शान्ति पर्व · अध्याय 117
मुनि द्वारा कुत्ते को शरभ बनाना और शाप देना
भीष्म तपस्वी और उसके कुत्ते की कथा आगे सुनाते हैं। मुनि बाघ को हाथी बनाते हैं, सिंह के आने पर हाथी को सिंह, और जंगली शरभ के आने पर सिंह को शरभ बना देते हैं। शरभ बना वह जीव कृतघ्न होकर ऋषि को मारने का निश्चय करता है, ताकि वे दूसरों को ऐसी शक्ति न दे सकें। ऋषि ज्ञान-दृष्टि से यह जान लेते हैं, अपनी शक्ति बताते हैं, उसके सब रूप गिनाते हैं और शाप देते हैं कि वह फिर कुत्ता हो जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.117.1)
व्याघ्रस्तूटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः । नागश्चागात्तमुद्देशं मत्तो मेघ इवोत्थितः ॥
vyāghrastūṭajamūlasthastṛptaḥ supto hatairmṛgaiḥ | nāgaścāgāttamuddeśaṃ matto megha ivotthitaḥ
बाघ तृप्त होकर अपने मारे हुए मृगों के बीच कुटिया की जड़ में सोया हुआ था; और मदमत्त हाथी, बादल की तरह उठा हुआ, उस स्थान पर आ गया।
श्लोक 2 (12.117.2)
प्रभिन्नकरटः प्रांशुः पद्मी विततकुम्भकः । सुविषाणो महाकायो मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥
prabhinnakaraṭaḥ prāṃśuḥ padmī vitatakumbhakaḥ | suviṣāṇo mahākāyo meghagambhīraniḥsvanaḥ
वह ऊँचा था, उसके गण्डस्थल मद से फटे हुए थे, शरीर पर कमल जैसे चिह्न थे, मस्तक चौड़ा था, दाँत सुन्दर थे, देह विशाल थी और स्वर मेघ की तरह गम्भीर था।
श्लोक 3 (12.117.3)
तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमायान्तं बलगर्वितम् । व्याघ्रो हस्तिभयात्त्रस्तस्तमृषिं शरणं ययौ ॥
taṃ dṛṣṭvā kuñjaraṃ mattamāyāntaṃ balagarvitam | vyāghro hastibhayāttrastastamṛṣiṃ śaraṇaṃ yayau
उस मदमत्त, बल के गर्व से भरे हाथी को आते देखकर बाघ हाथी के भय से त्रस्त होकर ऋषि की शरण में गया।
श्लोक 4 (12.117.4)
ततोऽनयत्कुञ्जरत्वं व्याघ्रं तमृषिसत्तमः । महामेघोपमं दृष्ट्वा स भीतो ह्यभवद्गजः ॥
tato'nayatkuñjaratvaṃ vyāghraṃ tamṛṣisattamaḥ | mahāmeghopamaṃ dṛṣṭvā sa bhīto hyabhavadgajaḥ
तब ऋषिश्रेष्ठ ने उस बाघ को हाथी का रूप दे दिया; और बड़े बादल के समान उसे देखकर वह दूसरा हाथी भयभीत हो गया।
श्लोक 5 (12.117.5)
ततः कमलषण्डानि सल्लकीगहनानि च । व्यचरत्स मुदायुक्तः पद्मरेणुविभूषितः ॥
tataḥ kamalaṣaṇḍāni sallakīgahanāni ca | vyacaratsa mudāyuktaḥ padmareṇuvibhūṣitaḥ
तब वह प्रसन्न होकर कमल-समूहों और सल्लकी के घने वनों में विचरता रहा, कमल के पराग से विभूषित।
श्लोक 6 (12.117.6)
कदाचिद्रममाणस्य हस्तिनः संमुखं तदा । ऋषेस्तस्योटजस्थस्य कालोऽगच्छद्दिवानिशम् ॥
kadācidramamāṇasya hastinaḥ saṃmukhaṃ tadā | ṛṣestasyoṭajasthasya kālo'gacchaddivāniśam
