शान्ति पर्व · अध्याय 118
मन्त्रियों, सचिवों और योद्धाओं का चयन
भीष्म ऋषि द्वारा पशु-योनियों में उठाकर फिर कुत्ता बना दिए गए श्वान की कथा समाप्त करते हैं और उससे शिक्षा निकालते हैं: किसी को पद देने से पहले राजा को उसके कुल, शील और स्वभाव की परीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि नीच कुल के लोग सत्ता पाकर स्वामी के ही विरोधी हो जाते हैं। वे मन्त्री और योद्धा के अनेक गुण गिनाते हैं, राज्य को चिरकाल तक टिकाए रखने के लक्षणों पर बृहस्पति के श्लोक सुनाते हैं, और कहते हैं कि सब मनुष्यों को अपने साथ जोड़ने वाला राजा सारी पृथ्वी जीत सकता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.118.1)
स श्वा प्रकृतिमापन्नः परं दैन्यमुपागमत् । ऋषिणा हुंकृतः पापस्तपोवनबहिष्कृतः ॥
sa śvā prakṛtimāpannaḥ paraṃ dainyamupāgamat | ṛṣiṇā huṃkṛtaḥ pāpastapovanabahiṣkṛtaḥ
अपने मूल स्वभाव में लौटा हुआ वह कुत्ता अत्यन्त दीन दशा को प्राप्त हुआ; ऋषि की हुंकार से फटकारा गया वह पापी तपोवन से बाहर निकाल दिया गया।
श्लोक 2 (12.118.2)
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा शीलशौचताम् । आर्जवं प्रकृतिं सत्वं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम् ॥
evaṃ rājñā matimatā viditvā śīlaśaucatām | ārjavaṃ prakṛtiṃ satvaṃ śrutaṃ vṛttaṃ kulaṃ damam
इस प्रकार बुद्धिमान् राजा किसी पुरुष के शील और शुचिता, सरलता, प्रकृति और सत्त्व, शास्त्रज्ञान, आचरण, कुल और संयम को जानकर,
श्लोक 3 (12.118.3)
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रशमं क्षमाम् । भृत्या ये मन्त्रिणो योग्यास्तत्र स्थाप्याः सुरक्षिताः ॥
anukrośaṃ balaṃ vīryaṃ prabhāvaṃ praśamaṃ kṣamām | bhṛtyā ye mantriṇo yogyāstatra sthāpyāḥ surakṣitāḥ
उसकी दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, शान्ति और क्षमा को परखकर, जो सेवक और मन्त्री जिस पद के योग्य हों, उन्हें वहीं नियुक्त करे और भलीभाँति उनकी रक्षा करे।
श्लोक 4 (12.118.4)
नापरीक्ष्य महीपालः प्रकर्तुं भृत्यमर्हति । अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ॥
nāparīkṣya mahīpālaḥ prakartuṃ bhṛtyamarhati | akulīnanarākīrṇo na rājā sukhamedhate
राजा को बिना परीक्षा किए किसी को सेवा में नहीं लेना चाहिए; जिस राजा के पास नीच कुल के लोग भरे हों, वह सुख से नहीं बढ़ता।
श्लोक 5 (12.118.5)
कुलजः प्राकृतो राजंस्तत्कुलीनतया सदा । न पापे कुरुते बुद्धिं निन्द्यमानोऽप्यनागसि ॥
kulajaḥ prākṛto rājaṃstatkulīnatayā sadā | na pāpe kurute buddhiṃ nindyamāno'pyanāgasi
हे राजन्, कुलीन पुरुष साधारण स्थिति का हो तो भी अपने कुल की मर्यादा के कारण निर्दोष होने पर निन्दित किए जाने पर भी पाप की ओर मन नहीं लगाता।
श्लोक 6 (12.118.6)
अकुलीनस्तु पुरुषः प्राकृतः साधुसंक्षयात् । दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ॥
akulīnastu puruṣaḥ prākṛtaḥ sādhusaṃkṣayāt | durlabhaiśvaryatāṃ prāpto ninditaḥ śatrutāṃ vrajet
