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शान्ति पर्व · अध्याय 2

कर्ण की अस्त्र-शिक्षा और ब्राह्मण का शाप

युधिष्ठिर के पूछने पर नारद कर्ण के शाप की कथा आरम्भ करते हैं। क्षत्रियों को स्वर्ग पहुँचाने वाले संघर्ष को जगाने के लिए कन्या से उत्पन्न हुआ कर्ण पाण्डवों से ईर्ष्या में जलता रहा, दुर्योधन का मित्र बना और उसने द्रोण से ब्रह्मास्त्र माँगा। द्रोण ने मना कर दिया, क्योंकि वह केवल ब्राह्मण या तपस्वी क्षत्रिय को सिखाया जा सकता है; तब कर्ण महेन्द्र पर्वत पर राम के पास गया, स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनका शिष्य बना। एक दिन समुद्र के किनारे घूमते हुए उसने अनजाने में एक ब्राह्मण की होमधेनु मार दी, और क्रुद्ध ब्राह्मण ने उसे शाप दिया कि पृथ्वी उसके रथ का पहिया निगल लेगी और शत्रु उसका सिर काट देगा। गाय, धन और रत्न देकर भी वह ब्राह्मण को न मना सका और भयभीत होकर राम के पास लौट आया।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.2.1)

स एवमुक्तस्तु तदा नारदो वदतांवरः । कथयामास तत्सर्वं यथा शप्तः स सूतजः ॥

sa evamuktastu tadā nārado vadatāṃvaraḥ | kathayāmāsa tatsarvaṃ yathā śaptaḥ sa sūtajaḥ

यह सुनकर वक्ताओं में श्रेष्ठ नारद ने वह सब कह सुनाया कि सूतपुत्र को किस प्रकार शाप मिला था।

नारद उवाच

श्लोक 2 (12.2.2)

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । न कर्णार्जुनयोः किंचिदविषह्यं भवेद्रणे ॥

evametanmahābāho yathā vadasi bhārata | na karṇārjunayoḥ kiṃcidaviṣahyaṃ bhavedraṇe

हे महाबाहु भारत! जैसा तुम कहते हो, वह ठीक ही है; युद्ध में कर्ण और अर्जुन के लिए कुछ भी असह्य न होता।

श्लोक 3 (12.2.3)

गुह्यमेतत्तु देवानां कथयिष्यामि ते नृप । तन्निबोध महाबाहो यथावृत्तमिदं पुरा ॥

guhyametattu devānāṃ kathayiṣyāmi te nṛpa | tannibodha mahābāho yathāvṛttamidaṃ purā

हे राजन्! यह देवताओं का रहस्य है, मैं तुम्हें बताऊँगा। हे महाबाहो! यह प्राचीन काल में जैसे हुआ, उसे सुनो।

श्लोक 4 (12.2.4)

क्षत्रं स्वर्गं कथं गच्छेच्छस्त्रपूतमिति प्रभो । संघर्षजननस्तस्मात्कन्यागर्भो विसर्जितः ॥

kṣatraṃ svargaṃ kathaṃ gacchecchastrapūtamiti prabho | saṃgharṣajananastasmātkanyāgarbho visarjitaḥ

हे प्रभो! 'क्षत्रिय शस्त्र से पवित्र होकर स्वर्ग कैसे जाएँ?'—इसी विचार से संघर्ष जगाने वाला वह कन्या-गर्भ से उत्पन्न बालक संसार में भेजा गया।

श्लोक 5 (12.2.5)

स बालस्तेजसा युक्तः सूतपुत्रत्वमागतः । चकाराङ्गिरसां श्रेष्ठे धनुर्वेदं गुरौ तव ॥

sa bālastejasā yuktaḥ sūtaputratvamāgataḥ | cakārāṅgirasāṃ śreṣṭhe dhanurvedaṃ gurau tava

वह तेजस्वी बालक सूतपुत्र बना और उसने तुम्हारे गुरु, अंगिराओं में श्रेष्ठ द्रोण के पास धनुर्वेद का अभ्यास किया।

श्लोक 6 (12.2.6)

स बलं भीमसेनस्य फल्गुनस्यास्त्रलाघवम् । बुद्धिं च तव राजेन्द्र यमयोर्विनयं तथा ॥

sa balaṃ bhīmasenasya phalgunasyāstralāghavam | buddhiṃ ca tava rājendra yamayorvinayaṃ tathā

