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शान्ति पर्व · अध्याय 110

दुर्गम संकटों को पार करने के उपाय

युधिष्ठिर पूछते हैं कि अनेक प्रकार से पीड़ित प्राणी जीवन के दुर्गम संकटों को कैसे पार करें। भीष्म गिनाते हैं कि कौन लोग उन्हें पार करते हैं: जो अपने आश्रम के धर्म का पालन करते हैं, सत्य बोलते हैं, किसी को कष्ट नहीं देते, अतिथियों और माता-पिता का आदर करते हैं, क्रोध और भोग को वश में रखते हैं, और सबसे बढ़कर जो नारायण के भक्त हैं, उन्हीं कृष्ण के, जो युधिष्ठिर के अपने सुहृद् और बन्धु हैं। अन्त में वे बताते हैं कि इस उपदेश का पाठ और श्रवण भी संकट से पार उतारता है।

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.110.1)

क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैर्भावैः पृथक्पृथक् । दुर्गाण्यतितरेद्येन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kliśyamāneṣu bhūteṣu taistairbhāvaiḥ pṛthakpṛthak | durgāṇyatitaredyena tanme brūhi pitāmaha

हे पितामह, जब प्राणी अपनी-अपनी अवस्थाओं के कारण अलग-अलग प्रकार से कष्ट पा रहे हैं, तब मनुष्य किस उपाय से उन दुर्गम संकटों को पार कर सकता है, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.110.2)

आश्रमेषु यथोक्तेषु यथोक्तं ये द्विजातयः । वर्तन्ते संयतात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

āśrameṣu yathokteṣu yathoktaṃ ye dvijātayaḥ | vartante saṃyatātmāno durgāṇyatitaranti te

जो द्विज संयतचित्त होकर शास्त्र में बताए गए अपने-अपने आश्रमों में विधि के अनुसार रहते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 3 (12.110.3)

ये दम्भान्नाचरन्ति स्म येषां वृत्तिश्च संयता । विषयांश्च निगृह्णन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye dambhānnācaranti sma yeṣāṃ vṛttiśca saṃyatā | viṣayāṃśca nigṛhṇanti durgāṇyatitaranti te

जो दम्भ का आचरण नहीं करते, जिनकी जीविका मर्यादित है और जो विषयों को वश में रखते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 4 (12.110.4)

प्रत्याहुर्नोच्यमाना ये न हिंसन्ति च हिंसिताः । प्रयच्छन्ति न याचन्ते दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

pratyāhurnocyamānā ye na hiṃsanti ca hiṃsitāḥ | prayacchanti na yācante durgāṇyatitaranti te

जो कटु वचन सुनकर उत्तर नहीं देते, मार खाकर भी मारते नहीं, जो देते हैं पर माँगते नहीं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 5 (12.110.5)

वासयन्त्यतिथीन्नित्यं नित्यं ये चानसूयकाः । नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

vāsayantyatithīnnityaṃ nityaṃ ye cānasūyakāḥ | nityaṃ svādhyāyaśīlāśca durgāṇyatitaranti te

जो अतिथियों को सदा ठहराते हैं, जो सदा निन्दा-रहित हैं और जो सदा वेदाध्ययन में लगे रहते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 6 (12.110.6)

मातापित्रोश्च ये वृत्तिं वर्तन्ते धर्मकोविदाः । वर्जयन्ति दिवास्वप्नं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

mātāpitrośca ye vṛttiṃ vartante dharmakovidāḥ | varjayanti divāsvapnaṃ durgāṇyatitaranti te

जो धर्म को जानने वाले माता-पिता की सेवा का व्रत निभाते हैं और दिन में सोना छोड़ देते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 7 (12.110.7)

ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा । निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye vā pāpaṃ na kurvanti karmaṇā manasā girā | nikṣiptadaṇḍā bhūteṣu durgāṇyatitaranti te

जो कर्म, मन और वाणी से पाप नहीं करते और सब प्राणियों के प्रति दण्ड का त्याग कर चुके हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 8 (12.110.8)

