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शान्ति पर्व · अध्याय 128

तनु बताते हैं: उनसे भी अधिक कृश आशाएँ

राजा वीरद्युम्न मौन बैठे मुनि को अपना परिचय देकर आशा के विषय में पूछते हैं। ऋषभ बताते हैं कि तनु का इसी राजा ने कभी अनादर किया था और तनु ने आशा को त्याग देने का निश्चय किया था। तनु कहते हैं कि आशा से अधिक कृश कुछ नहीं, और अपने से भी कृश आशाएँ गिनाते हैं: वह याचक जिसका सत्कार तो होता है पर सहायता नहीं, कृतघ्न और क्रूर लोगों की आशा, खोए हुए इकलौते पुत्र के पिता की, तथा स्त्रियों, वृद्धों, धनवानों और कन्याओं की आशा। राजा पुत्र के लिए प्रार्थना करता है; स्वयं धर्मरूप तनु बालक को लौटा लाते हैं। ऋषभ सुमित्र से अपनी कृशतर आशा त्याग देने को कहते हैं और भीष्म युधिष्ठिर से अटल रहने को।

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राजोवाच

श्लोक 1 (12.128.1)

वीरद्युम्न इति ख्यातो राजाऽहं दिक्षु विश्रुतः । भूरिद्युम्नं सुतं नष्टमन्वेष्टुं वनमागतः ॥

vīradyumna iti khyāto rājā'haṃ dikṣu viśrutaḥ | bhūridyumnaṃ sutaṃ naṣṭamanveṣṭuṃ vanamāgataḥ

मैं वीरद्युम्न नाम से प्रसिद्ध राजा हूँ, सब दिशाओं में विख्यात। मैं अपने खोए हुए पुत्र भूरिद्युम्न को खोजने के लिए इस वन में आया हूँ।

श्लोक 2 (12.128.2)

एकः पुत्रः स विप्राग्र्य बाल एव च सोऽनघः । न दृश्यते वने चास्मिंस्तमन्वेष्टुं चराम्यहम् ॥

ekaḥ putraḥ sa viprāgrya bāla eva ca so'naghaḥ | na dṛśyate vane cāsmiṃstamanveṣṭuṃ carāmyaham

हे विप्रश्रेष्ठ! वह मेरा एकमात्र पुत्र है, अभी बालक ही और निष्पाप; वह इस वन में कहीं दिखाई नहीं देता, उसी को खोजने मैं घूम रहा हूँ।

ऋषभ उवाच

श्लोक 3 (12.128.3)

इत्युक्ते तेन वचने राज्ञा मुनिरधोमुखः । तूष्णीमेवाभवत्तत्र न च प्रत्युक्तवान्नृपम् ॥

ityukte tena vacane rājñā muniradhomukhaḥ | tūṣṇīmevābhavattatra na ca pratyuktavānnṛpam

राजा के ऐसा कहने पर मुनि नीचे मुँह किए वहाँ चुप ही रहे और राजा को कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 4 (12.128.4)

स हि तेन पुरा विप्रो राज्ञा नात्यर्थमानितः । आशाकृतश्च राजेन्द्र तपो दीर्घं समाश्रितः ॥

sa hi tena purā vipro rājñā nātyarthamānitaḥ | āśākṛtaśca rājendra tapo dīrghaṃ samāśritaḥ

हे राजेन्द्र! उस ब्राह्मण का उस राजा ने पहले अधिक सम्मान नहीं किया था, और आशा से आहत होकर उसने लम्बे तप का आश्रय ले लिया था।

श्लोक 5 (12.128.5)

प्रतिग्रहमहं राज्ञां न करिष्ये कथंचन । अन्येषां चैव वर्णानामिति कृत्वा धियं तदा ॥

pratigrahamahaṃ rājñāṃ na kariṣye kathaṃcana | anyeṣāṃ caiva varṇānāmiti kṛtvā dhiyaṃ tadā

"मैं राजाओं से, और अन्य वर्णों से भी, कभी दान नहीं लूँगा" - ऐसा उस समय मन में निश्चय करके,

श्लोक 6 (12.128.6)

आशा हि पुरुषं बालमालापयति तस्थूषी । तामहं व्यपनेष्यामि इति कृत्वा व्यवस्थितः । वीरद्युम्नस्तु तं भूयः पप्रच्छ मुनिसत्तमम् ॥