भीमसेन के बल, अर्जुन की अस्त्र-चपलता, हे राजेन्द्र! तुम्हारी बुद्धि और दोनों जुड़वाँ भाइयों की विनयशीलता को सोचकर,

श्लोक 7 (12.2.7)

सख्यं च वासुदेवेन बाल्ये गाण्डीवधन्वनः । राजानामनुरागं च चिन्तयानो व्यदह्यत ॥

sakhyaṃ ca vāsudevena bālye gāṇḍīvadhanvanaḥ | rājānāmanurāgaṃ ca cintayāno vyadahyata

तथा बचपन से गाण्डीवधारी अर्जुन की वासुदेव के साथ मित्रता और राजाओं के उनके प्रति अनुराग को सोचकर वह भीतर ही भीतर जलता रहता था।

श्लोक 8 (12.2.8)

स सख्यमगमद्बाल्ये राज्ञा दुर्योधनेन च । युष्माभिर्नित्यसंघृष्टो दैवाच्चापि स्वभावतः ॥

sa sakhyamagamadbālye rājñā duryodhanena ca | yuṣmābhirnityasaṃghṛṣṭo daivāccāpi svabhāvataḥ

बचपन में ही वह राजा दुर्योधन का मित्र बन गया; और दैववश तथा स्वभाव से भी वह तुम लोगों से सदा रगड़ खाता रहा।

श्लोक 9 (12.2.9)

विद्याधिकमथालक्ष्य धनुर्वेदे धनञ्जयम् । द्रोणं रहस्युपागम्य कर्णो वचनमब्रवीत् ॥

vidyādhikamathālakṣya dhanurvede dhanañjayam | droṇaṃ rahasyupāgamya karṇo vacanamabravīt

धनुर्वेद में धनंजय को अधिक विद्वान देखकर कर्ण एकान्त में द्रोण के पास जाकर बोला—

कर्ण उवाच

श्लोक 10 (12.2.10)

ब्रह्मास्त्रं वेत्तुमिच्छामि सरहस्यनिवर्तनम् । अर्जुनेन समो युद्धे भवेयमिति मे मतिः ॥

brahmāstraṃ vettumicchāmi sarahasyanivartanam | arjunena samo yuddhe bhaveyamiti me matiḥ

मैं रहस्य और उपसंहार सहित ब्रह्मास्त्र जानना चाहता हूँ; मेरा विचार है कि मैं युद्ध में अर्जुन के समान हो जाऊँ।

श्लोक 11 (12.2.11)

समः पुत्रेषु च स्नेहः शिष्येषु च तव ध्रुवम् । त्वत्प्रसादान्न मा ब्रूयुरकृतास्त्रं विचक्षणाः ॥

samaḥ putreṣu ca snehaḥ śiṣyeṣu ca tava dhruvam | tvatprasādānna mā brūyurakṛtāstraṃ vicakṣaṇāḥ

आपका स्नेह पुत्रों और शिष्यों पर निश्चय ही समान है; आपकी कृपा से विद्वान लोग मुझे अस्त्रविद्या से रहित न कहें।

नारद उवाच

श्लोक 12 (12.2.12)

द्रोणस्तथोक्तः कर्णेन सापेक्षः फल्गुनं प्रति । दौरात्म्यं चैव कर्णस्य विदित्वा तमुवाच ह ॥

droṇastathoktaḥ karṇena sāpekṣaḥ phalgunaṃ prati | daurātmyaṃ caiva karṇasya viditvā tamuvāca ha

कर्ण के ऐसा कहने पर द्रोण, जो अर्जुन के पक्ष में झुके थे और कर्ण की दुष्टता को भी जानते थे, उससे बोले—

द्रोण उवाच

श्लोक 13 (12.2.13)

ब्रह्मास्त्रं ब्राह्मणो विद्याद्यथावच्चरितव्रतः । क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात्कथंचन ॥

brahmāstraṃ brāhmaṇo vidyādyathāvaccaritavrataḥ | kṣatriyo vā tapasvī yo nānyo vidyātkathaṃcana

ब्रह्मास्त्र को विधिपूर्वक व्रत का पालन करने वाला ब्राह्मण जान सकता है, अथवा तपस्वी क्षत्रिय; दूसरा कोई उसे किसी प्रकार नहीं जान सकता।

नारद उवाच

श्लोक 14 (12.2.14)

इत्युक्तोऽङ्गिरसां श्रेष्ठमामन्त्र्य प्रतिपूज्य च । जगाम सहसा राजन्महेन्द्रं पर्वतं प्रति ॥

ityukto'ṅgirasāṃ śreṣṭhamāmantrya pratipūjya ca | jagāma sahasā rājanmahendraṃ parvataṃ prati

