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शान्ति पर्व · अध्याय 126

आश्रम में सुमित्र का आशा के विषय में प्रश्न

मृग का पीछा करते हुए राजा सुमित्र एक महावन में पहुँचकर तपस्वियों के आश्रम में आते हैं। तपस्वी उनका सत्कार करते हैं और उनका परिचय तथा आने का कारण पूछते हैं। वे अपना वंश और शिकार का वृत्तान्त सुनाते हैं और कहते हैं कि राजचिह्नों के छूट जाने से अधिक दुःख उन्हें अपनी आशा के टूटने का है। वे ऋषियों से पूछते हैं कि आशा और आकाश में कौन बड़ा है, और इस संसार में सबसे दुर्लभ क्या है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.126.1)

प्रविश्य च महारण्यं तापसानामथाश्रमम् । आससाद ततो राजा श्रान्तश्चोपाविशत्तदा ॥

praviśya ca mahāraṇyaṃ tāpasānāmathāśramam | āsasāda tato rājā śrāntaścopāviśattadā

महावन में प्रवेश करके राजा तपस्वियों के एक आश्रम में पहुँचा और थका होने के कारण वहाँ बैठ गया।

श्लोक 2 (12.126.2)

तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा । समेत्य ऋषयस्तस्मै पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥

taṃ kārmukadharaṃ dṛṣṭvā śramārtaṃ kṣudhitaṃ tadā | sametya ṛṣayastasmai pūjāṃ cakruryathāvidhi

उसे धनुष लिए, थका और भूखा देखकर ऋषियों ने एकत्र होकर विधिपूर्वक उसका सत्कार किया।

श्लोक 3 (12.126.3)

स पूजामृषिभिर्दत्तां प्रतिगृह्य नराधिपः । अपृच्छत्तापसान्सर्वांस्तपोवृद्धिमनुत्तमाम् ॥

sa pūjāmṛṣibhirdattāṃ pratigṛhya narādhipaḥ | apṛcchattāpasānsarvāṃstapovṛddhimanuttamām

ऋषियों से दिया हुआ सत्कार स्वीकार करके राजा ने सब तपस्वियों से उनके तप की अनुपम वृद्धि के विषय में पूछा।

श्लोक 4 (12.126.4)

ते तस्य राज्ञो वचनं प्रतिगृह्य तपोधनाः । ऋषयो राजशार्दूलमपृच्छंस्तत्प्रयोजनम् ॥

te tasya rājño vacanaṃ pratigṛhya tapodhanāḥ | ṛṣayo rājaśārdūlamapṛcchaṃstatprayojanam

उन तपस्वी ऋषियों ने राजा की बात सुनकर उस राजश्रेष्ठ से उसके आने का प्रयोजन पूछा।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 5 (12.126.5)

केन भद्रमुखार्थेन तपोवनमुपागतः । पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशो धन्वी बाणी नरेश्वर ॥

kena bhadramukhārthena tapovanamupāgataḥ | padātirbaddhanistriṃśo dhanvī bāṇī nareśvara

'हे भद्रमुख नरेश्वर, आप किस शुभ प्रयोजन से पैदल, तलवार बाँधे, धनुष और बाण लिए तपोवन में आए हैं?'

श्लोक 6 (12.126.6)

एतदिच्छामहे श्रोतुं कुतः प्राप्तोऽसि मानद । कस्मिन्कुले तु जातस्त्वं किंनामा चासि ब्रूहि नः ॥

etadicchāmahe śrotuṃ kutaḥ prāpto'si mānada | kasminkule tu jātastvaṃ kiṃnāmā cāsi brūhi naḥ

'हे मानद, हम यह सुनना चाहते हैं कि आप कहाँ से आए हैं। आप किस कुल में उत्पन्न हुए हैं और आपका नाम क्या है? हमें बताइए।'

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (12.126.7)

ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ । आचख्यौ तद्यथावृत्तं परिचर्यां च भारत ॥

tataḥ sa rājā sarvebhyo dvijebhyaḥ puruṣarṣabha | ācakhyau tadyathāvṛttaṃ paricaryāṃ ca bhārata

तब उस राजा ने, हे पुरुषश्रेष्ठ, उन सब ब्राह्मणों को जैसा हुआ था वैसा ही सब कुछ और अपना अनुसरण-वृत्तान्त बताया, हे भारत।

सुमित्र उवाच

श्लोक 8 (12.126.8)

हैहयानां कुले जातः सुमित्रोऽमित्रकर्शनः । चरामि मृगयूथानि निघ्रन्बाणैः सहस्रशः ॥

haihayānāṃ kule jātaḥ sumitro'mitrakarśanaḥ | carāmi mṛgayūthāni nighranbāṇaiḥ sahasraśaḥ

'मैं हैहयों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, शत्रुओं को सताने वाला सुमित्र। मैं हज़ारों की संख्या में अपने बाणों से मृगों के झुण्डों को मारता हुआ घूमता हूँ,

श्लोक 9 (12.126.9)

बलेन महता ब्रह्मन्सामात्यः सावरोधकः । मृगस्तु विद्धो बाणेन मया सरति शल्यवान् ॥

balena mahatā brahmansāmātyaḥ sāvarodhakaḥ | mṛgastu viddho bāṇena mayā sarati śalyavān

