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शान्ति पर्व · अध्याय 111

बाघ और सियार की कथा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सच्चे सौम्य और सच्चे कठोर पुरुष की पहचान कैसे की जाए। भीष्म राजा पौरिक की प्राचीन कथा सुनाते हैं, जो सियार के जन्म में श्मशान में शुद्ध जीवन बिताता है और जिसे एक बाघ सच्चे व्यवहार के वचन पर अपना मन्त्री बनाता है। बाघ के पुराने सेवक उसके घर में चुराया हुआ मांस रख देते हैं और उसे दण्ड मिलने वाला होता है, तब बाघ की माता समझाती हैं कि दिखावे की जाँच करनी चाहिए। सियार निर्दोष सिद्ध होता है, किन्तु फिर विश्वास न कर पाने के कारण सब अनुनय ठुकराकर प्रायोपवेशन से देह त्यागता और स्वर्ग जाता है।

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.111.1)

असौम्याः सौम्यरूपेण सौम्याश्चासौम्यदर्शिनः । ईदृशान्पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वयम् ॥

asaumyāḥ saumyarūpeṇa saumyāścāsaumyadarśinaḥ | īdṛśānpuruṣāṃstāta kathaṃ vidyāmahe vayam

हे तात, कुछ लोग सौम्य रूप धारण करके भी कठोर होते हैं और कुछ कठोर दिखकर भी सौम्य होते हैं। ऐसे पुरुषों को हम कैसे पहचानें?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.111.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । व्याघ्रगोमायुसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vyāghragomāyusaṃvādaṃ taṃ nibodha yudhiṣṭhira

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, बाघ और सियार का संवाद। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।

श्लोक 3 (12.111.3)

पुरिकायां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः । परहिंसारुचिः क्रूरो बभूव पुरुषाधमः ॥

purikāyāṃ puri purā śrīmatyāṃ pauriko nṛpaḥ | parahiṃsāruciḥ krūro babhūva puruṣādhamaḥ

बहुत पहले की बात है, समृद्ध पुरिका नगरी में पौरिक नाम का एक राजा था, जो क्रूर और दूसरों को सताने में रुचि रखने वाला, मनुष्यों में अधम था।

श्लोक 4 (12.111.4)

स त्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् । गोमायुत्वं च सम्प्राप्तो दूषितः पूर्वकर्मणा ॥

sa tvāyuṣi parikṣīṇe jagāmānīpsitāṃ gatim | gomāyutvaṃ ca samprāpto dūṣitaḥ pūrvakarmaṇā

आयु क्षीण होने पर वह अनचाही गति को प्राप्त हुआ और अपने पूर्वकर्म से दूषित होकर सियार की योनि में पहुँचा।

श्लोक 5 (12.111.5)

संस्मृत्य पूर्वजातिं स निर्वेदं परमं गतः । न भक्षयति मांसानि परैरुपहृतान्यपि ॥

saṃsmṛtya pūrvajātiṃ sa nirvedaṃ paramaṃ gataḥ | na bhakṣayati māṃsāni parairupahṛtānyapi

पूर्वजन्म को स्मरण करके उसे गहरा वैराग्य हो गया, और दूसरों के लाए हुए मांस को भी वह नहीं खाता था।

श्लोक 6 (12.111.6)

अहिंस्रः सर्वभूतेषु सत्यवाक्सुदृढव्रतः । चकार च यथाकाममाहारं पतितैः फलैः ॥

ahiṃsraḥ sarvabhūteṣu satyavāksudṛḍhavrataḥ | cakāra ca yathākāmamāhāraṃ patitaiḥ phalaiḥ

वह सब प्राणियों के प्रति अहिंसक, सत्यवादी और दृढ़ व्रत वाला था, और अपनी इच्छा के अनुसार गिरे हुए फलों का आहार करता था।

श्लोक 7 (12.111.7)

श्मशाने तस्य चावासो गोमायोः संमतोऽभवत् । जन्मभूम्यनुरोधाच्च नान्यद्वासमरोचयत् ॥

śmaśāne tasya cāvāso gomāyoḥ saṃmato'bhavat | janmabhūmyanurodhācca nānyadvāsamarocayat

उस सियार को श्मशान में रहना ही प्रिय था, और जन्मभूमि के प्रति लगाव के कारण उसने कोई दूसरा निवास पसन्द नहीं किया।

श्लोक 8 (12.111.8)

तस्य शौचममृष्यन्तः सर्वे ते सहजातयः । चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनैः प्रश्रयोत्तरैः ॥

tasya śaucamamṛṣyantaḥ sarve te sahajātayaḥ | cālayanti sma tāṃ buddhiṃ vacanaiḥ praśrayottaraiḥ

उसके साथ जन्मे सभी भाई-बन्धु उसकी शुद्धता को सह न सके और अत्यन्त विनम्र वचनों से उसके विचार को डिगाने लगे।

सहजातय ऊचुः

श्लोक 9 (12.111.9)

वसन्पितृवने रौद्रे शौचं लप्सितुमिच्छसि । इयं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ॥

vasanpitṛvane raudre śaucaṃ lapsitumicchasi | iyaṃ vipratipattiste yadā tvaṃ piśitāśanaḥ

तुम भयंकर पितृवन में रहते हो और फिर भी शुद्धता पाना चाहते हो। जब तुम मांसभक्षी हो, तब तुम्हारी यह बात विपरीत है।

श्लोक 10 (12.111.10)

तत्समो वा भवास्माभिर्भक्ष्यान्दास्यामहे वयम् । भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं तदस्ति ते ॥

tatsamo vā bhavāsmābhirbhakṣyāndāsyāmahe vayam | bhuṅkṣva śaucaṃ parityajya yaddhi bhuktaṃ tadasti te

या तो हमारे समान हो जाओ, हम तुम्हें खाने को देंगे; या शुद्धता छोड़कर खाओ, क्योंकि जो खा लिया, वही तुम्हारा है।

भीष्म उवाच

श्लोक 11 (12.111.11)

इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच समाहितः । मधुरैः प्रश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिरनिष्ठुरैः ॥

iti teṣāṃ vacaḥ śrutvā pratyuvāca samāhitaḥ | madhuraiḥ praśritairvākyairhetumadbhiraniṣṭhuraiḥ

उनकी बातें सुनकर उसने शान्त भाव से मधुर, विनीत, युक्तियुक्त और कोमल वाक्यों में उत्तर दिया।

गोमायुरुवाच

श्लोक 12 (12.111.12)

अप्रमाणं प्रसूतिर्मे शीलतः क्रियते कुलम् । प्रार्थयिष्ये तु तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ॥

apramāṇaṃ prasūtirme śīlataḥ kriyate kulam | prārthayiṣye tu tatkarma yena vistīryate yaśaḥ

जन्म प्रमाण नहीं है; कुल तो शील से बनता है। मैं वही कर्म करना चाहूँगा जिससे यश फैलता है।

श्लोक 13 (12.111.13)

श्मशाने यदि वासो मे समाधिर्मे निशाम्यताम् । आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मलक्षणम् ॥

śmaśāne yadi vāso me samādhirme niśāmyatām | ātmā phalati karmāṇi nāśramo dharmalakṣaṇam

यदि मैं श्मशान में रहता हूँ, तो मेरी समाधि को देखो। कर्मों का फल आत्मा ही देती है; आश्रम धर्म का लक्षण नहीं है।

श्लोक 14 (12.111.14)

आश्रमे यो द्विजं हन्याद्गां वा दद्यादनाश्रमे । किं नु तत्पातकं न स्यात्तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ॥

āśrame yo dvijaṃ hanyādgāṃ vā dadyādanāśrame | kiṃ nu tatpātakaṃ na syāttadvā dattaṃ vṛthā bhavet

यदि कोई आश्रम में ब्राह्मण को मारे या आश्रम से बाहर गाय दान करे, तो क्या वह हत्या पाप नहीं होगी, या वह दान व्यर्थ नहीं जाएगा?

श्लोक 15 (12.111.15)

भवन्तः सर्वलोभेन केवलं भक्षणे रताः । अनुबन्धे तु ये दोषास्तान्न पश्यन्ति मोहिताः ॥

bhavantaḥ sarvalobhena kevalaṃ bhakṣaṇe ratāḥ | anubandhe tu ye doṣāstānna paśyanti mohitāḥ

तुम सब पूरे लोभ से केवल खाने में ही लगे हो; मोह के कारण तुम उसके परिणामस्वरूप आने वाले दोषों को नहीं देखते।

श्लोक 16 (12.111.16)

अप्रत्ययकृतां गर्ह्यामर्थापनयदूषिताम् । इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद्वृत्तिं न रोचये ॥

apratyayakṛtāṃ garhyāmarthāpanayadūṣitām | iha cāmutra cāniṣṭāṃ tasmādvṛttiṃ na rocaye

जो जीविका अविश्वास से उपजी है, निन्दनीय है, धर्म की हानि से दूषित है और इस लोक तथा परलोक में अनिष्ट है, उसे मैं नहीं चाहता।

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (12.111.17)

तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः । कृत्वात्मसदृशां पूजां साचिव्येऽवर्धयत्स्वयम् ॥

taṃ śuciṃ paṇḍitaṃ matvā śārdūlaḥ khyātavikramaḥ | kṛtvātmasadṛśāṃ pūjāṃ sācivye'vardhayatsvayam

उसे शुद्ध और बुद्धिमान समझकर प्रसिद्ध पराक्रम वाले बाघ ने अपने समान ही उसका सत्कार किया और स्वयं उसे मन्त्री पद पर बढ़ाया।

शार्दूल उवाच

श्लोक 18 (12.111.18)

सौम्य विज्ञातरूपस्त्वं गच्छ यात्रां मया सह । व्रियन्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ॥

saumya vijñātarūpastvaṃ gaccha yātrāṃ mayā saha | vriyantāmīpsitā bhogāḥ parihāryāśca puṣkalāḥ

हे सौम्य, मैंने तुम्हारा स्वभाव जान लिया है; मेरे साथ राजकार्य में चलो। मनचाहे भोग चुन लो, और जो तुम्हें अप्रिय हो, वह भी भरपूर टाल दिया जाएगा।

श्लोक 19 (12.111.19)

तीक्ष्णा वयमिति ख्याता भवतो ज्ञापयामहे । मृदुपूर्वं घातिनस्ते श्रेयश्चाधिगमिष्यति ॥

tīkṣṇā vayamiti khyātā bhavato jñāpayāmahe | mṛdupūrvaṃ ghātinaste śreyaścādhigamiṣyati

हम तीक्ष्ण स्वभाव के माने जाते हैं, यह मैं तुम्हें बताए देता हूँ। फिर भी हम मारने वाले होकर भी तुम्हारे साथ आरम्भ से कोमल व्यवहार करेंगे, और तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.111.20)

अथ सम्पूज्य तद्वाक्यं मृगेन्द्रस्य महात्मनः । गोमायुः प्रश्रितं वाक्यं बभाषे किञ्चिदानतः ॥

atha sampūjya tadvākyaṃ mṛgendrasya mahātmanaḥ | gomāyuḥ praśritaṃ vākyaṃ babhāṣe kiñcidānataḥ

तब महात्मा मृगेन्द्र के उन वचनों का आदर करके सियार ने थोड़ा झुककर विनयपूर्ण वाक्य कहे।

गोमायुरुवाच

श्लोक 21 (12.111.21)

सदृशं मृगराजैतत्तव वाक्यं मदन्तरे । यत्सहायान्मृगयसे धर्मार्थकुशलाञ्शुचीन् ॥

sadṛśaṃ mṛgarājaitattava vākyaṃ madantare | yatsahāyānmṛgayase dharmārthakuśalāñśucīn

हे मृगराज, मेरे विषय में आपका यह वचन उचित ही है कि आप धर्म और अर्थ में कुशल, पवित्र सहायकों को खोज रहे हैं।

