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शान्ति पर्व · अध्याय 121

दण्ड का स्वरूप और उसके नाम

युधिष्ठिर पूछते हैं कि दण्ड वास्तव में क्या है, उसका रूप कैसा है और वह संसार को व्यवस्था में कैसे रखता है। भीष्म दण्ड को व्यवहार (न्याय-व्यवस्था) और धर्म से अभिन्न बताते हैं; उसका भयंकर रूप और शस्त्र वर्णित करते हैं, उसके अनेक नाम और उसमें समाए विरोधी युग्म गिनाते हैं, और दिखाते हैं कि वह यज्ञ, देवताओं और सब प्राणियों के अन्न को कैसे धारण करता है। वे राजा की सेना के आठ अंग और व्यवहार के कई प्रकार बताते हैं, और अन्त में कहते हैं कि अपने धर्म में स्थित राजा के लिए माता-पिता भी दण्ड से परे नहीं हैं।

अध्याय 120अध्याय-सूचीअध्याय 122

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.121.1)

अयं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः । कीदृशश्च महादण्डो दण्डे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

ayaṃ pitāmahenokto rājadharmaḥ sanātanaḥ | kīdṛśaśca mahādaṇḍo daṇḍe sarvaṃ pratiṣṭhitam

पितामह ने राजाओं का यह सनातन धर्म बताया है। परन्तु वह महान् दण्ड कैसा है, जिस पर सब कुछ टिका हुआ है?

श्लोक 2 (12.121.2)

देवतानामृषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् । यक्षरक्षः पिशाचानां मर्त्यानां च विशेषतः ॥

devatānāmṛṣīṇāṃ ca pitṝṇāṃ ca mahātmanām | yakṣarakṣaḥ piśācānāṃ martyānāṃ ca viśeṣataḥ

देवताओं, ऋषियों, पितरों और महात्माओं का; यक्षों, राक्षसों और पिशाचों का, और विशेष रूप से मनुष्यों का —

श्लोक 3 (12.121.3)

सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यक्ष्वपि निवासिनाम् । सर्वस्यापि महातेजा दण्डः श्रेयानिति प्रभो ॥

sarveṣāṃ prāṇināṃ loke tiryakṣvapi nivāsinām | sarvasyāpi mahātejā daṇḍaḥ śreyāniti prabho

संसार के उन सब प्राणियों का, यहाँ तक कि पशु-पक्षी आदि योनियों में रहने वालों का भी — हे प्रभो, आपने कहा है कि इन सबके लिए तेजस्वी दण्ड ही परम कल्याणकारी है।

श्लोक 4 (12.121.4)

इत्येतदुक्तं भवता दण्डे वै सचराचरम् । पश्यतां लोक आयत्तं ससुरासुरमानुषम् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥

ityetaduktaṃ bhavatā daṇḍe vai sacarācaram | paśyatāṃ loka āyattaṃ sasurāsuramānuṣam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tattvena bharatarṣabha

आपने कहा है कि चर-अचर सहित सारा संसार, देवता, असुर और मनुष्यों समेत, दण्ड पर ही आश्रित है, जैसा ज्ञानी देखते हैं। हे भरतश्रेष्ठ, मैं यही बात यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 5 (12.121.5)

को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किंपरायणः । किमात्मकः कथंभूतः कतिमूर्तिः कथं प्रभुः ॥

ko daṇḍaḥ kīdṛśo daṇḍaḥ kiṃrūpaḥ kiṃparāyaṇaḥ | kimātmakaḥ kathaṃbhūtaḥ katimūrtiḥ kathaṃ prabhuḥ

दण्ड क्या है? वह कैसा है? उसका रूप क्या है और उसका अन्तिम आश्रय क्या है? उसका स्वरूप क्या है, वह कैसे उत्पन्न हुआ, उसकी कितनी मूर्तियाँ हैं, और वह प्रभु कैसे है?

श्लोक 6 (12.121.6)

जागर्ति च कथं दण्डः प्रजासु विहितात्मकः । कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति प्रतिपालयन् ॥

jāgarti ca kathaṃ daṇḍaḥ prajāsu vihitātmakaḥ | kaśca pūrvāparamidaṃ jāgarti pratipālayan

प्रजाओं में स्थापित दण्ड कैसे जागता रहता है? और इस सबकी रक्षा करता हुआ, आगे-पीछे कौन जागता रहता है?

