शान्ति पर्व · अध्याय 120
राजा मोर के समान हो
युधिष्ठिर राजाओं के कर्तव्य संक्षेप में पूछते हैं। भीष्म कहते हैं कि राजा का परम कार्य सब प्राणियों की रक्षा है और उसे मोर की तरह, जो रंग-बिरंगे पंख धारण करता है, अनेक रूप धारण करने चाहिए: मन्त्रणा को गुप्त रखे, जालों से सावधान रहे, शत्रुओं पर प्रहार करे और सुदृढ़ आश्रय खोजे। फिर वे ईमानदार और योग्य अधिकारियों के चुनाव, मधुमक्खी की तरह धैर्य से धन-संचय, धन को प्रज्वलित करने वाली आठ बातों, बुद्धि और उद्योग की शक्ति, लोभी पुरुष के खतरे और शत्रु को जीतने के उपायों की चर्चा करते हैं, और अन्त में युधिष्ठिर को इन कर्तव्यों का पालन करने का उपदेश देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.120.1)
राजवृत्तान्यनेकानि त्वया प्रोक्तानि भारत । पूर्वैः पूर्वनियुक्तानि राजधर्मार्थवेदिभिः ॥
rājavṛttānyanekāni tvayā proktāni bhārata | pūrvaiḥ pūrvaniyuktāni rājadharmārthavedibhiḥ
हे भारत, आपने राजाओं के आचरण के अनेक प्रकार बताए हैं, जिन्हें राजधर्म और उसके प्रयोजन को जानने वाले पूर्वजों ने पहले नियत किया था।
श्लोक 2 (12.120.2)
तदेव विस्तरेणोक्तं पूर्ववृत्तं सतां मतम् । प्रणेयं राजधर्माणां प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥
tadeva vistareṇoktaṃ pūrvavṛttaṃ satāṃ matam | praṇeyaṃ rājadharmāṇāṃ prabrūhi bharatarṣabha
जो आपने विस्तार से कहा, सज्जनों द्वारा मान्य वह प्राचीन आचार, उसे अब राजधर्मों के सार के रूप में संक्षेप में कहिए, हे भरतश्रेष्ठ।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.120.3)
रक्षणं सर्वभूतानामिति क्षात्रं परं मतम् । तद्यथा रक्षणं कुर्यात्तथा शृणु महीपते ॥
rakṣaṇaṃ sarvabhūtānāmiti kṣātraṃ paraṃ matam | tadyathā rakṣaṇaṃ kuryāttathā śṛṇu mahīpate
सब प्राणियों की रक्षा करना क्षत्रिय का परम कर्तव्य माना गया है। हे पृथ्वीपति, सुनो कि वह रक्षा कैसे की जाए।
श्लोक 4 (12.120.4)
यथा बर्हाणि चित्राणि बिभर्ति भुजगाशनः । तथा बहुविधं राजा रूपं कुर्वीत धर्मवित् ॥
yathā barhāṇi citrāṇi bibharti bhujagāśanaḥ | tathā bahuvidhaṃ rājā rūpaṃ kurvīta dharmavit
जैसे साँपों को खाने वाला मोर रंग-बिरंगे पंख धारण करता है, वैसे ही धर्म को जानने वाला राजा अनेक प्रकार के रूप धारण करे।
श्लोक 5 (12.120.5)
तैक्ष्ण्यं जिह्मत्वमादानं सत्यमार्जवमेव च । मध्यस्थः सत्वमातिष्ठंस्तथा वै सुखमृच्छति ॥
taikṣṇyaṃ jihmatvamādānaṃ satyamārjavameva ca | madhyasthaḥ satvamātiṣṭhaṃstathā vai sukhamṛcchati
तीक्ष्णता, कुटिलता, ग्रहण करना, सत्य और सरलता भी; मध्य मार्ग पर रहकर और सत्त्व में स्थित होकर राजा इस प्रकार सुख पाता है।
श्लोक 6 (12.120.6)
यस्मिन्नर्थे यथैव स्यात्तद्वर्णं रूपमादिशेत् । बहुरूपस्य राज्ञो हि सूक्ष्मोऽप्यर्थो न सीदति ॥
yasminnarthe yathaiva syāttadvarṇaṃ rūpamādiśet | bahurūpasya rājño hi sūkṣmo'pyartho na sīdati
जिस कार्य में जैसा रूप उचित हो, वैसा ही वर्ण और रूप धारण करे; क्योंकि बहुरूपी राजा का छोटा-सा प्रयोजन भी विफल नहीं होता।
श्लोक 7 (12.120.7)
नित्यं रक्षितमन्त्रः स्याद्यथा मूकः शरच्छिखी । श्लक्ष्णाक्षरगतः श्रीमान्भवेच्छास्त्रविशारदः ॥
