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शान्ति पर्व · अध्याय 116

मुनि द्वारा कुत्ते को चीता और बाघ बनाना

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जिस राजा के पास कुलीन सहायक न हों, क्या वह नीच कुल के लोगों को नियुक्त करे। भीष्म जमदग्निपुत्र राम के विषय में ऋषियों से सुनी एक कथा सुनाते हैं: एक तपस्वी वन में रहते हैं जहाँ भयंकर पशु भी उनके पास आ बैठते हैं, और एक कुत्ता उनका साथ कभी नहीं छोड़ता। जब एक चीता कुत्ते को मारने आता है, तो मुनि कुत्ते को चीता बना देते हैं, और जब बाघ उस चीते को डराता है, तो उसे बाघ भी बना देते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.116.1)

न सन्ति कुलजा यत्र सहायाः पार्थिवस्य तु । अकुलीनाश्च कर्तव्या न वा भरतसत्तम ॥

na santi kulajā yatra sahāyāḥ pārthivasya tu | akulīnāśca kartavyā na vā bharatasattama

जहाँ राजा के पास कुलीन सहायक न हों, वहाँ क्या नीच कुल के लोगों को नियुक्त करना चाहिए या नहीं, हे भरतश्रेष्ठ?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.116.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निदर्शनं परं लोके सज्जनाचरितं सदा ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nidarśanaṃ paraṃ loke sajjanācaritaṃ sadā

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जो संसार में सज्जनों के सदा के आचरण का सर्वोत्तम दृष्टान्त है।

श्लोक 3 (12.116.3)

अस्यैवार्थस्य सदृशं यच्छ्रुतं मे तपोवने । जामदग्न्यस्य रामस्य यदुक्तमृषिसत्तमैः ॥

asyaivārthasya sadṛśaṃ yacchrutaṃ me tapovane | jāmadagnyasya rāmasya yaduktamṛṣisattamaiḥ

यह कथा इसी विषय के अनुरूप है। मैंने इसे तपोवन में सुना था, जिसे श्रेष्ठ ऋषियों ने जमदग्नि के पुत्र राम के विषय में कहा था।

श्लोक 4 (12.116.4)

वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते । ऋषिर्मूलफलाहारो नियतो नियतेन्द्रियः ॥

vane mahati kasmiṃścidamanuṣyaniṣevite | ṛṣirmūlaphalāhāro niyato niyatendriyaḥ

किसी विशाल वन में, जहाँ कोई मनुष्य नहीं आता था, एक ऋषि रहते थे जो कन्द-मूल और फल खाते थे, नियमबद्ध और जितेन्द्रिय थे।

श्लोक 5 (12.116.5)

दीक्षादमपरिश्रान्तः स्वाध्यायपरमः शुचिः । उपवासविशुद्धात्मा सततं सत्पथे स्थितः ॥

dīkṣādamapariśrāntaḥ svādhyāyaparamaḥ śuciḥ | upavāsaviśuddhātmā satataṃ satpathe sthitaḥ

वे दीक्षा और संयम से कभी न थकने वाले, स्वाध्याय में सर्वाधिक तत्पर, पवित्र, उपवास से शुद्ध हुए अन्तःकरण वाले थे और सदा सन्मार्ग पर स्थित रहते थे।

श्लोक 6 (12.116.6)

तस्य संदृश्य सद्भावमुपविष्टस्य धीमतः । सर्वे सत्वाः समीपस्था भवन्ति वनचारिणः ॥

tasya saṃdṛśya sadbhāvamupaviṣṭasya dhīmataḥ | sarve satvāḥ samīpasthā bhavanti vanacāriṇaḥ

उन बुद्धिमान् को बैठे देखकर, उनके सद्भाव का अनुभव करके, वन में विचरने वाले सब प्राणी उनके पास आ जाते थे।

श्लोक 7 (12.116.7)

सिंहा व्याघ्राः सशरभा मत्ताश्चैव महागजाः । द्वीपिनः खड्गभल्लूका ये चान्ये भीमदर्शनाः ॥

siṃhā vyāghrāḥ saśarabhā mattāścaiva mahāgajāḥ | dvīpinaḥ khaḍgabhallūkā ye cānye bhīmadarśanāḥ

सिंह, बाघ, शरभ, मदमत्त बड़े हाथी, चीते, गैंडे, भालू और अन्य भयानक दिखने वाले जीव।

श्लोक 8 (12.116.8)

ते सुखप्रश्नदाः सर्वे भवन्ति क्षतजाशनाः । तस्यर्षेः शिष्यवच्चैव चित्तज्ञाः प्रियकारिणः ॥

te sukhapraśnadāḥ sarve bhavanti kṣatajāśanāḥ | tasyarṣeḥ śiṣyavaccaiva cittajñāḥ priyakāriṇaḥ

