शान्ति पर्व · अध्याय 3
कर्ण और परशुराम: कृमि और शाप
कर्ण की सेवा से प्रसन्न होकर राम उसे सम्पूर्ण ब्रह्मास्त्र सिखाते हैं। एक दिन राम कर्ण की गोद में सिर रखकर सोए हैं कि एक कृमि कर्ण की जाँघ बेधने लगता है; कर्ण बिना हिले पीड़ा सह लेता है, और रक्त से राम जाग उठते हैं। राम की दृष्टि से कृमि मर जाता है; वह भृगु के शाप से कृमि बना दंश नामक असुर था और मुक्त होकर चला जाता है। राम यह सोचकर कि ऐसी पीड़ा केवल क्षत्रिय ही सह सकता है, कर्ण से सच कहलवाते हैं कि वह ब्राह्मण नहीं, सूतपुत्र है। वे उसे शाप देते हैं कि मृत्यु के समय अस्त्र उसके काम नहीं आएगा। कर्ण दुर्योधन के पास लौटकर कहता है कि उसने अस्त्र सीख लिए हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (12.3.1)
कर्णस्य बाहुवीर्येण प्रश्रयेण दमेन च । तुतोष भृगुशार्दूलो गुरुशुश्रूषया तथा ॥
karṇasya bāhuvīryeṇa praśrayeṇa damena ca | tutoṣa bhṛguśārdūlo guruśuśrūṣayā tathā
कर्ण की भुजाओं के बल, विनय, संयम और गुरु-सेवा से भृगुश्रेष्ठ परशुराम प्रसन्न हुए।
श्लोक 2 (12.3.2)
ततस्तस्मै महातेजा ब्रह्मास्त्रं सनिवर्तनम् । प्रोवाच सुमहाप्रज्ञः स तपस्वी तपस्विने ॥
tatastasmai mahātejā brahmāstraṃ sanivartanam | provāca sumahāprajñaḥ sa tapasvī tapasvine
तब उस महातेजस्वी, परम प्रज्ञावान् तपस्वी ने अपने तपस्वी शिष्य को उपसंहार सहित ब्रह्मास्त्र सिखाया।
श्लोक 3 (12.3.3)
विदितास्त्रस्ततः कर्णो रममाणोऽऽश्रमे भृगोः । चकार वै धनुर्वेदे यत्नमद्भुतविक्रमः ॥
viditāstrastataḥ karṇo ramamāṇo''śrame bhṛgoḥ | cakāra vai dhanurvede yatnamadbhutavikramaḥ
अस्त्र जान लेने पर भृगु के आश्रम में रमता हुआ अद्भुत पराक्रमी कर्ण धनुर्वेद के अभ्यास में लगा रहा।
श्लोक 4 (12.3.4)
ततः कदाचिद्रामस्तु चरन्नाश्रममन्तिकात् । कर्णेन सहितो धीमानुपवासेन कर्शितः ॥
tataḥ kadācidrāmastu carannāśramamantikāt | karṇena sahito dhīmānupavāsena karśitaḥ
फिर एक बार बुद्धिमान परशुराम, उपवास से दुर्बल होकर, कर्ण के साथ आश्रम के निकट घूम रहे थे;
श्लोक 5 (12.3.5)
सुष्वाप जामदग्न्यस्तु विस्रम्भोत्पन्नसौहृदः । तस्योत्सङ्गे समाधाय शिरः क्लान्तमना गुरुः ॥
suṣvāpa jāmadagnyastu visrambhotpannasauhṛdaḥ | tasyotsaṅge samādhāya śiraḥ klāntamanā guruḥ
और विश्वास से उपजी मित्रता के कारण जमदग्निपुत्र थके मन से अपना सिर कर्ण की गोद में रखकर सो गए।
श्लोक 6 (12.3.6)
अथ क्रिमिः श्लेष्ममयो मांसशोणितभोजनः । दारुणो दारुणाकारः कर्णस्याभ्याशमागतः ॥