nityaṃ rakṣitamantraḥ syādyathā mūkaḥ śaracchikhī | ślakṣṇākṣaragataḥ śrīmānbhavecchāstraviśāradaḥ
वह अपनी मन्त्रणा को सदा गुप्त रखे, शरद ऋतु के मौन मोर की तरह; मृदुभाषी, श्रीसम्पन्न और शास्त्र में निपुण हो।
श्लोक 8 (12.120.8)
आयव्ययेषु युक्तः स्याज्जलस्रवणेष्विव । शैलाद्वर्षोदकानीव द्विजान्सिद्धान्समाश्रयेत् । आत्मार्थं हि सदा राजा कुर्याद्धर्मध्वजोत्तमम् ॥
āyavyayeṣu yuktaḥ syājjalasravaṇeṣviva | śailādvarṣodakānīva dvijānsiddhānsamāśrayet | ātmārthaṃ hi sadā rājā kuryāddharmadhvajottamam
आय और व्यय के विषय में वह बहते जल की तरह सावधान रहे; जैसे पर्वत से वर्षा का जल बह आता है, वैसे ही सिद्ध ब्राह्मणों के पास जाए। राजा अपने कल्याण के लिए धर्म को ही सदा अपनी श्रेष्ठ ध्वजा बनाए।
श्लोक 9 (12.120.9)
नित्यमुद्यतदण्डः स्यादाचारे चाप्रमादवान् । लोके चायव्ययौ दृष्ट्वा वृक्षाद्वृक्षमिवाव्रजेत् ॥
nityamudyatadaṇḍaḥ syādācāre cāpramādavān | loke cāyavyayau dṛṣṭvā vṛkṣādvṛkṣamivāvrajet
वह दण्ड सदा उठाए रखे और आचरण में सावधान रहे; लोक की आय और व्यय को देखकर पेड़ से पेड़ पर जाने वाले की तरह आगे बढ़े।
श्लोक 10 (12.120.10)
आज्ञावान्स्यात्स्वयूथ्येषु भौमानि चरणैः किरन् । जातपक्षः परिस्पन्देत्प्रेक्षेद्वैकल्यमात्मनः ॥
ājñāvānsyātsvayūthyeṣu bhaumāni caraṇaiḥ kiran | jātapakṣaḥ parispandetprekṣedvaikalyamātmanaḥ
अपने जनों में उसकी आज्ञा मानी जाए, और वह अपनी चाल से शत्रु की खेती को रौंदता चले। पंख निकल आने पर वह हरकत में आए, और अपने भीतर की कमी पर दृष्टि रखे।
श्लोक 11 (12.120.11)
दोषान्विवृणुयाच्छत्रोः परपक्षांश्च सूदयेत् । काननेष्विव पुष्पाणि बहिरर्थान्समाचरेत् ॥
doṣānvivṛṇuyācchatroḥ parapakṣāṃśca sūdayet | kānaneṣviva puṣpāṇi bahirarthānsamācaret
वह शत्रु के दोष प्रकट करे और शत्रु के पक्षधरों को तितर-बितर करे; जैसे वन में फूल चुने जाते हैं, वैसे ही बाहर से अपने प्रयोजन जुटाए।
श्लोक 12 (12.120.12)
उच्छ्रितानाश्रयेत्स्फीतान्नरेन्द्रानचलोपमान् । श्रयेच्छायामिव ज्ञातिं गुप्तं शरणमाश्रयेत् ॥
ucchritānāśrayetsphītānnarendrānacalopamān | śrayecchāyāmiva jñātiṃ guptaṃ śaraṇamāśrayet
वह ऊँचे और समृद्ध, पर्वत की तरह अटल राजाओं का आश्रय ले; किसी स्वजन को छाया की तरह खोजे और गुप्त शरण में जाए।
श्लोक 13 (12.120.13)
प्रावृषीवासितग्रीवो माद्येत निशि निर्जने । मायूरेण गुणेनैव स्त्रीभिरारक्षितश्चरेत् ॥
prāvṛṣīvāsitagrīvo mādyeta niśi nirjane | māyūreṇa guṇenaiva strībhirārakṣitaścaret
जैसे काली गर्दन वाला मोर वर्षा ऋतु में निर्जन रात में मस्त होता है, वैसे ही मोर की रीति से वह स्त्रियों से रक्षित होकर विचरे।
श्लोक 14 (12.120.14)
न जह्याच्च तनुत्राणं रक्षेदात्मानमात्मना । चारभूमिष्विव ततान्पाशांश्च परिवर्जयेत् ॥
na jahyācca tanutrāṇaṃ rakṣedātmānamātmanā | cārabhūmiṣviva tatānpāśāṃśca parivarjayet
वह अपना कवच न छोड़े और स्वयं ही अपनी रक्षा करे; चरागाहों में बिछाए गए फन्दों से बचता रहे।
श्लोक 15 (12.120.15)
प्रणयेद्वाऽपि तां भूमिं प्रणश्येद्ग्रहणे पुनः । एवं मयूरधर्मेण वर्तयन्सततं नरः । हन्यात्क्रुद्धानतिविषांस्ताञ्जिह्मगतयोऽहिताः ॥
praṇayedvā'pi tāṃ bhūmiṃ praṇaśyedgrahaṇe punaḥ | evaṃ mayūradharmeṇa vartayansatataṃ naraḥ | hanyātkruddhānativiṣāṃstāñjihmagatayo'hitāḥ