āśā hi puruṣaṃ bālamālāpayati tasthūṣī | tāmahaṃ vyapaneṣyāmi iti kṛtvā vyavasthitaḥ | vīradyumnastu taṃ bhūyaḥ papraccha munisattamam

"आशा टिककर पुरुष को बालक की तरह बकवास कराती है; मैं उसे दूर कर दूँगा" - ऐसा निश्चय करके वे डटे रहे। पर वीरद्युम्न ने उन मुनिश्रेष्ठ से फिर पूछा।

राजोवाच

श्लोक 7 (12.128.7)

आशायाः किंच वृत्तं वै किंचेह भुवि दुर्लभम् । ब्रवीतु भगवानेतत्त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ॥

āśāyāḥ kiṃca vṛttaṃ vai kiṃceha bhuvi durlabham | bravītu bhagavānetattvaṃ hi dharmārthadarśivān

आशा का स्वरूप क्या है, और इस पृथ्वी पर दुर्लभ क्या है? भगवन्! यह मुझे बताइए, क्योंकि आप धर्म और अर्थ को देखने वाले हैं।

ऋषभ उवाच

श्लोक 8 (12.128.8)

ततः संस्मृत्य तत्सर्वं स्मारयिष्यन्निवाब्रवीत् । राजानं भगवान्विप्रस्ततः कृशतनुस्तदा ॥

tataḥ saṃsmṛtya tatsarvaṃ smārayiṣyannivābravīt | rājānaṃ bhagavānviprastataḥ kṛśatanustadā

तब वह सब याद करके, मानो राजा को भी याद दिलाते हुए, उन भगवान् ब्राह्मण, कृश-शरीर मुनि ने राजा से कहा।

ऋषिरुवाच

श्लोक 9 (12.128.9)

कृशत्वेन समं राजन्नाशाया विद्यते नृप । तस्या वै दुर्लभत्वाच्च प्रार्थितः पार्थिवो मया ॥

kṛśatvena samaṃ rājannāśāyā vidyate nṛpa | tasyā vai durlabhatvācca prārthitaḥ pārthivo mayā

हे राजन्! दुबलेपन में आशा के बराबर कुछ नहीं है; और उसकी वस्तु के दुर्लभ होने के कारण ही मैंने एक राजा से याचना की थी।

राजोवाच

श्लोक 10 (12.128.10)

कृशाकृशे मया ब्रह्मन्गृहीते वचनात्तव । दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिवाद्विजे ॥

kṛśākṛśe mayā brahmangṛhīte vacanāttava | durlabhatvaṃ ca tasyaiva vedavākyamivādvije

हे ब्रह्मन्! आपके वचन से मैंने कृश और अकृश को समझ लिया, और यह भी कि उसी का मिलना उतना ही कठिन है जितना द्विज न होने वाले के लिए वेदवाक्य।

श्लोक 11 (12.128.11)

संशयस्तु महाप्राज्ञ संजातो हृदये मम । तन्मुने मम तत्त्वेन वक्तुमर्हसि पृच्छतः ॥

saṃśayastu mahāprājña saṃjāto hṛdaye mama | tanmune mama tattvena vaktumarhasi pṛcchataḥ

हे महाप्राज्ञ! मेरे हृदय में एक संशय उत्पन्न हुआ है; इसलिए हे मुने! मैं जो पूछ रहा हूँ उसे आप ठीक-ठीक बताइए।

श्लोक 12 (12.128.12)

त्वत्तः कृशतरं किंनु ब्रवीतु भगवानिदम् । यदि गुह्यं न ते विप्र लोके किंचेह दुर्लभम् ॥

tvattaḥ kṛśataraṃ kiṃnu bravītu bhagavānidam | yadi guhyaṃ na te vipra loke kiṃceha durlabham

आपसे भी अधिक दुबला क्या है, यह भगवन् बताएँ; और हे विप्र! यदि आपके लिए गोपनीय न हो तो यह भी कि इस लोक में दुर्लभ क्या है।

कृश उवाच

श्लोक 13 (12.128.13)

दुर्लभोऽप्यथवा नास्ति योऽर्थी धृतिमवाप्नुयात् । स दुर्लभतरस्तात योऽर्थिनं नावमन्यते ॥

durlabho'pyathavā nāsti yo'rthī dhṛtimavāpnuyāt | sa durlabhatarastāta yo'rthinaṃ nāvamanyate

