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शान्ति पर्व · अध्याय 119

प्रत्येक सेवक अपने योग्य स्थान पर

भीष्म कुत्ते, सिंह और शरभ के दृष्टान्त की शिक्षा आगे बढ़ाते हैं: राजा तब फलता-फूलता है जब वह प्रत्येक सेवक को उसके कुल और योग्यता के अनुरूप पद पर रखता है, और क्रम उलट देने पर हानि उठाता है। केवल विद्वान्, सरल, कुलीन और निष्ठावान् लोग ही उसके पास रहें, जैसे सिंह के पास सिंह ही रहना चाहिए। वे कोश की रक्षा, अन्न-भण्डार भरने, सैनिकों को शिक्षित करने और सम्बन्धियों तथा नगरवासियों की देखभाल की सलाह भी देते हैं, और अन्त में कहते हैं कि अपनी निश्चित शिक्षा उन्होंने युधिष्ठिर को दे दी।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.119.1)

एवं गुणयुतान्भृत्यान्स्वेस्वे स्थाने नराधिपः । नियोजयति कृत्येषु स राज्यफलमश्नुते ॥

evaṃ guṇayutānbhṛtyānsvesve sthāne narādhipaḥ | niyojayati kṛtyeṣu sa rājyaphalamaśnute

जो राजा इस प्रकार गुणवान् सेवकों को अपने-अपने योग्य स्थान पर कार्यों में नियुक्त करता है, वह राज्य का फल भोगता है।

श्लोक 2 (12.119.2)

न वा स्वस्थानमुत्क्रम्य प्रमाणमपि सत्कृतम् । आरोप्य चापि स्वस्थानमुत्क्रम्यान्यत्प्रपद्यते ॥

na vā svasthānamutkramya pramāṇamapi satkṛtam | āropya cāpi svasthānamutkramyānyatprapadyate

जो अपना स्थान छोड़ चुका हो, उसका मर्यादा के भीतर भी सत्कार नहीं करना चाहिए; अपने स्थान पर फिर बिठा दिए जाने पर भी वह उसे छोड़कर दूसरी जगह चला जाता है।

श्लोक 3 (12.119.3)

स्वजातिगुणसंपन्नाः स्वेषु धर्मेष्ववस्थिताः । प्रकर्तव्या ह्यमात्यास्तु नास्थाने प्रक्रिया क्षमा ॥

svajātiguṇasaṃpannāḥ sveṣu dharmeṣvavasthitāḥ | prakartavyā hyamātyāstu nāsthāne prakriyā kṣamā

अपनी जाति के गुणों से युक्त और अपने धर्मों में स्थित पुरुषों को ही अमात्य बनाना चाहिए; अनुचित स्थान पर नियुक्ति करना ठीक नहीं।

श्लोक 4 (12.119.4)

अनुरूपाणि कर्माणि भृत्येभ्यो यः प्रयच्छति । स भृत्यगुणसंपन्नं राजा फलमुपाश्नुते ॥

anurūpāṇi karmāṇi bhṛtyebhyo yaḥ prayacchati | sa bhṛtyaguṇasaṃpannaṃ rājā phalamupāśnute

जो राजा सेवकों को उनके अनुरूप कर्म सौंपता है, वह सेवकों के गुणों से युक्त फल प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (12.119.5)

शरभः शरभस्थाने सिंहः सिंह इवोत्थितः । व्याघ्रो व्याघ्र इव स्थाप्यो द्वीपी द्वीपी यथा तथा ॥

śarabhaḥ śarabhasthāne siṃhaḥ siṃha ivotthitaḥ | vyāghro vyāghra iva sthāpyo dvīpī dvīpī yathā tathā

शरभ को शरभ के स्थान पर, उठे हुए सिंह को सिंह की तरह, बाघ को बाघ की तरह और तेन्दुए को तेन्दुए की तरह स्थापित करना चाहिए; इसी प्रकार सबको।

श्लोक 6 (12.119.6)

कर्मस्विहानुरूपेषु न्यस्या भृत्या यथाविधि । प्रतिलोमं न भृत्यास्ते स्थाप्याः कर्मफलैषिणा ॥

karmasvihānurūpeṣu nyasyā bhṛtyā yathāvidhi | pratilomaṃ na bhṛtyāste sthāpyāḥ karmaphalaiṣiṇā