वह उस भूमि को पार कर ले, और फिर घने स्थान में छिप जाए। इस प्रकार सदा मोर की रीति से रहता हुआ मनुष्य क्रोधी, अत्यन्त विषैले और टेढ़ी चाल चलने वाले शत्रुओं को मारे।
श्लोक 16 (12.120.16)
नासूयेच्चावगर्ह्याणि सन्निवासान्निवासयेत् । सदा बर्हिसमं कामं प्रशस्तं कृतमाचरेत् । सर्वतश्चाददेत्प्रज्ञां पतङ्गं गहनेष्विव ॥
nāsūyeccāvagarhyāṇi sannivāsānnivāsayet | sadā barhisamaṃ kāmaṃ praśastaṃ kṛtamācaret | sarvataścādadetprajñāṃ pataṅgaṃ gahaneṣviva
वह निन्दनीय बातों पर क्रोध न करे और दृढ़ जड़ वाले सहायकों को अपने पास बसाए। सदा इच्छानुसार मोर की तरह प्रशंसनीय कर्म करे; और सब ओर से प्रज्ञा ग्रहण करे, जैसे टिड्डियों का झुण्ड झाड़ियों में उतरता है।
श्लोक 17 (12.120.17)
एवं मयूरवद्राजा स्वराज्यं परिपालयेत् । आत्मबुद्धिकरीं नीतिं विदधीत विचक्षणः ॥
evaṃ mayūravadrājā svarājyaṃ paripālayet | ātmabuddhikarīṃ nītiṃ vidadhīta vicakṣaṇaḥ
इस प्रकार मोर की तरह राजा अपने राज्य का पालन करे; बुद्धिमान् ऐसी नीति अपनाए जो उसकी अपनी बुद्धि को बढ़ाए।
श्लोक 18 (12.120.18)
आत्मसंयमनं बुद्ध्या परबुद्ध्या विचारणाम् । बुद्ध्या चात्मगुणप्राप्तिरेतच्छास्त्रनिदर्शनम् ॥
ātmasaṃyamanaṃ buddhyā parabuddhyā vicāraṇām | buddhyā cātmaguṇaprāptiretacchāstranidarśanam
अपने को बुद्धि से संयत करना, दूसरों के विचार को उनकी बुद्धि से परखना, और बुद्धि से अपने गुणों की प्राप्ति करना, यही शास्त्र का उपदेश है।
श्लोक 19 (12.120.19)
परं विश्वासयेत्साम्ना स्वशक्तिं चोपलक्षयेत् । आत्मनः परिमर्शेन बुद्धिं बुद्ध्या विचारयेत् ॥
paraṃ viśvāsayetsāmnā svaśaktiṃ copalakṣayet | ātmanaḥ parimarśena buddhiṃ buddhyā vicārayet
वह साम से दूसरे का विश्वास जीते और अपनी शक्ति को पहचाने; आत्म-परीक्षण द्वारा बुद्धि को बुद्धि से तौले।
श्लोक 20 (12.120.20)
सान्त्वयोगमतिः प्राज्ञः कार्याकार्यप्रयोजनकः । निगूढबुद्धेर्धीरस्य वक्तव्ये वक्ष्यते तथा ॥
sāntvayogamatiḥ prājñaḥ kāryākāryaprayojanakaḥ | nigūḍhabuddherdhīrasya vaktavye vakṣyate tathā
जिसकी बुद्धि साम-नीति में लगी है और जो करणीय-अकरणीय का विचार करता है, वह प्राज्ञ, धीर और गूढ़ मन्त्रणा वाला पुरुष बोलने योग्य अवसर आने पर उचित रूप से बोलेगा।
श्लोक 21 (12.120.21)
संनिकृष्टां कथां प्राज्ञो यदि बुद्ध्या बृहस्पतिः । स्वभावमेष्यते तप्तं कृष्णायसमिवोदके ॥
saṃnikṛṣṭāṃ kathāṃ prājño yadi buddhyā bṛhaspatiḥ | svabhāvameṣyate taptaṃ kṛṣṇāyasamivodake
बुद्धि में बृहस्पति के समान प्राज्ञ पुरुष भी यदि किसी निम्न कोटि की चर्चा में पड़ जाए, तो वह अपने स्वभाव में वैसे ही लौट आएगा जैसे तपाया हुआ काला लोहा पानी में डालने पर ठण्डा हो जाता है।
श्लोक 22 (12.120.22)
अनुयुञ्जीत सत्यानि सर्वाण्येव महीपतिः । आगमैरुपदिष्टानि स्वस्य चैव परस्य च ॥
anuyuñjīta satyāni sarvāṇyeva mahīpatiḥ | āgamairupadiṣṭāni svasya caiva parasya ca
राजा आगमों में बताई गई सब सच्ची बातों की जाँच करे, चाहे वे अपने पक्ष की हों या दूसरे के।
श्लोक 23 (12.120.23)
मृदुं क्रूरं तथा प्राज्ञं शूरं चार्थविधानवित् । स्वकर्मणि नियुञ्जीत ये चान्ये वचनाधिकाः ॥