वे सब रक्त पीने वाले होते हुए भी उन्हें कुशल-क्षेम के वचन अर्पित करते और शिष्यों की तरह उनके मन को जानकर उन ऋषि का प्रिय करते थे।

श्लोक 9 (12.116.9)

उक्त्वा च ते सुखप्रश्नं सर्वे यान्ति यथासुखम् । ग्राम्यस्त्वेकः पशुस्तत्र नाजहात्स महामुनिम् ॥

uktvā ca te sukhapraśnaṃ sarve yānti yathāsukham | grāmyastvekaḥ paśustatra nājahātsa mahāmunim

कुशल-क्षेम का वचन देकर वे सब अपनी इच्छा से चले जाते; पर एक पालतू पशु उन महामुनि को कभी नहीं छोड़ता था।

श्लोक 10 (12.116.10)

भक्तोऽनुरक्तः सततमुपवासकृशोऽबलः । फलमूलोत्तराहारः शान्तः शिष्टाकृतिर्यथा ॥

bhakto'nuraktaḥ satatamupavāsakṛśo'balaḥ | phalamūlottarāhāraḥ śāntaḥ śiṣṭākṛtiryathā

वह उनका भक्त और अनुरागी था, उनके साथ उपवास से दुर्बल हो गया था, फल-मूल पर जीता था और शान्त तथा सुशील शिष्य के रूप जैसा दिखता था।

श्लोक 11 (12.116.11)

तस्यर्षेरुपविष्टस्य पादमूले महामतेः । मनुष्यवद्गतो भावं स्नेहबद्धोऽभवद्भृशम् ॥

tasyarṣerupaviṣṭasya pādamūle mahāmateḥ | manuṣyavadgato bhāvaṃ snehabaddho'bhavadbhṛśam

बैठे हुए उन बुद्धिमान् ऋषि के चरणों में बैठा हुआ वह पशु मनुष्य के समान भाव को प्राप्त हो गया और स्नेह से गहराई तक बँध गया।

श्लोक 12 (12.116.12)

ततोऽभ्ययान्महारौद्रो द्वीपी क्षतजभोजनः । श्वार्थमत्यर्थमुद्धुष्टः क्रूरः काल इवान्तकः ॥

tato'bhyayānmahāraudro dvīpī kṣatajabhojanaḥ | śvārthamatyarthamuddhuṣṭaḥ krūraḥ kāla ivāntakaḥ

तब एक अत्यन्त भयंकर चीता आया, जो रक्त खाता था, कुत्ते के कारण ज़ोर से गरज रहा था और अन्तक काल के समान क्रूर था।

श्लोक 13 (12.116.13)

लेलिह्यमानस्तृषितः पुच्छास्फोटनतत्परः । व्यादितास्यः क्षुधाभुग्नः प्रार्थयानस्तदामिषम् ॥

lelihyamānastṛṣitaḥ pucchāsphoṭanatatparaḥ | vyāditāsyaḥ kṣudhābhugnaḥ prārthayānastadāmiṣam

वह जीभ से होंठ चाटता, प्यासा, पूँछ पटकता, मुँह फाड़े और भूख से झुका हुआ उस मांस को चाह रहा था।

श्लोक 14 (12.116.14)

दृष्ट्वा तं क्रूरमायान्तं जीवितार्थी नराधिप । प्रोवाच श्वा मुनिं तत्र तच्छृणुष्व विशांपते ॥

dṛṣṭvā taṃ krūramāyāntaṃ jīvitārthī narādhipa | provāca śvā muniṃ tatra tacchṛṇuṣva viśāṃpate

उस क्रूर को आते देखकर, प्राण बचाने की इच्छा से कुत्ते ने वहाँ मुनि से कहा। हे नरेश्वर, उसे सुनो।

श्वोवाच

श्लोक 15 (12.116.15)

श्वशत्रुर्भगवन्नेष द्वीपी मां हन्तुमिच्छति । त्वत्प्रसादाद्भयं न स्यादस्मान्मम महामुने । तथा कुरु महाबाहो सर्वज्ञस्त्वं न संशयः ॥

śvaśatrurbhagavanneṣa dvīpī māṃ hantumicchati | tvatprasādādbhayaṃ na syādasmānmama mahāmune | tathā kuru mahābāho sarvajñastvaṃ na saṃśayaḥ

"भगवन्, कुत्ते का शत्रु यह चीता मुझे मारना चाहता है। हे महामुनि, आपकी कृपा से मुझे इससे भय न रहे। हे महाबाहो, ऐसा ही कीजिए; आप सर्वज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (12.116.16)

स मुनिस्तस्य विज्ञाय भावज्ञो भयकारणम् । रुतज्ञः सर्वसत्वानां तमैश्वर्यसमन्वितः ॥

sa munistasya vijñāya bhāvajño bhayakāraṇam | rutajñaḥ sarvasatvānāṃ tamaiśvaryasamanvitaḥ

