शान्ति पर्व · अध्याय 127
ऋषभ का कृश मुनि तनु और राजा वीरद्युम्न का वृत्तान्त
भीष्म वह कथा सुनाते हैं जो ऋषभ मुनि ने राजा सुमित्र को कही थी। नर-नारायण के आश्रम में ऋषभ को तनु नामक अद्भुत दुबले मुनि मिले। वहाँ राजा वीरद्युम्न आए, जो वन में खोए अपने एकमात्र पुत्र भूरिद्युम्न को पाने की आशा से दुबले हो चुके थे, और उन्होंने तनु से पूछा कि दुर्लभ क्या है और आशा के विषय में बड़ी बात क्या है। तनु ने एक ऐसे ऋषि की बात से उत्तर आरम्भ किया जिसका पुत्र ने कभी अनादर किया था; फिर ऋषियों ने राजा को घेरकर उनके आने का कारण पूछा।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.127.1)
ततस्तेषां समेतानामृषीणामृषिसत्तमः । ऋषभो नाम विप्रर्षिर्विस्मयन्निदमब्रवीत् ॥
tatasteṣāṃ sametānāmṛṣīṇāmṛṣisattamaḥ | ṛṣabho nāma viprarṣirvismayannidamabravīt
तब उन एकत्र हुए ऋषियों के बीच ऋषिश्रेष्ठ ऋषभ नाम के विप्रर्षि ने विस्मित होकर यह कहा।
ऋषभ उवाच
श्लोक 2 (12.127.2)
पुराऽहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन्प्रभो । समासादितवान्दिव्यं नरनारायणाश्रमम् ॥
purā'haṃ rājaśārdūla tīrthānyanucaranprabho | samāsāditavāndivyaṃ naranārāyaṇāśramam
हे राजसिंह! हे प्रभो! बहुत पहले मैं तीर्थों में घूमता हुआ नर-नारायण के दिव्य आश्रम में पहुँचा।
श्लोक 3 (12.127.3)
यत्र सा बदरी रम्या सरो वैहायसं तथा । यत्र चाश्वशिरा राजन्वेदान्पठति शाश्वतान् ॥
yatra sā badarī ramyā saro vaihāyasaṃ tathā | yatra cāśvaśirā rājanvedānpaṭhati śāśvatān
वहाँ वह रमणीय बदरी-वृक्ष है, वैहायस नाम का सरोवर है, और वहीं, हे राजन्! अश्वशिरा सनातन वेदों का पाठ करते हैं।
श्लोक 4 (12.127.4)
तस्मिन्सरसि कृत्वाऽहं विधिवत्तर्पणं पुरा । पितृणां देवतानां च ततोऽश्रममियां तदा ॥
tasminsarasi kṛtvā'haṃ vidhivattarpaṇaṃ purā | pitṛṇāṃ devatānāṃ ca tato'śramamiyāṃ tadā
उस सरोवर में मैंने पहले विधिपूर्वक पितरों और देवताओं को जल अर्पित किया, फिर आश्रम की ओर गया।
श्लोक 5 (12.127.5)
रमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी । अदूरादाश्रमात्किंचिद्वासार्थमगमं तदा ॥
ramāte yatra tau nityaṃ naranārāyaṇāvṛṣī | adūrādāśramātkiṃcidvāsārthamagamaṃ tadā
जहाँ वे दोनों ऋषि नर और नारायण सदा रमते हैं, उस आश्रम से कुछ ही दूर मैं ठहरने के लिए एक स्थान पर गया।
श्लोक 6 (12.127.6)
अत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च । अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोनिधिम् ॥
atra cīrājinadharaṃ kṛśamuccamatīva ca | adrākṣamṛṣimāyāntaṃ tanuṃ nāma taponidhim
वहाँ मैंने तप के भण्डार तनु नामक ऋषि को आते देखा; वे चीर और मृगचर्म पहने थे, दुबले थे और बहुत ऊँचे थे।
श्लोक 7 (12.127.7)
अन्यैर्नरैर्महाबाहो वपुषाऽप्रतिमं तदा । कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी मया ॥
anyairnarairmahābāho vapuṣā'pratimaṃ tadā | kṛśatā cāpi rājarṣe na dṛṣṭā tādṛśī mayā
हे महाबाहो! शरीर में वे दूसरे मनुष्यों के बीच अनुपम थे, और हे राजर्षे! वैसी दुबलाई मैंने कहीं और नहीं देखी।
श्लोक 8 (12.127.8)
शरीरमपि राजेन्द्र तनु कानिष्ठिकासमम् । ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ॥
śarīramapi rājendra tanu kāniṣṭhikāsamam | grīvā bāhū tathā pādau keśāścādbhutadarśanāḥ
हे राजेन्द्र! उनका शरीर पतला था, कनिष्ठिका (छोटी उँगली) के समान; गर्दन, भुजाएँ, पैर और केश भी देखने में अद्भुत थे।
श्लोक 9 (12.127.9)
शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च । तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ॥
śiraḥ kāyānurūpaṃ ca karṇau netre tathaiva ca | tasya vākcaiva ceṣṭā ca sāmānye rājasattama
उनका सिर शरीर के अनुरूप था, कान और आँखें भी वैसे ही; पर उनकी वाणी और चेष्टा सामान्य थी, हे राजश्रेष्ठ!