ऐसा याचक दुर्लभ है - या कहें कि है ही नहीं - जो संतोष पा ले; और उससे भी दुर्लभ, हे तात! वह है जो याचक का अनादर नहीं करता।

श्लोक 14 (12.128.14)

सत्कृत्य नोपक्रियते परं शक्त्या यथार्थतः । या सक्ता सर्वभूतेषु साऽऽशा कृशतरी मया ॥

satkṛtya nopakriyate paraṃ śaktyā yathārthataḥ | yā saktā sarvabhūteṣu sā''śā kṛśatarī mayā

सब प्राणियों से लगी रहने वाली वह आशा - याचक का सत्कार तो किया जाता है, पर दाता की सामर्थ्य के अनुसार उसका ठीक-ठीक उपकार नहीं किया जाता - वह आशा मुझसे भी अधिक कृश है।

श्लोक 15 (12.128.15)

कृतघ्नेषु च या सक्ता नृशंसेष्वलसेषु च । अपकारिषु चासक्ता साऽऽशा कृशतरी मया ॥

kṛtaghneṣu ca yā saktā nṛśaṃseṣvalaseṣu ca | apakāriṣu cāsaktā sā''śā kṛśatarī mayā

जो आशा कृतघ्नों, क्रूरों, आलसियों और अपकार करने वालों से बँधी रहती है, वह आशा मुझसे भी अधिक कृश है।

श्लोक 16 (12.128.16)

एकपुत्रः पिता पुत्रे नष्टे वा प्रोषितेऽपि वा । प्रवृत्तिं यो न जानाति साऽऽशा कृशतरी मता ॥

ekaputraḥ pitā putre naṣṭe vā proṣite'pi vā | pravṛttiṃ yo na jānāti sā''śā kṛśatarī matā

जिस पिता का एकमात्र पुत्र खो गया हो या परदेस चला गया हो और जो उसका समाचार नहीं जान पाता, उसकी वह आशा और भी कृश मानी गई है।

श्लोक 17 (12.128.17)

प्रसवे चैव नारीणां वृद्धानां पुत्रकारिता । तथा नरेन्द्र धनिनां साऽशा कृशतरी मता ॥

prasave caiva nārīṇāṃ vṛddhānāṃ putrakāritā | tathā narendra dhanināṃ sā'śā kṛśatarī matā

प्रसव के समय स्त्रियों की आशा; और वृद्धों की, तथा हे नरेन्द्र! धनवानों की भी पुत्र पाने की आशा - वह आशा और भी कृश मानी गई है।

श्लोक 18 (12.128.18)

प्रदानकाङ्क्षिणीनां च कन्यानां वयसि स्थिते । श्रुत्वा कथास्तथायुक्ताः साऽऽशा कृशतरी मता ॥

pradānakāṅkṣiṇīnāṃ ca kanyānāṃ vayasi sthite | śrutvā kathāstathāyuktāḥ sā''śā kṛśatarī matā

विवाह में दिए जाने की आकांक्षा रखने वाली कन्याओं की, युवावस्था आ जाने पर, वैसी चर्चाएँ सुनकर बनी आशा - वह भी और कृश मानी गई है।

ऋषभ उवाच

श्लोक 19 (12.128.19)

एतच्छ्रुत्वा ततो राजन्स राजा सावरोधनः । संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभे ॥

etacchrutvā tato rājansa rājā sāvarodhanaḥ | saṃspṛśya pādau śirasā nipapāta dvijarṣabhe

यह सुनकर, हे राजन्! वह राजा अपने अन्तःपुर के साथ ब्राह्मणश्रेष्ठ के चरण सिर से छूकर उनके सामने गिर पड़ा।

राजोवाच

श्लोक 20 (12.128.20)

प्रसादये त्वां भगवन्पुत्रेणेच्छामि संगमम् । यदेतदुक्तं भवता संप्रति द्विजसत्तम । वृणीष्व च वरान्विप्र यानिच्छसि यथाविधि ॥

prasādaye tvāṃ bhagavanputreṇecchāmi saṃgamam | yadetaduktaṃ bhavatā saṃprati dvijasattama | vṛṇīṣva ca varānvipra yānicchasi yathāvidhi

भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ और अपने पुत्र से मिलना चाहता हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ! आपने अभी जो कहा है, उसके विषय में - हे विप्र! जो भी वर आप चाहें, विधिपूर्वक माँग लें।