मन को जानने वाले उन ऋषि ने कुत्ते के भाव और उसके भय का कारण समझ लिया; वे सब प्राणियों की बोली जानते थे और ऐश्वर्य से सम्पन्न थे।

मुनिरुवाच

श्लोक 17 (12.116.17)

न भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचन । एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ॥

na bhayaṃ dvīpinaḥ kāryaṃ mṛtyutaste kathaṃcana | eṣa śvarūparahito dvīpī bhavasi putraka

"तुम्हें चीते से मृत्यु का भय किसी प्रकार नहीं करना चाहिए। पुत्र, तुम कुत्ते का रूप छोड़कर चीता हो जाओ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (12.116.18)

ततः श्वा द्वीपितां नीतो जाम्बूनदनिभाकृतिः । चित्राङ्गो विस्फुरद्दंष्ट्रो वने वसति निर्भयः ॥

tataḥ śvā dvīpitāṃ nīto jāmbūnadanibhākṛtiḥ | citrāṅgo visphuraddaṃṣṭro vane vasati nirbhayaḥ

इस प्रकार कुत्ता चीता बना दिया गया; उसका शरीर सोने जैसा चमकता था, अंग चितकबरे थे, दाँत चमकते थे और वह वन में निर्भय रहने लगा।

श्लोक 19 (12.116.19)

तं दृष्ट्वा संमुखे द्वीपी आत्मनः सदृशं पशुम् । अविरुद्धस्ततस्तस्य क्षणेन समपद्यत ॥

taṃ dṛṣṭvā saṃmukhe dvīpī ātmanaḥ sadṛśaṃ paśum | aviruddhastatastasya kṣaṇena samapadyata

दूसरा चीता अपने ही समान पशु को सामने देखकर क्षण भर में उसके प्रति शत्रुता से रहित हो गया।

श्लोक 20 (12.116.20)

ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः । द्वीपिनं लेलिहन्वक्रं व्याघ्रो रुधिरलालसः ॥

tato'bhyayānmahāraudro vyāditāsyaḥ kṣudhānvitaḥ | dvīpinaṃ lelihanvakraṃ vyāghro rudhiralālasaḥ

तब एक अत्यन्त भयानक बाघ आया, जिसका मुँह खुला था, जो भूख से भरा और रक्त का लोभी था, और चीते की ओर जबड़े चाटता हुआ बढ़ा।

श्लोक 21 (12.116.21)

व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधा भुग्नं दंष्ट्रिणं वनचारिणम् । द्वीपी जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेयिवान् ॥

vyāghraṃ dṛṣṭvā kṣudhā bhugnaṃ daṃṣṭriṇaṃ vanacāriṇam | dvīpī jīvitarakṣārthamṛṣiṃ śaraṇameyivān

भूख से झुके हुए, दाढ़ों वाले, वन में घूमने वाले बाघ को देखकर चीते ने प्राण बचाने के लिए ऋषि की शरण ली।

श्लोक 22 (12.116.22)

ततः संवासजं स्नेहमृषिणा कुर्वता तदा । स द्वीपी व्याघ्रतां नीतो रिपुभ्यो बलवत्तरः ॥

tataḥ saṃvāsajaṃ snehamṛṣiṇā kurvatā tadā | sa dvīpī vyāghratāṃ nīto ripubhyo balavattaraḥ

तब साथ रहने से उत्पन्न स्नेह के कारण ऋषि ने उस चीते को बाघ बना दिया, जो शत्रुओं से अधिक बलवान् था।

श्लोक 23 (12.116.23)

ततो दृष्ट्वा स शार्दूलो नाभ्यघ्नत्तं विशांपते । स तु श्वा व्याघ्रतां प्राप्य बलवान्पिशिताशनः ॥

tato dṛṣṭvā sa śārdūlo nābhyaghnattaṃ viśāṃpate | sa tu śvā vyāghratāṃ prāpya balavānpiśitāśanaḥ

तब उसे देखकर उस बाघ ने उस पर आक्रमण नहीं किया, हे नरेश्वर; और वह कुत्ता बलवान्, मांसभक्षी बाघ बनकर

श्लोक 24 (12.116.24)

न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत्तदा । यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः । तथैव स महाराज व्याघ्रः समभवत्तदा ॥

na mūlaphalabhogeṣu spṛhāmapyakarottadā | yathā mṛgapatirnityaṃ prakāṅkṣati vanaukasaḥ | tathaiva sa mahārāja vyāghraḥ samabhavattadā

तब कन्द-मूल और फल खाने की इच्छा तक नहीं रखता था। जैसे मृगराज सदा वन के जीवों को चाहता है, वैसे ही, हे महाराज, वह बाघ उस समय हो गया।

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