mṛduṃ krūraṃ tathā prājñaṃ śūraṃ cārthavidhānavit | svakarmaṇi niyuñjīta ye cānye vacanādhikāḥ
कोमल, क्रूर, बुद्धिमान्, शूर और कार्य-व्यवस्था में निपुण, इन्हें वह उनके योग्य कर्म में लगाए, और उन्हें भी जो वाणी में बढ़कर हों।
श्लोक 24 (12.120.24)
अप्यदृष्टानि युक्तानि स्वानुरूपेषु कर्मसु । सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवायताः ॥
apyadṛṣṭāni yuktāni svānurūpeṣu karmasu | sarvāṃstānanuvarteta svarāṃstantrīrivāyatāḥ
जिन्हें उसने स्वयं नहीं देखा, वे भी यदि अपने अनुरूप कर्मों में नियुक्त हों, तो वह उन सबका अनुसरण करे, जैसे तनी हुई तन्त्रियाँ स्वरों का अनुसरण करती हैं।
श्लोक 25 (12.120.25)
धर्माणामविरोधेन सर्वेषां प्रियमाचरेत् । ममायमिति राजा यः सपर्वत इवाचलः ॥
dharmāṇāmavirodhena sarveṣāṃ priyamācaret | mamāyamiti rājā yaḥ saparvata ivācalaḥ
धर्मों का विरोध किए बिना वह सबका प्रिय करे; जो राजा प्रत्येक को 'यह मेरा है' मानता है, वह पर्वत की तरह अचल रहता है।
श्लोक 26 (12.120.26)
व्यवहारं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् । धर्ममेवाभिरक्षेत कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥
vyavahāraṃ samādhāya sūryo raśmīnivāyatān | dharmamevābhirakṣeta kṛtvā tulye priyāpriye
सूर्य जैसे अपनी फैली किरणों को व्यवस्थित करता है, वैसे ही अपने कार्य-व्यवहार को सँभालकर वह प्रिय और अप्रिय को समान मानते हुए केवल धर्म की रक्षा करे।
श्लोक 27 (12.120.27)
कुलप्रकृतिदेशानां धर्मज्ञान्मृदुभाषिणः । मध्ये वयसि निर्दोषान्हिते युक्ताञ्जितक्लमान् ॥
kulaprakṛtideśānāṃ dharmajñānmṛdubhāṣiṇaḥ | madhye vayasi nirdoṣānhite yuktāñjitaklamān
कुल, प्रकृति और देश के धर्म को जानने वाले, मृदुभाषी, मध्य आयु के, निर्दोष, हित में लगे और थकान को जीत चुके पुरुषों को,
श्लोक 28 (12.120.28)
अलुब्धाञ्शिक्षितान्दान्तान्धर्मेषु परिनिष्ठितान् । स्थापयेत्सर्वकार्येषु राजा सर्वार्थरक्षिणः ॥
alubdhāñśikṣitāndāntāndharmeṣu pariniṣṭhitān | sthāpayetsarvakāryeṣu rājā sarvārtharakṣiṇaḥ
जो लोभरहित, शिक्षित, संयमी और धर्मों में दृढ़ स्थित हों, और सब हितों की रक्षा करने वाले हों, ऐसे पुरुषों को राजा सब कामों में नियुक्त करे।
श्लोक 29 (12.120.29)
एतेन च प्रकारेण कृत्यानामागतिं गतिम् । युक्त्या समनुतिष्ठेन तुष्टश्चारैः पुरस्कृतः ॥
etena ca prakāreṇa kṛtyānāmāgatiṃ gatim | yuktyā samanutiṣṭhena tuṣṭaścāraiḥ puraskṛtaḥ
इसी प्रकार वह कार्यों के आने-जाने को युक्ति से सँभाले, सन्तुष्ट रहे और गुप्तचरों को आगे रखे।
श्लोक 30 (12.120.30)
अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्याऽनुदर्शिनः । आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुधैव वसुंधरा ॥
amoghakrodhaharṣasya svayaṃ kṛtyā'nudarśinaḥ | ātmapratyayakośasya vasudhaiva vasuṃdharā
जिसका क्रोध और हर्ष कभी निष्फल नहीं जाते, जो स्वयं कार्यों की देखरेख करता है और जिसका कोश उसका आत्मविश्वास है, उसके लिए पृथ्वी सचमुच धन देने वाली बन जाती है।
श्लोक 31 (12.120.31)
व्यक्तश्चानुग्रहो यस्य यथोक्तश्चापि निग्रहः । गुप्तात्मा गुप्तराष्ट्रस्य स राजा राजधर्मवित् ॥