ऋषभ उवाच

श्लोक 21 (12.128.21)

अब्रवीच्चैव तद्वाक्यं राजा राजीवलोचनः ॥

abravīccaiva tadvākyaṃ rājā rājīvalocanaḥ

और कमल-नयन राजा ने वह बात कही।

राजोवाच

श्लोक 22 (12.128.22)

सत्यमेतत्त्वया विप्र यथोक्तं नान्यथा मृषा ॥

satyametattvayā vipra yathoktaṃ nānyathā mṛṣā

हे विप्र! आपने जैसा कहा, वह सत्य है; वैसा ही है, अन्यथा या मिथ्या नहीं।

ऋषभ उवाच

श्लोक 23 (12.128.23)

ततः प्रहस्य भगवांस्तनुर्धर्मभृतां वरः । पुत्रमस्यानयत्क्षिप्रं तपसा च श्रुतेन च ॥

tataḥ prahasya bhagavāṃstanurdharmabhṛtāṃ varaḥ | putramasyānayatkṣipraṃ tapasā ca śrutena ca

तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भगवान् तनु ने हँसकर अपने तप और विद्या के बल से राजा के पुत्र को तुरंत ला दिया।

श्लोक 24 (12.128.24)

स समानीय तत्पुत्रं तमुपालभ्य पार्थिवम् । आत्मानं दर्शयामास धर्मं धर्मभृतांवरः ॥

sa samānīya tatputraṃ tamupālabhya pārthivam | ātmānaṃ darśayāmāsa dharmaṃ dharmabhṛtāṃvaraḥ

पुत्र को लाकर और राजा को उलाहना देकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन मुनि ने स्वयं को धर्म के रूप में प्रकट किया।

श्लोक 25 (12.128.25)

स दर्शयित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् । विपाप्मा विगतक्रोधश्चचार वनमन्तिकात् ॥

sa darśayitvā cātmānaṃ divyamadbhutadarśanam | vipāpmā vigatakrodhaścacāra vanamantikāt

अपना अद्भुत दिव्य रूप दिखाकर, पापरहित और क्रोधरहित होकर वे पास के वन में विचरने चले गए।

श्लोक 26 (12.128.26)

एतद्दृष्टं मया राजंस्त्वत्तश्च वचनं श्रुतम् । आशामपनय त्वाशु ततः कृशतरीमिमाम् ॥

etaddṛṣṭaṃ mayā rājaṃstvattaśca vacanaṃ śrutam | āśāmapanaya tvāśu tataḥ kṛśatarīmimām

हे राजन्! यह मैंने देखा है और तुम्हारी बात भी सुनी है; इसलिए इस कृशतर आशा को शीघ्र छोड़ दो।

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (12.128.27)

स तथोक्तस्तदा राजन्नृषभेण महात्मना । सुमित्रोऽपानयत्क्षिप्रमाशां कृशतरीं ततः ॥

sa tathoktastadā rājannṛṣabheṇa mahātmanā | sumitro'pānayatkṣipramāśāṃ kṛśatarīṃ tataḥ

हे राजन्! महात्मा ऋषभ के इस प्रकार कहने पर सुमित्र ने उस कृशतर आशा को तुरंत छोड़ दिया।

श्लोक 28 (12.128.28)

एवं त्वमपि कौन्तेय श्रुत्वा वाणीमिमां मम । स्थिरो भव महाराज हिमवानिव निश्चलः ॥

evaṃ tvamapi kaunteya śrutvā vāṇīmimāṃ mama | sthiro bhava mahārāja himavāniva niścalaḥ

हे कुन्तीपुत्र! तुम भी मेरी इस वाणी को सुनकर हिमालय की तरह अटल होकर स्थिर बनो, हे महाराज!

श्लोक 29 (12.128.29)

त्वं हि श्रुत्वा च पृष्ट्वा च कृच्छ्रेष्वर्थेषु तेष्विह । श्रुत्वा मम महाराज न संतप्तुमिहार्हसि ॥

tvaṃ hi śrutvā ca pṛṣṭvā ca kṛcchreṣvartheṣu teṣviha | śrutvā mama mahārāja na saṃtaptumihārhasi

तुमने इन कठिन विषयों के बारे में सुना भी है और पूछा भी है; मुझे सुन लेने के बाद, हे महाराज! तुम्हें दुःखी नहीं होना चाहिए।

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