सेवकों को विधिपूर्वक उन कामों में नियुक्त करना चाहिए जो उनके अनुरूप हों; कर्म का फल चाहने वाले को उन्हें उलटे क्रम में नहीं रखना चाहिए।

श्लोक 7 (12.119.7)

यः प्रमाणमतिक्रम्य प्रतिलोमं नराधिपः । भृत्यान्स्थापयतेऽबुद्धिर्न स रञ्जयते प्रजाः ॥

yaḥ pramāṇamatikramya pratilomaṃ narādhipaḥ | bhṛtyānsthāpayate'buddhirna sa rañjayate prajāḥ

जो मूर्ख राजा मर्यादा लाँघकर सेवकों को उलटे क्रम में नियुक्त करता है, वह प्रजा को प्रसन्न नहीं कर पाता।

श्लोक 8 (12.119.8)

न बालिशा न च क्षुद्रा नाप्राज्ञा नाजितेन्द्रियाः । नाकुलीना जनाः पार्श्वे स्थाप्या राज्ञा गुणैषिणा ॥

na bāliśā na ca kṣudrā nāprājñā nājitendriyāḥ | nākulīnā janāḥ pārśve sthāpyā rājñā guṇaiṣiṇā

मूर्ख, क्षुद्र, अज्ञानी, इन्द्रियों को वश में न रखने वाले और अकुलीन लोगों को गुणों की खोज करने वाला राजा अपने पास न रखे।

श्लोक 9 (12.119.9)

साधवः कुलजाः शूरा ज्ञानवन्तोऽनसूयकाः । अक्षुद्राः शुचयो दक्षाः स्युर्नराः पारिपार्श्वकाः ॥

sādhavaḥ kulajāḥ śūrā jñānavanto'nasūyakāḥ | akṣudrāḥ śucayo dakṣāḥ syurnarāḥ pāripārśvakāḥ

सज्जन, कुलीन, शूर, ज्ञानवान्, ईर्ष्यारहित, उदार, पवित्र और कुशल पुरुष ही उसके पार्श्व-सेवक हों।

श्लोक 10 (12.119.10)

उद्भूतास्तत्पराः शान्ताश्चौक्षाः प्रकृतिजाः शुभाः । स्वेस्वे स्थानेऽनुपाकृष्टास्ते स्यू राज्ञो बहिश्चराः ॥

udbhūtāstatparāḥ śāntāścaukṣāḥ prakṛtijāḥ śubhāḥ | svesve sthāne'nupākṛṣṭāste syū rājño bahiścarāḥ

उन्नत स्थिति वाले, निष्ठावान्, शान्त, पवित्र, स्वभाव से शुभ और अपने-अपने स्थान से न हटाए गए पुरुष राजा के बाहर विचरने वाले अंग, मानो उसके बाहर घूमते प्राण हों।

श्लोक 11 (12.119.11)

सिंहस्य सततं पार्श्वे सिंह एव जनो भवेत् । असिंहः सिंहसहितः सिंहवल्लभते फलम् ॥

siṃhasya satataṃ pārśve siṃha eva jano bhavet | asiṃhaḥ siṃhasahitaḥ siṃhavallabhate phalam

सिंह के पास सदा सिंह-जैसा ही मनुष्य रहे; जो सिंह नहीं है, वह भी सिंह के साथ रहकर सिंह के समान फल पाता है।

श्लोक 12 (12.119.12)

यस्तु सिंहः श्वभिः कीर्णः सिंहकर्मफले रतः । न स सिंहफलं भोक्तुं शक्तः श्वभिरुपासितः ॥

yastu siṃhaḥ śvabhiḥ kīrṇaḥ siṃhakarmaphale rataḥ | na sa siṃhaphalaṃ bhoktuṃ śaktaḥ śvabhirupāsitaḥ

परन्तु जो सिंह कुत्तों से घिरा हो और सिंह के कर्मों का फल चाहता हो, वह कुत्तों से सेवित रहकर सिंह का फल नहीं भोग सकता।

श्लोक 13 (12.119.13)