श्लोक 22 (12.111.22)

न शक्यमनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् । दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ॥

na śakyamanamātyena mahattvamanuśāsitum | duṣṭāmātyena vā vīra śarīraparipanthinā

हे वीर, मन्त्रियों के बिना, या शरीर के लिए ही संकट बने दुष्ट मन्त्रियों के साथ, कोई राजा अपनी महत्ता का शासन नहीं कर सकता।

श्लोक 23 (12.111.23)

सहायाननुरक्तांस्तु यतेतानुपसंहितान् । परस्परमसङ्घुष्टान्विजिगीषूनलोलुपान् ॥

sahāyānanuraktāṃstu yatetānupasaṃhitān | parasparamasaṅghuṣṭānvijigīṣūnalolupān

उसे ऐसे सहायक पाने का यत्न करना चाहिए जो अनुरक्त हों, जिन्हें किसी ने फोड़ा न हो, जो आपस में कलह न करते हों, विजय चाहने वाले हों और लोभ से रहित हों।

श्लोक 24 (12.111.24)

तानतीतोपधान्प्राज्ञान्हिते युक्तान्मनस्विनः । पूजयेथा महाभागान्यथाचार्यान्यथा पितॄन् ॥

tānatītopadhānprājñānhite yuktānmanasvinaḥ | pūjayethā mahābhāgānyathācāryānyathā pitṝn

जो प्रलोभनों से परे हों, बुद्धिमान, हित में लगे, उदार मन वाले और महाभाग हों, उनका आप आचार्यों और पिताओं के समान सम्मान करें।

श्लोक 25 (12.111.25)

न त्वेवं मम सन्तोषाद्रोचतेऽन्यन्मृगाधिप । न कामये सुखान्भोगानैश्वर्यं वा त्वदाश्रयम् ॥

na tvevaṃ mama santoṣādrocate'nyanmṛgādhipa | na kāmaye sukhānbhogānaiśvaryaṃ vā tvadāśrayam

किन्तु हे मृगाधिप, अपने सन्तोष के कारण मुझे दूसरा कुछ नहीं भाता। मैं न सुख-भोग चाहता हूँ और न आपके आश्रय का ऐश्वर्य।

श्लोक 26 (12.111.26)

न योक्ष्यति हि मे शीलं तव भृत्यैः पुरातनैः । ते त्वां विभेदयिष्यन्ति दुःखशीला मदन्तरे ॥

na yokṣyati hi me śīlaṃ tava bhṛtyaiḥ purātanaiḥ | te tvāṃ vibhedayiṣyanti duḥkhaśīlā madantare

मेरा स्वभाव आपके पुराने सेवकों के साथ नहीं बैठेगा; वे दुष्ट स्वभाव के होकर मेरे विषय में आपको फोड़ देंगे।

श्लोक 27 (12.111.27)

संश्रयः श्लाघनीयस्त्वमन्येषामपि भास्वताम् । कृतात्मा सुमहाभागः पापकेष्वप्यदारुणः ॥

saṃśrayaḥ ślāghanīyastvamanyeṣāmapi bhāsvatām | kṛtātmā sumahābhāgaḥ pāpakeṣvapyadāruṇaḥ

आप अन्य तेजस्वियों के लिए भी प्रशंसनीय आश्रय हैं, आत्मसंयमी हैं, महाभाग हैं और पापियों के प्रति भी निर्दय नहीं हैं।

श्लोक 28 (12.111.28)

दीर्घदर्शी महोत्साहः स्थूललक्ष्यो महाबलः । कृती चामोघकर्तासि भाव्यैश्च समलङ्कृतः ॥

dīrghadarśī mahotsāhaḥ sthūlalakṣyo mahābalaḥ | kṛtī cāmoghakartāsi bhāvyaiśca samalaṅkṛtaḥ

आप दूरदर्शी, महान उत्साह वाले, उदार, महाबली, कुशल और कभी निष्फल कर्म न करने वाले हैं, और आने वाले कल्याणों से अलंकृत हैं।

श्लोक 29 (12.111.29)

किं तु स्वेनास्मि सन्तुष्टो दुःखा वृत्तिरनुष्ठिता । सेवायाश्चापि नाभिज्ञः स्वच्छन्देन वनेचरः ॥

kiṃ tu svenāsmi santuṣṭo duḥkhā vṛttiranuṣṭhitā | sevāyāścāpi nābhijñaḥ svacchandena vanecaraḥ

किन्तु मैं अपने में सन्तुष्ट हूँ, मैंने कठिन जीविका अपनाई है, और सेवा का मुझे कुछ ज्ञान नहीं; मैं स्वेच्छा से जीने वाला वनचर हूँ।

श्लोक 30 (12.111.30)

राजोपक्रोशदोषाश्च सर्वे संश्रयवासिनाम् । वनचर्या च निःसङ्गा निर्भया निरवग्रहा ॥

rājopakrośadoṣāśca sarve saṃśrayavāsinām | vanacaryā ca niḥsaṅgā nirbhayā niravagrahā

राजा के कोप के सारे दोष उसके आश्रित रहने वालों पर आते हैं, जब कि वन का जीवन निःसंग, निर्भय और बन्धनरहित होता है।

श्लोक 31 (12.111.31)

नृपेणाहूयमानस्य यत्तिष्ठति भयं हृदि । न तत्तिष्ठति तुष्टानां वने मूलफलाशिनाम् ॥

nṛpeṇāhūyamānasya yattiṣṭhati bhayaṃ hṛdi | na tattiṣṭhati tuṣṭānāṃ vane mūlaphalāśinām

राजा द्वारा बुलाए जाने वाले के हृदय में जो भय बना रहता है, वह वन में कन्द-मूल-फल खाकर सन्तुष्ट रहने वालों के हृदय में नहीं रहता।

श्लोक 32 (12.111.32)

पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥

pānīyaṃ vā nirāyāsaṃ svādvannaṃ vā bhayottaram | vicārya khalu paśyāmi tatsukhaṃ yatra nirvṛtiḥ

