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शान्ति पर्व · अध्याय 124

शील: प्रह्लाद, इन्द्र और श्री का प्रस्थान

युधिष्ठिर पूछते हैं कि शील कैसे प्राप्त होता है। भीष्म बताते हैं कि पाण्डवों की समृद्धि देखकर दुःखी दुर्योधन को धृतराष्ट्र ने प्रह्लाद का प्राचीन आख्यान सुनाया। ब्राह्मण के वेश में इन्द्र ने प्रह्लाद की सेवा की और वर में उनका शील माँग लिया; शील के जाने पर धर्म, सत्य, वृत्त, बल और अन्त में श्री भी उसके पीछे चली गईं। फिर धृतराष्ट्र शील का सार अहिंसा, दया और दान बताते हुए दुर्योधन को उसे अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.124.1)

इमे जना मनुष्येन्द्र प्रशंसन्ति सदा भुवि । धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशयो महान् ॥

ime janā manuṣyendra praśaṃsanti sadā bhuvi | dharmasya śīlamevādau tato me saṃśayo mahān

हे नरेन्द्र, लोग पृथ्वी पर सदा धर्म के आरम्भ में शील की ही प्रशंसा करते हैं; इसी से मेरे मन में बड़ा संशय उठा है।

श्लोक 2 (12.124.2)

यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं यथैतदुपलभ्यते ॥

yadi tacchakyamasmābhirjñātuṃ dharmabhṛtāṃ vara | śrotumicchāmi tatsarvaṃ yathaitadupalabhyate

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, यदि हमारे लिए इसे जान पाना सम्भव हो, तो मैं वह सब जैसा समझा जाता है वैसा सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 3 (12.124.3)

कथं तत्प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत । किंलक्षणं च तत्प्रोक्तं ब्रूहि मे वदतां वर ॥

kathaṃ tatprāpyate śīlaṃ śrotumicchāmi bhārata | kiṃlakṣaṇaṃ ca tatproktaṃ brūhi me vadatāṃ vara

वह शील कैसे प्राप्त होता है? हे भारत, मैं यह सुनना चाहता हूँ। उसके लक्षण क्या बताए गए हैं? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (12.124.4)

पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद । आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तवागताम् ॥

purā duryodhaneneha dhṛtarāṣṭrāya mānada | ākhyātaṃ tapyamānena śriyaṃ dṛṣṭvā tavāgatām

हे मानद, बहुत पहले तुम्हारे पास आई हुई श्री को देखकर सन्तप्त हुए दुर्योधन ने यह बात धृतराष्ट्र से कही थी।

श्लोक 5 (12.124.5)

इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह । सभायां चापहसनं तत्सर्वं शृणु भारत ॥

indraprasthe mahārāja tava sabhrātṛkasya ha | sabhāyāṃ cāpahasanaṃ tatsarvaṃ śṛṇu bhārata

हे महाराज, इन्द्रप्रस्थ में तुम्हारी और तुम्हारे भाइयों की सभा में जो उपहास हुआ था, वह सब सुनो, हे भारत।

श्लोक 6 (12.124.6)

भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् । दुर्योधनस्तदा दीनः सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥

bhavatastāṃ sabhāṃ dṛṣṭvā samṛddhiṃ cāpyanuttamām | duryodhanastadā dīnaḥ sarvaṃ pitre nyavedayat

तुम्हारी उस सभा और तुम्हारी अनुपम समृद्धि को देखकर दुर्योधन ने उदास होकर अपने पिता को सब कुछ बता दिया।

श्लोक 7 (12.124.7)

श्रुत्वा हि धृतराष्ट्रश्च दुर्योधनवचस्तदा । अब्रवीत्कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ॥

śrutvā hi dhṛtarāṣṭraśca duryodhanavacastadā | abravītkarṇasahitaṃ duryodhanamidaṃ vacaḥ

दुर्योधन की बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कर्ण के साथ बैठे दुर्योधन से तब यह वचन कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 8 (12.124.8)

किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग्भविष्यति ॥

kimarthaṃ tapyase putra śrotumicchāmi tattvataḥ | śrutvā tvāmanuneṣyāmi yadi samyagbhaviṣyati

बेटा, तुम किसलिए सन्तप्त हो? मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ। सुनकर मैं तुम्हें मनाऊँगा, यदि वह उचित सिद्ध हुआ।

श्लोक 9 (12.124.9)

यदा त्वां महदैश्वर्यं प्राप्तं परपुरंजय । किंकरा भ्रातरः सर्वे मित्रसंबन्धिबान्धवाः ॥

yadā tvāṃ mahadaiśvaryaṃ prāptaṃ parapuraṃjaya | kiṃkarā bhrātaraḥ sarve mitrasaṃbandhibāndhavāḥ