vyaktaścānugraho yasya yathoktaścāpi nigrahaḥ | guptātmā guptarāṣṭrasya sa rājā rājadharmavit
जिसका अनुग्रह स्पष्ट दिखाई दे और जिसका दण्ड शास्त्र के अनुसार हो, जो अपनी और अपने राष्ट्र की रक्षा करता है, वही राजा राजधर्म को जानता है।
श्लोक 32 (12.120.32)
नित्यं राष्ट्रमवेक्षेत गोभिः सूर्य इवातपन् । चारांश्चानुचरान्विद्यात्तथा बुद्ध्या स्वयं चरेत् ॥
nityaṃ rāṣṭramavekṣeta gobhiḥ sūrya ivātapan | cārāṃścānucarānvidyāttathā buddhyā svayaṃ caret
वह अपने राष्ट्र पर सदा दृष्टि रखे, जैसे सूर्य अपनी किरणों से तपता हुआ सब पर दृष्टि रखता है; गुप्तचरों को अपने अनुचर जाने, और बुद्धि के साथ स्वयं भी घूमे।
श्लोक 33 (12.120.33)
कालप्राप्तमुपादद्यान्नार्थं राजा प्रसूचयेत् । अहन्यहनि संदुह्यान्महीं गामिव बुद्धिमान् ॥
kālaprāptamupādadyānnārthaṃ rājā prasūcayet | ahanyahani saṃduhyānmahīṃ gāmiva buddhimān
वह समय पर देय धन ले ले और धन की बात को प्रकट न करे; बुद्धिमान् राजा गाय को दुहने की तरह प्रतिदिन पृथ्वी को दुहे।
श्लोक 34 (12.120.34)
यथाक्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनोति मधु षट्पदः । तथा द्रव्यमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ॥
yathākrameṇa puṣpebhyaścinoti madhu ṣaṭpadaḥ | tathā dravyamupādāya rājā kurvīta saṃcayam
जैसे छह पैरों वाला भौंरा क्रम से फूल-फूल से मधु बटोरता है, वैसे ही राजा धन ग्रहण करके संचय करे।
श्लोक 35 (12.120.35)
यद्धि गुप्तावशिष्टं स्यात्तद्वित्तं धर्मकामयोः । संचयान्न विसर्गी स्याद्राजा शास्त्रविदात्मवान् ॥
yaddhi guptāvaśiṣṭaṃ syāttadvittaṃ dharmakāmayoḥ | saṃcayānna visargī syādrājā śāstravidātmavān
रक्षा के व्यय के बाद जो बच जाए, वही धन धर्म और काम के लिए है; शास्त्र का ज्ञाता और आत्मसंयमी राजा अपने संचय में से खर्च न करे।
श्लोक 36 (12.120.36)
नार्थमल्पं परिभवेन्नावमन्येत शात्रवान् । बुद्ध्याऽनुबुद्ध्या चात्मानं न चाबुद्धेषु विश्वसेत् ॥
nārthamalpaṃ paribhavennāvamanyeta śātravān | buddhyā'nubuddhyā cātmānaṃ na cābuddheṣu viśvaset
वह थोड़े धन की उपेक्षा न करे और शत्रुओं का अनादर न करे; बुद्धि और विचार से अपने को जाने, और मूर्खों पर विश्वास न करे।
श्लोक 37 (12.120.37)
धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा । धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः । अल्पस्य वा महतो वा विवृद्धौ । धनस्यैतान्यष्ट समिंधनानि ॥
dhṛtirdākṣyaṃ saṃyamo buddhirātmā | dhairyaṃ śauryaṃ deśakālāpramādaḥ | alpasya vā mahato vā vivṛddhau | dhanasyaitānyaṣṭa samiṃdhanāni
धैर्य, कुशलता, संयम, बुद्धि, आत्मा (शरीर), साहस, शौर्य, और देश-काल के विषय में सावधानी, ये आठ धन की वृद्धि के समिधा हैं, चाहे धन थोड़े से बढ़ना हो या बहुत से।
श्लोक 38 (12.120.38)
अग्निस्तोको वर्धतेऽप्याज्यसिक्तो । बीजं चैकं बहुसहस्रमेति । क्षयोदयौ विपुलौ सन्नियम्यौ । तस्मादल्पं नावमन्येत वित्तम् ॥
agnistoko vardhate'pyājyasikto | bījaṃ caikaṃ bahusahasrameti | kṣayodayau vipulau sanniyamyau | tasmādalpaṃ nāvamanyeta vittam
छोटी-सी आग घी पड़ने पर बढ़ जाती है; एक बीज हजारों बन जाता है। हानि और लाभ दोनों विशाल हो सकते हैं और उन्हें नियन्त्रण में रखना चाहिए; इसलिए थोड़े धन की भी अवहेलना न करे।