बिना परिश्रम मिला केवल पानी हो या भय से घिरा स्वादिष्ट अन्न, विचार करके मैं देखता हूँ कि सुख वही है जहाँ शान्ति है।

श्लोक 33 (12.111.33)

अपराधैर्न तावन्तो भृत्याः शिष्टा नराधिपैः । उपघातैर्यथा भृत्या दूषिता निधनं गताः ॥

aparādhairna tāvanto bhṛtyāḥ śiṣṭā narādhipaiḥ | upaghātairyathā bhṛtyā dūṣitā nidhanaṃ gatāḥ

राजा अपराधों के कारण उतने सेवकों को दण्ड नहीं देते, जितने सेवक दूसरों के आघातों से दूषित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 34 (12.111.34)

यदि त्वेतन्मया कार्यं मृगेन्द्रो यदि मन्यते । समयं कृतमिच्छामि वर्तितव्यं यथा मयि ॥

yadi tvetanmayā kāryaṃ mṛgendro yadi manyate | samayaṃ kṛtamicchāmi vartitavyaṃ yathā mayi

फिर भी यदि मुझे यह करना ही है और मृगेन्द्र को स्वीकार हो, तो मैं एक करार चाहता हूँ कि मेरे साथ कैसा बर्ताव किया जाएगा।

श्लोक 35 (12.111.35)

मदीया माननीयास्ते श्रोतव्यं च हितं वचः । कल्पिता या च ते वृत्तिः सा भवेत्तव सुस्थिरा ॥

madīyā mānanīyāste śrotavyaṃ ca hitaṃ vacaḥ | kalpitā yā ca te vṛttiḥ sā bhavettava susthirā

मेरे लोगों का आप सम्मान करेंगे, मेरे हितकर वचन सुनेंगे, और जो जीविका मेरे लिए ठहराई जाए, वह दृढ़ रहेगी।

श्लोक 36 (12.111.36)

न मन्त्रयेयमन्यैस्ते सचिवैः सह कर्हिचित् । नीतिमन्तः परीप्सन्तो वृथा ब्रूयुः परे मयि ॥

na mantrayeyamanyaiste sacivaiḥ saha karhicit | nītimantaḥ parīpsanto vṛthā brūyuḥ pare mayi

मैं आपके अन्य मन्त्रियों के साथ कभी मन्त्रणा नहीं करूँगा; नीति जानने वाले और अपना लाभ चाहने वाले वे मेरे विरुद्ध व्यर्थ ही बोलेंगे।

श्लोक 37 (12.111.37)

एक एकेन सङ्गम्य रहो ब्रूयां हितं तव । न च ते ज्ञातिकार्येषु प्रष्टव्योऽहं हिताहिते ॥

eka ekena saṅgamya raho brūyāṃ hitaṃ tava | na ca te jñātikāryeṣu praṣṭavyo'haṃ hitāhite

मैं अकेले में आपसे मिलकर आपके हित की बात कहूँगा, और आपके स्वजनों के कार्यों में हित-अहित के विषय में मुझसे पूछा नहीं जाएगा।

श्लोक 38 (12.111.38)

मया संमन्त्र्य पश्चाच्च न हिंस्याः सचिवास्त्वया । मदीयानां च कुपितो मा त्वं दण्डं निपातयेः ॥

mayā saṃmantrya paścācca na hiṃsyāḥ sacivāstvayā | madīyānāṃ ca kupito mā tvaṃ daṇḍaṃ nipātayeḥ

मुझसे सलाह करके आप बाद में अपने मन्त्रियों की हिंसा नहीं करेंगे, और क्रोध में मेरे लोगों पर दण्ड नहीं गिराएँगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (12.111.39)

एवमस्त्विति तेनासौ मृगेन्द्रेणाभिपूजितः । प्राप्तवान्मतिसाचिव्यं गोमायुर्व्याघ्रयोनितः ॥

evamastviti tenāsau mṛgendreṇābhipūjitaḥ | prāptavānmatisācivyaṃ gomāyurvyāghrayonitaḥ

मृगेन्द्र ने 'ऐसा ही हो' कहकर उसका सम्मान किया, और इस प्रकार सियार को बाघ से मन्त्री का पद प्राप्त हुआ।

श्लोक 40 (12.111.40)

तं तथा सत्कृतं दृष्ट्वा युज्यमानं च कर्मणि । प्राद्विषन्कृतसङ्घाताः पूर्वभृत्या मुहुर्मुहुः ॥

taṃ tathā satkṛtaṃ dṛṣṭvā yujyamānaṃ ca karmaṇi | prādviṣankṛtasaṅghātāḥ pūrvabhṛtyā muhurmuhuḥ

उसे इस प्रकार सम्मानित और कार्य में नियुक्त देखकर पुराने सेवक संगठित होकर बार-बार उससे द्वेष करने लगे।

श्लोक 41 (12.111.41)

मित्रबुद्ध्या च गोमायुं सान्त्वयित्वा प्रवेश्य च । दोषेषु समतां नेतुमैच्छन्नशुभबुद्धयः ॥

mitrabuddhyā ca gomāyuṃ sāntvayitvā praveśya ca | doṣeṣu samatāṃ netumaicchannaśubhabuddhayaḥ

मित्र-भाव दिखाकर उन्होंने सियार को सान्त्वना दी और अपने बीच बुला लिया, और दुष्ट बुद्धि वाले वे उसे अपने ही दोषों के समान दोषों तक ले जाना चाहते थे।

श्लोक 42 (12.111.42)

अन्यथा ह्युचिताः पूर्वं परद्रव्यापहारिणः । अशक्ताः किञ्चिदादातुं द्रव्यं गोमायुयन्त्रिताः ॥

anyathā hyucitāḥ pūrvaṃ paradravyāpahāriṇaḥ | aśaktāḥ kiñcidādātuṃ dravyaṃ gomāyuyantritāḥ

पहले तो वे दूसरों का धन हड़पने के अभ्यस्त थे, पर अब सियार के नियन्त्रण में रहकर कुछ भी लेने में असमर्थ थे।