हे ब्रह्मन्, बड़ी सेना, मन्त्रियों और अन्तःपुर के साथ। मेरे बाण से बिंधा हुआ मृग शल्य लिए हुए भागा जा रहा है,

श्लोक 10 (12.126.10)

तं द्रवन्तमनुप्राप्तो वनमेतद्यदृच्छया । भवत्सकाशं नष्टश्रीर्हताशः श्रमकर्शितः ॥

taṃ dravantamanuprāpto vanametadyadṛcchayā | bhavatsakāśaṃ naṣṭaśrīrhatāśaḥ śramakarśitaḥ

और उसका पीछा करता हुआ मैं संयोग से इस वन में आपके पास आ पहुँचा हूँ, श्री से रहित, हताश और थकान से क्षीण।

श्लोक 11 (12.126.11)

किंनु दुःखमतोऽन्यद्वै यदहं श्रमकर्शितः । भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षणः ॥

kiṃnu duḥkhamato'nyadvai yadahaṃ śramakarśitaḥ | bhavatāmāśramaṃ prāpto hatāśo bhraṣṭalakṣaṇaḥ

इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा कि मैं थकान से क्षीण, हताश और राजचिह्नों से भ्रष्ट होकर आपके आश्रम में आया हूँ?

श्लोक 12 (12.126.12)

न राजलक्षणत्यागः पुनरस्य तपोधनाः । दुःखं करोति मे तीव्रं यथाऽऽशा विहता मम ॥

na rājalakṣaṇatyāgaḥ punarasya tapodhanāḥ | duḥkhaṃ karoti me tīvraṃ yathā''śā vihatā mama

हे तपस्वियो, राजचिह्नों के छूट जाने से भी मुझे वैसा तीव्र दुःख नहीं होता, जैसा मेरी आशा के टूट जाने से हो रहा है।

श्लोक 13 (12.126.13)

हिमवान्वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः । महत्त्वान्नान्वपद्येतां रोदस्योरन्तरं यथा ॥

himavānvā mahāśailaḥ samudro vā mahodadhiḥ | mahattvānnānvapadyetāṃ rodasyorantaraṃ yathā

महान् पर्वत हिमवान् हो या महासागर, ये अपनी विशालता में भी आकाश और पृथ्वी के बीच के विस्तार को नहीं पा सकते;

श्लोक 14 (12.126.14)

आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गतः । भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः ॥

āśāyāstapasi śreṣṭhāstathā nāntamahaṃ gataḥ | bhavatāṃ viditaṃ sarvaṃ sarvajñā hi tapodhanāḥ

हे तपस्वियों में श्रेष्ठो, उसी प्रकार मैं भी आशा का अन्त नहीं पा सका हूँ। यह सब आपको विदित है, क्योंकि तपस्वी सर्वज्ञ होते हैं।

श्लोक 15 (12.126.15)

भवन्तः सुमहाभागास्तस्मात्पृच्छामि संशयम् । आशावान्पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा ॥

bhavantaḥ sumahābhāgāstasmātpṛcchāmi saṃśayam | āśāvānpuruṣo yaḥ syādantarikṣamathāpi vā

आप बड़े भाग्यशाली हैं, इसलिए मैं अपना संशय आपसे पूछता हूँ: जो पुरुष आशावान् है और जो अन्तरिक्ष है,

श्लोक 16 (12.126.16)

किंनु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वे प्रतिभाति वः । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम् ॥

kiṃnu jyāyastaraṃ loke mahattve pratibhāti vaḥ | etadicchāmi tattvena śrotuṃ kimiha durlabham

इन दोनों में कौन इस लोक में विशालता में आपको बड़ा जान पड़ता है? मैं यह यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ: यहाँ दुर्लभ क्या है?

श्लोक 17 (12.126.17)

यदि गुह्यं न वो नित्यं तदा प्रब्रूत मा चिरम् । न हि गुह्यतमं श्रोतुमिच्छामि द्विजपुङ्गवाः ॥

yadi guhyaṃ na vo nityaṃ tadā prabrūta mā ciram | na hi guhyatamaṃ śrotumicchāmi dvijapuṅgavāḥ

यदि वह आपका सदा गुप्त रखने योग्य रहस्य न हो, तो देर न कीजिए, बताइए; हे द्विजश्रेष्ठो, मैं अत्यन्त गुप्त बात सुनना नहीं चाहता।

श्लोक 18 (12.126.18)

भवत्तपोविघातो वा येन स्याद्विरमे ततः । यदि वाऽस्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरितः ॥

bhavattapovighāto vā yena syādvirame tataḥ | yadi vā'sti kathāyogo yo'yaṃ praśno mayeritaḥ

अथवा यदि इससे आपके तप में विघ्न पड़ता हो, तो मैं रुक जाऊँगा; और यदि मेरे द्वारा पूछे गए इस प्रश्न पर चर्चा हो सकती हो,

श्लोक 19 (12.126.19)

एतत्कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत्समाहिताः ॥

etatkāraṇasāmarthyaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ | bhavanto'pi taponityā brūyuretatsamāhitāḥ

तो मैं इस बात का कारण और उसकी सामर्थ्य यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ; और आप, जो सदा तप में लगे रहते हैं, इसे एकाग्र होकर बताइए।

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