श्लोक 7 (12.121.7)

कश्च विज्ञायते पूर्वः को वरो दण्डसंज्ञितः । किंसंस्थश्चाभवद्दण्डः का चास्य गतिरिष्यते ॥

kaśca vijñāyate pūrvaḥ ko varo daṇḍasaṃjñitaḥ | kiṃsaṃsthaścābhavaddaṇḍaḥ kā cāsya gatiriṣyate

सबसे पहले कौन जाना जाता है, और 'दण्ड' नाम से जो श्रेष्ठ है वह कौन है? दण्ड किसमें प्रतिष्ठित है और उसकी गति क्या कही जाती है?

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (12.121.8)

शृणु कौरव्य यो दण्डो व्यवहारो यथा च सः । यस्मिन्हि सर्वमायत्तं स धर्म इति केवलः ॥

śṛṇu kauravya yo daṇḍo vyavahāro yathā ca saḥ | yasminhi sarvamāyattaṃ sa dharma iti kevalaḥ

हे कुरुवंशी, सुनो कि दण्ड क्या है और वह व्यवहार (न्याय-व्यवस्था) कैसे है। जिसमें सब कुछ आश्रित है, वह केवल धर्म ही है।

श्लोक 9 (12.121.9)

धर्मस्यार्थे महाराज व्यवहार इतीष्यते । तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्विह महात्मनः ॥

dharmasyārthe mahārāja vyavahāra itīṣyate | tasya lopaḥ kathaṃ na syāllokeṣviha mahātmanaḥ

हे महाराज, धर्म के प्रयोजन से ही न्याय-व्यवस्था को 'व्यवहार' कहा जाता है; अन्यथा इन लोकों में उस महान् तत्त्व का लोप कैसे न होता?

श्लोक 10 (12.121.10)

इत्यर्थं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते । अपि चैतत्पुरा राजन्मनुना प्रोक्तमादितः ॥

ityarthaṃ vyavahārasya vyavahāratvamiṣyate | api caitatpurā rājanmanunā proktamāditaḥ

इसी कारण व्यवहार को 'व्यवहार' कहा जाता है। हे राजन्, बहुत पहले आरम्भ में मनु ने भी यही कहा था —

श्लोक 11 (12.121.11)

सुप्रणीतेन दण्डेन प्रियाप्रियसमात्मना । प्रजा रक्षति यः सम्यग्धर्म एव स केवलः ॥

supraṇītena daṇḍena priyāpriyasamātmanā | prajā rakṣati yaḥ samyagdharma eva sa kevalaḥ

जो राजा भली-भाँति प्रयुक्त दण्ड से, प्रिय और अप्रिय को समान दृष्टि से देखते हुए, प्रजा की रक्षा करता है, वह केवल धर्म ही है।

श्लोक 12 (12.121.12)

यथोक्तमेतद्वचनं प्रागेव मनुना पुरा । यन्मयोक्तं वसिष्ठेन ब्रह्मणो वचनं महत् ॥

yathoktametadvacanaṃ prāgeva manunā purā | yanmayoktaṃ vasiṣṭhena brahmaṇo vacanaṃ mahat

ये ही वचन बहुत पहले सबसे आरम्भ में मनु ने कहे थे; और जो ब्रह्मा का महान् वचन मैंने कहा है, वही वसिष्ठ ने भी कहा था।

श्लोक 13 (12.121.13)

प्रागिदं वचनं प्रोक्तमतः प्राग्वचनं विदुः । व्यवहारस्य चाख्यानाद्व्यवहार इहोच्यते ॥

prāgidaṃ vacanaṃ proktamataḥ prāgvacanaṃ viduḥ | vyavahārasya cākhyānādvyavahāra ihocyate

यह वचन सबसे पहले कहा गया था, इसलिए लोग इसे 'प्राग्वचन' कहते हैं; और व्यवहार का कथन करने के कारण यहाँ इसे 'व्यवहार' कहा जाता है।

श्लोक 14 (12.121.14)

दण्डान्त्रिवर्गः सततं सुप्रणीतात्प्रवर्तते । दैवं हि परमो दण्डो रूपतोऽग्निरिवोत्थितः ॥

daṇḍāntrivargaḥ satataṃ supraṇītātpravartate | daivaṃ hi paramo daṇḍo rūpato'gnirivotthitaḥ