श्लोक 43 (12.111.43)

व्युत्थानं चात्र काङ्क्षद्भिः कथाभिः प्रविलोभ्यते । धनेन महता चैव बुद्धिरस्य विलोभ्यते ॥

vyutthānaṃ cātra kāṅkṣadbhiḥ kathābhiḥ pravilobhyate | dhanena mahatā caiva buddhirasya vilobhyate

उसके विरुद्ध उठ खड़े होने की इच्छा से वे बातों से उसे लुभाते रहे, और बड़े धन से उसकी बुद्धि को लुभाने का प्रयत्न करते रहे।

श्लोक 44 (12.111.44)

न चापि स महाप्राज्ञस्तस्माद्धैर्याच्चचाल ह । अथास्य समयं कृत्वा विनाशाय स्थिताः परे ॥

na cāpi sa mahāprājñastasmāddhairyāccacāla ha | athāsya samayaṃ kṛtvā vināśāya sthitāḥ pare

किन्तु उस महाप्राज्ञ ने अपने धैर्य से डिगना स्वीकार नहीं किया। तब शत्रुओं ने योजना बनाकर उसके विनाश की तैयारी कर ली।

श्लोक 45 (12.111.45)

ईप्सितं च मृगेन्द्रस्य मांसं यत्तत्र संस्कृतम् । अपनीय स्वयं तद्धि तैर्न्यस्तं तस्य वेश्मनि ॥

īpsitaṃ ca mṛgendrasya māṃsaṃ yattatra saṃskṛtam | apanīya svayaṃ taddhi tairnyastaṃ tasya veśmani

मृगेन्द्र को जो मांस प्रिय था और वहाँ तैयार किया गया था, उसे उन्होंने स्वयं हटाकर सियार के घर में रख दिया।

श्लोक 46 (12.111.46)

यदर्थं चाप्यपहृतं येन यच्चैव मन्त्रितम् । तस्य तद्विदितं सर्वं कारणार्थं च मर्षितम् ॥

yadarthaṃ cāpyapahṛtaṃ yena yaccaiva mantritam | tasya tadviditaṃ sarvaṃ kāraṇārthaṃ ca marṣitam

किस उद्देश्य से, किसने और क्या षड्यन्त्र रचा, यह सब उसने जान लिया, और अपने प्रयोजन के लिए उसे सह लिया।

श्लोक 47 (12.111.47)

समयोऽयं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता । नोपघातस्त्वया ग्राह्यो राजन्मैत्रीमिहेच्छता ॥

samayo'yaṃ kṛtastena sācivyamupagacchatā | nopaghātastvayā grāhyo rājanmaitrīmihecchatā

मन्त्री-पद ग्रहण करते समय उसने यह करार किया था कि मित्रता चाहने वाले राजा को उसके प्रति आघात का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।

श्लोक 48 (12.111.48)

भोजने चोपहर्तव्ये तन्मांसं न स्म दृश्यते । मृगराजेन चाज्ञप्तं मृग्यतां चोर इत्युत ॥

bhojane copahartavye tanmāṃsaṃ na sma dṛśyate | mṛgarājena cājñaptaṃ mṛgyatāṃ cora ityuta

भोजन परोसने के समय वह मांस दिखाई नहीं दिया, और मृगराज ने आज्ञा दी कि चोर को खोजा जाए।

श्लोक 49 (12.111.49)

कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्रायोपवर्णितम् । सचिवेनोपनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना ॥

kṛtakaiścāpi tanmāṃsaṃ mṛgendrāyopavarṇitam | sacivenopanītaṃ te viduṣā prājñamāninā

और कपटियों ने मृगेन्द्र को बताया कि वह मांस आपके विद्वान, अपने को बुद्धिमान समझने वाले मन्त्री ने उठा लिया है।

श्लोक 50 (12.111.50)

सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमायुचापलम् । बभूवामर्षितो राजा वधं चास्याभ्यरोचयत् ॥

saroṣastvatha śārdūlaḥ śrutvā gomāyucāpalam | babhūvāmarṣito rājā vadhaṃ cāsyābhyarocayat

तब सियार की इस चपलता को सुनकर बाघ क्रोध से भर गया, राजा अमर्ष में आ गया और उसने उसके वध को ठीक समझा।

श्लोक 51 (12.111.51)

छिद्रं तु तस्य तद्दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः । सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गेषु वर्तते ॥

chidraṃ tu tasya taddṛṣṭvā procuste pūrvamantriṇaḥ | sarveṣāmeva so'smākaṃ vṛttibhaṅgeṣu vartate

उसमें यह छिद्र देखकर उसके पूर्व मन्त्री बोले: वह हम सबकी जीविका तोड़ने में लगा है।

पूर्वमन्त्रिण ऊचुः

श्लोक 52 (12.111.52)

इदं चास्येदृशं कर्म वाल्लभ्येन तु रक्ष्यते । श्रुतश्च स्वामिना पूर्वं यादृशो नैष तादृशः ॥

idaṃ cāsyedṛśaṃ karma vāllabhyena tu rakṣyate | śrutaśca svāminā pūrvaṃ yādṛśo naiṣa tādṛśaḥ

उसका यह कर्म ऐसा है, और राजा की कृपा के कारण ही इसकी रक्षा होती है; स्वामी ने पहले उसके विषय में जैसा सुना था, वह वैसा नहीं है।

श्लोक 53 (12.111.53)

वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः । धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः । कार्यार्थं भोजनार्थेषु व्रतेषु कृतवाञ्श्रमम् ॥

vāṅmātreṇaiva dharmiṣṭhaḥ svabhāvena tu dāruṇaḥ | dharmacchadmā hyayaṃ pāpo vṛthācāraparigrahaḥ | kāryārthaṃ bhojanārtheṣu vrateṣu kṛtavāñśramam

वह केवल वाणी से धर्मिष्ठ है, स्वभाव से क्रूर है; यह पापी धर्म का ढोंग करने वाला है और व्यर्थ आचरण अपनाए हुए है। अपने कार्य और भोजन के लिए ही उसने व्रतों में श्रम किया है।