ये न लोभान्नयन्त्यर्थान्राजानो रजसाऽन्विताः । विषयान्परिरक्षन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye na lobhānnayantyarthānrājāno rajasā'nvitāḥ | viṣayānparirakṣanti durgāṇyatitaranti te

जो राजा रजोगुण से युक्त होते हुए भी लोभवश दूसरों का धन नहीं हड़पते और अपने राज्य की रक्षा करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 9 (12.110.9)

स्वेषु दारेषु वर्तन्ते न्यायलब्धेष्वृतावृतौ । अग्निहोत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

sveṣu dāreṣu vartante nyāyalabdheṣvṛtāvṛtau | agnihotraparāḥ santo durgāṇyatitaranti te

जो सज्जन न्याय से प्राप्त अपनी ही पत्नियों के पास प्रत्येक ऋतुकाल में जाते हैं और अग्निहोत्र में तत्पर रहते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 10 (12.110.10)

आहवेषु च ये शूरास्त्यक्त्वा मृत्युकृतं भयम् । धर्मेण जयमिच्छन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

āhaveṣu ca ye śūrāstyaktvā mṛtyukṛtaṃ bhayam | dharmeṇa jayamicchanti durgāṇyatitaranti te

जो शूरवीर युद्धों में मृत्यु के भय को त्यागकर धर्मपूर्वक विजय चाहते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 11 (12.110.11)

ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते । प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye vadantīha satyāni prāṇatyāge'pyupasthite | pramāṇabhūtā bhūtānāṃ durgāṇyatitaranti te

जो प्राण त्यागने का समय आने पर भी यहाँ सत्य ही बोलते हैं और प्राणियों के लिए प्रमाण-रूप हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 12 (12.110.12)

कर्माण्यकुत्सनार्थानि येषां वाचश्च सूनृताः । येषामर्थाश्च साध्वर्था दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

karmāṇyakutsanārthāni yeṣāṃ vācaśca sūnṛtāḥ | yeṣāmarthāśca sādhvarthā durgāṇyatitaranti te

जिनके कर्म निन्दा के योग्य नहीं हैं, जिनकी वाणी मधुर और सत्य है और जिनका धन सत्कार्य के लिए है, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 13 (12.110.13)

अनध्यायेषु ये विप्राः स्वाध्यायं नैव कुर्वते । तपोनिष्ठाः सुतपसो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

anadhyāyeṣu ye viprāḥ svādhyāyaṃ naiva kurvate | taponiṣṭhāḥ sutapaso durgāṇyatitaranti te

जो ब्राह्मण अनध्याय के दिनों में वेदपाठ नहीं करते, तप में निष्ठा रखते हैं और उत्तम तपस्वी हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 14 (12.110.14)

ये तपश्च तपस्यन्ति कौमारब्रह्मचारिणः । विद्या वेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye tapaśca tapasyanti kaumārabrahmacāriṇaḥ | vidyā vedavratasnātā durgāṇyatitaranti te

जो बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्य के साथ तप करते हैं, विद्वान हैं और वेदव्रत पूरा करके स्नातक हो चुके हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 15 (12.110.15)

ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये । सत्वे स्थिता महाभागा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye ca saṃśāntarajasaḥ saṃśāntatamasaśca ye | satve sthitā mahābhāgā durgāṇyatitaranti te

जिनका रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गया है और जो सत्त्वगुण में स्थित महाभाग हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 16 (12.110.16)

येषां न कश्चित्रसति न त्रसन्ति हि कस्यचित् । येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

yeṣāṃ na kaścitrasati na trasanti hi kasyacit | yeṣāmātmasamo loko durgāṇyatitaranti te

जिनसे कोई नहीं डरता और जो किसी से नहीं डरते, तथा जिनके लिए संसार अपने ही समान है, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 17 (12.110.17)

परश्रिया न तप्यन्ति ये सन्तः पुरुषर्षभाः । ग्राम्यादन्नान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

paraśriyā na tapyanti ye santaḥ puruṣarṣabhāḥ | grāmyādannānnivṛttāśca durgāṇyatitaranti te

जो श्रेष्ठ सज्जन दूसरे की सम्पत्ति देखकर नहीं जलते और ग्रामीण अन्न से विरत हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 18 (12.110.18)