परन्तु नीच कुल का पुरुष, सज्जनों के नाश से ऊँचा उठकर कठिनता से मिलने वाला ऐश्वर्य पा लेने पर, निन्दा किए जाने पर शत्रुता करने लगता है।
श्लोक 7 (12.118.7)
काकः श्वानोऽकुलीनश्च बिडालः सर्प एव च । अकुलीना च या नारी तुल्यास्ते परिकीर्तिताः ॥
kākaḥ śvāno'kulīnaśca biḍālaḥ sarpa eva ca | akulīnā ca yā nārī tulyāste parikīrtitāḥ
कौआ, कुत्ता, नीच कुल का पुरुष, बिल्ली, साँप और नीच कुल की स्त्री, ये सब एक समान कहे गए हैं।
श्लोक 8 (12.118.8)
लोकपालाः सदोद्विग्नाः पश्यन्त्यकुलजान्यथा । नारीं वा पुरुषं वाऽथ शीलं तत्रापि कारणम् ॥
lokapālāḥ sadodvignāḥ paśyantyakulajānyathā | nārīṃ vā puruṣaṃ vā'tha śīlaṃ tatrāpi kāraṇam
लोकपाल सदा उद्विग्न रहकर कुलहीन स्त्री या पुरुष को सशंक दृष्टि से देखते हैं; फिर भी इस विषय में भी शील ही कारण है।
श्लोक 9 (12.118.9)
दुष्कुलीना च या स्त्री स्याद्दुष्कुलीनश्च यः पुमान् । अहिंसाशीलसंयोगाद्धर्मश्चाऽऽकुलतां व्रजेत् ॥
duṣkulīnā ca yā strī syādduṣkulīnaśca yaḥ pumān | ahiṃsāśīlasaṃyogāddharmaścā''kulatāṃ vrajet
जो स्त्री बुरे कुल की हो या जो पुरुष बुरे कुल का हो, उनके अहिंसा और शील से संयोग के कारण धर्म भी आकुलता को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 10 (12.118.10)
धर्मं प्रति महाराज श्लोकानाह बृहस्पतिः । शृणु सर्वान्महीपाल हृदि तांश्च करिष्यसि ॥
dharmaṃ prati mahārāja ślokānāha bṛhaspatiḥ | śṛṇu sarvānmahīpāla hṛdi tāṃśca kariṣyasi
हे महाराज, धर्म के विषय में बृहस्पति ने श्लोक कहे थे; हे भूपाल, उन सबको सुनो, और तुम उन्हें हृदय में धारण करोगे।
श्लोक 11 (12.118.11)
असितं सितकर्माणं यथा दान्तं तपस्विनम् । वृत्तस्थमपि चण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥
asitaṃ sitakarmāṇaṃ yathā dāntaṃ tapasvinam | vṛttasthamapi caṇḍālaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ
जो काले वर्ण का होकर भी शुद्ध कर्म वाला, संयमी और तपस्वी के समान हो, ऐसे चाण्डाल को भी, यदि वह सदाचार में स्थित हो, देवता ब्राह्मण ही जानते हैं।
श्लोक 12 (12.118.12)
यदि घातयते कश्चित्पापसत्वं प्रजाहितः । सर्वसत्वहितार्थाय न तेनासौ विहिंसकः ॥
yadi ghātayate kaścitpāpasatvaṃ prajāhitaḥ | sarvasatvahitārthāya na tenāsau vihiṃsakaḥ
यदि कोई प्रजा का हित चाहने वाला सब प्राणियों के हित के लिए किसी पापी प्रकृति के जीव को मरवाता है, तो इससे वह हिंसक नहीं होता।
श्लोक 13 (12.118.13)
द्वीपिनं शरभं सिंहं व्याघ्रं कुञ्जरमेव च । महिषं च वराहं च सूकरं श्वानपन्नगान् ॥
dvīpinaṃ śarabhaṃ siṃhaṃ vyāghraṃ kuñjarameva ca | mahiṣaṃ ca varāhaṃ ca sūkaraṃ śvānapannagān
तेन्दुआ, शरभ, सिंह, बाघ, हाथी, भैंसा, जंगली सूअर, सूअर, कुत्ते और साँप,
श्लोक 14 (12.118.14)
गोब्राह्मणहितार्थाय बालस्त्रीरक्षणाय च । वृद्धातुरपरित्राणे यो हिनस्ति स धर्मवित् ॥
gobrāhmaṇahitārthāya bālastrīrakṣaṇāya ca | vṛddhāturaparitrāṇe yo hinasti sa dharmavit
इन्हें जो गौओं और ब्राह्मणों के हित के लिए, बालकों और स्त्रियों की रक्षा के लिए तथा वृद्धों और रोगियों को बचाने के लिए मारता है, वह धर्म को जानने वाला है।