भीष्म उवाच

श्लोक 54 (12.111.54)

मांसापनयनं ज्ञात्वा व्याघ्रस्तेषां तु तद्वचः । आज्ञापयामास तदा गोमायुर्वध्यतामिति ॥

māṃsāpanayanaṃ jñātvā vyāghrasteṣāṃ tu tadvacaḥ | ājñāpayāmāsa tadā gomāyurvadhyatāmiti

मांस के हटाए जाने को जानकर और उनकी बात सुनकर बाघ ने तब आज्ञा दी कि सियार का वध किया जाए।

श्लोक 55 (12.111.55)

शार्दूलवचनं श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः । मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्बोधयितुमागमत् ॥

śārdūlavacanaṃ śrutvā śārdūlajananī tataḥ | mṛgarājaṃ hitairvākyaiḥ sambodhayitumāgamat

बाघ की आज्ञा सुनकर उसकी माता मृगराज को हितकर वाक्यों से समझाने के लिए आई।

शार्दूलजनन्युवाच

श्लोक 56 (12.111.56)

पुत्र नैतत्त्वया ग्राह्यं कपटारम्भसंवृतम् । कर्मसङ्घर्षजैर्दोषैर्दुष्यत्यशुचिभिः शुचिः ॥

putra naitattvayā grāhyaṃ kapaṭārambhasaṃvṛtam | karmasaṅgharṣajairdoṣairduṣyatyaśucibhiḥ śuciḥ

पुत्र, कपट की रचना में लिपटी इस बात को तुम्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए। कर्मों की टकराहट से उपजे दोषों द्वारा अशुद्ध लोग शुद्ध को दूषित कर देते हैं।

श्लोक 57 (12.111.57)

नोच्छ्रितं सहते कश्चित्प्रक्रिया वैरकारिका । शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ॥

nocchritaṃ sahate kaścitprakriyā vairakārikā | śucerapi hi yuktasya doṣa eva nipātyate

ऊँचे उठे हुए को कोई सहन नहीं करता; चाल वैर पैदा करती है। शुद्ध और सावधान व्यक्ति पर भी दोष ही गिरा दिया जाता है।

श्लोक 58 (12.111.58)

लुब्धानां शुचयो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः । मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः । अधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपकाः ॥

lubdhānāṃ śucayo dveṣyāḥ kātarāṇāṃ tarasvinaḥ | mūrkhāṇāṃ paṇḍitā dveṣyā daridrāṇāṃ mahādhanāḥ | adhārmikāṇāṃ dharmiṣṭhā virūpāṇāṃ surūpakāḥ

लोभियों को पवित्र लोग अप्रिय लगते हैं, कायरों को पराक्रमी, मूर्खों को पण्डित, दरिद्रों को धनी, अधार्मिकों को धर्मिष्ठ और कुरूपों को सुरूप।

श्लोक 59 (12.111.59)

बहवः पण्डिता लुब्धाः सर्वे मायोपजीविनः । कुर्युर्दोषमदोषस्य बृहस्पतिमतेरपि ॥

bahavaḥ paṇḍitā lubdhāḥ sarve māyopajīvinaḥ | kuryurdoṣamadoṣasya bṛhaspatimaterapi

बहुत-से पण्डित लोभी होते हैं और सब माया से जीते हैं; वे बृहस्पति जैसी बुद्धि वाले निर्दोष पर भी दोष मढ़ दें।

श्लोक 60 (12.111.60)

शून्यात्तच्च गृहान्मांसं यदद्यापहृतं तव । नेच्छते दीयमानं च साधु तावद्विमृश्यताम् ॥

śūnyāttacca gṛhānmāṃsaṃ yadadyāpahṛtaṃ tava | necchate dīyamānaṃ ca sādhu tāvadvimṛśyatām

तुम्हारे सूने घर से आज जो मांस उठा लिया गया, उसके विषय में यह भी देखो कि वह देने पर भी मांस नहीं लेता। पहले इसे भली-भाँति विचार लो।

श्लोक 61 (12.111.61)

असत्याः सत्यसङ्काशाः सत्याश्चासत्यदर्शिनः । दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ॥

asatyāḥ satyasaṅkāśāḥ satyāścāsatyadarśinaḥ | dṛśyante vividhā bhāvāsteṣu yuktaṃ parīkṣaṇam

असत्य बातें सत्य-सी दिखती हैं और सत्य बातें असत्य-सी; भाँति-भाँति की वस्तुएँ ऐसी ही दिखाई देती हैं। उनमें परीक्षा करना उचित है।

श्लोक 62 (12.111.62)

तलवद्दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव । न चैवास्ति तलं व्योम्नि न खद्योते हुताशनः ॥

talavaddṛśyate vyoma khadyoto havyavāḍiva | na caivāsti talaṃ vyomni na khadyote hutāśanaḥ

आकाश धरातल-सा दिखता है और जुगनू अग्नि-सा, पर न आकाश में कोई धरातल है और न जुगनू में आग।

श्लोक 63 (12.111.63)

तस्मात्प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तमर्थः परीक्षितुम् । परीक्ष्य ज्ञापयन्ह्यर्थान्न पश्चात्परितप्यते ॥

tasmātpratyakṣadṛṣṭo'pi yuktamarthaḥ parīkṣitum | parīkṣya jñāpayanhyarthānna paścātparitapyate

इसलिए आँखों से देखी बात की भी परीक्षा करना उचित है; जो परखकर कार्य घोषित करता है, वह बाद में पछताता नहीं।

श्लोक 64 (12.111.64)

न दुष्करमिदं पुत्र यत्प्रभुर्घातयेत्परम् । श्लाघनीया च वर्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥

na duṣkaramidaṃ putra yatprabhurghātayetparam | ślāghanīyā ca varyā ca loke prabhavatāṃ kṣamā