हे शत्रुनगर-विजयी, अब जब तुम्हें महान् ऐश्वर्य मिल गया है, सब भाई तुम्हारे सेवक हैं और मित्र, सम्बन्धी तथा बन्धु भी तुम्हारे साथ हैं,

श्लोक 10 (12.124.10)

आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् । आजानेया वहन्ति त्वां कस्माच्छोचसि पुत्रक ॥

ācchādayasi prāvārānaśnāsi piśitaudanam | ājāneyā vahanti tvāṃ kasmācchocasi putraka

तुम उत्तम वस्त्र पहनते हो, मांस-भात खाते हो और उत्तम जाति के घोड़े तुम्हें ढोते हैं; फिर, बेटा, तुम शोक क्यों करते हो?

दुर्योधन उवाच

श्लोक 11 (12.124.11)

दश तात सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् । भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥

daśa tāta sahasrāṇi snātakānāṃ mahātmanām | bhuñjate rukmapātrībhiryudhiṣṭhiraniveśane

तात, युधिष्ठिर के घर में दस हज़ार महात्मा स्नातक ब्राह्मण सोने के पात्रों में भोजन करते हैं।

श्लोक 12 (12.124.12)

दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यपुष्पफलान्विताम् । अश्वांस्तित्तिरकल्माषान्रत्नानि विविधानि च ॥

dṛṣṭvā ca tāṃ sabhāṃ divyapuṣpaphalānvitām | aśvāṃstittirakalmāṣānratnāni vividhāni ca

और दिव्य पुष्पों और फलों से भरी उस दिव्य सभा को, तीतर के समान चितकबरे घोड़ों को और अनेक प्रकार के रत्नों को देखकर,

श्लोक 13 (12.124.13)

दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिमिन्द्रोपमां शुभाम् । अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि मानद ॥

dṛṣṭvā tāṃ pāṇḍaveyānāmṛddhimindropamāṃ śubhām | amitrāṇāṃ sumahatīmanuśocāmi mānada

पाण्डवों की इन्द्र के समान शुभ और शत्रुओं के हाथ में पड़ी हुई उस अत्यन्त विशाल समृद्धि को देखकर, हे मानद, मैं शोक कर रहा हूँ।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 14 (12.124.14)

यदीच्छसि श्रियं तात यादृशी सा युधिष्ठिरे । विशिष्टां वा नरश्रेष्ठ शीलवान्भव पुत्रक ॥

yadīcchasi śriyaṃ tāta yādṛśī sā yudhiṣṭhire | viśiṣṭāṃ vā naraśreṣṭha śīlavānbhava putraka

बेटा, यदि तुम वैसी श्री चाहते हो जैसी युधिष्ठिर के पास है, या उससे भी बढ़कर, हे नरश्रेष्ठ, तो शीलवान् बनो, पुत्र।

श्लोक 15 (12.124.15)

शीलेन हि त्रयो लोकाः शक्या जेतुं न संशयः । न हि किंचिदसाध्यंवै लोके शीलवतां सताम् ॥

śīlena hi trayo lokāḥ śakyā jetuṃ na saṃśayaḥ | na hi kiṃcidasādhyaṃvai loke śīlavatāṃ satām

शील से तीनों लोक जीते जा सकते हैं, इसमें संशय नहीं। इस संसार में शीलवान् सज्जनों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।

श्लोक 16 (12.124.16)

एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजयः । सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिवान् ॥

ekarātreṇa māndhātā tryaheṇa janamejayaḥ | saptarātreṇa nābhāgaḥ pṛthivīṃ pratipedivān

मान्धाता ने एक रात में, जनमेजय ने तीन दिन में और नाभाग ने सात रात में पृथ्वी प्राप्त कर ली।

श्लोक 17 (12.124.17)

एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो यशोन्विताः । ततस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वयमागता ॥

ete hi pārthivāḥ sarve śīlavanto yaśonvitāḥ | tatasteṣāṃ guṇakrītā vasudhā svayamāgatā

ये सभी राजा शीलवान् और यशस्वी थे; इसलिए उनके गुणों से मोल ली गई पृथ्वी स्वयं उनके पास आ गई।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (12.124.18)

कथं तत्प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत । येन शीलेन संप्राप्ताः क्षिप्रमेव वसुंधराम् ॥

kathaṃ tatprāpyate śīlaṃ śrotumicchāmi bhārata | yena śīlena saṃprāptāḥ kṣiprameva vasuṃdharām