भली-भाँति प्रयुक्त दण्ड से धर्म, अर्थ और काम, यह त्रिवर्ग, सदा चलता रहता है। दण्ड वास्तव में परम देवता है, जो रूप में प्रज्वलित अग्नि के समान है।

श्लोक 15 (12.121.15)

नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः । अष्टपान्नैकनयनः शङ्कुकर्णोर्ध्वरोमवान् ॥

nīlotpaladalaśyāmaścaturdaṃṣṭraścaturbhujaḥ | aṣṭapānnaikanayanaḥ śaṅkukarṇordhvaromavān

वह नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम है; चार दाढ़ों, चार भुजाओं और आठ पैरों वाला है; उसके अनेक नेत्र हैं, कान खूँटे जैसे हैं और रोएँ ऊपर की ओर खड़े हैं;

श्लोक 16 (12.121.16)

जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः । एतद्रूपं बिभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुरासदः ॥

jaṭī dvijihvastāmrāsyo mṛgarājatanucchadaḥ | etadrūpaṃ bibhartyugraṃ daṇḍo nityaṃ durāsadaḥ

वह जटाधारी, दो जीभों वाला और ताँबे के रंग के मुख वाला है, तथा मृगराज (सिंह) की खाल ओढ़े हुए है — दण्ड सदा यही उग्र रूप धारण करता है, जिसके निकट पहुँचना कठिन है।

श्लोक 17 (12.121.17)

असिर्धनुर्गदा शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः । मुसलं परशुश्चक्रं प्रासदण्डर्ष्टितोमराः ॥

asirdhanurgadā śaktistriśūlaṃ mudgaraḥ śaraḥ | musalaṃ paraśuścakraṃ prāsadaṇḍarṣṭitomarāḥ

खड्ग, धनुष, गदा, शक्ति, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, मूसल, फरसा, चक्र, प्रास, दण्ड, ऋष्टि और तोमर —

श्लोक 18 (12.121.18)

सर्वप्रहरणीयानि यानि यानीह कानिचित् । दण्ड एव स सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ॥

sarvapraharaṇīyāni yāni yānīha kānicit | daṇḍa eva sa sarvātmā loke carati mūrtimān

यहाँ जितने भी प्रकार के शस्त्र हैं, वे सब दण्ड ही हैं; सबका आत्मा वही दण्ड शरीर धारण करके संसार में विचरता है।

श्लोक 19 (12.121.19)

भिन्दंश्छिन्दन्रुजन्कृन्तन्दारयन्पाटयंस्तथा । घातयन्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ॥

bhindaṃśchindanrujankṛntandārayanpāṭayaṃstathā | ghātayannabhidhāvaṃśca daṇḍa eva caratyuta

तोड़ता, काटता, कुचलता, चीरता, फाड़ता, विदीर्ण करता, मारता और दौड़कर आक्रमण करता हुआ — यह सब करता हुआ दण्ड ही विचरता है।

श्लोक 20 (12.121.20)

असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्मा दुरासदः । श्रीगर्भो विजयः शास्ता व्यवहारः प्रजागरः ॥

asirviśasano dharmastīkṣṇavarmā durāsadaḥ | śrīgarbho vijayaḥ śāstā vyavahāraḥ prajāgaraḥ

वह असि (खड्ग), विशसन (संहारक), धर्म, तीक्ष्णवर्मा, दुरासद, श्रीगर्भ, विजय, शास्ता, व्यवहार और प्रजागर (सदा जागने वाला) है।

श्लोक 21 (12.121.21)

शास्त्रं ब्राह्मणमन्त्राश्च शास्ता प्रवचनं परम् । धर्मपालोऽक्षरो गोपः सत्यगो नित्यगो गृहः ॥

śāstraṃ brāhmaṇamantrāśca śāstā pravacanaṃ param | dharmapālo'kṣaro gopaḥ satyago nityago gṛhaḥ

वह शास्त्र, ब्राह्मण और मन्त्र, शास्ता, परम प्रवचन, धर्मपाल, अक्षर, गोप, सत्यग, नित्यग और गृह है।

श्लोक 22 (12.121.22)