सर्वान्देवान्नमस्यन्ति सर्वधर्मांश्च शृण्वते । ये श्रद्दधानाः शान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

sarvāndevānnamasyanti sarvadharmāṃśca śṛṇvate | ye śraddadhānāḥ śāntāśca durgāṇyatitaranti te

जो सब देवताओं को प्रणाम करते हैं और सभी धर्मों को सुनते हैं, जो श्रद्धालु और शान्त हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 19 (12.110.19)

ये न मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति च ये परान् । मान्यमानान्नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye na mānitvamicchanti mānayanti ca ye parān | mānyamānānnamasyanti durgāṇyatitaranti te

जो अपने लिए मान नहीं चाहते पर दूसरों का सम्मान करते हैं और माननीयों को प्रणाम करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 20 (12.110.20)

ये च श्राद्धानि कुर्वन्ति तिथ्यांतिथ्यां प्रजार्थिनः । सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye ca śrāddhāni kurvanti tithyāṃtithyāṃ prajārthinaḥ | suviśuddhena manasā durgāṇyatitaranti te

जो सन्तान की कामना से प्रत्येक तिथि पर अत्यन्त शुद्ध मन से श्राद्ध करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 21 (12.110.21)

ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान्संशमयन्ति च । न च रुष्यन्ति भृत्यानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye krodhaṃ saṃniyacchanti kruddhānsaṃśamayanti ca | na ca ruṣyanti bhṛtyānāṃ durgāṇyatitaranti te

जो क्रोध को रोकते हैं, क्रुद्ध लोगों को शान्त करते हैं और अपने सेवकों पर कभी कुपित नहीं होते, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 22 (12.110.22)

मधु मांसं स्त्रियो नित्यं वर्जयन्तीह मानवाः । जन्मप्रभृति मद्यं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

madhu māṃsaṃ striyo nityaṃ varjayantīha mānavāḥ | janmaprabhṛti madyaṃ ca durgāṇyatitaranti te

जो मनुष्य मधु, मांस और स्त्रियों से सदा दूर रहते हैं और जन्म से ही मद्य का त्याग किए हुए हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 23 (12.110.23)

यात्रार्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

yātrārthaṃ bhojanaṃ yeṣāṃ saṃtānārthaṃ ca maithunam | vāk satyavacanārthaṃ ca durgāṇyatitaranti te

जिनका भोजन केवल जीवन-निर्वाह के लिए है, जिनका सहवास केवल सन्तान के लिए है और जिनकी वाणी केवल सत्य बोलने के लिए है, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 24 (12.110.24)

ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् । भक्ता नारायणं देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

īśvaraṃ sarvabhūtānāṃ jagataḥ prabhavāpyayam | bhaktā nārāyaṇaṃ devaṃ durgāṇyatitaranti te

जो समस्त प्राणियों के ईश्वर, जगत् की उत्पत्ति और लय के कारण नारायण देव के भक्त हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 25 (12.110.25)

य एष पद्मरक्ताक्षः पीतवासा महाभुजः । सुहृद्धाता च मित्रं च संबन्धी च तवाच्युतः ॥

ya eṣa padmaraktākṣaḥ pītavāsā mahābhujaḥ | suhṛddhātā ca mitraṃ ca saṃbandhī ca tavācyutaḥ

जो ये कमल के समान लाल नेत्रों वाले, पीताम्बरधारी, विशाल भुजाओं वाले हैं, वे अच्युत ही तुम्हारे सुहृद्, सहायक, मित्र और सम्बन्धी हैं।

श्लोक 26 (12.110.26)

य इमान्सकलाँल्लोकांश्चर्मवत्परिवेष्टयेत् । इच्छन्प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ॥

ya imānsakalām̐llokāṃścarmavatpariveṣṭayet | icchanprabhuracintyātmā govindaḥ puruṣottamaḥ

जो प्रभु, अचिन्त्य स्वरूप वाले गोविन्द पुरुषोत्तम, चाहें तो इन समस्त लोकों को चमड़े की तरह लपेट सकते हैं,

श्लोक 27 (12.110.27)

