शान्ति पर्व · अध्याय 115
राजा को योग्य सहायकों की आवश्यकता
युधिष्ठिर भीष्म के सामने अपना संशय रखते हैं कि राज्य और कुल के लिए क्या हितकर है, और पूछते हैं कि अभिषिक्त राजा प्रजा को कैसे प्रसन्न रखे तथा कैसे सेवकों को अपने समीप रखे। भीष्म उत्तर देते हैं कि अकेला कोई शासन नहीं कर सकता, और उस राजा के लक्षण गिनाते हैं जो राज्य का फल भोगता है: स्वामिभक्त कुलीन सेवक और मन्त्री, सुखी जनपद, विश्वासी कोश और अन्नभण्डार, न्यायपूर्ण व्यवहार, और छठा भाग ही लेने वाला राजा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.115.1)
पितामह महाप्राज्ञ संशयो मे महानयम् । संछेत्तव्यस्त्वया राजन्भवान्कुलकरो हि नः ॥
pitāmaha mahāprājña saṃśayo me mahānayam | saṃchettavyastvayā rājanbhavānkulakaro hi naḥ
पितामह, हे महाप्राज्ञ, मुझे एक बड़ा संशय है। हे राजन्, आप ही उसे दूर कर सकते हैं, क्योंकि आप हमारे कुल के कर्ता हैं।
श्लोक 2 (12.115.2)
पुरुषाणामयं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् । कथितो वाक्यसंचारस्ततो विज्ञापयामि ते ॥
puruṣāṇāmayaṃ tāta durvṛttānāṃ durātmanām | kathito vākyasaṃcārastato vijñāpayāmi te
तात, दुराचारी और दुष्ट मनुष्यों की कही हुई एक बात मुझ तक पहुँची है; इसीलिए मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ।
श्लोक 3 (12.115.3)
यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदयम् । अयत्यां च तदात्वे च क्षेमवृद्धिकरं च तत् ॥
yaddhitaṃ rājyatantrasya kulasya ca sukhodayam | ayatyāṃ ca tadātve ca kṣemavṛddhikaraṃ ca tat
मुझे बताइए कि राज्य के संचालन के लिए क्या हितकर है, कुल को सुख देने वाला क्या है, और भविष्य तथा वर्तमान दोनों में कल्याण और वृद्धि करने वाला क्या है,
श्लोक 4 (12.115.4)
पुत्रपौत्राभिरामं च राष्ट्रवृद्धिकरं च यत् । अन्नपाने शरीरे च हितं यत्तद्ब्रवीहि मे ॥
putrapautrābhirāmaṃ ca rāṣṭravṛddhikaraṃ ca yat | annapāne śarīre ca hitaṃ yattadbravīhi me
जो पुत्र-पौत्रों को सुख देने वाला हो, राष्ट्र की वृद्धि करे और अन्न, जल तथा शरीर के लिए हितकर हो।
श्लोक 5 (12.115.5)
अभिषिक्तो हि यो राजा राज्यस्थो मित्रसंवृतः । सुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जयेत्प्रजाः ॥
abhiṣikto hi yo rājā rājyastho mitrasaṃvṛtaḥ | suhṛtsamupeto vā sa kathaṃ rañjayetprajāḥ
जो राजा अभिषिक्त होकर राज्य में स्थित है, मित्रों से घिरा है और सुहृदों से युक्त है, वह प्रजा को कैसे प्रसन्न रखे?