हे भारत, वह शील कैसे प्राप्त होता है? मैं सुनना चाहता हूँ, जिस शील से उन्होंने शीघ्र ही पृथ्वी पा ली।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 19 (12.124.19)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदेन पुरा वृत्तं शीलमाश्रित्य भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradena purā vṛttaṃ śīlamāśritya bhārata

इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, जो पहले नारद ने शील के आश्रय से कहा था, हे भारत।

श्लोक 20 (12.124.20)

प्रह्लादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः । शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशे कृतम् ॥

prahlādena hṛtaṃ rājyaṃ mahendrasya mahātmanaḥ | śīlamāśritya daityena trailokyaṃ ca vaśe kṛtam

महात्मा महेन्द्र का राज्य प्रह्लाद ने छीन लिया था; शील का आश्रय लेकर उस दैत्य ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया था।

श्लोक 21 (12.124.21)

ततो बृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः । तमुवाच महाप्राज्ञः श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥

tato bṛhaspatiṃ śakraḥ prāñjaliḥ samupasthitaḥ | tamuvāca mahāprājñaḥ śreya icchāmi veditum

तब शक्र हाथ जोड़कर बृहस्पति के पास उपस्थित हुए और महाप्राज्ञ इन्द्र ने उनसे कहा, 'मैं अपना परम श्रेय जानना चाहता हूँ।'

श्लोक 22 (12.124.22)

ततो बृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैश्रेयसं परम् । कथयामास भगवान्देवेन्द्राय कुरूद्वह ॥

tato bṛhaspatistasmai jñānaṃ naiśreyasaṃ param | kathayāmāsa bhagavāndevendrāya kurūdvaha

तब भगवान् बृहस्पति ने देवेन्द्र को वह परम नैःश्रेयस ज्ञान बताया, हे कुरुश्रेष्ठ।

श्लोक 23 (12.124.23)

एतावच्छ्रेय इत्येव बृहस्पतिरभाषत । इन्द्रस्तु भूयः पप्रच्छ को विशेषो भवेदिति ॥

etāvacchreya ityeva bṛhaspatirabhāṣata | indrastu bhūyaḥ papraccha ko viśeṣo bhavediti

'श्रेय इतना ही है,' बृहस्पति ने कहा। परन्तु इन्द्र ने फिर पूछा, 'इससे विशेष और क्या हो सकता है?'

बृहस्पतिरुवाच

श्लोक 24 (12.124.24)

विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः । तत्रागमय भद्रं ते भूय एव सुरोत्तम ॥

viśeṣo'sti mahāṃstāta bhārgavasya mahātmanaḥ | tatrāgamaya bhadraṃ te bhūya eva surottama

हे तात, महात्मा भार्गव के पास एक बड़ी विशेष बात है। हे सुरश्रेष्ठ, तुम्हारा कल्याण हो; वहीं जाकर फिर वह सीखो।

श्लोक 25 (12.124.25)

आत्मनस्तु ततः श्रेयो भार्गवः सुमहायशाः । ज्ञानमागमयत्प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ॥

ātmanastu tataḥ śreyo bhārgavaḥ sumahāyaśāḥ | jñānamāgamayatprītyā punaḥ sa paramadyutiḥ

तब परम तेजस्वी, महायशस्वी भार्गव ने प्रेमपूर्वक उसे फिर अपने श्रेय का ज्ञान कराया।

श्लोक 26 (12.124.26)

तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना । श्रेयोऽस्तीति परं भूयः शुक्रमाह शतक्रतुः ॥

tenāpi samanujñāto bhārgaveṇa mahātmanā | śreyo'stīti paraṃ bhūyaḥ śukramāha śatakratuḥ

महात्मा भार्गव से भी अनुमति पाकर शतक्रतु ने शुक्र से फिर कहा, 'इससे भी ऊँचा श्रेय है।'

श्लोक 27 (12.124.27)

भार्गवस्त्वाह सर्वज्ञः प्रह्लादस्य महात्मनः । ज्ञानमस्ति विशेषेणेत्युक्तो हृष्टश्च सोऽभवत् ॥

bhārgavastvāha sarvajñaḥ prahlādasya mahātmanaḥ | jñānamasti viśeṣeṇetyukto hṛṣṭaśca so'bhavat

सर्वज्ञ भार्गव ने कहा, 'महात्मा प्रह्लाद के पास विशेष ज्ञान है।' यह सुनकर वे प्रसन्न हो गए।

श्लोक 28 (12.124.28)

स तत्र ब्राह्मणो भूत्वा प्रह्लादं पाकशासनः । स्तुत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥

sa tatra brāhmaṇo bhūtvā prahlādaṃ pākaśāsanaḥ | stutvā provāca medhāvī śreya icchāmi veditum