स्थितः प्रियहिते नित्यं स एष पुरुषोत्तमः । राजंस्तव यदुश्रेष्ठो वैकुण्ठः पुरुषर्षभः ॥

sthitaḥ priyahite nityaṃ sa eṣa puruṣottamaḥ | rājaṃstava yaduśreṣṭho vaikuṇṭhaḥ puruṣarṣabhaḥ

जो सदा प्रिय और हित में लगे रहते हैं, वे ही ये पुरुषोत्तम हैं। हे राजन्, तुम्हारे लिए वे यदुश्रेष्ठ वैकुण्ठ हैं, पुरुषों में श्रेष्ठ।

श्लोक 28 (12.110.28)

य एनं संश्रयन्तीह भक्त्या नारायणं हरिम् । ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥

ya enaṃ saṃśrayantīha bhaktyā nārāyaṇaṃ harim | te tarantīha durgāṇi na cātrāsti vicāraṇā

जो यहाँ भक्ति से इन नारायण हरि की शरण लेते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 29 (12.110.29)

अस्मिन्नर्पितकर्माणः सर्वभावेन भारत । कृष्णे कमलपत्राक्षे दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

asminnarpitakarmāṇaḥ sarvabhāvena bhārata | kṛṣṇe kamalapatrākṣe durgāṇyatitaranti te

हे भारत, जिन्होंने अपने कर्म सम्पूर्ण भाव से इन कमलनयन कृष्ण को अर्पित कर दिए हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 30 (12.110.30)

लोकरक्षार्थमुत्पन्नमदित्यां कश्यपात्मजम् । देवमिन्द्रं नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

lokarakṣārthamutpannamadityāṃ kaśyapātmajam | devamindraṃ namasyanti durgāṇyatitaranti te

जो लोकों की रक्षा के लिए अदिति के गर्भ से कश्यप के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए इन्द्र देव को प्रणाम करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 31 (12.110.31)

ब्रह्माणं लोककर्तारं ये नमस्यन्ति सत्पतिम् । यष्टव्यं क्रतुभिर्देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

brahmāṇaṃ lokakartāraṃ ye namasyanti satpatim | yaṣṭavyaṃ kratubhirdevaṃ durgāṇyatitaranti te

जो लोकों के रचयिता, सत्पुरुषों के स्वामी, यज्ञों द्वारा पूजनीय देव ब्रह्मा को प्रणाम करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 32 (12.110.32)

यं विष्णुरिन्द्रः शंभुश्च ब्रह्मा लोकपितामहः । स्तुवन्ति विविधैः स्तोत्रैर्देवदेवं महेश्वरम् । समर्चयन्ति ये शश्वद्दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

yaṃ viṣṇurindraḥ śaṃbhuśca brahmā lokapitāmahaḥ | stuvanti vividhaiḥ stotrairdevadevaṃ maheśvaram | samarcayanti ye śaśvaddurgāṇyatitaranti te

जिन देवाधिदेव महेश्वर की स्तुति विष्णु, इन्द्र, शम्भु और लोकपितामह ब्रह्मा अनेक स्तोत्रों से करते हैं, उनकी जो सदा भली-भाँति पूजा करते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 33 (12.110.33)

दुर्गातितरणं ये च पठन्ति श्रावयन्ति च । कथयन्ति च विप्रेभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

durgātitaraṇaṃ ye ca paṭhanti śrāvayanti ca | kathayanti ca viprebhyo durgāṇyatitaranti te

जो इस दुर्गातितरण के उपदेश का पाठ करते हैं, दूसरों को सुनाते हैं और ब्राह्मणों को कथा के रूप में कहते हैं, वे दुर्गम संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 34 (12.110.34)

इति कृत्यसमुद्देशः कीर्तितस्ते मयाऽनघ । तरते येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवः ॥

iti kṛtyasamuddeśaḥ kīrtitaste mayā'nagha | tarate yena durgāṇi paratreha ca mānavaḥ

हे निष्पाप, इस प्रकार मैंने तुम्हें करने योग्य बातों का यह संक्षेप बता दिया, जिससे मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में दुर्गम संकटों को पार कर जाता है।

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