श्लोक 6 (12.115.6)
यो ह्यसत्प्रग्रहरतिः स्नेहरागबलात्कृतः । इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषकः ॥
yo hyasatpragraharatiḥ sneharāgabalātkṛtaḥ | indriyāṇāmanīśatvādasajjanabubhūṣakaḥ
जो दुष्टों को आश्रय देने में रुचि रखता है, स्नेह और राग के वश में है, और इन्द्रियों पर नियन्त्रण न होने से असज्जनों को बढ़ाना चाहता है —
श्लोक 7 (12.115.7)
तस्य भृत्या विमुखतां यान्ति सर्वे कुलोद्गताः । न च भृत्यबलैरर्थैः स राजा संप्रयुज्यते ॥
tasya bhṛtyā vimukhatāṃ yānti sarve kulodgatāḥ | na ca bhṛtyabalairarthaiḥ sa rājā saṃprayujyate
उसके सब सेवक, कुलीन होते हुए भी, उससे विमुख हो जाते हैं, और वह राजा सेवकों के बल से मिलने वाले लाभों से युक्त नहीं रहता।
श्लोक 8 (12.115.8)
एतन्मे चिन्तयानस्य राजधर्मान्दिवानिशम् । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या भवाञ्शंसितुमर्हति ॥
etanme cintayānasya rājadharmāndivāniśam | bṛhaspatisamo buddhyā bhavāñśaṃsitumarhati
राजधर्मों का मैं दिन-रात इसी प्रकार चिन्तन करता रहता हूँ; आप बुद्धि में बृहस्पति के समान हैं, अतः आप ही इन्हें बताने के योग्य हैं।
श्लोक 9 (12.115.9)
शासता पुरुषव्याघ्र त्वं नः कुलहिते रतः । क्षत्ता चैको महाप्राज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ॥
śāsatā puruṣavyāghra tvaṃ naḥ kulahite rataḥ | kṣattā caiko mahāprājño yo naḥ śaṃsati sarvadā
हे पुरुषव्याघ्र, आप हमारा शासन करने वाले हैं और हमारे कुल के हित में लगे रहते हैं; और महाप्राज्ञ क्षत्ता (विदुर) ही अकेले दूसरे हैं जो हमें सदा सलाह देते हैं।
श्लोक 10 (12.115.10)
त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदयम् । अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ॥
tvattaḥ kulahitaṃ vākyaṃ śrutvā rājyahitodayam | amṛtasyāvyayasyeva tṛptaḥ svapsyāmyahaṃ sukham
आपसे कुल के हित की और राज्य के कल्याण को बढ़ाने वाली बात सुनकर, मानो अक्षय अमृत से तृप्त होकर, मैं सुख से सो सकूँगा।
श्लोक 11 (12.115.11)
कीदृशाः सन्निकर्षस्था भृत्याः सर्वगुणान्विताः । कीदृशैः किं कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीयते ॥
kīdṛśāḥ sannikarṣasthā bhṛtyāḥ sarvaguṇānvitāḥ | kīdṛśaiḥ kiṃ kulīnairvā saha yātrā vidhīyate
राजा के समीप कैसे सेवक रखने चाहिए जो सब गुणों से युक्त हों? और किस प्रकार के लोगों के साथ, अथवा कौन-से कुलीनों के साथ, राज्य का कार्य चलाया जाता है?
श्लोक 12 (12.115.12)
न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता । राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनः प्रशासति ॥
na hyeko bhṛtyarahito rājā bhavati rakṣitā | rājyaṃ cedaṃ janaḥ sarvastatkulīnaḥ praśāsati
सेवकों से रहित अकेला राजा रक्षक नहीं हो सकता; और इस राज्य का शासन सारे कुलीन जन मिलकर करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.115.13)
न च प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत ॥
na ca praśāstuṃ rājyaṃ hi śakyamekena bhārata
हे भारत, राज्य का शासन अकेला एक व्यक्ति नहीं कर सकता।
श्लोक 14 (12.115.14)
असहायवता तात नैवार्थाः केचिदप्युत । लब्धुं लब्धा ह्यपि सदा रक्षितुं भरतर्षभ ॥
asahāyavatā tāta naivārthāḥ kecidapyuta | labdhuṃ labdhā hyapi sadā rakṣituṃ bharatarṣabha
तात, जिसके कोई सहायक नहीं, वह कोई धन नहीं पा सकता; और हे भरतश्रेष्ठ, पा लेने पर भी उसकी सदा रक्षा नहीं कर सकता।
श्लोक 15 (12.115.15)
यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः । हितैषी कुलजः स्निग्धः स राज्यफलमश्नुते ॥
yasya bhṛtyajanaḥ sarvo jñānavijñānakovidaḥ | hitaiṣī kulajaḥ snigdhaḥ sa rājyaphalamaśnute
जिस राजा के सब सेवक ज्ञान-विज्ञान में निपुण, हितैषी, कुलीन और स्नेही हैं, वह राज्य का फल भोगता है।
श्लोक 16 (12.115.16)
मन्त्रिणो यस्य कुलजा असंहार्याः सहोषिताः । नृपतेर्मतिमाप्सन्ते सत्पथज्ञानकोविदाः ॥
mantriṇo yasya kulajā asaṃhāryāḥ sahoṣitāḥ | nṛpatermatimāpsante satpathajñānakovidāḥ
जिस राजा के मन्त्री कुलीन हैं, रिश्वत आदि से भेदे नहीं जा सकते, साथ रहते आए हैं, राजा के मन को समझते हैं और सन्मार्ग के ज्ञान में निपुण हैं, वह राज्य का फल भोगता है।
श्लोक 17 (12.115.17)
अनागतविधातारः कालज्ञानविशारदाः । अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ॥
anāgatavidhātāraḥ kālajñānaviśāradāḥ | atikrāntamaśocantaḥ sa rājyaphalamaśnute
जिस राजा के लोग आने वाले संकट का पहले से उपाय करते हैं, समय को पहचानने में निपुण हैं और बीती बात का शोक नहीं करते, वह राज्य का फल भोगता है।
श्लोक 18 (12.115.18)
समदुःखसुखा यस्य सहायाः प्रियकारिणः । अर्थचिन्तापराः सभ्याः स राज्यफलमश्नुते ॥
samaduḥkhasukhā yasya sahāyāḥ priyakāriṇaḥ | arthacintāparāḥ sabhyāḥ sa rājyaphalamaśnute
जिस राजा के सहायक सुख-दुःख में उसके समान भागीदार हैं, उसका प्रिय करते हैं, राज्य के हित की चिन्ता में लगे रहते हैं और सभा के योग्य हैं, वह राज्य का फल भोगता है।
श्लोक 19 (12.115.19)
यस्य नार्तो जनपदः सन्निकर्षगतः सदा । अक्षुद्रः सत्पथालम्बी स राजा राज्यभाग्भवेत् ॥
yasya nārto janapadaḥ sannikarṣagataḥ sadā | akṣudraḥ satpathālambī sa rājā rājyabhāgbhavet
जिस राजा का जनपद सदा उसके निकट रहकर कभी दुःखी नहीं होता, जो क्षुद्रता से रहित है और सन्मार्ग का आश्रय लेता है, वह राजा राज्य का भागी होता है।
श्लोक 20 (12.115.20)
कोशोऽक्षपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्नरैः । आप्तैस्तुष्टैश्च पृष्टैश्च धार्यते स नृपोत्तमः ॥
kośo'kṣapaṭalaṃ yasya kośavṛddhikarairnaraiḥ | āptaistuṣṭaiśca pṛṣṭaiśca dhāryate sa nṛpottamaḥ
वह राजा श्रेष्ठ है जिसका कोश और लेखा-कार्यालय ऐसे विश्वासी, सन्तुष्ट और भली-भाँति परखे हुए लोगों के हाथ में है जो कोश को बढ़ाते हैं।
श्लोक 21 (12.115.21)
कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः संचयतत्परैः । पात्रभूतैरलुब्धैश्च पाल्यमानं गुणी भवेत् ॥
koṣṭhāgāramasaṃhāryairāptaiḥ saṃcayatatparaiḥ | pātrabhūtairalubdhaiśca pālyamānaṃ guṇī bhavet
विश्वासी, अभेद्य, संचय में तत्पर, योग्य और लोभरहित लोगों द्वारा रक्षित अन्न का भण्डार अनेक गुना फलदायी हो जाता है।
श्लोक 22 (12.115.22)
व्यवहारश्च नगरे यस्य धर्मफलोदयः । दृश्यते शङ्खलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥
vyavahāraśca nagare yasya dharmaphalodayaḥ | dṛśyate śaṅkhalikhitaḥ sa dharmaphalabhāṅ nṛpaḥ
जिस राजा के नगर में न्याय-व्यवहार शङ्ख और लिखित की रीति से धर्म का फल उत्पन्न करता दिखाई देता है, वह धर्म के फल का भागी होता है।
श्लोक 23 (12.115.23)
संगृहीतमनुष्यश्च यो राजा राजधर्मवित् । षड्भागं परिगृह्णाति स धर्मफलमश्नुते ॥
saṃgṛhītamanuṣyaśca yo rājā rājadharmavit | ṣaḍbhāgaṃ parigṛhṇāti sa dharmaphalamaśnute
जिस राजा ने अपने लोगों को अपना बना लिया है, जो राजधर्म को जानता है और केवल छठा भाग ग्रहण करता है, वह धर्म का फल पाता है।