पुत्र, किसी प्रभु के लिए दूसरे को मरवा देना कठिन नहीं है; पर समर्थों की क्षमा ही संसार में प्रशंसनीय और श्रेष्ठ मानी जाती है।

श्लोक 65 (12.111.65)

स्थापितोऽयं पुत्र त्वया सामन्तेष्वधि विश्रुतः । दुःखेनासाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ॥

sthāpito'yaṃ putra tvayā sāmanteṣvadhi viśrutaḥ | duḥkhenāsādyate pātraṃ dhāryatāmeṣa te suhṛt

पुत्र, तुमने उसे जो स्थान दिया है, उससे वह पड़ोसी राजाओं में भी प्रसिद्ध है। योग्य पात्र कठिनता से मिलता है; इसे अपने पास रखो, यह तुम्हारा सुहृद् है।

श्लोक 66 (12.111.66)

दूषितं परदोषैर्हि गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् । स्वयं संदूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ॥

dūṣitaṃ paradoṣairhi gṛhṇīte yo'nyathā śucim | svayaṃ saṃdūṣitāmātyaḥ kṣiprameva vinaśyati

जो दूसरों के दोषों से दूषित मानकर किसी शुद्ध को अन्यथा ग्रहण करता है और स्वयं अपने मन्त्रियों को भ्रष्ट करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 67 (12.111.67)

तस्मादथारिसङ्घाताद्गोमायोः कश्चिदागतः । धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत्कपटं कृतम् ॥

tasmādathārisaṅghātādgomāyoḥ kaścidāgataḥ | dharmātmā tena cākhyātaṃ yathaitatkapaṭaṃ kṛtam

तब सियार के शत्रुओं के दल से कोई धर्मात्मा आया और उसने बताया कि यह कपट किस प्रकार रचा गया था।

श्लोक 68 (12.111.68)

ततो विज्ञातचारित्रः सत्कृत्य स विमोक्षितः । परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ॥

tato vijñātacāritraḥ satkṛtya sa vimokṣitaḥ | pariṣvaktaśca sasnehaṃ mṛgendreṇa punaḥ punaḥ

तब उसका चरित्र जान लिया गया, उसका सत्कार करके उसे छोड़ दिया गया, और मृगेन्द्र ने बार-बार स्नेह से उसे गले लगाया।

श्लोक 69 (12.111.69)

अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमायुर्नीतिशास्त्रवित् । तेनामर्षेण सन्तप्तः प्रायमासितुमैच्छत ॥

anujñāpya mṛgendraṃ tu gomāyurnītiśāstravit | tenāmarṣeṇa santaptaḥ prāyamāsitumaicchata

नीतिशास्त्र के ज्ञाता सियार ने मृगेन्द्र से आज्ञा ली और उस अपमान से सन्तप्त होकर प्रायोपवेशन करना चाहा।

श्लोक 70 (12.111.70)

शार्दूलस्तत्र गोमायुं स्नेहात्प्रस्रुतलोचनः । अवारयत्स धर्मिष्ठं पूजया प्रतिपूजयन् ॥

śārdūlastatra gomāyuṃ snehātprasrutalocanaḥ | avārayatsa dharmiṣṭhaṃ pūjayā pratipūjayan

वहाँ बाघ ने स्नेह से आँसू भरी आँखों से उस धर्मिष्ठ सियार को रोका और सम्मान के बदले सम्मान करते हुए आदर दिखाया।

श्लोक 71 (12.111.71)

तं स गोमायुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् । बभाषे प्रणतो वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ॥

taṃ sa gomāyurālokya snehādāgatasambhramam | babhāṣe praṇato vākyaṃ bāṣpagadgadayā girā

स्नेह से घबराकर आए हुए उसे देखकर सियार ने प्रणाम करके आँसुओं से रुँधे स्वर में कहा।

गोमायुरुवाच

श्लोक 72 (12.111.72)

पूजितोऽहं त्वया पूर्वं पश्चाच्चैव विमानितः । परेषामास्पदं नीतो वस्तुं नार्हाम्यहं त्वयि ॥

pūjito'haṃ tvayā pūrvaṃ paścāccaiva vimānitaḥ | pareṣāmāspadaṃ nīto vastuṃ nārhāmyahaṃ tvayi

आपने पहले मेरा सम्मान किया और बाद में अपमान किया; मुझे दूसरों का निशाना बना दिया गया है। अब मैं आपके पास रहने योग्य नहीं हूँ।

श्लोक 73 (12.111.73)

स्वसन्तुष्टाश्च्युताः स्थानान्मानात्प्रत्यवरोपिताः । स्वयं चोपहृता भृत्या ये चाप्युपहृताः परैः ॥

svasantuṣṭāścyutāḥ sthānānmānātpratyavaropitāḥ | svayaṃ copahṛtā bhṛtyā ye cāpyupahṛtāḥ paraiḥ

जो सेवक अपने में सन्तुष्ट हैं, पद से गिरे हुए हैं, मान से उतारे गए हैं, और जिन्हें स्वयं या दूसरों ने अपनी ओर मिला लिया है,

श्लोक 74 (12.111.74)

परिक्षीणाश्च लुब्धाश्च क्रूराः काराभितापिताः । हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तोपात्ता महेप्सवः ॥

parikṣīṇāśca lubdhāśca krūrāḥ kārābhitāpitāḥ | hṛtasvā mānino ye ca tyaktopāttā mahepsavaḥ

जो नष्ट हो चुके हैं, लोभी हैं, क्रूर हैं, दण्ड या कारागार से पीड़ित हैं, जिनका धन छीना गया है, जो अभिमानी हैं, जिन्होंने पाया हुआ छोड़ा है और जो बड़ी आकांक्षा रखते हैं,

श्लोक 75 (12.111.75)

सन्तापिताश्च ये केचिद्व्यसनौघप्रतीक्षिणः । अन्तर्हिताः सोपहिताः सर्वे ते परसाधनाः ॥

santāpitāśca ye kecidvyasanaughapratīkṣiṇaḥ | antarhitāḥ sopahitāḥ sarve te parasādhanāḥ

जो किसी प्रकार सताए गए हैं और विपत्तियों की बाढ़ की प्रतीक्षा करते हैं, छिपे हुए और गुप्त रूप से रखे हुए, वे सब दूसरों के साधन हैं।

श्लोक 76 (12.111.76)

अवमानेन युक्तस्य स्थापितस्य च मे पुनः । कथं यास्यसि विश्वासमहमेष्यामि वा पुनः ॥

avamānena yuktasya sthāpitasya ca me punaḥ | kathaṃ yāsyasi viśvāsamahameṣyāmi vā punaḥ

जिसे अपमान सहना पड़ा और फिर पद पर रखा गया, ऐसे मुझ पर आप फिर कैसे विश्वास करेंगे, या मैं आप पर कैसे करूँगा?