श्लोक 10 (12.127.10)
दृष्ट्वाऽहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः । पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
dṛṣṭvā'haṃ taṃ kṛśaṃ vipraṃ bhītaḥ paramadurmanāḥ | pādau tasyābhivādyātha sthitaḥ prāñjaliragrataḥ
उस दुबले ब्राह्मण को देखकर मैं डर गया और बहुत व्याकुल हुआ; उनके चरणों में प्रणाम करके मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा हो गया।
श्लोक 11 (12.127.11)
निवेद्य नामगोत्रे च तथा कार्यं नरर्षभ । प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ॥
nivedya nāmagotre ca tathā kāryaṃ nararṣabha | pradiṣṭe cāsane tena śanairahamupāviśam
हे नरश्रेष्ठ! अपना नाम, गोत्र और प्रयोजन बताकर, उनके बताए आसन पर मैं चुपचाप बैठ गया।
श्लोक 12 (12.127.12)
ततः स कथयामास धर्मार्थसहिताः कथाः । ऋषिमध्ये महाराज तत्र धर्मभृतां वरः ॥
tataḥ sa kathayāmāsa dharmārthasahitāḥ kathāḥ | ṛṣimadhye mahārāja tatra dharmabhṛtāṃ varaḥ
तब हे महाराज! वहाँ ऋषियों के बीच धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन मुनि ने धर्म और अर्थ से भरी कथाएँ सुनानी आरम्भ कीं।
श्लोक 13 (12.127.13)
तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः । उपयाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः ॥
tasmiṃstu kathayatyeva rājā rājīvalocanaḥ | upayājjavanairaśvaiḥ sabalaḥ sāvarodhanaḥ
वे कथा कह ही रहे थे कि कमल-जैसे नेत्रों वाला एक राजा तेज़ घोड़ों पर सेना और अन्तःपुर के साथ वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 14 (12.127.14)
स्मरम्पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः । भूरिद्युम्नपिता श्रीमान्वीरद्युम्नो महायशाः ॥
smaramputramaraṇye vai naṣṭaṃ paramadurmanāḥ | bhūridyumnapitā śrīmānvīradyumno mahāyaśāḥ
वन में खोए हुए अपने पुत्र को याद करके वह बहुत उदास था; वह यशस्वी श्रीमान् वीरद्युम्न भूरिद्युम्न का पिता था।
श्लोक 15 (12.127.15)
इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति भारत । एवमाशाकृशो राजा चरन्वनमिदं पुरा ॥
iha drakṣyāmi taṃ putraṃ drakṣyāmīheti bhārata | evamāśākṛśo rājā caranvanamidaṃ purā
"यहाँ मैं उस पुत्र को देखूँगा, यहीं देखूँगा" - हे भारत! इस प्रकार आशा से दुबला हुआ वह राजा इस वन में घूमता रहा था।
राजोवाच
श्लोक 16 (12.127.16)
दुर्लभः स मया द्रष्टुं भूय एव च धार्मिक । एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत्तदा ॥
durlabhaḥ sa mayā draṣṭuṃ bhūya eva ca dhārmika | ekaḥ putro mahāraṇye naṣṭa ityasakṛttadā
"हे धर्मात्मन्! अब उसे फिर देख पाना मेरे लिए कठिन है - मेरा एकमात्र पुत्र इस महावन में खो गया!" - वह उस समय बार-बार यही कहता था।
श्लोक 17 (12.127.17)
न स शक्यो मया द्रष्टुमाशा च महती मम । तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥
na sa śakyo mayā draṣṭumāśā ca mahatī mama | tayā parītagātro'haṃ mumūrṣurnātra saṃśayaḥ
मैं उसे देख नहीं सकता, फिर भी मेरी आशा बहुत बड़ी है; उसी से अंग-अंग घिरा हुआ मैं मरने को हूँ, इसमें संदेह नहीं।
ऋषभ उवाच
श्लोक 18 (12.127.18)
एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः । अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान् ॥