तब पाकशासन इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और प्रह्लाद के पास जाकर उनकी स्तुति की; उस मेधावी ने कहा, 'मैं श्रेय जानना चाहता हूँ।'

श्लोक 29 (12.124.29)

प्रह्लादस्त्वब्रवीद्विप्रं क्षणो नास्ति द्विजोत्तम । त्रैलोक्यराज्यसक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ॥

prahlādastvabravīdvipraṃ kṣaṇo nāsti dvijottama | trailokyarājyasaktasya tato nopadiśāmi te

प्रह्लाद ने उस ब्राह्मण से कहा, 'हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे अवकाश नहीं है; मैं तीनों लोकों के राज्य में लगा हुआ हूँ, इसलिए तुम्हें उपदेश नहीं दे सकता।'

श्लोक 30 (12.124.30)

ब्राह्मणस्त्वब्रवीद्राजन्यस्मिन्काले क्षणो भवेत् । तदोपादेष्टुमिच्छामि यदि कार्यान्तरं भवेत् ॥

brāhmaṇastvabravīdrājanyasminkāle kṣaṇo bhavet | tadopādeṣṭumicchāmi yadi kāryāntaraṃ bhavet

ब्राह्मण ने कहा, 'हे राजन्, जिस समय अवकाश हो, उसी समय मैं उपदेश पाना चाहता हूँ, यदि आपके दूसरे कामों से कोई अन्तर मिले।'

श्लोक 31 (12.124.31)

ततः प्रीतोऽभवद्राजा प्रह्लादो ब्रह्मवादिनः । तथेत्युक्त्वा ददौ काले ज्ञानतत्त्वं द्विजे तदा ॥

tataḥ prīto'bhavadrājā prahlādo brahmavādinaḥ | tathetyuktvā dadau kāle jñānatattvaṃ dvije tadā

तब राजा प्रह्लाद उस ब्रह्मवादी ब्राह्मण से प्रसन्न हुए और 'ऐसा ही हो' कहकर उन्होंने उचित समय पर उस द्विज को ज्ञान का सार दिया।

श्लोक 32 (12.124.32)

ब्राह्मणोऽपि यथान्यायं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् । चकार सर्वभावेन यद्यच्च मनसेच्छति ॥

brāhmaṇo'pi yathānyāyaṃ guruvṛttimanuttamām | cakāra sarvabhāvena yadyacca manasecchati

उस ब्राह्मण ने भी विधि के अनुसार गुरु की उत्तम सेवा पूरे मन से की, और जो-जो प्रह्लाद मन में चाहते थे, वह किया।

श्लोक 33 (12.124.33)

पृष्टश्च तेन बहुशः प्राप्तं कथमरिंदम । त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद्ब्रवीहि मे । प्रह्लादोऽपि महाराज ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥

pṛṣṭaśca tena bahuśaḥ prāptaṃ kathamariṃdama | trailokyarājyaṃ dharmajña kāraṇaṃ tadbravīhi me | prahlādo'pi mahārāja brāhmaṇaṃ vākyamabravīt

उसके बार-बार पूछने पर, 'हे अरिंदम, तुमने तीनों लोकों का राज्य कैसे पाया? हे धर्मज्ञ, मुझे उसका कारण बताओ,' हे महाराज, प्रह्लाद ने भी ब्राह्मण से यह वचन कहा।

प्रह्लाद उवाच

श्लोक 34 (12.124.34)

नासूयामि द्विजान्विप्र राजास्मीति कथंचन । काम्यानि वदतां तेषां संयच्छामि वहामि च ॥

nāsūyāmi dvijānvipra rājāsmīti kathaṃcana | kāmyāni vadatāṃ teṣāṃ saṃyacchāmi vahāmi ca

हे ब्राह्मण, 'मैं राजा हूँ' ऐसा सोचकर मैं ब्राह्मणों की कभी अवज्ञा नहीं करता। जो प्रिय बातें कहते हैं, उनके सामने मैं अपने को संयत रखता हूँ और उनका भार उठाता हूँ।

श्लोक 35 (12.124.35)

ते विस्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा । तेषां कार्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनहंकृतम् ॥

te visrabdhāḥ prabhāṣante saṃyacchanti ca māṃ sadā | teṣāṃ kāryapathe yuktaṃ śuśrūṣumanahaṃkṛtam

वे निःशंक होकर मुझसे बोलते हैं और सदा मुझे संयम में रखते हैं। मुझे अपने कार्य-पथ में लगा हुआ, सेवा के लिए तत्पर और अहंकार-रहित देखकर,