ऐसा कहे जाने पर वह अंगिराओं में श्रेष्ठ द्रोण से विदा लेकर और उनका आदर करके, हे राजन्, तुरन्त महेन्द्र पर्वत की ओर चला गया।

श्लोक 15 (12.2.15)

स तु राममुपागम्य शिरसाऽभिप्रणम्य च । ब्राह्मणो भार्गवोऽस्मीति गौरवेणाभ्यवन्दत ॥

sa tu rāmamupāgamya śirasā'bhipraṇamya ca | brāhmaṇo bhārgavo'smīti gauraveṇābhyavandata

वह राम के पास पहुँचा, सिर झुकाकर प्रणाम किया और आदरपूर्वक अभिवादन करके बोला, 'मैं भार्गव ब्राह्मण हूँ।'

श्लोक 16 (12.2.16)

रामस्तं प्रतिजग्राह पृष्ट्वा गोत्रादि सर्वशः । उष्यतां स्वागतं चेति प्रीतिमांश्चाभवद्भृशम् ॥

rāmastaṃ pratijagrāha pṛṣṭvā gotrādi sarvaśaḥ | uṣyatāṃ svāgataṃ ceti prītimāṃścābhavadbhṛśam

राम ने गोत्र आदि सब पूछकर उसे अपनाया और कहा, 'ठहरो, तुम्हारा स्वागत है।' वे बहुत प्रसन्न हुए।

श्लोक 17 (12.2.17)

तत्र कर्णस्य वसतो महेन्द्रे स्वर्गसंमिते । गन्धर्वै राक्षसैर्यक्षैर्देवैश्चासीत्समागमः ॥

tatra karṇasya vasato mahendre svargasaṃmite | gandharvai rākṣasairyakṣairdevaiścāsītsamāgamaḥ

स्वर्ग-समान महेन्द्र पर्वत पर रहते हुए कर्ण का वहाँ गन्धर्वों, राक्षसों, यक्षों और देवताओं से मिलना हुआ।

श्लोक 18 (12.2.18)

स तत्रेष्वस्त्रमकरोद्भृगुश्रेष्ठाद्यथाविधि । प्रियश्चाभवदत्यर्थं देवदानवरक्षसाम् ॥

sa tatreṣvastramakarodbhṛguśreṣṭhādyathāvidhi | priyaścābhavadatyarthaṃ devadānavarakṣasām

वहाँ उसने भृगुश्रेष्ठ से विधिपूर्वक धनुष-बाण और अस्त्रों का अभ्यास किया और देवों, दानवों तथा राक्षसों का अत्यन्त प्रिय हो गया।

श्लोक 19 (12.2.19)

स कदाचित्समुद्रान्ते विचरन्नाश्रमान्तिके । एकः खड्गधनुष्पाणिः परिचक्राम सूतजः ॥

sa kadācitsamudrānte vicarannāśramāntike | ekaḥ khaḍgadhanuṣpāṇiḥ paricakrāma sūtajaḥ

एक बार समुद्र के किनारे एक आश्रम के निकट घूमते हुए सूतपुत्र अकेला हाथ में तलवार और धनुष लिए विचरता रहा।

श्लोक 20 (12.2.20)

सोऽग्निहोत्रप्रसक्तस्य कस्यचिद्ब्रह्मवादिनः । जघानाज्ञानतः पार्थ होमधेनुं यदृच्छया ॥

so'gnihotraprasaktasya kasyacidbrahmavādinaḥ | jaghānājñānataḥ pārtha homadhenuṃ yadṛcchayā

हे पार्थ! वहाँ अग्निहोत्र में लगे किसी ब्रह्मवादी की होमधेनु को उसने संयोग से अनजाने में मार डाला।

श्लोक 21 (12.2.21)

तदज्ञानकृतं मत्वा ब्राह्मणाय न्यवेदयत् । कर्णः प्रसादयंश्चैनमिदमित्यब्रवीद्वचः ॥

tadajñānakṛtaṃ matvā brāhmaṇāya nyavedayat | karṇaḥ prasādayaṃścainamidamityabravīdvacaḥ

उसे अनजाने में किया हुआ जानकर उसने ब्राह्मण को बताया, और कर्ण उसे प्रसन्न करता हुआ यह बोला—

कर्ण उवाच

श्लोक 22 (12.2.22)

