शान्ति पर्व · अध्याय 4
कलिंग-राजकन्या के स्वयंवर में कर्ण
नारद आगे कहते हैं: प्राप्त अस्त्र के साथ कर्ण दुर्योधन के पास रहने लगा। कलिंग में राजा चित्रांगद की कन्या के स्वयंवर में सब दिशाओं से राजा एकत्र हुए, और दुर्योधन कर्ण के साथ वहाँ गया। जब राजाओं के नाम सुनाए जाते समय कन्या उसे छोड़कर आगे बढ़ गई, तो दुर्योधन यह अनादर न सह सका; उसने कन्या को रथ पर चढ़ा लिया और राजाओं को ललकारा, और पीछे कर्ण चला। राजाओं ने आक्रमण किया; कर्ण ने उनके धनुष-बाण काट डाले, सारथी मार दिए और उन्हें भगा दिया, और दुर्योधन कन्या को लेकर हस्तिनापुर लौटा।
नारद उवाच
श्लोक 1 (12.4.1)
कर्णस्तु समवाप्यैवमस्त्रं भार्गवनन्दनात् । दुर्योधनेन सहितो मुमुदे भरतर्षभ ॥
karṇastu samavāpyaivamastraṃ bhārgavanandanāt | duryodhanena sahito mumude bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! भार्गव-पुत्र से इस प्रकार अस्त्र पाकर कर्ण दुर्योधन के साथ आनन्द से रहने लगा।
श्लोक 2 (12.4.2)
ततः कदाचिद्राजानः समाजग्मुः स्वयंवरे । कलिङ्गविषये राजन्राज्ञश्चित्राङ्गदस्य च ॥
tataḥ kadācidrājānaḥ samājagmuḥ svayaṃvare | kaliṅgaviṣaye rājanrājñaścitrāṅgadasya ca
फिर एक बार, हे राजन्, कलिंग देश में, राजा चित्रांगद के यहाँ, स्वयंवर में राजा लोग एकत्र हुए।
श्लोक 3 (12.4.3)
श्रीमद्राजपुरं नाम नगरं तत्र भारत । राजानः शतशस्तत्र कन्यार्थे समुपागमन् ॥
śrīmadrājapuraṃ nāma nagaraṃ tatra bhārata | rājānaḥ śataśastatra kanyārthe samupāgaman
हे भारत! वहाँ श्रीमान् राजपुर नाम का नगर है; वहाँ सैकड़ों राजा कन्या के लिए आए।
श्लोक 4 (12.4.4)
श्रुत्वा दुर्योधनस्तत्र समेतान्सर्वपार्थिवान् । रथेन काञ्चनाङ्गेन कर्णेन सहितो ययौ ॥
śrutvā duryodhanastatra sametānsarvapārthivān | rathena kāñcanāṅgena karṇena sahito yayau
सब राजाओं के वहाँ एकत्र होने की बात सुनकर दुर्योधन सोने के अंगों वाले रथ में कर्ण के साथ वहाँ गया।
श्लोक 5 (12.4.5)
ततः स्वयंवरे तस्मिन्नानादेश्या महारथाः । समाजग्मुर्नृपतयः कन्यार्थे नृपसत्तम ॥
tataḥ svayaṃvare tasminnānādeśyā mahārathāḥ | samājagmurnṛpatayaḥ kanyārthe nṛpasattama
हे नृपश्रेष्ठ! उस स्वयंवर में अनेक देशों के महारथी राजा कन्या के लिए एकत्र हुए।
श्लोक 6 (12.4.6)
शिशुपालो जरासन्धो भीष्मको वक्र एव च । कपोतरोमा नीलश्च रुक्मी च दृढविक्रमः ॥
śiśupālo jarāsandho bhīṣmako vakra eva ca | kapotaromā nīlaśca rukmī ca dṛḍhavikramaḥ
शिशुपाल, जरासन्ध, भीष्मक, वक्र, कपोतरोमा, नील और दृढ़ पराक्रमी रुक्मी,
श्लोक 7 (12.4.7)
सृगालश्च महाराजः स्त्रीराज्याधिपतिश्च यः । विशोकः शतधन्वा च भोजो वीरश्च नामतः ॥