श्लोक 15 (12.118.15)
ब्राह्मणः पापकर्मा च म्लेच्छो वा धार्मिकः शुचिः । श्रेयांस्तत्र भवेन्म्लेच्छो ब्राह्मणः पापकृत्तमः ॥
brāhmaṇaḥ pāpakarmā ca mleccho vā dhārmikaḥ śuciḥ | śreyāṃstatra bhavenmleccho brāhmaṇaḥ pāpakṛttamaḥ
पापकर्म करने वाले ब्राह्मण और धार्मिक तथा शुद्ध म्लेच्छ में से म्लेच्छ श्रेष्ठ है; पाप करने वाला ब्राह्मण तो अत्यन्त नीच है।
श्लोक 16 (12.118.16)
दुष्कुलीनः कुलीनो वा यः कश्चिच्छीलवान्नरः । प्रकृतिं तस्य विज्ञाय स्थिरां वा यदि वाऽस्थिराम् ॥
duṣkulīnaḥ kulīno vā yaḥ kaścicchīlavānnaraḥ | prakṛtiṃ tasya vijñāya sthirāṃ vā yadi vā'sthirām
बुरे कुल का हो या अच्छे कुल का, जो भी शीलवान् पुरुष हो, उसकी प्रकृति को, चाहे वह स्थिर हो या अस्थिर, जानकर,
श्लोक 17 (12.118.17)
शीलं वाऽनुत्तमं कर्म कुर्याद्राजा समाहितः । नियुञ्जीत महीपालो दुर्वृत्तं पापकर्मसु ॥
śīlaṃ vā'nuttamaṃ karma kuryādrājā samāhitaḥ | niyuñjīta mahīpālo durvṛttaṃ pāpakarmasu
सावधान राजा उसके शील या उसके उत्तम कर्म को ध्यान में रखे; और दुराचारी पुरुष को पृथ्वीपति पापकर्मों में लगाए।
श्लोक 18 (12.118.18)
कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानकोविदम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ॥
kulīnaṃ śikṣitaṃ prājñaṃ jñānavijñānakovidam | sarvaśāstrārthatattvajñaṃ sahiṣṇuṃ deśajaṃ tathā
कुलीन, शिक्षित, बुद्धिमान्, ज्ञान और विज्ञान में निपुण, सब शास्त्रों के अर्थ और तत्त्व को जानने वाला, सहनशील और उसी देश में उत्पन्न,
श्लोक 19 (12.118.19)
कृतज्ञं बलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् । अलुब्धं लब्धसंतुष्टं स्वामिमित्रबुभूषकम् ॥
kṛtajñaṃ balavantaṃ ca kṣāntaṃ dāntaṃ jitendriyam | alubdhaṃ labdhasaṃtuṣṭaṃ svāmimitrabubhūṣakam
कृतज्ञ, बलवान्, क्षमाशील, संयमी, इन्द्रियों को जीतने वाला, लोभरहित, जो मिले उसमें सन्तुष्ट, अपने स्वामी और मित्रों की उन्नति चाहने वाला,
श्लोक 20 (12.118.20)
सचिवं देशकालज्ञं सर्वसंग्रहणे रतम् । संस्कृतं युक्तवचनं हितैषिणमतन्द्रितम् ॥
sacivaṃ deśakālajñaṃ sarvasaṃgrahaṇe ratam | saṃskṛtaṃ yuktavacanaṃ hitaiṣiṇamatandritam
देश और काल को जानने वाला, सबको अपनाने में लगा रहने वाला, संस्कारी, उचित वचन बोलने वाला, हित चाहने वाला और आलस्यरहित मन्त्री,
श्लोक 21 (12.118.21)
युक्ताचारं स्वविषये संधिविग्रहकोविदम् । शस्तं त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रियम् ॥
yuktācāraṃ svaviṣaye saṃdhivigrahakovidam | śastaṃ trivargavettāraṃ paurajānapadapriyam
अपने राज्य में उचित आचरण करने वाला, सन्धि और विग्रह में निपुण, प्रशंसित, धर्म-अर्थ-काम को जानने वाला, नगरवासियों और देहातियों का प्रिय,
श्लोक 22 (12.118.22)
सेनाव्यूहनतत्त्वज्ञं बलहर्षणकोविदम् । इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्रासेनाविशारदम् ॥
senāvyūhanatattvajñaṃ balaharṣaṇakovidam | iṅgitākāratattvajñaṃ yātrāsenāviśāradam