जब हाथी उनके सामने क्रीड़ा करता रहा, तब कुटिया में रहने वाले उन ऋषि का दिन-रात का समय बीतता रहा।
श्लोक 7 (12.117.7)
अथाजगाम तं देशं केसरी केसरारुणः । गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ॥
athājagāma taṃ deśaṃ kesarī kesarāruṇaḥ | girikandarajo bhīmaḥ siṃho nāgakulāntakaḥ
तब उस स्थान पर एक सिंह आया, जो अपनी अयाल से लाल-पीला दीखता था, पर्वत की गुफा में जन्मा था, भयंकर था और हाथियों के झुण्ड का नाश करने वाला था।
श्लोक 8 (12.117.8)
तं दृष्ट्वा सिंहमायान्तं नागः सिंहभयार्दितः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानो भयातुरः ॥
taṃ dṛṣṭvā siṃhamāyāntaṃ nāgaḥ siṃhabhayārditaḥ | ṛṣiṃ śaraṇamāpede vepamāno bhayāturaḥ
सिंह को आता देखकर सिंह के भय से पीड़ित हाथी काँपता हुआ और भय से व्याकुल होकर ऋषि की शरण में गया।
श्लोक 9 (12.117.9)
स ततः सिंहतां नीतो गजेन्द्रो मुनिना तदा । तं च नागणयत्सिंहं तुल्यजातिसमन्वयात् ॥
sa tataḥ siṃhatāṃ nīto gajendro muninā tadā | taṃ ca nāgaṇayatsiṃhaṃ tulyajātisamanvayāt
तब मुनि ने उस गजराज को सिंह बना दिया; और समान जाति का हो जाने के कारण उसने उस दूसरे सिंह की कुछ भी परवाह नहीं की।
श्लोक 10 (12.117.10)
दृष्ट्वा च सोऽभवत्सिंहो वन्यो हिंसन्नवाग्बलः । स चाश्रमेऽवसत्सिंहस्तस्मिन्नेव सुखी वने ॥
dṛṣṭvā ca so'bhavatsiṃho vanyo hiṃsannavāgbalaḥ | sa cāśrame'vasatsiṃhastasminneva sukhī vane
उसे देखकर जंगली सिंह का बल, हानि पहुँचाने की इच्छा रखते हुए भी, दब गया; और ऋषि का वह सिंह उसी वन में आश्रम में सुख से रहने लगा।
श्लोक 11 (12.117.11)
न चान्ये क्षुद्रपशवस्तपोवनसमीपतः । व्यदृश्यन्त तदा त्रस्ता जीविताकाङ्क्षिणस्तथा ॥
na cānye kṣudrapaśavastapovanasamīpataḥ | vyadṛśyanta tadā trastā jīvitākāṅkṣiṇastathā
तपोवन के समीप तब कोई और छोटा पशु दिखाई नहीं देता था; वे सब भयभीत थे और अपने प्राण बचाना चाहते थे।
श्लोक 12 (12.117.12)
कदाचित्कालयोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः । बलवान्क्षतजाहारो नानासत्वभयंकरः ॥
kadācitkālayogena sarvaprāṇivihiṃsakaḥ | balavānkṣatajāhāro nānāsatvabhayaṃkaraḥ
एक बार काल के योग से एक ऐसा जीव आया जो सब प्राणियों को मारने वाला, बलवान्, रक्त खाने वाला और अनेक प्रकार के प्राणियों को भयभीत करने वाला था:
श्लोक 13 (12.117.13)
अष्टपादूर्ध्वनयनः शरभो वनगोचरः । तं सिंहं हन्तुमागच्छन्मुनेस्तस्य निवेशने ॥
aṣṭapādūrdhvanayanaḥ śarabho vanagocaraḥ | taṃ siṃhaṃ hantumāgacchanmunestasya niveśane