atha krimiḥ śleṣmamayo māṃsaśoṇitabhojanaḥ | dāruṇo dāruṇākāraḥ karṇasyābhyāśamāgataḥ
तभी कफ से बना, मांस-रक्त खाने वाला, भयंकर और भयंकर आकार का एक कृमि कर्ण के पास आया।
श्लोक 7 (12.3.7)
स तस्योरुमथासाद्य बिभेद रुधिराशनः । न चैनमशकत्क्षेप्तुं वक्तुं वाऽपि गुरोर्भयात् ॥
sa tasyorumathāsādya bibheda rudhirāśanaḥ | na cainamaśakatkṣeptuṃ vaktuṃ vā'pi gurorbhayāt
वह रक्तपायी उसकी जाँघ पर पहुँचकर उसे बेधने लगा; और गुरु के भय से कर्ण न उसे हटा सका, न कुछ बोल सका।
श्लोक 8 (12.3.8)
स दश्यमानोऽपि तथा कृमिणा तेन भारत । गुरोः प्रबोधनाकाङ्क्षी तमुपैक्षत सूर्यजः ॥
sa daśyamāno'pi tathā kṛmiṇā tena bhārata | guroḥ prabodhanākāṅkṣī tamupaikṣata sūryajaḥ
हे भारत! उस कृमि से डसे जाते हुए भी सूर्यपुत्र ने गुरु को जगाना न चाहते हुए उसे सहा।
श्लोक 9 (12.3.9)
कर्णस्तु वेदनां धैर्यादसह्यां विनिगृह्य ताम् । अकम्पयन्नव्यथयन्धारयामास भार्गवम् ॥
karṇastu vedanāṃ dhairyādasahyāṃ vinigṛhya tām | akampayannavyathayandhārayāmāsa bhārgavam
कर्ण ने धैर्य से उस असह्य वेदना को दबा लिया और बिना काँपे, बिना विचलित हुए भार्गव को थामे रखा।
श्लोक 10 (12.3.10)
यदा स रुधिरेणाङ्गे परिस्पृष्टोऽभवद्गुरुः । तदाऽबुध्यत तेजस्वी संरब्धश्चैनमब्रवीत् ॥
yadā sa rudhireṇāṅge parispṛṣṭo'bhavadguruḥ | tadā'budhyata tejasvī saṃrabdhaścainamabravīt
जब गुरु का शरीर रक्त से सन गया, तब वे तेजस्वी जाग उठे और व्याकुल होकर उससे बोले—
राम उवाच
श्लोक 11 (12.3.11)
अहोऽस्म्यशुचितां प्राप्तः किमिदं च कृतं त्वया । कथयस्व भयं त्यक्त्वा याथातथ्यमिदं मम ॥
aho'smyaśucitāṃ prāptaḥ kimidaṃ ca kṛtaṃ tvayā | kathayasva bhayaṃ tyaktvā yāthātathyamidaṃ mama
'अहो! मैं अपवित्र हो गया। तुमने यह क्या किया? भय छोड़कर मुझे ठीक-ठीक बताओ।'
नारद उवाच
श्लोक 12 (12.3.12)
तस्य कर्णस्तदाचष्ट कृमिणा परिभक्षणम् । ददर्श रामस्तं चापि कृमिं सूकरसंस्थितम् ॥
tasya karṇastadācaṣṭa kṛmiṇā paribhakṣaṇam | dadarśa rāmastaṃ cāpi kṛmiṃ sūkarasaṃsthitam
तब कर्ण ने उन्हें कृमि के काटने की बात बताई; और राम ने भी सूअर के आकार का वह कृमि देखा।
श्लोक 13 (12.3.13)
अष्टपादं तीक्ष्णदंष्ट्रं सूचीभिः परिसंवृतम् । रोमभिः सन्निरुद्धाङ्गमलर्कं नाम नामतः ॥
aṣṭapādaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃ sūcībhiḥ parisaṃvṛtam | romabhiḥ sanniruddhāṅgamalarkaṃ nāma nāmataḥ