श्लोक 39 (12.120.39)
बालोऽप्यबालः स्थविरो रिपुर्यः । सदा प्रमत्तं पुरुषं निहन्यात् । कालेनान्यस्तस्य मूलं हरेत् । कालज्ञानं पार्थिवानां वरिष्ठम् ॥
bālo'pyabālaḥ sthaviro ripuryaḥ | sadā pramattaṃ puruṣaṃ nihanyāt | kālenānyastasya mūlaṃ haret | kālajñānaṃ pārthivānāṃ variṣṭham
शत्रु बालक भी हो तो बालक नहीं है, और वृद्ध भी वैसा ही है; वह सदा असावधान पुरुष पर प्रहार करेगा। समय आने पर कोई दूसरा सबल उसकी जड़ उखाड़ लेगा। राजाओं के लिए समय का ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है।
श्लोक 40 (12.120.40)
हरेत्कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या । दर्थे विघ्नं वीर्यमस्योपहन्यात् । रिपुर्द्वेष्टा दुर्बलो वा बली वा । तस्माच्छत्रोर्नैव बिभ्येद्यतात्मा ॥
haretkīrtiṃ dharmamasyoparundhyā | darthe vighnaṃ vīryamasyopahanyāt | ripurdveṣṭā durbalo vā balī vā | tasmācchatrornaiva bibhyedyatātmā
ऐसा शत्रु उसकी कीर्ति हर सकता है, उसके धर्म को रोक सकता है, उसके धन में विघ्न डाल सकता है और उसके बल को नष्ट कर सकता है। शत्रु द्वेष रखने वाला होता है, चाहे दुर्बल हो या बलवान्; इसलिए संयमी पुरुष शत्रु से कभी न डरे।
श्लोक 41 (12.120.41)
क्षयं शत्रोः संचयं पालनं वा । उभावर्थौ सहितौ धर्मकामौ । ततश्चान्यन्मतिमान्संदधीत । तस्माद्राजा बुद्धिमन्तं श्रयेत ॥
kṣayaṃ śatroḥ saṃcayaṃ pālanaṃ vā | ubhāvarthau sahitau dharmakāmau | tataścānyanmatimānsaṃdadhīta | tasmādrājā buddhimantaṃ śrayeta
शत्रु का नाश, या अपना संचय और पालन, ये दोनों साथ मिलकर धर्म और काम के साधक हैं; फिर बुद्धिमान् शेष की व्यवस्था करे। इसलिए राजा बुद्धिमान् पुरुष का आश्रय ले।
श्लोक 42 (12.120.42)
बुद्धिर्दीप्ता बलवन्तं हिनस्ति । बलं बुद्ध्या पाल्यते वर्धमानम् । शत्रुर्बुद्ध्या सीदते पीड्यमानो । बुद्धिपूर्वं कर्म यत्तत्प्रशस्तम् ॥
buddhirdīptā balavantaṃ hinasti | balaṃ buddhyā pālyate vardhamānam | śatrurbuddhyā sīdate pīḍyamāno | buddhipūrvaṃ karma yattatpraśastam
प्रज्वलित बुद्धि बलवान् को भी नष्ट कर देती है; बढ़ता हुआ बल बुद्धि से सुरक्षित रहता है; बुद्धि से दबाया गया शत्रु डूब जाता है; वही कर्म प्रशंसनीय है जो बुद्धिपूर्वक किया जाए।
श्लोक 43 (12.120.43)
सर्वान्कामान्कामयानो हि धीरः । सत्वेनाल्पेनाप्नुते हीनदोषः । यश्चात्मानं प्रार्थयतेऽर्थ्यमानैः । श्रेयः पात्रं पूरयते च नाल्पम् ॥
sarvānkāmānkāmayāno hi dhīraḥ | satvenālpenāpnute hīnadoṣaḥ | yaścātmānaṃ prārthayate'rthyamānaiḥ | śreyaḥ pātraṃ pūrayate ca nālpam
सभी इष्ट वस्तुओं की कामना करने वाला धीर, दोषरहित पुरुष थोड़े बल से भी उन्हें पा लेता है; परन्तु जो माँगने वालों के बीच अपने को ही माँगे जाने योग्य बनाता है, वह अपने कल्याण का पात्र थोड़ा भी नहीं भर पाता।
श्लोक 44 (12.120.44)
तस्माद्राजा प्रगृहीतः प्रजासु । मूलं लक्ष्म्याः सर्वशो ह्याददीत । दीर्घं कालं ह्यपि संपीड्यमानो । व्युष्यात्संपद्व्यवसायेन शक्त्या ॥
tasmādrājā pragṛhītaḥ prajāsu | mūlaṃ lakṣmyāḥ sarvaśo hyādadīta | dīrghaṃ kālaṃ hyapi saṃpīḍyamāno | vyuṣyātsaṃpadvyavasāyena śaktyā