etacchrutvā tu bhagavāṃstanurmunivarottamaḥ | avākśirā dhyānaparo muhūrtamiva tasthivān
यह सुनकर भगवान् तनु, श्रेष्ठ मुनियों में भी श्रेष्ठ, सिर झुकाकर थोड़ी देर ध्यान में डूबे से बैठे रहे।
श्लोक 19 (12.127.19)
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः । उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दमन्दमिवासकृत् ॥
tamanudhyāntamālakṣya rājā paramadurmanāḥ | uvāca vākyaṃ dīnātmā mandamandamivāsakṛt
उन्हें ध्यान में डूबा देखकर अत्यन्त उदास और दीन मन वाला राजा बार-बार बहुत धीमे स्वर में बोला।
राजोवाच
श्लोक 20 (12.127.20)
दुर्लभं किंनु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत् । ब्रवीतु भगवानेतद्यदि गुह्यं न चेत्तदा ॥
durlabhaṃ kiṃnu devarṣe āśāyāścaiva kiṃ mahat | bravītu bhagavānetadyadi guhyaṃ na cettadā
हे देवर्षे! कौन-सी वस्तु दुर्लभ है, और आशा के विषय में बड़ी बात क्या है? यदि यह गोपनीय न हो तो भगवान् मुझे बताएँ।
तनुरुवाच
श्लोक 21 (12.127.21)
महर्षिर्भगवांस्तेन पूर्वमासीद्विमानितः । बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः । अर्थयन्कुशलं राजन्काञ्चनं वल्कलानि च ॥
maharṣirbhagavāṃstena pūrvamāsīdvimānitaḥ | bāliśāṃ buddhimāsthāya mandabhāgyatayā''tmanaḥ | arthayankuśalaṃ rājankāñcanaṃ valkalāni ca
उन भगवान् महर्षि का पहले उसके द्वारा अनादर हुआ था; अपने ही दुर्भाग्य से मूर्खतापूर्ण बुद्धि अपनाकर उन्होंने, हे राजन्! कल्याण, सोना और वल्कल वस्त्र माँगे थे।
श्लोक 22 (12.127.22)
अवज्ञापूर्वकेनापि न संपादितवांस्ततः । निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निराशः समपद्यत ॥
avajñāpūrvakenāpi na saṃpāditavāṃstataḥ | nirviṇṇaḥ sa tu viprarṣirnirāśaḥ samapadyata
अनादर किए जाने पर भी उसके बाद कुछ सिद्ध नहीं हुआ; और वह ब्राह्मण ऋषि विरक्त होकर निराश हो गया।
ऋषभ उवाच
श्लोक 23 (12.127.23)
एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् । श्रान्तोऽवसीदद्धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ॥
evamukto'bhivādyātha tamṛṣiṃ lokapūjitam | śrānto'vasīdaddharmātmā yathā tvaṃ narasattama
ऐसा कहे जाने पर उस धर्मात्मा राजा ने लोकपूजित उन ऋषि को प्रणाम किया और थका हुआ, हे नरश्रेष्ठ! तुम्हारी ही तरह उदास होकर बैठ गया।
श्लोक 24 (12.127.24)
अर्ध्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महायशाः । आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥
ardhyaṃ tataḥ samānīya pādyaṃ caiva mahāyaśāḥ | āraṇyenaiva vidhinā rājñe sarvaṃ nyavedayat
तब उन महायशस्वी ऋषि ने अर्घ्य और पाद्य मँगवाकर वन की रीति के अनुसार राजा को सब कुछ अर्पित किया।
श्लोक 25 (12.127.25)
ततस्तमृषयः सर्वे परिवार्य नरर्षभम् । उपाविशन्पुरस्कृत्य सप्तर्षय इव ध्रुवम् ॥
tatastamṛṣayaḥ sarve parivārya nararṣabham | upāviśanpuraskṛtya saptarṣaya iva dhruvam
तब सब ऋषि उन नरश्रेष्ठ राजा को घेरकर, उनका सत्कार करते हुए, ध्रुव के चारों ओर सप्तर्षियों की तरह बैठ गए।
श्लोक 26 (12.127.26)
अपृच्छंश्चैव तत्रैनं राजानमपराजितम् । प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य प्रवेशने ॥
apṛcchaṃścaiva tatrainaṃ rājānamaparājitam | prayojanamidaṃ sarvamāśramasya praveśane
और वहाँ उन्होंने उस अपराजित राजा से आश्रम में उसके आने का सारा प्रयोजन पूछा।