sṛgālaśca mahārājaḥ strīrājyādhipatiśca yaḥ | viśokaḥ śatadhanvā ca bhojo vīraśca nāmataḥ
महाराज सृगाल, स्त्रीराज्य का जो स्वामी था वह, विशोक, शतधन्वा, और भोज तथा वीर नाम वाले—
श्लोक 8 (12.4.8)
एते चान्ये च बहवो दक्षिणां दिशमाश्रिताः । म्लेच्छाश्चार्याश्च राजानः प्राच्योदीच्यास्तथैव च ॥
ete cānye ca bahavo dakṣiṇāṃ diśamāśritāḥ | mlecchāścāryāśca rājānaḥ prācyodīcyāstathaiva ca
ये और दूसरे बहुत-से राजा, जो दक्षिण दिशा में बसे थे, तथा पूर्व और उत्तर के म्लेच्छ और आर्य राजा भी—
श्लोक 9 (12.4.9)
काञ्चनाङ्गदिनः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभाः । सर्वे भास्वरदेहाश्च व्याघ्रा इव बलोत्कटाः ॥
kāñcanāṅgadinaḥ sarve śuddhajāmbūnadaprabhāḥ | sarve bhāsvaradehāśca vyāghrā iva balotkaṭāḥ
सभी सोने के अंगद पहने थे, शुद्ध जाम्बूनद सोने जैसी आभा वाले थे, सबके शरीर चमकते थे, और वे बाघों जैसे बलवान थे।
श्लोक 10 (12.4.10)
ततः समुपविष्टेषु तेषु राजसु भारत । विवेश रङ्गं सा कन्या धात्रीवर्षवरान्विता ॥
tataḥ samupaviṣṭeṣu teṣu rājasu bhārata | viveśa raṅgaṃ sā kanyā dhātrīvarṣavarānvitā
हे भारत! जब वे राजा बैठ गए, तब वह कन्या धाय और नपुंसक सेवक के साथ रंगमण्डप में आई।
श्लोक 11 (12.4.11)
ततः संश्राव्यमाणेषु राज्ञां नामसु भारत । अत्यक्रामद्धार्तराष्ट्रं सा कन्या वरवर्णिनी ॥
tataḥ saṃśrāvyamāṇeṣu rājñāṃ nāmasu bhārata | atyakrāmaddhārtarāṣṭraṃ sā kanyā varavarṇinī
हे भारत! तब राजाओं के नाम सुनाए जाते समय वह सुन्दर वर्ण वाली कन्या धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन को छोड़कर आगे बढ़ गई।
श्लोक 12 (12.4.12)
दुर्योधनस्तु कौरव्यो नामर्षयत लङ्घनम् । प्रत्यपेधच्च तां कन्यामसत्कृत्य नराधिपान् ॥
duryodhanastu kauravyo nāmarṣayata laṅghanam | pratyapedhacca tāṃ kanyāmasatkṛtya narādhipān
कुरुवंशी दुर्योधन इस अनादर को न सह सका; उसने राजाओं की उपेक्षा करके उस कन्या को रोक लिया,
श्लोक 13 (12.4.13)
स वीर्यमदमत्तत्वाद्भीष्मद्रोणावुपाश्रितः । रथमारोप्य तां कन्यामाजुहाव नराधिपान् ॥
sa vīryamadamattatvādbhīṣmadroṇāvupāśritaḥ | rathamāropya tāṃ kanyāmājuhāva narādhipān
और बल के मद से मतवाले उसने भीष्म और द्रोण का सहारा लेकर उस कन्या को रथ पर चढ़ा लिया तथा राजाओं को ललकारा।
श्लोक 14 (12.4.14)
तमन्वगाद्रथी खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । कर्णः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः पृष्ठतः पुरुषर्षभ ॥