आठ पैरों वाला, ऊपर की ओर नेत्र किए हुए, वन में घूमने वाला शरभ, जो उस सिंह को मारने के लिए मुनि के निवास पर आ पहुँचा।
श्लोक 14 (12.117.14)
तं दृष्ट्वा शरभं यान्तं सिंहः परभयान्वितः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानः कृताञ्जलिः ॥
taṃ dṛṣṭvā śarabhaṃ yāntaṃ siṃhaḥ parabhayānvitaḥ | ṛṣiṃ śaraṇamāpede vepamānaḥ kṛtāñjaliḥ
शरभ को आता देखकर सिंह दूसरे के भय से घिरकर काँपता हुआ और हाथ जोड़े हुए ऋषि की शरण में गया।
श्लोक 15 (12.117.15)
तं मुनिः शरभं चक्रे बलोत्कटमरिंदम । ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः । दृष्ट्वा बलिनमत्युग्रं द्रुतं संप्राद्रवद्वनम् ॥
taṃ muniḥ śarabhaṃ cakre balotkaṭamariṃdama | tataḥ sa śarabho vanyo muneḥ śarabhamagrataḥ | dṛṣṭvā balinamatyugraṃ drutaṃ saṃprādravadvanam
हे शत्रुदमन, मुनि ने उसे अत्यन्त बलवान् शरभ बना दिया। तब वह जंगली शरभ मुनि के सामने उस बलवान् और अति उग्र शरभ को देखकर शीघ्र वन में भाग गया।
श्लोक 16 (12.117.16)
स एवं शरभस्थाने न्यस्तो वै मुनिना तदा । मुनेः पार्श्वगतो नित्यं शरभः सुखमाप्तवान् ॥
sa evaṃ śarabhasthāne nyasto vai muninā tadā | muneḥ pārśvagato nityaṃ śarabhaḥ sukhamāptavān
इस प्रकार मुनि द्वारा शरभ के स्थान पर बिठाया गया वह शरभ सदा मुनि के पास रहकर सुख पाता रहा।
श्लोक 17 (12.117.17)
ततः शरभसंत्रस्ताः सर्वे मृगगणा वनात् । दिशः संप्राद्रवन्राजन्भयाज्जीवितकाङ्क्षिणः ॥
tataḥ śarabhasaṃtrastāḥ sarve mṛgagaṇā vanāt | diśaḥ saṃprādravanrājanbhayājjīvitakāṅkṣiṇaḥ
तब वन के सब मृगों के झुण्ड शरभ से डरकर, हे राजन्, प्राण बचाने की इच्छा से भय के मारे चारों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 18 (12.117.18)
शरभोऽप्यतिसंहृष्टो नित्यं प्राणिवधे रतः । फलमूलाशनं कर्तुं नैच्छत्स पिशिताशनः ॥
śarabho'pyatisaṃhṛṣṭo nityaṃ prāṇivadhe rataḥ | phalamūlāśanaṃ kartuṃ naicchatsa piśitāśanaḥ
शरभ भी अत्यन्त प्रसन्न होकर, सदा प्राणियों को मारने में रत, मांसभक्षी होने के कारण फल-मूल खाना नहीं चाहता था।
श्लोक 19 (12.117.19)
ततः क्षुद्रसमाचारो बलेन च समन्वितः । इयेष तं मुनिं हन्तुमकृतज्ञः कृतान्वयः ॥
tataḥ kṣudrasamācāro balena ca samanvitaḥ | iyeṣa taṃ muniṃ hantumakṛtajñaḥ kṛtānvayaḥ
तब छोटे आचरण वाला, बल से युक्त, कृतघ्न वह, जिसका यह रूप स्वयं मुनि का बनाया हुआ था, उन्हीं मुनि को मारना चाहने लगा।
श्लोक 20 (12.117.20)
चिन्तयामास च तदा शरभः श्वानपूर्वकः ॥
cintayāmāsa ca tadā śarabhaḥ śvānapūrvakaḥ
और तब पहले कुत्ता रहे उस शरभ ने सोचा:
श्लोक 21 (12.117.21)