उसके आठ पैर थे, तीखी दाढ़ें थीं, सुइयों जैसे रोमों से ढका हुआ और रोमों से घिरा शरीर था; उसका नाम अलर्क था।
श्लोक 14 (12.3.14)
स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत् । तस्मिन्नेवासृजि क्लिन्नस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sa dṛṣṭamātro rāmeṇa kṛmiḥ prāṇānavāsṛjat | tasminnevāsṛji klinnastadadbhutamivābhavat
राम की दृष्टि पड़ते ही उस कृमि ने प्राण त्याग दिए। उसी रक्त में लथपथ पड़े हुए उसके साथ मानो एक अद्भुत बात हुई।
श्लोक 15 (12.3.15)
ततोऽन्तरिक्षे ददृशे विश्वरूपः करालवान् । राक्षसो लोहितग्रीवः कृष्णाङ्गो मेघवाहनः ॥
tato'ntarikṣe dadṛśe viśvarūpaḥ karālavān | rākṣaso lohitagrīvaḥ kṛṣṇāṅgo meghavāhanaḥ
तब आकाश में एक विकराल, अनेक रूपों वाला राक्षस दिखाई दिया—लाल गर्दन वाला, काले अंगों वाला, मेघ पर चलने वाला।
श्लोक 16 (12.3.16)
स रामं प्राञ्जलिर्भूत्वा बभाषे पूर्णमानसः । स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्येऽहं यथागतम् ॥
sa rāmaṃ prāñjalirbhūtvā babhāṣe pūrṇamānasaḥ | svasti te bhṛguśārdūla gamiṣye'haṃ yathāgatam
उसने हाथ जोड़कर, भरे मन से राम से कहा, 'हे भृगुशार्दूल! आपका कल्याण हो; मैं जैसे आया था वैसे ही लौट जाऊँगा।'
दंश उवाच
श्लोक 17 (12.3.17)
मोक्षितो नरकादस्माद्भवता मुनिसत्तम । भद्रं च तेऽस्तु सिद्धिश्च प्रियं मे भवता कृतम् ॥
mokṣito narakādasmādbhavatā munisattama | bhadraṃ ca te'stu siddhiśca priyaṃ me bhavatā kṛtam
हे मुनिश्रेष्ठ! आपने मुझे इस नरक से मुक्त कर दिया। आपका मंगल हो और सिद्धि हो; आपने मेरा प्रिय किया है।
नारद उवाच
श्लोक 18 (12.3.18)
तमुवाच महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान् । कस्त्वं कस्माच्च नरकं प्रतिपन्नो ब्रवीहि तत् ॥
tamuvāca mahābāhurjāmadagnyaḥ pratāpavān | kastvaṃ kasmācca narakaṃ pratipanno bravīhi tat
महाबाहु, प्रतापी जमदग्निपुत्र ने उससे कहा, 'तुम कौन हो और नरक में क्यों पड़े? वह बताओ।'
श्लोक 19 (12.3.19)
सोऽब्रवीदहमासं प्राग्दंशो नाम महासुरः । पुरा देवयुगे तात भृगोस्तु सवया इव ॥
so'bravīdahamāsaṃ prāgdaṃśo nāma mahāsuraḥ | purā devayuge tāta bhṛgostu savayā iva
वह बोला, 'मैं पहले दंश नाम का महान् असुर था। हे तात! बहुत पहले देवयुग में मैं भृगु की ही आयु का था।'
दंश उवाच
श्लोक 20 (12.3.20)
सोऽहं भृगोः सुदयितां भार्यामपहरं बलात् । महर्षेरभिशापेन क्रिमिभूतोऽपतं भुवि ॥