श्लोक 36 (12.124.36)

धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् । समासिञ्चन्ति शास्त्रज्ञाः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥

dharmātmānaṃ jitakrodhaṃ niyataṃ saṃyatendriyam | samāsiñcanti śāstrajñāḥ kṣaudraṃ madhviva makṣikāḥ

धर्मात्मा, क्रोध को जीते हुए, नियमित और जितेन्द्रिय मुझ पर शास्त्र के जानकार अपना ज्ञान वैसे ही उँडेलते हैं जैसे मधुमक्खियाँ मधु।

श्लोक 37 (12.124.37)

सोऽहं वागग्रविद्यानां रसानामवलेहिता । स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥

so'haṃ vāgagravidyānāṃ rasānāmavalehitā | svajātyānadhitiṣṭhāmi nakṣatrāṇīva candramāḥ

इस प्रकार मैं उन रसों का आस्वादन करने वाला हूँ, जो वाणी के अग्र भाग में बसी विद्याओं में रहते हैं; और जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों के ऊपर रहता है, वैसे ही मैं अपने सजातीयों के ऊपर स्थित हूँ।

श्लोक 38 (12.124.38)

एतत्पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् । यद्ब्राह्मणमुखे हव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्तते ॥

etatpṛthivyāmamṛtametaccakṣuranuttamam | yadbrāhmaṇamukhe havyametacchrutvā pravartate

यही पृथ्वी पर अमृत है, यही सर्वोत्तम नेत्र है: जो ब्राह्मण के मुख में हव्य के रूप में रहता है; उसे सुनकर ही मनुष्य अपने कर्म में प्रवृत्त होता है।

श्लोक 39 (12.124.39)

एतावच्छ्रेय इत्याह प्रह्लादो ब्रह्मवादिनम् । शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमब्रवीत् ॥

etāvacchreya ityāha prahlādo brahmavādinam | śuśrūṣitastena tadā daityendro vākyamabravīt

'श्रेय इतना ही है,' प्रह्लाद ने उस ब्रह्मवादी से कहा। उसकी सेवा पाकर दैत्येन्द्र ने तब यह वचन कहा।

श्लोक 40 (12.124.40)

यथावद्गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम । वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदाताऽस्मि न संशयः ॥

yathāvadguruvṛttyā te prīto'smi dvijasattama | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te pradātā'smi na saṃśayaḥ

'हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारी विधिपूर्वक गुरुसेवा से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो; तुम्हारा कल्याण हो, मैं निश्चय ही दूँगा।'

श्लोक 41 (12.124.41)

कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच द्विजसत्तमः । प्रह्लादस्त्वब्रवीत्प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ॥

kṛtamityeva daityendramuvāca dvijasattamaḥ | prahlādastvabravītprīto gṛhyatāṃ vara ityuta

'बस, पर्याप्त है,' उस द्विजश्रेष्ठ ने दैत्येन्द्र से कहा। परन्तु प्रह्लाद ने प्रसन्न होकर कहा, 'वर ग्रहण करो।'

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 42 (12.124.42)

यदि राजन्प्रसन्नस्त्वं मम चेदिच्छसि प्रियम् । भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ॥

yadi rājanprasannastvaṃ mama cedicchasi priyam | bhavataḥ śīlamicchāmi prāptumeṣa varo mama

'हे राजन्, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो मैं आपका शील पाना चाहता हूँ; यही मेरा वर है।'

श्लोक 43 (12.124.43)

ततः प्रीतस्तु दैत्येन्द्रो भयमस्याभवन्महत् । वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पचेतायमित्युत ॥

tataḥ prītastu daityendro bhayamasyābhavanmahat | vare pradiṣṭe vipreṇa nālpacetāyamityuta

तब दैत्येन्द्र प्रसन्न तो हुआ, पर ब्राह्मण के वर माँगने पर उसे बड़ा भय हुआ: 'यह छोटी बुद्धि का नहीं है।'

श्लोक 44 (12.124.44)

एवमस्त्विति स प्राह प्रह्लादो विस्मितस्तदा । उपाकृत्य तु विप्राय वरं दुःखान्वितोऽभवत् ॥

evamastviti sa prāha prahlādo vismitastadā | upākṛtya tu viprāya varaṃ duḥkhānvito'bhavat

'ऐसा ही हो,' प्रह्लाद ने विस्मित होकर कहा। ब्राह्मण को वर देकर वे दुःख से भर गए।

श्लोक 45 (12.124.45)