असङ्गो रुद्रतनयो मनुर्ज्येष्ठः शिवंकरः । नामान्येतानि दण्डस्य कीर्तितानि युधिष्ठिर ॥

asaṅgo rudratanayo manurjyeṣṭhaḥ śivaṃkaraḥ | nāmānyetāni daṇḍasya kīrtitāni yudhiṣṭhira

वह असंग, रुद्रतनय, ज्येष्ठ मनु और शिवंकर है। हे युधिष्ठिर, दण्ड के ये नाम बताए गए हैं।

श्लोक 23 (12.121.23)

दण्डो हि भगवान्विष्णुर्यज्ञो नारायणः प्रभुः । शश्वद्रूपं महद्बिभ्रन्महापुरुष उच्यते ॥

daṇḍo hi bhagavānviṣṇuryajño nārāyaṇaḥ prabhuḥ | śaśvadrūpaṃ mahadbibhranmahāpuruṣa ucyate

दण्ड ही भगवान् विष्णु है, वही यज्ञ और प्रभु नारायण है। सदा महान् रूप धारण करने के कारण वह महापुरुष कहलाता है।

श्लोक 24 (12.121.24)

तथोक्ता ब्रह्मकन्येति लक्ष्मीर्नीतिः सरस्वती । दण्डनीतिर्जगद्धात्री दण्डो हि बहुविग्रहः ॥

tathoktā brahmakanyeti lakṣmīrnītiḥ sarasvatī | daṇḍanītirjagaddhātrī daṇḍo hi bahuvigrahaḥ

और जिसे ब्रह्मा की कन्या कहा गया है — लक्ष्मी, नीति, सरस्वती — वही जगत् को धारण करने वाली दण्डनीति है। दण्ड के अनेक रूप हैं।

श्लोक 25 (12.121.25)

अर्थानर्थौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ बलाबले । दौर्भाग्यं भागधेयं च पुण्यापुण्ये गुणागुणौ ॥

arthānarthau sukhaṃ duḥkhaṃ dharmādharmau balābale | daurbhāgyaṃ bhāgadheyaṃ ca puṇyāpuṇye guṇāguṇau

लाभ और हानि, सुख और दुःख, धर्म और अधर्म, बल और निर्बलता, दुर्भाग्य और सौभाग्य, पुण्य और पाप, गुण और अवगुण;

श्लोक 26 (12.121.26)

कामाकामावृतुर्मासः शर्वरी दिवसः क्षणः । अप्रमादः प्रमादश्च हर्षशोकौ शमो दमः ॥

kāmākāmāvṛturmāsaḥ śarvarī divasaḥ kṣaṇaḥ | apramādaḥ pramādaśca harṣaśokau śamo damaḥ

इच्छा और अनिच्छा; ऋतु, मास, रात्रि, दिन और क्षण; सावधानी और असावधानी; हर्ष और शोक; शम और दम;

श्लोक 27 (12.121.27)

दैवं पुरुषकारश्च मोक्षामोक्षौ भयाभये । हिंसाहिंसे तपो यज्ञः संयमोऽथ विषामृते ॥

daivaṃ puruṣakāraśca mokṣāmokṣau bhayābhaye | hiṃsāhiṃse tapo yajñaḥ saṃyamo'tha viṣāmṛte

दैव और पुरुषार्थ; मोक्ष और बन्धन; भय और अभय; हिंसा और अहिंसा; तप, यज्ञ और संयम; विष और अमृत;

श्लोक 28 (12.121.28)

अन्तश्चादिश्च मध्यं च कृतानां च प्रपञ्चनम् । मदः प्रमोदो दर्पश्च दम्भो धैर्यं नयानयौ ॥

antaścādiśca madhyaṃ ca kṛtānāṃ ca prapañcanam | madaḥ pramodo darpaśca dambho dhairyaṃ nayānayau

अन्त, आदि और मध्य; रचे हुए सब पदार्थों का विस्तार; मद, आनन्द, घमण्ड, पाखण्ड, धैर्य; नीति और अनीति;

श्लोक 29 (12.121.29)

अशक्तिः शक्तिरित्येवं मानस्तम्भौ व्ययाव्ययौ । विनयश्च विसर्गश्च कालाकालौ च कौरव ॥

aśaktiḥ śaktirityevaṃ mānastambhau vyayāvyayau | vinayaśca visargaśca kālākālau ca kaurava