एवमेतैर्मनुष्येन्द्र शूरैः प्राज्ञैर्बहुश्रुतैः । कुलीनैः सह शक्येत कृत्स्ना जेतुं वसुंधरा ॥

evametairmanuṣyendra śūraiḥ prājñairbahuśrutaiḥ | kulīnaiḥ saha śakyeta kṛtsnā jetuṃ vasuṃdharā

इस प्रकार हे नरेन्द्र, ऐसे शूर, बुद्धिमान्, बहुश्रुत और कुलीन पुरुषों के साथ सारी पृथ्वी जीती जा सकती है।

श्लोक 14 (12.119.14)

नावैद्यो नानृजुः पार्श्वे नाप्राज्ञो नामहायशाः । संग्राह्यो वसुधापालैर्भृत्यो भृत्यवतां वर ॥

nāvaidyo nānṛjuḥ pārśve nāprājño nāmahāyaśāḥ | saṃgrāhyo vasudhāpālairbhṛtyo bhṛtyavatāṃ vara

हे सेवकों वाले राजाओं में श्रेष्ठ, अशिक्षित, कुटिल, अज्ञानी या यशहीन पुरुष को राजा सेवक के रूप में न अपनाएँ।

श्लोक 15 (12.119.15)

वाणवद्विसृता यान्ति स्वामिकार्यपरा नराः । ये भृत्याः पार्थिवहितास्तेषु सान्त्वं सदा चरेत् ॥

vāṇavadvisṛtā yānti svāmikāryaparā narāḥ | ye bhṛtyāḥ pārthivahitāsteṣu sāntvaṃ sadā caret

स्वामी के कार्य में लगे लोग छोड़े गए बाणों की तरह निकल पड़ते हैं; जो सेवक राजा के हितैषी हैं, उनके प्रति राजा सदा सान्त्वना का व्यवहार करे।

श्लोक 16 (12.119.16)

कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः । कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत् ॥

kośaśca satataṃ rakṣyo yatnamāsthāya rājabhiḥ | kośamūlā hi rājānaḥ kośavṛddhikaro bhavet

राजाओं को यत्नपूर्वक कोश की सदा रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि राजा कोश पर ही टिके हैं; वह कोश की वृद्धि करने वाला हो।

श्लोक 17 (12.119.17)

कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः । सदा त्वं सत्सु संन्यस्तधनधान्यपरो भव ॥

koṣṭhāgāraṃ ca te nityaṃ sphītaṃ dhānyaiḥ susaṃcitaiḥ | sadā tvaṃ satsu saṃnyastadhanadhānyaparo bhava

तुम्हारा अन्न-भण्डार सदा भरा रहे और भलीभाँति संचित अन्न से परिपूर्ण हो; सज्जनों को सौंपे गए धन-धान्य के प्रति सदा सजग रहो।

श्लोक 18 (12.119.18)

नित्ययुक्ताश्च ते भृत्या भवन्तु रणकोविदाः । वाजिनां च प्रयोगेषु वैशारद्यमिहेष्यते ॥

nityayuktāśca te bhṛtyā bhavantu raṇakovidāḥ | vājināṃ ca prayogeṣu vaiśāradyamiheṣyate

तुम्हारे सेवक सदा तत्पर और युद्ध में कुशल हों; और यहाँ घोड़ों के संचालन में निपुणता चाहिए।

श्लोक 19 (12.119.19)

ज्ञातिबन्धुजनावेक्षी मित्रसंबन्धिसत्कृतः । पौरकार्यहितान्वेक्षी भव कौरवनन्दन ॥

jñātibandhujanāvekṣī mitrasaṃbandhisatkṛtaḥ | paurakāryahitānvekṣī bhava kauravanandana

जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों की देखभाल करो, मित्रों और सम्बन्धियों से सम्मानित रहो, और हे कुरुनन्दन, नगरवासियों के हित और कार्यों पर ध्यान देने वाले बनो।

श्लोक 20 (12.119.20)

एषा ते नैष्ठिकी बुद्धिः प्रज्ञा चाभिहिता मया । श्वा ते निदर्शनं तात किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

eṣā te naiṣṭhikī buddhiḥ prajñā cābhihitā mayā | śvā te nidarśanaṃ tāta kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

यह तुम्हारी निश्चित बुद्धि है और यह प्रज्ञा मैंने कह दी; कुत्ते का दृष्टान्त तुम्हारे सामने है, वत्स। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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