सेना की व्यूह-रचना के तत्त्व को जानने वाला, सैनिकों में उत्साह भरने में निपुण, संकेतों और चेष्टाओं का रहस्य समझने वाला, कूच और सेना-संचालन में कुशल,
श्लोक 23 (12.118.23)
हस्तिशिक्षाश्वतत्त्वज्ञमहंकारविवर्जितम् । प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं बलिनं युक्तमन्त्रिणम् ॥
hastiśikṣāśvatattvajñamahaṃkāravivarjitam | pragalbhaṃ dakṣiṇaṃ dāntaṃ balinaṃ yuktamantriṇam
हाथी-घोड़ों की शिक्षा के तत्त्व को जानने वाला, अहंकाररहित, साहसी, कुशल, संयमी, बलवान् और योग्य मन्त्री,
श्लोक 24 (12.118.24)
चौक्षं चौक्षजनाकीर्णं सुवेषं सुखदर्शनम् । नायकं नीतिकुशलं गुणैः षड्भिः समन्वितम् ॥
caukṣaṃ caukṣajanākīrṇaṃ suveṣaṃ sukhadarśanam | nāyakaṃ nītikuśalaṃ guṇaiḥ ṣaḍbhiḥ samanvitam
शुद्ध, शुद्ध लोगों से घिरा हुआ, सुन्दर वेश वाला, देखने में सुखद, नीति में कुशल नायक, छह गुणों से युक्त,
श्लोक 25 (12.118.25)
अस्तब्धं प्रश्रितं श्लक्ष्णं मृदुवादिनमेव च । धीरं महर्द्धि च देशकालोपपादकम् ॥
astabdhaṃ praśritaṃ ślakṣṇaṃ mṛduvādinameva ca | dhīraṃ maharddhi ca deśakālopapādakam
अहंकाररहित, विनम्र, कोमल, मृदुभाषी, धैर्यवान्, बड़े ऐश्वर्य वाला, देश और काल के अनुसार सब जुटा देने वाला,
श्लोक 26 (12.118.26)
सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते । तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ॥
sacivaṃ yaḥ prakurute na cainamavamanyate | tasya vistīryate rājyaṃ jyotsnā grahapateriva
जो राजा ऐसे पुरुष को सचिव बनाता है और उसका अनादर नहीं करता, उसका राज्य चन्द्रमा की चाँदनी की तरह फैलता है।
श्लोक 27 (12.118.27)
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः । एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ॥
etaireva guṇairyukto rājā śāstraviśāradaḥ | eṣṭavyo dharmaparamaḥ prajāpālanatatparaḥ
इन्हीं गुणों से युक्त, शास्त्र में निपुण, धर्म को सर्वोपरि मानने वाला और प्रजा के पालन में लगा रहने वाला राजा ही खोजने योग्य है।
श्लोक 28 (12.118.28)
धीरो मर्षी शुचिः शीघ्रः काले पुरुषकारवित् । शुश्रूषुः श्रुतवाञ्श्रोता ऊहापोहविशारदः ॥
dhīro marṣī śuciḥ śīghraḥ kāle puruṣakāravit | śuśrūṣuḥ śrutavāñśrotā ūhāpohaviśāradaḥ
धीर, क्षमाशील, पवित्र, फुर्तीला, समय पर पुरुषार्थ करना जानने वाला, सुनने का इच्छुक, शास्त्रज्ञ, अच्छा श्रोता, तर्क-वितर्क में निपुण,
श्लोक 29 (12.118.29)
मेधावी धारणायुक्तो यथान्यायोपपादकः । दान्तः सदा प्रियाभाषी क्षमावांश्च विपर्यये ॥
medhāvī dhāraṇāyukto yathānyāyopapādakaḥ | dāntaḥ sadā priyābhāṣī kṣamāvāṃśca viparyaye
मेधावी, स्मरणशक्ति वाला, न्याय के अनुसार काम करने वाला, संयमी, सदा प्रिय बोलने वाला और अपकार होने पर भी क्षमा करने वाला,
श्लोक 30 (12.118.30)
नातिच्छेत्ता स्वयंकारी श्रद्धालुः सुखदर्शनः । आर्तहस्तप्रदो नित्यमाप्तामात्यो नये रतः ॥
nāticchettā svayaṃkārī śraddhāluḥ sukhadarśanaḥ | ārtahastaprado nityamāptāmātyo naye rataḥ