दत्ते वरे गते विप्रे चिन्ताऽसीन्महती तदा । प्रह्लादस्य महाराज निश्चयं न च जग्मिवान् ॥

datte vare gate vipre cintā'sīnmahatī tadā | prahlādasya mahārāja niścayaṃ na ca jagmivān

वर दे दिए जाने और ब्राह्मण के चले जाने पर, हे महाराज, प्रह्लाद को बड़ी चिन्ता हुई और वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके।

श्लोक 46 (12.124.46)

तस्य चिन्तयतस्तावच्छायाभूतं महाद्युतेः । तेजोविग्रहवत्तात शरीरमजहात्तदा ॥

tasya cintayatastāvacchāyābhūtaṃ mahādyuteḥ | tejovigrahavattāta śarīramajahāttadā

जब वे इस प्रकार चिन्ता में थे, तब उन महातेजस्वी के शरीर से छाया के समान, तेजोमय आकार वाली एक मूर्ति निकल गई।

श्लोक 47 (12.124.47)

तमपृच्छन्महाराजः प्रह्लादः को भवानिति । प्रत्याह तं तु शीलोस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वया ॥

tamapṛcchanmahārājaḥ prahlādaḥ ko bhavāniti | pratyāha taṃ tu śīlosmi tyakto gacchāmyahaṃ tvayā

महाराज प्रह्लाद ने उससे पूछा, 'आप कौन हैं?' उसने उत्तर दिया, 'मैं शील हूँ। तुमसे त्यागा हुआ मैं जा रहा हूँ।'

श्लोक 48 (12.124.48)

तस्मिन्द्विजोत्तमे राजन्वत्स्याम्यहमरिंदम । योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वयि नित्यं समाहितः । इत्युक्त्वाऽन्तर्हितं तद्वै शक्रं चान्वाविशत्प्रभो ॥

tasmindvijottame rājanvatsyāmyahamariṃdama | yo'sau śiṣyatvamāgamya tvayi nityaṃ samāhitaḥ | ityuktvā'ntarhitaṃ tadvai śakraṃ cānvāviśatprabho

'हे राजन्, हे अरिंदम, मैं उस श्रेष्ठ ब्राह्मण में निवास करूँगा, जो तुम्हारा शिष्य बनकर सदा तुम्हारे प्रति सावधान रहा।' यह कहकर वह अन्तर्धान हो गया और, हे प्रभो, शक्र में समा गया।

श्लोक 49 (12.124.49)

तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूपस्ततोपरः । शरीरान्निः सृतस्तस्य को भवानिति सोब्रवीत् ॥

tasmiṃstejasi yāte tu tādṛgrūpastatoparaḥ | śarīrānniḥ sṛtastasya ko bhavāniti sobravīt

उस तेज के चले जाने पर उसी के समान रूप वाला एक और उनके शरीर से निकला। उन्होंने कहा, 'आप कौन हैं?'

धर्म उवाच

श्लोक 50 (12.124.50)

धर्मं प्रह्लाद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः । तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् ॥

dharmaṃ prahlāda māṃ viddhi yatrāsau dvijasattamaḥ | tatra yāsyāmi daityendra yataḥ śīlaṃ tato hyaham

'प्रह्लाद, मुझे धर्म जानो। हे दैत्येन्द्र, जहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वहीं मैं जाऊँगा; क्योंकि जहाँ शील है, वहीं मैं हूँ।'

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 51 (12.124.51)

ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा । शरीरान्निः सृतस्तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः ॥

tato'paro mahārāja prajvalanniva tejasā | śarīrānniḥ sṛtastasya prahlādasya mahātmanaḥ

तब, हे महाराज, तेज से जलता हुआ-सा एक और महात्मा प्रह्लाद के शरीर से निकला।

श्लोक 52 (12.124.52)

को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः । सत्यं विद्ध्यसुरेन्द्राद्य प्रयास्ये धर्ममन्वहम् ॥

ko bhavāniti pṛṣṭaśca tamāha sa mahādyutiḥ | satyaṃ viddhyasurendrādya prayāsye dharmamanvaham

'आप कौन हैं?' ऐसा पूछे जाने पर उस महाद्युतिमान् ने उनसे कहा, 'हे असुरेन्द्र, मुझे सत्य जानो; मैं प्रतिदिन धर्म के पीछे जाऊँगा।'

श्लोक 53 (12.124.53)

तस्मिन्ननुगते धर्मं पुरुषे पुरुषोऽपरः । निश्चक्राम ततस्तस्मात्पृष्टश्चाह महातपाः ॥

tasminnanugate dharmaṃ puruṣe puruṣo'paraḥ | niścakrāma tatastasmātpṛṣṭaścāha mahātapāḥ