अबुद्धिपूर्वं भगवन्धेनुरेषा हता तव । मया तत्र प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनः ॥

abuddhipūrvaṃ bhagavandhenureṣā hatā tava | mayā tatra prasādaṃ me kuruṣveti punaḥ punaḥ

'भगवन्! आपकी यह गाय मुझसे अनजाने में मारी गई। इसलिए मुझ पर कृपा कीजिए'—उसने बार-बार कहा।

नारद उवाच

श्लोक 23 (12.2.23)

तं स विप्रोऽब्रवीत्क्रुद्धो वाचा निर्भर्त्सयन्निव । दुराचार वधार्हस्त्वं फलं प्राप्स्यसि दुर्मते ॥

taṃ sa vipro'bravītkruddho vācā nirbhartsayanniva | durācāra vadhārhastvaṃ phalaṃ prāpsyasi durmate

तब वह ब्राह्मण क्रोधित होकर, मानो वाणी से फटकारता हुआ, उससे बोला, 'दुराचारी! तू वध के योग्य है। दुर्बुद्धि! तू फल पाएगा।'

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 24 (12.2.24)

येन विस्पर्धसे नित्यं यदर्थं घटसेऽनिशम् । युध्यतस्तेन ते पाप भूमिश्चक्रं ग्रसिष्यति ॥

yena vispardhase nityaṃ yadarthaṃ ghaṭase'niśam | yudhyatastena te pāpa bhūmiścakraṃ grasiṣyati

जिससे तू सदा स्पर्धा करता है, जिसके लिए तू निरन्तर प्रयत्न करता है, उसके साथ लड़ते समय, पापी! पृथ्वी तेरे रथ का पहिया निगल लेगी।

श्लोक 25 (12.2.25)

ततश्चक्रे महीग्रस्ते मूर्धानं ते विचेष्टतः । पातयिष्यति विक्रम्य शत्रुर्गच्छ नराधम ॥

tataścakre mahīgraste mūrdhānaṃ te viceṣṭataḥ | pātayiṣyati vikramya śatrurgaccha narādhama

फिर पहिया पृथ्वी में फँस जाने पर जब तू छटपटाएगा, तब तेरा शत्रु पराक्रम से तेरा सिर काट गिराएगा। नराधम! चला जा।

श्लोक 26 (12.2.26)

यथेयं गौर्हता मूढ प्रमत्तस्य त्वया मम । प्रमत्तस्यैव मे वाचा शिरस्ते पातयिष्यति ॥

yatheyaṃ gaurhatā mūḍha pramattasya tvayā mama | pramattasyaiva me vācā śiraste pātayiṣyati

मूर्ख! जैसे तूने असावधानी में मेरी यह गाय मारी, वैसे ही मेरे वचन से, तेरी असावधानी के समय, दूसरा कोई तेरा सिर गिरा देगा।

नारद उवाच

श्लोक 27 (12.2.27)

शप्तः प्रसादयामास कर्णस्तं द्विजसत्तमम् । गोभिर्धनैश्च रत्नैश्च स चैनं पुनरब्रवीत् ॥

śaptaḥ prasādayāmāsa karṇastaṃ dvijasattamam | gobhirdhanaiśca ratnaiśca sa cainaṃ punarabravīt

शाप पाकर कर्ण ने गायों, धन और रत्नों से उस द्विजश्रेष्ठ को प्रसन्न करना चाहा, और उसने उससे फिर कहा—

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 28 (12.2.28)

नेदमव्याहृतं कुर्याद्ब्रह्मलोकेऽपि केवलम् । गच्छ वा तिष्ठ वा यद्वा कार्यं यत्तत्समाचर ॥

nedamavyāhṛtaṃ kuryādbrahmaloke'pi kevalam | gaccha vā tiṣṭha vā yadvā kāryaṃ yattatsamācara

ब्रह्मलोक में भी कोई इस वचन को अन्यथा नहीं कर सकता। चाहे जा, चाहे रह, या जो करना हो वह कर।

नारद उवाच

श्लोक 29 (12.2.29)

इत्युक्तो ब्राह्मणेनाथ कर्णो दैन्यादधोमुखः । राममभ्यागमद्भीतस्तदेव मनसा स्मरन् ॥

ityukto brāhmaṇenātha karṇo dainyādadhomukhaḥ | rāmamabhyāgamadbhītastadeva manasā smaran

ब्राह्मण के ऐसा कहने पर कर्ण दीनता से सिर झुकाए, भयभीत होकर उसी बात को मन में दोहराता हुआ राम के पास लौट आया।

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