श्लोक 77 (12.111.77)

समर्थ इति सङ्गृह्य स्थापयित्वा परीक्ष्य च । कृतं च समयं भित्त्वा त्वयाहमवमानितः ॥

samartha iti saṅgṛhya sthāpayitvā parīkṣya ca | kṛtaṃ ca samayaṃ bhittvā tvayāhamavamānitaḥ

आपने मुझे समर्थ मानकर अपनाया, पद पर बैठाया और परखा, फिर किए हुए करार को तोड़कर मेरा अपमान किया।

श्लोक 78 (12.111.78)

प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि । न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ॥

prathamaṃ yaḥ samākhyātaḥ śīlavāniti saṃsadi | na vācyaṃ tasya vaiguṇyaṃ pratijñāṃ parirakṣatā

जिसे पहले सभा में शीलवान घोषित किया गया हो, अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करने वाले को उसके दोष की बात नहीं कहनी चाहिए।

श्लोक 79 (12.111.79)

एवं चावमतस्येह विश्वासं किं प्रयास्यसि । त्वयि चैव ह्यविश्वासे ममोद्वेगो भविष्यति ॥

evaṃ cāvamatasyeha viśvāsaṃ kiṃ prayāsyasi | tvayi caiva hyaviśvāse mamodvego bhaviṣyati

इस प्रकार अपमानित मुझ पर आप कैसा विश्वास करेंगे? और आपके अविश्वास करने पर मुझे उद्वेग ही रहेगा।

श्लोक 80 (12.111.80)

शङ्कितस्त्वमहं भीतः परे छिद्रानुदर्शिनः । अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद्बहुच्छलम् ॥

śaṅkitastvamahaṃ bhītaḥ pare chidrānudarśinaḥ | asnigdhāścaiva dustoṣāḥ karma caitadbahucchalam

आप शंकालु हैं और मैं भयभीत; दूसरे लोग छिद्र ढूँढने वाले हैं, वे स्नेहहीन और कठिनता से सन्तुष्ट होने वाले हैं, और यह सारा कार्य छल-कपट से भरा है।

श्लोक 81 (12.111.81)

दुःखेन श्लेष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते । भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥

duḥkhena śleṣyate bhinnaṃ śliṣṭaṃ duḥkhena bhidyate | bhinnaśliṣṭā tu yā prītirna sā snehena vartate

टूटा हुआ कठिनता से जुड़ता है और जुड़ा हुआ कठिनता से टूटता है; टूटकर जुड़ी हुई प्रीति स्नेह से नहीं चलती।

श्लोक 82 (12.111.82)

कश्चिदेव हि भीतस्तु दृश्यते न परात्मनोः । कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावाः स्निग्धास्तु दुर्लभाः ॥

kaścideva hi bhītastu dṛśyate na parātmanoḥ | kāryāpekṣā hi vartante bhāvāḥ snigdhāstu durlabhāḥ

कोई विरला ही भयभीत दिखाई देता है, चाहे दूसरे के लिए या अपने लिए; लोग अपने प्रयोजन देखकर चलते हैं, स्नेहशील तो दुर्लभ हैं।

श्लोक 83 (12.111.83)

सुदुःखं पुरुषज्ञानं चित्तं ह्येषां चलाचलम् । समर्थो वाप्यशक्तो वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ॥

suduḥkhaṃ puruṣajñānaṃ cittaṃ hyeṣāṃ calācalam | samartho vāpyaśakto vā śateṣveko'dhigamyate

मनुष्य की पहचान अत्यन्त कठिन है, क्योंकि इन लोगों का चित्त चंचल है; कोई समर्थ हो या असमर्थ, सैकड़ों में कोई एक ही समझ में आता है।

श्लोक 84 (12.111.84)

अकस्मात्प्रक्रिया नॄणामकस्माच्चापकर्षणम् । शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकर्तुं बुद्धिलाघवात् ॥

akasmātprakriyā nṝṇāmakasmāccāpakarṣaṇam | śubhāśubhe mahattvaṃ ca prakartuṃ buddhilāghavāt

लोग अचानक किसी को ऊपर उठा देते हैं और अचानक नीचे गिरा देते हैं; बुद्धि के हल्केपन के कारण वे शुभ-अशुभ में महत्त्व जोड़ते रहते हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 85 (12.111.85)

एवं बहुविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मार्थहेतुमत् । प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात् ॥

evaṃ bahuvidhaṃ sāntvamuktvā dharmārthahetumat | prasādayitvā rājānaṃ gomāyurvanamabhyagāt

इस प्रकार धर्म और अर्थ की युक्तियों से भरे अनेक प्रकार के सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और राजा को प्रसन्न करके सियार वन की ओर चला गया।

श्लोक 86 (12.111.86)

अगृह्यानुनयं तस्य मृगेन्द्रस्य स बुद्धिमान् । गोमायुः प्रायमासीनस्त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ ॥

agṛhyānunayaṃ tasya mṛgendrasya sa buddhimān | gomāyuḥ prāyamāsīnastyaktvā dehaṃ divaṃ yayau

उस बुद्धिमान सियार ने मृगेन्द्र के अनुनय को स्वीकार नहीं किया; प्रायोपवेशन में बैठकर उसने देह त्याग दी और स्वर्ग चला गया।

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