अत्यधिक काट-छाँट न करने वाला, स्वयं निर्णय लेकर काम करने वाला, श्रद्धालु, देखने में सुखद, दुखियों को सदा हाथ बढ़ाकर सहारा देने वाला, विश्वसनीय मन्त्रियों वाला, नीति में लगा रहने वाला,
श्लोक 31 (12.118.31)
नाहंवादी ननिर्द्वन्द्वो नयत्किंचनकारकः । कृते कर्मण्यमोघानां कर्ता भृत्यजनप्रियः ॥
nāhaṃvādī nanirdvandvo nayatkiṃcanakārakaḥ | kṛte karmaṇyamoghānāṃ kartā bhṛtyajanapriyaḥ
डींग न हाँकने वाला, परिग्रह से रहित न होने वाला, जो-तो कुछ भी न करने वाला; जिसके किए हुए कर्म कभी निष्फल नहीं होते; सेवकों का प्रिय;
श्लोक 32 (12.118.32)
संगृहीतजनोऽस्तब्धः प्रसन्नवदनः सदा । त्राता भृत्यजनापेक्षी न क्रोधी सुमहामनाः ॥
saṃgṛhītajano'stabdhaḥ prasannavadanaḥ sadā | trātā bhṛtyajanāpekṣī na krodhī sumahāmanāḥ
लोगों को अपने साथ जोड़े रखने वाला, अभिमानरहित, सदा प्रसन्न मुख, रक्षक, सेवकों का ध्यान रखने वाला, क्रोधरहित, उदार हृदय वाला;
श्लोक 33 (12.118.33)
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासनः । चारनेत्रः प्रजावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ॥
yuktadaṇḍo na nirdaṇḍo dharmakāryānuśāsanaḥ | cāranetraḥ prajāvekṣī dharmārthakuśalaḥ sadā
उचित दण्ड देने वाला, अपराध को बिना दण्ड छोड़ न देने वाला, धर्मयुक्त कार्य से शासन करने वाला, गुप्तचरों को नेत्र बनाकर प्रजा पर दृष्टि रखने वाला, और सदा धर्म तथा अर्थ में कुशल।
श्लोक 34 (12.118.34)
राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत् । योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वैर्गुणगणैर्वृताः ॥
rājā guṇaśatākīrṇa eṣṭavyastādṛśo bhavet | yodhāścaiva manuṣyendra sarvairguṇagaṇairvṛtāḥ
सैकड़ों गुणों से भरा राजा खोजने योग्य है; वैसा ही वह स्वयं भी हो। और हे नरेन्द्र, योद्धा भी सब गुण-समूहों से सम्पन्न हों।
श्लोक 35 (12.118.35)
अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाया राज्यधारणे । न विमानयितव्यास्ते राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ॥
anveṣṭavyāḥ supuruṣāḥ sahāyā rājyadhāraṇe | na vimānayitavyāste rājñā vṛddhimabhīpsatā
राज्य को धारण करने में सहायक सज्जनों को खोजना चाहिए; उन्नति चाहने वाले राजा को उनका अपमान नहीं करना चाहिए।
श्लोक 36 (12.118.36)
योधाः समरशौण्डीराः कृतज्ञाः शास्त्रकोविदाः । धर्मशास्त्रसमायुक्ताः पदातिजनसंवृताः ॥
yodhāḥ samaraśauṇḍīrāḥ kṛtajñāḥ śāstrakovidāḥ | dharmaśāstrasamāyuktāḥ padātijanasaṃvṛtāḥ
युद्ध में शूर, कृतज्ञ, शास्त्र के ज्ञाता, धर्मशास्त्र से युक्त, पैदल सैनिकों से घिरे हुए योद्धा,
श्लोक 37 (12.118.37)
अर्थमानविवृद्धाश्च रथचर्याविशारदाः । इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येयं नृपतेर्मही ॥
arthamānavivṛddhāśca rathacaryāviśāradāḥ | iṣvastrakuśalā yasya tasyeyaṃ nṛpatermahī
धन और मान में बढ़े हुए, रथ-संचालन में निपुण, धनुष और अस्त्रों में कुशल योद्धा जिस राजा के पास हों, यह पृथ्वी उसी की है।
श्लोक 38 (12.118.38)
ज्ञातीनामनवज्ञानं भृत्येष्वशठता तथा । नैपुणं चार्थचर्यासु यस्यैते तस्य सा मही ॥