उस पुरुष के धर्म के पीछे चले जाने पर उस शरीर से एक और पुरुष निकला; पूछे जाने पर उस महातपस्वी ने कहा:

श्लोक 54 (12.124.54)

वृत्तं प्रह्लाद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् । तस्मिन्गते महाश्वेता शरीरात्तस्य निर्ययौ ॥

vṛttaṃ prahlāda māṃ viddhi yataḥ satyaṃ tato hyaham | tasmingate mahāśvetā śarīrāttasya niryayau

'प्रह्लाद, मुझे वृत्त (आचरण) जानो; जहाँ सत्य है, वहीं मैं हूँ।' उसके चले जाने पर उनके शरीर से एक महाश्वेत मूर्ति निकली।

श्लोक 55 (12.124.55)

पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः । इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप ॥

pṛṣṭaścāha balaṃ viddhi yato vṛttamahaṃ tataḥ | ityuktvā prayayau tatra yato vṛttaṃ narādhipa

पूछे जाने पर उसने कहा, 'मुझे बल जानो; जहाँ वृत्त है, वहीं मैं हूँ।' यह कहकर, हे नराधिप, वह वहीं चला गया जहाँ वृत्त गया था।

श्लोक 56 (12.124.56)

ततः प्रभामयी देवी शरीरात्तस्य निर्ययौ । तामपृच्छत्स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येनमब्रवीत् ॥

tataḥ prabhāmayī devī śarīrāttasya niryayau | tāmapṛcchatsa daityendraḥ sā śrīrityenamabravīt

तब एक प्रभामयी देवी उनके शरीर से निकली। दैत्येन्द्र ने उससे पूछा, तो उसने उनसे कहा, 'मैं श्री हूँ।'

श्रीरुवाच

श्लोक 57 (12.124.57)

उषिताऽस्मि सुखं नित्यं त्वयि सत्यपराक्रम । त्वया युक्ता गमिष्यामि बलं ह्यनुगता ह्यहम् ॥

uṣitā'smi sukhaṃ nityaṃ tvayi satyaparākrama | tvayā yuktā gamiṣyāmi balaṃ hyanugatā hyaham

'हे सत्यपराक्रमी, मैं तुममें सदा सुख से रही हूँ। तुमसे संयुक्त रही हुई मैं अब जाऊँगी, क्योंकि मैं बल की अनुगामिनी हूँ।'

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 58 (12.124.58)

ततो भयं प्रादुरासीत्प्रह्लादस्य महात्मनः । अपृच्छत च तां भूयः क्व यासि कमलालये ॥

tato bhayaṃ prādurāsītprahlādasya mahātmanaḥ | apṛcchata ca tāṃ bhūyaḥ kva yāsi kamalālaye

तब महात्मा प्रह्लाद को भय हुआ और उन्होंने उससे फिर पूछा, 'हे कमलवासिनी, तुम कहाँ जा रही हो?'

प्रह्लाद उवाच

श्लोक 59 (12.124.59)

त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी । कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥

tvaṃ hi satyavratā devī lokasya parameśvarī | kaścāsau brāhmaṇaśreṣṭhastattvamicchāmi veditum

'तुम सत्यव्रता देवी हो, लोक की परमेश्वरी हो। और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? मैं यथार्थ जानना चाहता हूँ।'

श्रीरुवाच

श्लोक 60 (12.124.60)

स शक्रो ब्रह्मचारी यस्त्वत्तश्चैवोपशिक्षितः । त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत्तेनापहृतं प्रभो ॥

sa śakro brahmacārī yastvattaścaivopaśikṣitaḥ | trailokye te yadaiśvaryaṃ tattenāpahṛtaṃ prabho

'वह शक्र था, ब्रह्मचारी, जिसे तुमने ही शिक्षा दी थी। हे प्रभो, तीनों लोकों में जो तुम्हारा ऐश्वर्य था, वह उसने हर लिया।'

श्लोक 61 (12.124.61)

शीलेन हि त्रयो लोकास्त्वया धर्मज्ञ निर्जिताः । तद्विज्ञाय सुरेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ॥

śīlena hi trayo lokāstvayā dharmajña nirjitāḥ | tadvijñāya surendreṇa tava śīlaṃ hṛtaṃ prabho

'हे धर्मज्ञ, तुमने शील से तीनों लोक जीते थे। यह जानकर सुरेन्द्र ने तुम्हारा शील हर लिया, हे प्रभो।'

श्लोक 62 (12.124.62)

धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाऽप्यहम् । शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ॥

dharmaḥ satyaṃ tathā vṛttaṃ balaṃ caiva tathā'pyaham | śīlamūlā mahāprājña sadā nāstyatra saṃśayaḥ