अस्य प्रभावात्संप्राप्तो वाङ्मात्रेणैव केवलम् । शरभत्वं सुदुष्प्रापं सर्वभूतभयंकरम् ॥
asya prabhāvātsaṃprāpto vāṅmātreṇaiva kevalam | śarabhatvaṃ suduṣprāpaṃ sarvabhūtabhayaṃkaram
"इसी के प्रभाव से मुझे केवल वाणी मात्र से शरभ का वह पद मिल गया, जो पाना बहुत कठिन है और सब प्राणियों को भयभीत करता है।
श्लोक 22 (12.117.22)
अन्येऽप्यत्र भयत्रस्ताः सन्ति सत्वा भयार्दिताः । मुनिमाश्रित्य जीवन्तो मृगाः पक्षिगणास्तथा ॥
anye'pyatra bhayatrastāḥ santi satvā bhayārditāḥ | munimāśritya jīvanto mṛgāḥ pakṣigaṇāstathā
यहाँ और भी भय से घिरे और भय से पीड़ित प्राणी हैं, पशु और पक्षियों के झुण्ड, जो इस मुनि का आश्रय लेकर जीते हैं।
श्लोक 23 (12.117.23)
तेषामपि कदाचिच्च शरभत्वं प्रयच्छति । सर्वसत्वोत्तमं लोके बलं यत्र प्रतिष्ठितम् ॥
teṣāmapi kadācicca śarabhatvaṃ prayacchati | sarvasatvottamaṃ loke balaṃ yatra pratiṣṭhitam
कभी वे उन्हें भी शरभ का पद दे सकते हैं, जो संसार में सब प्राणियों में श्रेष्ठ है और जिसमें बल प्रतिष्ठित है।
श्लोक 24 (12.117.24)
पक्षिणामप्ययं दद्यात्कदाचिद्गारुडं बलम् ॥
pakṣiṇāmapyayaṃ dadyātkadācidgāruḍaṃ balam
वे पक्षियों को भी किसी दिन गरुड़ का बल दे सकते हैं।
श्लोक 25 (12.117.25)
यावदन्यस्य संप्रीतः कारुण्यं तु समाश्रितः । न ददाति बलं तुष्टः सत्वस्यान्यस्य कस्यचित् ॥
yāvadanyasya saṃprītaḥ kāruṇyaṃ tu samāśritaḥ | na dadāti balaṃ tuṣṭaḥ satvasyānyasya kasyacit
जब तक वे प्रसन्न और करुणा में स्थित होकर सन्तुष्ट भाव से किसी दूसरे प्राणी को बल नहीं दे देते,
श्लोक 26 (12.117.26)
तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रतः । स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशयः ॥
tāvadenamahaṃ vipraṃ vadhiṣyāmi ca śīghrataḥ | sthātuṃ mayā śakyamiha munighātānna saṃśayaḥ
तब तक मैं इस ब्राह्मण को शीघ्र मार डालूँगा। मुनि को मारे बिना मेरा यहाँ रहना सम्भव नहीं; इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 27 (12.117.27)
ततस्तेन तपःशक्त्या विदितो ज्ञानचक्षुषा । विज्ञाय च मुनिः प्राज्ञस्ततः शापं प्रयुक्तवान् ॥
tatastena tapaḥśaktyā vidito jñānacakṣuṣā | vijñāya ca muniḥ prājñastataḥ śāpaṃ prayuktavān
तब अपनी तपःशक्ति और ज्ञान-दृष्टि से मुनि ने उसे पहचान लिया; और जानकर उन बुद्धिमान् मुनि ने उसे शाप दिया।
मुनिरुवाच
श्लोक 28 (12.117.28)
अहमग्निप्रभो नाम मुनिर्भृगुकुलान्वयः । मनसा निर्दहेयं च जगत्संधारयामि च ॥
ahamagniprabho nāma munirbhṛgukulānvayaḥ | manasā nirdaheyaṃ ca jagatsaṃdhārayāmi ca