jñātīnāmanavajñānaṃ bhṛtyeṣvaśaṭhatā tathā | naipuṇaṃ cārthacaryāsu yasyaite tasya sā mahī
जाति-बन्धुओं का अनादर न करना, सेवकों के साथ सरल व्यवहार और अर्थ के कामों में निपुणता, जिसके पास ये हैं, पृथ्वी उसी की है।
श्लोक 39 (12.118.39)
आलस्यं चैव निद्रा च व्यसनान्यतिहास्यता । यस्यैतानि न विद्यन्ते तस्यैव सुचिरं मही ॥
ālasyaṃ caiva nidrā ca vyasanānyatihāsyatā | yasyaitāni na vidyante tasyaiva suciraṃ mahī
आलस्य, निद्रा, व्यसन और अत्यधिक हँसी-ठट्ठा, ये जिसमें नहीं हैं, पृथ्वी चिरकाल तक उसी की रहती है।
श्लोक 40 (12.118.40)
वृद्धसेवी महोत्साहो वर्णानां चैव रक्षिता । धर्मचर्याः सदा यस्य तस्येयं सुचिरं मही ॥
vṛddhasevī mahotsāho varṇānāṃ caiva rakṣitā | dharmacaryāḥ sadā yasya tasyeyaṃ suciraṃ mahī
वृद्धों की सेवा, बड़ा उत्साह, वर्णों की रक्षा और धर्म का सदा आचरण, ये जिसके पास हैं, यह पृथ्वी चिरकाल तक उसी की है।
श्लोक 41 (12.118.41)
नीतिवर्त्मानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च । रिपूणामनवज्ञानं तस्येयं सुचिरं मही ॥
nītivartmānusaraṇaṃ nityamutthānameva ca | ripūṇāmanavajñānaṃ tasyeyaṃ suciraṃ mahī
नीति के मार्ग का अनुसरण, सदा उद्योग और शत्रुओं को तुच्छ न समझना, इनसे युक्त राजा की यह पृथ्वी चिरकाल तक रहती है।
श्लोक 42 (12.118.42)
उत्थानं चैव दैवं च तयोर्नानात्वमेव च । मनुना वर्णितं पूर्वं वक्ष्ये शृणु तदेव हि ॥
utthānaṃ caiva daivaṃ ca tayornānātvameva ca | manunā varṇitaṃ pūrvaṃ vakṣye śṛṇu tadeva hi
उद्योग और दैव, और इन दोनों का भेद पहले मनु ने बताया था; वही मैं कहूँगा, सुनो।
श्लोक 43 (12.118.43)
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत । नयानयविधानज्ञः सदा भव कुरूद्वह ॥
utthānaṃ hi narendrāṇāṃ bṛhaspatirabhāṣata | nayānayavidhānajñaḥ sadā bhava kurūdvaha
बृहस्पति ने राजाओं के उद्योग के विषय में कहा था; हे कुरुश्रेष्ठ, तुम सदा नीति और अनीति के विधान को जानने वाले बने रहो।
श्लोक 44 (12.118.44)
दुर्हृदां छिद्रदर्शी यः सुहृदामुपकारवान् । विशेषविच्च भृत्यानां स राज्यफलमश्नुते ॥
durhṛdāṃ chidradarśī yaḥ suhṛdāmupakāravān | viśeṣavicca bhṛtyānāṃ sa rājyaphalamaśnute
जो शत्रुओं की दुर्बलता देखता है, मित्रों का उपकार करता है और सेवकों के भेद को पहचानता है, वह राज्य का फल भोगता है।
श्लोक 45 (12.118.45)
सर्वसंग्रहणे युक्तो नृपो भवति यः सदा । उत्थानशीलो मन्त्राढ्यः स राजा राजसत्तमः ॥
sarvasaṃgrahaṇe yukto nṛpo bhavati yaḥ sadā | utthānaśīlo mantrāḍhyaḥ sa rājā rājasattamaḥ
जो राजा सदा सबको अपने साथ जोड़ने में लगा रहता है, उद्योगशील और मन्त्रणा से सम्पन्न है, वह राजाओं में श्रेष्ठ है।
श्लोक 46 (12.118.46)
शक्या चाश्वसहस्रेण वीरारोहेण भारत । संगृहीतमनुष्येण कृत्स्ना जेतुं वसुंधरा ॥
śakyā cāśvasahasreṇa vīrāroheṇa bhārata | saṃgṛhītamanuṣyeṇa kṛtsnā jetuṃ vasuṃdharā
हे भरतवंशी, वीर सवारों वाले एक हजार घोड़ों और भलीभाँति संगृहीत मनुष्यों के साथ सारी पृथ्वी जीती जा सकती है।