so'haṃ bhṛgoḥ sudayitāṃ bhāryāmapaharaṃ balāt | maharṣerabhiśāpena krimibhūto'pataṃ bhuvi
मैंने भृगु की प्रिय पत्नी को बलपूर्वक हर लिया, और महर्षि के शाप से कृमि बनकर पृथ्वी पर गिरा।
श्लोक 21 (12.3.21)
अब्रवीद्धि स मां क्रुद्धस्तव पूर्वपितामहः । मूत्रश्लेष्माशनः पाप निरयं प्रतिपत्स्यसे ॥
abravīddhi sa māṃ kruddhastava pūrvapitāmahaḥ | mūtraśleṣmāśanaḥ pāpa nirayaṃ pratipatsyase
आपके पूर्वपितामह ने क्रोध से मुझसे कहा, 'पापी! तू मूत्र और कफ खाने वाला होकर नरक में पड़ेगा।'
श्लोक 22 (12.3.22)
शापस्यान्तो भवेद्ब्रह्मन्नित्येवं तमथाब्रवम् । भविता भार्गवाद्रामादिति मामब्रवीद्भृगुः ॥
śāpasyānto bhavedbrahmannityevaṃ tamathābravam | bhavitā bhārgavādrāmāditi māmabravīdbhṛguḥ
जब मैंने उनसे कहा, 'ब्रह्मन्! शाप का अन्त हो', तब भृगु ने मुझसे कहा, 'भार्गव राम से उसका अन्त होगा।'
श्लोक 23 (12.3.23)
सोऽहमेनां गतिं प्राप्तो यथा नकुशलस्तथा । त्वया साधो समागम्य विमुक्तः पापयोनितः ॥
so'hamenāṃ gatiṃ prāpto yathā nakuśalastathā | tvayā sādho samāgamya vimuktaḥ pāpayonitaḥ
इस प्रकार मैं इस दुर्गति को प्राप्त हुआ। हे साधु! आपसे मिलकर मैं इस पापयोनि से मुक्त हो गया।
नारद उवाच
श्लोक 24 (12.3.24)
एवमुक्त्वा नमस्कृत्य ययौ रामं महासुरः । रामः कर्णं तु सक्रोधमिदं वचनमब्रवीत् ॥
evamuktvā namaskṛtya yayau rāmaṃ mahāsuraḥ | rāmaḥ karṇaṃ tu sakrodhamidaṃ vacanamabravīt
यह कहकर और प्रणाम करके वह महान् असुर चला गया। तब राम ने क्रोध में कर्ण से यह वचन कहा—
राम उवाच
श्लोक 25 (12.3.25)
अतिदुःखमिदं मूढ न जातु ब्राह्मणः सहेत् । क्षत्रियस्येव ते धैर्यं कामया सत्यमुच्यताम् ॥
atiduḥkhamidaṃ mūḍha na jātu brāhmaṇaḥ sahet | kṣatriyasyeva te dhairyaṃ kāmayā satyamucyatām
मूर्ख! यह पीड़ा बहुत बड़ी है; ब्राह्मण इसे कभी नहीं सह सकता। तेरा धैर्य क्षत्रिय का-सा है। अपनी इच्छा से सच बता।
नारद उवाच
श्लोक 26 (12.3.26)
तमुवाच ततः कर्णः शापाद्भीतः प्रसादयन् । ब्रह्मक्षत्रान्तरे जातं सूतं मां विद्धि भार्गव ॥
tamuvāca tataḥ karṇaḥ śāpādbhītaḥ prasādayan | brahmakṣatrāntare jātaṃ sūtaṃ māṃ viddhi bhārgava
तब शाप से डरे हुए कर्ण ने उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा, 'हे भार्गव! मुझे ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच उत्पन्न सूत जानिए।'
कर्ण उवाच
श्लोक 27 (12.3.27)
राधेयः कर्ण इति मां प्रवदन्ति जना भुवि । प्रसादं कुरु मे ब्रह्मन्नस्त्रलुब्धस्य भार्गव ॥