अशक्ति और शक्ति; मान और जड़ता; व्यय और अव्यय; विनय और विसर्ग; और हे कौरव, उचित समय और अनुचित समय;

श्लोक 30 (12.121.30)

अनृतं चाज्ञता सत्यं श्रद्धाश्रद्धे तथैव च । क्लीबता व्यवसायश्च लाभालाभौ जयाजयौ ॥

anṛtaṃ cājñatā satyaṃ śraddhāśraddhe tathaiva ca | klībatā vyavasāyaśca lābhālābhau jayājayau

असत्य, अज्ञान और सत्य; श्रद्धा और अश्रद्धा; क्लीबता और दृढ़ निश्चय; लाभ और हानि; जय और पराजय;

श्लोक 31 (12.121.31)

तीक्ष्णता मृदुतात्युग्रमागमानागमौ तथा । विरोधश्चाविरोधश्च कार्याकार्ये बलाबले ॥

tīkṣṇatā mṛdutātyugramāgamānāgamau tathā | virodhaścāvirodhaśca kāryākārye balābale

तीक्ष्णता और कोमलता, अत्यन्त उग्रता; आगम और अनागम; विरोध और अविरोध; कर्तव्य और अकर्तव्य; बल और निर्बलता;

श्लोक 32 (12.121.32)

असूया चानसूया च धर्माधर्मौ तथैव च । अपत्रपानपत्रपे ह्रीश्च संपद्विपच्च ह ॥

asūyā cānasūyā ca dharmādharmau tathaiva ca | apatrapānapatrape hrīśca saṃpadvipacca ha

ईर्ष्या और ईर्ष्या का अभाव; धर्म और अधर्म फिर भी; निर्लज्जता और लज्जा; विनम्र संकोच; सम्पत्ति और विपत्ति;

श्लोक 33 (12.121.33)

तेजः कर्माणि पाण्डित्यं वाक्शक्तिर्बुद्धितत्वता । एवं दण्डस्य लोकेऽस्मिञ्जागर्ति बहुरूपता ॥

tejaḥ karmāṇi pāṇḍityaṃ vākśaktirbuddhitatvatā | evaṃ daṇḍasya loke'smiñjāgarti bahurūpatā

तेज, कर्म, पाण्डित्य, वाणी की शक्ति और तत्त्व को समझने वाली बुद्धि। इस प्रकार इस लोक में दण्ड के अनेक रूप सदा जागते रहते हैं।

श्लोक 34 (12.121.34)

न स्याद्यदीह दण्डो वै प्रमथेयुः परस्परम् । भयाद्दण्डस्य नान्योन्यं घ्नन्ति चैव युधिष्ठिर ॥

na syādyadīha daṇḍo vai pramatheyuḥ parasparam | bhayāddaṇḍasya nānyonyaṃ ghnanti caiva yudhiṣṭhira

यदि यहाँ दण्ड न होता तो लोग एक-दूसरे को कुचल डालते। हे युधिष्ठिर, दण्ड के भय से ही वे आपस में एक-दूसरे को नहीं मारते।

श्लोक 35 (12.121.35)

दण्डेन रक्ष्यमाणा हि राजन्नहरहः प्रजाः । राजानं वर्धयन्तीह तस्माद्दण्डः परायणम् ॥

daṇḍena rakṣyamāṇā hi rājannaharahaḥ prajāḥ | rājānaṃ vardhayantīha tasmāddaṇḍaḥ parāyaṇam

हे राजन्, दण्ड से प्रतिदिन रक्षित प्रजा यहाँ राजा को बढ़ाती है; इसीलिए दण्ड परम आश्रय है।

श्लोक 36 (12.121.36)

व्यवस्थापयते नित्यमिमं लोकं नरेश्वर । सत्ये व्यवस्थितो धर्मो ब्राह्मणेष्ववतिष्ठते ॥

vyavasthāpayate nityamimaṃ lokaṃ nareśvara | satye vyavasthito dharmo brāhmaṇeṣvavatiṣṭhate

हे नरेश्वर, यह दण्ड इस लोक को सदा व्यवस्था में रखता है। सत्य में स्थित धर्म ब्राह्मणों में निवास करता है।

श्लोक 37 (12.121.37)