"मैं अग्निप्रभ नामक मुनि हूँ, भृगु के कुल में उत्पन्न। मैं मन से जगत् को जला सकता हूँ, और मैं ही उसे धारण भी करता हूँ।
श्लोक 29 (12.117.29)
मम वश्यं जगत्सर्वं देवा यच्च चराचरम् । सन्ति देवाश्च ये भीताः स्वधर्मं न त्यजन्ति ये । स्वधर्माच्चलितान्सर्वान्वाङ्मात्रेणापि निर्दहे ॥
mama vaśyaṃ jagatsarvaṃ devā yacca carācaram | santi devāśca ye bhītāḥ svadharmaṃ na tyajanti ye | svadharmāccalitānsarvānvāṅmātreṇāpi nirdahe
सारा जगत्, देवता और जो कुछ चर-अचर है, मेरे वश में है। ऐसे देवता भी हैं जो भयभीत होकर अपना धर्म नहीं छोड़ते; और जो अपने धर्म से डिग जाते हैं, उन सबको मैं केवल वाणी से जला देता हूँ।
श्लोक 30 (12.117.30)
किमङ्ग त्वं मया नीतः शरभत्वमनामयम् । क्रूरः स सर्वभूतेषु हीनश्चाशुचिरेव च ॥
kimaṅga tvaṃ mayā nītaḥ śarabhatvamanāmayam | krūraḥ sa sarvabhūteṣu hīnaścāśucireva ca
फिर तुम्हारी तो बात ही क्या, जिसे मैंने रोगरहित शरभ के पद पर पहुँचाया — तुम जो सब प्राणियों के प्रति क्रूर, नीच और अपवित्र हो!
श्लोक 31 (12.117.31)
श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपी व्याघ्रत्वमागतः । व्याघ्रान्नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमागतः ॥
śvā tvaṃ dvīpitvamāpanno dvīpī vyāghratvamāgataḥ | vyāghrānnāgo madapaṭurnāgaḥ siṃhatvamāgataḥ
तुम कुत्ते थे, फिर चीता हुए; चीते से बाघ हुए; बाघ से मद बहाता हाथी हुए; और हाथी से सिंह हुए।
श्लोक 32 (12.117.32)
सिंहस्त्वं बलमापन्नो भूयः शरभतां गतः । मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वयः ॥
siṃhastvaṃ balamāpanno bhūyaḥ śarabhatāṃ gataḥ | mayā snehaparītena visṛṣṭo na kulānvayaḥ
सिंह होकर तुमने बल पाया और फिर शरभ बने। स्नेह से भरकर मैंने तुम्हें ये अनेक रूप दिए; पर कुल से तुम इनमें से किसी के नहीं हो।
श्लोक 33 (12.117.33)
यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि । तस्मात्स्वयोनिमापन्नः पुनः श्वानो भविष्यसि ॥
yasmādevamapāpaṃ māṃ pāpa hiṃsitumicchasi | tasmātsvayonimāpannaḥ punaḥ śvāno bhaviṣyasi
हे पापी, तुम मुझ निरपराध को मारना चाहते हो, इसलिए अपनी ही योनि को प्राप्त होकर तुम फिर कुत्ते हो जाओगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (12.117.34)
ततो मुनिजनद्वेष्टा दुष्टात्मा प्राकृतोऽबुधः । ऋषिणा शरभः शप्तस्तद्रूपं पुनराप्तवान् ॥
tato munijanadveṣṭā duṣṭātmā prākṛto'budhaḥ | ṛṣiṇā śarabhaḥ śaptastadrūpaṃ punarāptavān
तब मुनियों से द्वेष रखने वाला, दुष्टात्मा, नीच और अज्ञानी वह शरभ, ऋषि के शाप से, फिर उसी रूप को प्राप्त हो गया।