rādheyaḥ karṇa iti māṃ pravadanti janā bhuvi | prasādaṃ kuru me brahmannastralubdhasya bhārgava
संसार में लोग मुझे राधेय कर्ण कहते हैं। हे ब्रह्मन्, हे भार्गव! अस्त्र के लोभी मुझ पर कृपा कीजिए।
श्लोक 28 (12.3.28)
पिता गुरुर्न संदेहो वेदविद्याप्रदः प्रभुः । अतो भार्गव इत्युक्तं मया गोत्रं तवान्तिके ॥
pitā gururna saṃdeho vedavidyāpradaḥ prabhuḥ | ato bhārgava ityuktaṃ mayā gotraṃ tavāntike
पिता और गुरु एक ही हैं, इसमें सन्देह नहीं; वेदविद्या देने वाला वही प्रभु है। इसी से मैंने आपके निकट अपना गोत्र भार्गव बताया था।
नारद उवाच
श्लोक 29 (12.3.29)
तमुवाच भृगुश्रेष्ठः सरोपः प्रदहन्निव । भूमौ निपतितं दीनं वेपमानं कृताञ्जलिम् ॥
tamuvāca bhṛguśreṣṭhaḥ saropaḥ pradahanniva | bhūmau nipatitaṃ dīnaṃ vepamānaṃ kṛtāñjalim
तब भृगुश्रेष्ठ ने, मानो भस्म करते हुए क्रोध में, भूमि पर पड़े, दीन, काँपते और हाथ जोड़े हुए कर्ण से कहा—
राम उवाच
श्लोक 30 (12.3.30)
यस्मान्मिथ्याविचीर्णोऽहमस्त्रलोभादिह त्वया । तस्मादेतन्न ते मूढ ब्रह्मास्त्रं प्रतिभास्यति ॥
yasmānmithyāvicīrṇo'hamastralobhādiha tvayā | tasmādetanna te mūḍha brahmāstraṃ pratibhāsyati
तूने अस्त्र के लोभ से मुझे झूठ बोलकर ठगा है; इसलिए, मूर्ख! यह ब्रह्मास्त्र तुझे स्मरण नहीं आएगा—
श्लोक 31 (12.3.31)
अन्यत्र वधकालात्ते सदृशे न समीयुषः । अब्राह्मणे न हि ब्रह्म चिरं तिष्ठेत्कदाचन ॥
anyatra vadhakālātte sadṛśe na samīyuṣaḥ | abrāhmaṇe na hi brahma ciraṃ tiṣṭhetkadācana
पर केवल तेरे वध के समय, जब तू अपने समान योद्धा से भिड़ेगा। क्योंकि जो ब्राह्मण नहीं है, उसमें ब्रह्म देर तक नहीं टिकता।
श्लोक 32 (12.3.32)
गच्छेदानीं न ते स्थानमनृतस्येह विद्यते । न त्वया सदृशो युद्धे भविता क्षत्रियो भुवि ॥
gacchedānīṃ na te sthānamanṛtasyeha vidyate | na tvayā sadṛśo yuddhe bhavitā kṣatriyo bhuvi
अब जा। यहाँ तुझ जैसे झूठे के लिए कोई स्थान नहीं है। पृथ्वी पर युद्ध में तेरे समान कोई क्षत्रिय नहीं होगा।
नारद उवाच
श्लोक 33 (12.3.33)
एवमुक्तः स रामेण न्यायेनोपजगाम ह । दुर्योधनमुपागम्य कृतास्त्रोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥
evamuktaḥ sa rāmeṇa nyāyenopajagāma ha | duryodhanamupāgamya kṛtāstro'smīti cābravīt
राम के ऐसा कहने पर वह विधिपूर्वक प्रणाम करके चला गया और दुर्योधन के पास जाकर बोला, 'मैंने अस्त्र प्राप्त कर लिए हैं।'