धर्मयुक्ता द्विजश्रेष्ठा देवयुक्ता भवन्ति च । बभूव यज्ञो देवेभ्यो यज्ञः प्रीणाति देवताः ॥

dharmayuktā dvijaśreṣṭhā devayuktā bhavanti ca | babhūva yajño devebhyo yajñaḥ prīṇāti devatāḥ

धर्म से युक्त श्रेष्ठ द्विज देवताओं के साथ युक्त हो जाते हैं। देवताओं के लिए यज्ञ उत्पन्न हुआ, और यज्ञ देवताओं को प्रसन्न करता है।

श्लोक 38 (12.121.38)

प्रीताश्च देवता लोकमिन्द्रे प्रतिददत्युत । अन्नं ददाति शक्रश्चाप्यनुगृह्णन्निमाः प्रजाः ॥

prītāśca devatā lokamindre pratidadatyuta | annaṃ dadāti śakraścāpyanugṛhṇannimāḥ prajāḥ

प्रसन्न हुए देवता लोक को इन्द्र के हाथ सौंप देते हैं। इन्द्र इन प्रजाओं पर कृपा करके उन्हें अन्न देते हैं।

श्लोक 39 (12.121.39)

प्राणाश्च सर्वभूतानां नित्यमन्ने प्रतिष्ठिताः । तस्मात्प्रजाः प्रतिष्ठन्ते दण्डो जागर्ति तासु च ॥

prāṇāśca sarvabhūtānāṃ nityamanne pratiṣṭhitāḥ | tasmātprajāḥ pratiṣṭhante daṇḍo jāgarti tāsu ca

सब प्राणियों के प्राण सदा अन्न पर टिके हैं; इसीलिए प्रजाएँ स्थिर रहती हैं, और दण्ड उन पर जागता रहता है।

श्लोक 40 (12.121.40)

एवंप्रयोजनश्चैव दण्डः क्षत्रियतां गतः । रक्षन्प्रजाः स जागर्ति नित्यं सुविहितोऽक्षरः ॥

evaṃprayojanaścaiva daṇḍaḥ kṣatriyatāṃ gataḥ | rakṣanprajāḥ sa jāgarti nityaṃ suvihito'kṣaraḥ

ऐसा प्रयोजन होने के कारण दण्ड ने क्षत्रिय का रूप धारण किया है। प्रजा की रक्षा करता हुआ वह अविनाशी, भली-भाँति स्थापित होकर, सदा जागता रहता है।

श्लोक 41 (12.121.41)

ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्वं वृत्तं प्रजापतिः । भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः ॥

īśvaraḥ puruṣaḥ prāṇaḥ satvaṃ vṛttaṃ prajāpatiḥ | bhūtātmā jīva ityevaṃ nāmabhiḥ procyate'ṣṭabhiḥ

ईश्वर, पुरुष, प्राण, सत्त्व, वृत्त, प्रजापति, भूतात्मा और जीव — इन आठ नामों से उसे पुकारा जाता है।

श्लोक 42 (12.121.42)

अददद्दण्डमेवास्मै धृतमैश्वर्यमेव च । बले नयश्च संयुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ॥

adadaddaṇḍamevāsmai dhṛtamaiśvaryameva ca | bale nayaśca saṃyuktaḥ sadā pañcavidhātmakaḥ

ईश्वर ने इस राजा को दण्ड ही दिया और उसके साथ ऐश्वर्य को स्थिर किया; और बल तथा नीति से सदा युक्त राजा पाँच प्रकार के स्वरूप वाला है।

श्लोक 43 (12.121.43)

कुलं बहुधनामात्याः प्रज्ञा प्रोक्ता बलानि तु । आहार्यमष्टकैर्द्रव्यैर्बलमन्यद्युधिष्ठिर ॥

kulaṃ bahudhanāmātyāḥ prajñā proktā balāni tu | āhāryamaṣṭakairdravyairbalamanyadyudhiṣṭhira

कुल, प्रचुर धन, अमात्य और प्रज्ञा — ये बल कहे गए हैं। हे युधिष्ठिर, एक और बल है जो आठ प्रकार की सामग्रियों से जुटाया जाता है।

श्लोक 44 (12.121.44)

हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च । देशिकाश्चादिकाश्चैव तदष्टाङ्गं बलं स्मृतम् ॥

hastino'śvā rathāḥ pattirnāvo viṣṭistathaiva ca | deśikāścādikāścaiva tadaṣṭāṅgaṃ balaṃ smṛtam

हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, नावें, बेगारी मजदूर, पथप्रदर्शक और अग्रगामी — यही आठ अंगों वाली सेना कही गई है।

श्लोक 45 (12.121.45)

अथ चाङ्गस्य युक्तस्य रथिनो हस्तियायिनः । अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ॥

atha cāṅgasya yuktasya rathino hastiyāyinaḥ | aśvārohāḥ padātāśca mantriṇo rasadāśca ye

फिर उस सुसज्जित सेना में: रथी और हाथी पर चढ़ने वाले, घुड़सवार और पैदल, मन्त्री और वैद्य,

श्लोक 46 (12.121.46)

भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः । कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ॥

bhikṣukāḥ prāḍvivākāśca mauhūrtā daivacintakāḥ | kośo mitrāṇi dhānyaṃ ca sarvopakaraṇāni ca

भिक्षुक, न्यायाधीश, मुहूर्त जानने वाले और दैव का विचार करने वाले, कोश, मित्र, अन्न और सब प्रकार की सामग्री —

श्लोक 47 (12.121.47)

सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह तं विदुः । राज्यस्य दण्डमेवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ॥

saptaprakṛti cāṣṭāṅgaṃ śarīramiha taṃ viduḥ | rājyasya daṇḍamevāṅgaṃ daṇḍaḥ prabhava eva ca

सात प्रकृतियों और आठ अंगों वाले इस समूह को यहाँ राज्य का शरीर कहा जाता है। दण्ड राज्य का एक अंग है, और दण्ड ही उसका उद्गम भी है।

श्लोक 48 (12.121.48)

ईश्वरेण प्रसन्नेन कारणात्क्षत्रियस्य च । दण्डो दत्तः सदा गोप्ता दण्डो हीदं सनातनम् ॥

īśvareṇa prasannena kāraṇātkṣatriyasya ca | daṇḍo dattaḥ sadā goptā daṇḍo hīdaṃ sanātanam

प्रसन्न हुए ईश्वर ने क्षत्रिय के लिए दण्ड को सदा रक्षा करने वाले के रूप में दिया; क्योंकि यह दण्ड ही सनातन व्यवस्था है।

श्लोक 49 (12.121.49)

राजा पूज्यतमो नान्यो यथा धर्मः प्रदर्शितः । ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं स्वधर्मस्थापनाय च ॥

rājā pūjyatamo nānyo yathā dharmaḥ pradarśitaḥ | brahmaṇā lokarakṣārthaṃ svadharmasthāpanāya ca

राजा सबसे अधिक पूजनीय है, दूसरा कोई नहीं, जैसा ब्रह्मा ने लोक की रक्षा और अपने-अपने धर्म की स्थापना के लिए धर्म को प्रकट किया है।

श्लोक 50 (12.121.50)

भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथाविधः । तस्याद्य सहितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ॥

bhartṛpratyaya utpanno vyavahārastathāvidhaḥ | tasyādya sahito dṛṣṭo bhartṛpratyayalakṣaṇaḥ

इस प्रकार व्यवहार स्वामी (राजा) के प्रमाण पर आश्रित होकर उत्पन्न हुआ है। उसके साथ जो रूप जुड़ा हुआ दिखता है, वह स्वामी के प्रमाण पर निर्भरता के लक्षण वाला है।

श्लोक 51 (12.121.51)

व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते । मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथाऽपरः ॥

vyavahārastu vedātmā vedapratyaya ucyate | maulaśca naraśārdūla śāstroktaśca tathā'paraḥ

जिस व्यवहार का स्वरूप वेद है, वह वेद के प्रमाण पर आश्रित कहा जाता है। हे नरश्रेष्ठ, एक और परम्परागत है, और एक और वह है जो शास्त्रों में कहा गया है।

श्लोक 52 (12.121.52)

उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः । ज्ञेयो नः स नरेन्द्रस्थो दण्डः प्रत्यय एव च ॥

ukto yaścāpi daṇḍo'sau bhartṛpratyayalakṣaṇaḥ | jñeyo naḥ sa narendrastho daṇḍaḥ pratyaya eva ca

और जो दण्ड बताया गया है, जिसका लक्षण स्वामी के प्रमाण पर निर्भरता है, उसे हमें राजा में स्थित जानना चाहिए; वही प्रमाण भी है।