इसलिए प्रजा का स्नेह पाया हुआ राजा सब ओर से लक्ष्मी की जड़ ग्रहण करे; लम्बे समय तक पीड़ित होकर भी वह उद्योग और शक्ति से सम्पत्ति के साथ चमक उठेगा।
श्लोक 45 (12.120.45)
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा । सर्वं ह्येतद्व्यवसायेन शक्यम् । ब्रह्मायत्तं निवसति देहवत्सु । तस्माद्विद्याद्व्यवसायं प्रभूतम् ॥
vidyā tapo vā vipulaṃ dhanaṃ vā | sarvaṃ hyetadvyavasāyena śakyam | brahmāyattaṃ nivasati dehavatsu | tasmādvidyādvyavasāyaṃ prabhūtam
विद्या, तप या विपुल धन, यह सब दृढ़ उद्योग से प्राप्त हो सकता है। ब्रह्म देहधारियों में स्थित होकर निवास करता है; इसलिए उद्योग को महान् शक्ति जाने।
श्लोक 46 (12.120.46)
यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः । शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च । वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं । तस्माद्विद्वान्नावमन्येत देहम् ॥
yatrāsate matimanto manasvinaḥ | śakro viṣṇuryatra sarasvatī ca | vasanti bhūtāni ca yatra nityaṃ | tasmādvidvānnāvamanyeta deham
जहाँ मतिमान् और मनस्वी रहते हैं, जहाँ इन्द्र, विष्णु और सरस्वती रहते हैं, और जहाँ प्राणी सदा बसते हैं, इसलिए विद्वान् देह का अनादर न करे।
श्लोक 47 (12.120.47)
लुब्धं हन्यात्संप्रदानाद्धि नित्यं । लुब्धस्तृप्तिं परवित्तस्य नैति । सर्वो लुब्धः सर्वगुणोपभोगो । योऽर्थैर्हीनो धर्मकामौ जहाति ॥
lubdhaṃ hanyātsaṃpradānāddhi nityaṃ | lubdhastṛptiṃ paravittasya naiti | sarvo lubdhaḥ sarvaguṇopabhogo | yo'rthairhīno dharmakāmau jahāti
लोभी को सदा दान देकर वश में करे, क्योंकि लोभी दूसरे के धन से कभी तृप्त नहीं होता। प्रत्येक लोभी सब गुणों के उपभोग की लालसा करता है; और जो धन से रहित है, वह धर्म और काम को छोड़ देता है।
श्लोक 48 (12.120.48)
धनं भोगं पुत्रदारं समृद्धिं । सर्वं लुब्धः प्रार्थयते परेषाम् । लुब्धे दोषाः संभवन्तीह सर्वे । तस्माद्राजा न प्रगृह्णीत लुब्धम् ॥
dhanaṃ bhogaṃ putradāraṃ samṛddhiṃ | sarvaṃ lubdhaḥ prārthayate pareṣām | lubdhe doṣāḥ saṃbhavantīha sarve | tasmādrājā na pragṛhṇīta lubdham
धन, भोग, पुत्र-स्त्री और समृद्धि, लोभी दूसरों का सब कुछ चाहता है। लोभी में सभी दोष उत्पन्न होते हैं; इसलिए राजा लोभी को अपने निकट न लाए।
श्लोक 49 (12.120.49)
संदर्शनेन पुरुषं जघन्यमपि चोदयेत् । आरम्भान्द्विषतां प्राज्ञः सर्वार्थांश्च प्रसूदयेत् ॥
saṃdarśanena puruṣaṃ jaghanyamapi codayet | ārambhāndviṣatāṃ prājñaḥ sarvārthāṃśca prasūdayet
वह अपने दर्शन मात्र से निम्न पुरुष को भी प्रेरित करे; बुद्धिमान् राजा शत्रुओं के आरम्भ किए कामों को तोड़ दे और उनके सब प्रयोजनों को नष्ट करे।
श्लोक 50 (12.120.50)
धर्मान्वितेषु विज्ञाता मन्त्रगुप्तिश्च पाण्डव । आप्तो राजन्कुलीनश्च पर्याप्तो राष्ट्रसंग्रहे ॥
dharmānviteṣu vijñātā mantraguptiśca pāṇḍava | āpto rājankulīnaśca paryāpto rāṣṭrasaṃgrahe
हे पाण्डव, जो धर्मयुक्त विषयों में निपुण और मन्त्रणा को गुप्त रखने वाला हो; हे राजन्, विश्वसनीय, कुलीन और राष्ट्र के संग्रह में पूर्ण समर्थ हो,
श्लोक 51 (12.120.51)
विधिप्रयुक्तान्नरदेवधर्मा । नुक्तान्समासेन निबोध बुद्ध्या । इमान्विदध्यादनुसृत्य यो वै । राजा महीं पालयितुं स शक्तः ॥