tamanvagādrathī khaḍgī baddhagodhāṅgulitravān | karṇaḥ śastrabhṛtāṃ śreṣṭhaḥ pṛṣṭhataḥ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ! उसके पीछे शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ कर्ण रथ पर चला, तलवार लिए हुए और गोह की खाल के उँगली-रक्षक पहने हुए।
श्लोक 15 (12.4.15)
ततो विमर्दः सुमहान्राज्ञामासीद्युयुत्सताम् । सन्नह्यतां तनुत्राणि रथान्योजयतामपि ॥
tato vimardaḥ sumahānrājñāmāsīdyuyutsatām | sannahyatāṃ tanutrāṇi rathānyojayatāmapi
तब युद्ध को उत्सुक राजाओं में, जब वे कवच बाँध रहे थे और रथ जोत रहे थे, बड़ी हलचल मच गई।
श्लोक 16 (12.4.16)
तेऽभ्यधावन्त संक्रुद्धाः कर्णदुर्योधनावुभौ । शरवर्षाणि मुञ्चन्तो मेघाः पर्वतयोरिव ॥
te'bhyadhāvanta saṃkruddhāḥ karṇaduryodhanāvubhau | śaravarṣāṇi muñcanto meghāḥ parvatayoriva
क्रोध से भरे वे कर्ण और दुर्योधन दोनों पर टूट पड़े, दो पर्वतों पर बरसते मेघों की तरह बाणों की वर्षा करते हुए।
श्लोक 17 (12.4.17)
कर्णस्तेषामापततामेकैकेन शरेण ह । धनूंषि च शरव्रातान्पातयामास भूतले ॥
karṇasteṣāmāpatatāmekaikena śareṇa ha | dhanūṃṣi ca śaravrātānpātayāmāsa bhūtale
आक्रमण करते हुए उनमें से हर एक के धनुष और बाणों के समूह को कर्ण ने एक-एक बाण से काटकर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 18 (12.4.18)
ततो विधनुषः कांश्चित्कांश्चिदुद्यतकार्मुकान् । कांश्चिदुत्सृजतो बाणान्रथशक्तिगदास्तथा ॥
tato vidhanuṣaḥ kāṃścitkāṃścidudyatakārmukān | kāṃścidutsṛjato bāṇānrathaśaktigadāstathā
तब कोई बिना धनुष के रह गए, कोई धनुष उठाए थे, कोई बाण, रथ-शक्तियाँ और गदाएँ छोड़ रहे थे;
श्लोक 19 (12.4.19)
लाघवाद्व्याकुलीकृत्य कर्णः प्रहरतां वरः । हतसूतांश्च भूयिष्ठान्स विजिग्ये नराधिपान् ॥
lāghavādvyākulīkṛtya karṇaḥ praharatāṃ varaḥ | hatasūtāṃśca bhūyiṣṭhānsa vijigye narādhipān
प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ कर्ण ने अपनी फुर्ती से उन्हें व्याकुल कर दिया और अधिकांश राजाओं के सारथी मारकर उन्हें जीत लिया।
श्लोक 20 (12.4.20)
ते स्वयं वाहयन्तोऽश्वान्याहि याहीति वादिनः । व्यपेयुस्ते रणं हित्वा राजानो भग्नमानसाः ॥
te svayaṃ vāhayanto'śvānyāhi yāhīti vādinaḥ | vyapeyuste raṇaṃ hitvā rājāno bhagnamānasāḥ
वे स्वयं घोड़े हाँकते हुए 'चलो, चलो!' कहते, टूटे मन वाले राजा रणभूमि छोड़कर भाग गए।
श्लोक 21 (12.4.21)
दुर्योधनस्तु कर्णेन पाल्यमानोऽभ्ययात्तदा । हृष्टः कन्यामुपादाय नगरं नागसाह्वयम् ॥
duryodhanastu karṇena pālyamāno'bhyayāttadā | hṛṣṭaḥ kanyāmupādāya nagaraṃ nāgasāhvayam
और कर्ण से रक्षित दुर्योधन प्रसन्न होकर उस कन्या को लेकर नागसाह्वय (हस्तिनापुर) नगर की ओर चला।