श्लोक 53 (12.121.53)

दण्डप्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः । व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषयात्मकः ॥

daṇḍapratyayadṛṣṭo'pi vyavahārātmakaḥ smṛtaḥ | vyavahāraḥ smṛto yaśca sa vedaviṣayātmakaḥ

जो दण्ड के प्रमाण पर आश्रित दिखाई देता है, वह भी व्यवहार-स्वरूप माना गया है; और परम्परा में जो व्यवहार स्मरण किया गया है, उसका विषय वेद है।

श्लोक 54 (12.121.54)

यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शनः । धर्मप्रत्यय उद्दिष्टो यश्च धर्मः कृतात्मभिः ॥

yaśca vedaprasūtātmā sa dharmo guṇadarśanaḥ | dharmapratyaya uddiṣṭo yaśca dharmaḥ kṛtātmabhiḥ

और जो वेद से उत्पन्न है, वह धर्म है, जो गुणों को दिखाता है; उसे धर्म के प्रमाण पर आश्रित बताया गया है, और वही कृतात्मा पुरुषों का धर्म है।

श्लोक 55 (12.121.55)

व्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदृष्टो युधिष्ठिर । त्रीन्धारयति लोकान्वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥

vyavahāraḥ prajāgoptā brahmadṛṣṭo yudhiṣṭhira | trīndhārayati lokānvai satyātmā bhūtivardhanaḥ

हे युधिष्ठिर, प्रजा की रक्षा करने वाला व्यवहार ब्रह्मा द्वारा देखा गया था। सत्यस्वरूप और समृद्धि बढ़ाने वाला वह तीनों लोकों को धारण करता है।

श्लोक 56 (12.121.56)

यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः । व्यवहारश्च दृष्टो यः स वेद इति नः श्रुतिः ॥

yaśca daṇḍaḥ sa dṛṣṭo no vyavahāraḥ sanātanaḥ | vyavahāraśca dṛṣṭo yaḥ sa veda iti naḥ śrutiḥ

जो दण्ड है, उसे हम सनातन व्यवहार के रूप में देखते हैं; और जो व्यवहार दिखाई देता है, वही वेद है — ऐसा हमारी श्रुति है।

श्लोक 57 (12.121.57)

यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः । ब्रह्मा पितामहः पूर्वं भगवांश्च प्रजापतिः ॥

yaśca vedaḥ sa vai dharmo yaśca dharmaḥ sa satpathaḥ | brahmā pitāmahaḥ pūrvaṃ bhagavāṃśca prajāpatiḥ

और जो वेद है वही धर्म है, और जो धर्म है वही सत्पुरुषों का मार्ग है। पितामह ब्रह्मा, भगवान् प्रजापति, सबसे पहले हुए;

श्लोक 58 (12.121.58)

लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् । स मनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ॥

lokānāṃ sa hi sarveṣāṃ sasurāsurarakṣasām | sa manuṣyoragavatāṃ kartā caiva sa bhūtakṛt

क्योंकि वही देवता, असुर और राक्षसों सहित सब लोकों का कर्ता है, मनुष्यों और नागों का कर्ता है, और प्राणियों का रचयिता है।

श्लोक 59 (12.121.59)

ततो नो व्यवहारोऽयं भर्तृप्रत्ययलक्षणः । तस्मादिदमवोचाम व्यवहारनिदर्शनम् ॥

tato no vyavahāro'yaṃ bhartṛpratyayalakṣaṇaḥ | tasmādidamavocāma vyavahāranidarśanam

उन्हीं से हमारा यह व्यवहार आया है, जिसका लक्षण स्वामी के प्रमाण पर निर्भरता है; इसीलिए हमने व्यवहार का यह उदाहरण कहा है।

श्लोक 60 (12.121.60)

माता पिता च भ्राता च भार्या चैव पुरोहितः । नादण्ड्यो विद्यते राज्ञो यः स्वधर्मेण तिष्ठति ॥

mātā pitā ca bhrātā ca bhāryā caiva purohitaḥ | nādaṇḍyo vidyate rājño yaḥ svadharmeṇa tiṣṭhati

जो राजा अपने धर्म में स्थित है, उसके लिए कोई भी दण्ड से परे नहीं है — न माता, न पिता, न भाई, न पत्नी और न पुरोहित।

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