vidhiprayuktānnaradevadharmā | nuktānsamāsena nibodha buddhyā | imānvidadhyādanusṛtya yo vai | rājā mahīṃ pālayituṃ sa śaktaḥ
विधि के अनुसार बताए गए राजाओं के धर्म, जो संक्षेप में कहे गए हैं, उन्हें बुद्धि से सुनो। जो राजा इनका अनुसरण करके इन्हें लागू करता है, वही पृथ्वी की रक्षा कर सकता है।
श्लोक 52 (12.120.52)
सुनीतिजं यस्य विधानजं सुखं । धर्मप्रणीतं विधिवत्प्रसिद्ध्यति । न निन्द्यते तस्य गतिर्महीपते । स विन्दते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम् ॥
sunītijaṃ yasya vidhānajaṃ sukhaṃ | dharmapraṇītaṃ vidhivatprasiddhyati | na nindyate tasya gatirmahīpate | sa vindate rājyasukhaṃ hyanuttamam
जिसका सुख उत्तम नीति और उचित व्यवस्था से उत्पन्न होता है, जो धर्म से संचालित है और विधि से भलीभाँति सफल होता है, जिसके मार्ग की निन्दा नहीं होती, हे पृथ्वीपति, वह राज्य का अनुपम सुख पाता है।
श्लोक 53 (12.120.53)
धनैर्विशिष्टान्मतिशीलपूजिता । न्गुणोपपन्नान्युधि दृष्टविक्रमान् । गुणेषु युक्तानचिरादिवात्मवां । स्ततोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान् ॥
dhanairviśiṣṭānmatiśīlapūjitā | nguṇopapannānyudhi dṛṣṭavikramān | guṇeṣu yuktānacirādivātmavāṃ | stato'bhisaṃdhāya nihanti śātravān
आत्मसंयमी राजा जो धन में बढ़े-चढ़े, बुद्धि और शील से पूजित, गुणसम्पन्न, युद्ध में पराक्रम दिखा चुके और राजनीति के गुणों में कुशल पुरुषों को शीघ्र अपने पक्ष में कर लेता है, वह फिर शत्रुओं का संहार करता है।
श्लोक 54 (12.120.54)
पश्येदुपायान्विविधेषु कर्मसु । न चानुपायेन मतिं निवेशयेत् । श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं । न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते ॥
paśyedupāyānvividheṣu karmasu | na cānupāyena matiṃ niveśayet | śriyaṃ viśiṣṭāṃ vipulaṃ yaśo dhanaṃ | na doṣadarśī puruṣaḥ samaśnute
वह अपने अनेक कार्यों में उपाय खोजे और बिना उपाय के किसी काम में मन न लगाए; केवल दोष देखने वाला पुरुष न उत्तम श्री पाता है, न विपुल यश, न धन।
श्लोक 55 (12.120.55)
प्रीतिप्रवृत्तिं विनिवर्तनं च । सुहृत्सु विज्ञाय विचार्य चोभयोः । यदेव मित्रं गुरुभारमावहे । त्तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद्बुधः ॥
prītipravṛttiṃ vinivartanaṃ ca | suhṛtsu vijñāya vicārya cobhayoḥ | yadeva mitraṃ gurubhāramāvahe | ttadeva susnigdhamudāharedbudhaḥ
मित्रों में प्रीति की प्रवृत्ति और उससे निवृत्ति को जानकर और दोनों पक्षों का विचार करके, जो मित्र भारी बोझ उठाता है, उसी को बुद्धिमान् सच्चा स्नेही कहे।
श्लोक 56 (12.120.56)
एतान्मयोक्तांश्चर राजधर्मा । न्नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व । अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन । सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥
etānmayoktāṃścara rājadharmā | nnṛṇāṃ ca guptau matimādadhatsva | avāpsyase puṇyaphalaṃ sukhena | sarvo hi loko nṛpa dharmamūlaḥ
मैंने जो ये राजधर्म बताए हैं, उनका आचरण करो और प्रजा की रक्षा में मन लगाओ; तुम सहज ही पुण्य का फल पाओगे, क्योंकि हे राजन्, सारा संसार धर्म-मूलक है।