'हे महाप्राज्ञ, धर्म, सत्य, वृत्त, बल और मैं भी, ये सब सदा शील पर ही आधारित हैं; इसमें संशय नहीं।'

भीष्म उवाच

श्लोक 63 (12.124.63)

एवमुक्त्वा गता श्रीस्तु ते च सर्वे युधिष्ठिर । दुर्योधनस्तु पितरं भूय एवाब्रवीत्तदा ॥

evamuktvā gatā śrīstu te ca sarve yudhiṣṭhira | duryodhanastu pitaraṃ bhūya evābravīttadā

यह कहकर श्री चली गई, और हे युधिष्ठिर, वे सब भी चले गए। तब दुर्योधन ने अपने पिता से फिर कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 64 (12.124.64)

शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन । प्राप्यते च यथा शीलं तं चोपायं ब्रवीहि मे ॥

śīlasya tattvamicchāmi vettuṃ kauravanandana | prāpyate ca yathā śīlaṃ taṃ copāyaṃ bravīhi me

'हे कुरुनन्दन, मैं शील का तत्त्व जानना चाहता हूँ। शील कैसे प्राप्त होता है और उसका उपाय क्या है, यह मुझे बताइए।'

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 65 (12.124.65)

सोपायं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्लादेन महात्मना । संक्षेपतस्तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नरेश्वर ॥

sopāyaṃ pūrvamuddiṣṭaṃ prahlādena mahātmanā | saṃkṣepatastu śīlasya śṛṇu prāptiṃ nareśvara

'उपायसहित वह बात पहले महात्मा प्रह्लाद ने बता दी थी। हे नरेश्वर, अब संक्षेप में शील की प्राप्ति सुनो।'

श्लोक 66 (12.124.66)

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ॥

adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā | anugrahaśca dānaṃ ca śīlametatpraśasyate

'कर्म, मन और वाणी से किसी भी प्राणी से द्रोह न करना, अनुग्रह करना और दान देना: इसी को शील कहकर सराहा जाता है।'

श्लोक 67 (12.124.67)

यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् । अपत्रपेत वा येन न तत्कुर्यात्कथंचन ॥

yadanyeṣāṃ hitaṃ na syādātmanaḥ karma pauruṣam | apatrapeta vā yena na tatkuryātkathaṃcana

'अपना जो पुरुषार्थ-कर्म दूसरों के हित का न हो, या जिससे लज्जित होना पड़े, उसे कभी नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 68 (12.124.68)

तत्तु कर्म तथा कुर्याद्येन श्लाध्येत संसदि । शीलं समासेनैतत्ते कथितं कुरुसत्तम ॥

tattu karma tathā kuryādyena ślādhyeta saṃsadi | śīlaṃ samāsenaitatte kathitaṃ kurusattama

'पर जिस कर्म से सभा में सराहना हो, वही करना चाहिए। हे कुरुश्रेष्ठ, यह शील संक्षेप में तुम्हें बताया गया।'

श्लोक 69 (12.124.69)

यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् । न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च पतन्ति ते ॥

yadyapyaśīlā nṛpate prāpnuvanti śriyaṃ kvacit | na bhuñjate ciraṃ tāta samūlāśca patanti te

'हे राजन्, यदि अशील लोग कभी श्री पा भी लें, तो हे तात, वे उसे देर तक नहीं भोगते; वे जड़ समेत गिर पड़ते हैं।'

श्लोक 70 (12.124.70)

एतद्विदित्वा तत्त्वेन शीलवान्भव पुत्रक । यदीच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् । अधिकां चापि राजेन्द्र ततस्त्वं शीलवान्भव ॥

etadviditvā tattvena śīlavānbhava putraka | yadīcchasi śriyaṃ tāta suviśiṣṭāṃ yudhiṣṭhirāt | adhikāṃ cāpi rājendra tatastvaṃ śīlavānbhava

'इसे यथार्थ रूप से जानकर, बेटा, शीलवान् बनो। हे तात, यदि तुम युधिष्ठिर से भी बढ़कर श्री चाहते हो, या हे राजेन्द्र, उससे भी अधिक, तो शीलवान् बनो।'

भीष्म उवाच

श्लोक 71 (12.124.71)

एतत्कथितवान्पुत्रे धृतराष्ट्रो महीपतिः । एतत्कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत्फलम् ॥

etatkathitavānputre dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | etatkuruṣva kaunteya tataḥ prāpsyasi tatphalam

राजा धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र से यह कहा था। हे कौन्तेय, तुम भी यही करो, तो उसका फल पाओगे।

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