश्यहेतुमन्विच्छन्पृथायास्तस्य चैव ह । कारणं नाधिगच्छामि कथंचिदपि चिन्तयन् ॥
sādṛśyahetumanvicchanpṛthāyāstasya caiva ha | kāraṇaṃ nādhigacchāmi kathaṃcidapi cintayan
पृथा और उसके बीच की इस समानता का कारण खोजते हुए मैं बहुत सोचकर भी कोई कारण नहीं पा सका।
श्लोक 43 (12.1.43)
कथं नु तस्य संग्रामे पृथिवी चक्रमग्रसत् । कथं नु शप्तो भ्राता मे तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ॥
kathaṃ nu tasya saṃgrāme pṛthivī cakramagrasat | kathaṃ nu śapto bhrātā me tattvaṃ vaktumihārhasi
युद्ध में पृथ्वी ने उसके रथ का पहिया कैसे निगल लिया? और मेरा भाई कैसे शापित हुआ? यह सच-सच बताने की कृपा कीजिए।
श्लोक 44 (12.1.44)
श्रोतुमिच्छामि भगवंस्त्वत्तः सर्वं यथातथम् । भवान्हि सर्वविद्विद्वाँल्लोके वेद कृताकृतम् ॥
śrotumicchāmi bhagavaṃstvattaḥ sarvaṃ yathātatham | bhavānhi sarvavidvidvām̐lloke veda kṛtākṛtam
भगवन्! मैं आपसे सब कुछ यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ। आप सर्वज्ञ और विद्वान हैं; लोक में जो किया गया और जो नहीं किया गया, वह सब आप जानते हैं।