शान्ति पर्व · अध्याय 135
धर्म पर चलने वाला दस्यु कापव्य
भीष्म कापव्य की कथा सुनाते हैं, जो निषादी माता से उत्पन्न क्षत्रिय था; वह अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करता, तपस्वियों की रक्षा करता और उन्हें मृग पहुँचाता था, और हजारों दस्युओं ने उसे अपना नायक चुन लिया। उसने उन्हें नियम दिए: स्त्री, बालक, तपस्वी और निहत्थे का वध न करो, ब्राह्मणों, गायों और किसान की फसल को न लूटो, और केवल सज्जनों को सताने वालों को दण्ड दो। दस्युओं ने उसका अनुशासन माना, पाप छोड़े और समृद्ध हुए, और कापव्य को स्वयं महान सिद्धि मिली। भीष्म कहते हैं कि जो इस कथा को स्मरण रखता है, उसे वन में किसी से भय नहीं रहता।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.135.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा दस्युः समर्यादो दस्युत्वात्सिद्धिमाप्तवान् ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yathā dasyuḥ samaryādo dasyutvātsiddhimāptavān
इस विषय में भी लोग यह पुराना इतिहास सुनाते हैं कि कैसे मर्यादा में रहने वाला एक दस्यु अपने दस्युकर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 2 (12.135.2)
प्रहर्ता मतिमाञ्शूरः श्रुतवाननृशंसवान् । रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥
prahartā matimāñśūraḥ śrutavānanṛśaṃsavān | rakṣannāśramiṇāṃ dharmaṃ brahmaṇyo gurupūjakaḥ
वह प्रहार करने वाला, बुद्धिमान, शूर, शास्त्रज्ञ और क्रूरता से रहित था; आश्रमवासियों के धर्म की रक्षा करता था, ब्राह्मणों का भक्त और गुरुजनों का पूजक था।
श्लोक 3 (12.135.3)
निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः । कापच्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात्सिद्धिमाप्तवान् ॥
niṣādyāṃ kṣatriyājjātaḥ kṣatradharmānupālakaḥ | kāpacyo nāma naiṣādirdasyutvātsiddhimāptavān
क्षत्रिय पिता और निषाद जाति की माता से उत्पन्न, क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाला, कापव्य नाम का एक निषाद-पुत्र दस्युकर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 4 (12.135.4)
अरण्ये सायं पूर्वाह्णे मृगयूथप्रकोपिता । विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥
araṇye sāyaṃ pūrvāhṇe mṛgayūthaprakopitā | vidhijño mṛgajātīnāṃ naiṣādānāṃ ca kovidaḥ
वह मृगों की जातियों के उपायों का ज्ञाता और निषादों के आचार में निपुण था; सायंकाल और पूर्वाह्न में, जब मृगों के झुण्ड उत्तेजित होते, वह वन में घूमता था।
श्लोक 5 (12.135.5)
सर्वकाननदेशज्ञः पारियात्रचरः सदा । धर्मज्ञः सर्ववर्णानाममोघेषुर्दृढायुधः ॥
sarvakānanadeśajñaḥ pāriyātracaraḥ sadā | dharmajñaḥ sarvavarṇānāmamogheṣurdṛḍhāyudhaḥ
वह सब वनप्रदेशों को जानता था, सदा पारियात्र पर्वत पर विचरता था, सब वर्णों के धर्म को जानता था, उसके बाण अचूक थे और उसके शस्त्र दृढ़ थे।
श्लोक 6 (12.135.6)
अप्यनेकशतां सेनामेक एव जिगाय सः । स वृद्धावम्बपितरौ महारण्येऽभ्यपूजयत् ॥
apyanekaśatāṃ senāmeka eva jigāya saḥ | sa vṛddhāvambapitarau mahāraṇye'bhyapūjayat
वह अकेला ही सैकड़ों की सेनाओं को जीत लेता था; और महावन में उसने अपने वृद्ध माता-पिता की पूजा की।
श्लोक 7 (12.135.7)
मधुमांसैर्मूलफलैरन्नैरुच्चावचैरपि । सत्कृत्य भोजयामास सम्यक्परिचचार ह ॥
madhumāṃsairmūlaphalairannairuccāvacairapi | satkṛtya bhojayāmāsa samyakparicacāra ha
मधु और मांस, कन्द-मूल-फल और नाना प्रकार के अन्न से वह सत्कारपूर्वक उन्हें भोजन कराता और भली-भाँति उनकी सेवा करता था।
श्लोक 8 (12.135.8)
आरण्यकान्प्रव्रजितान्ब्राह्मणान्परिपालयन् । अपि तेभ्यो मृगान्हत्वा निनाय सततं वने ॥
āraṇyakānpravrajitānbrāhmaṇānparipālayan | api tebhyo mṛgānhatvā nināya satataṃ vane
वन में रहने वाले ब्राह्मणों और संन्यासियों की रक्षा करता हुआ वह उनके लिए मृगों को मारकर वन में निरन्तर पहुँचाता था।
श्लोक 9 (12.135.9)
येऽस्मान्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया । तेषामासज्य गेहेषु कल्य एव स गच्छति ॥
ye'smānna pratigṛhṇanti dasyubhojanaśaṅkayā | teṣāmāsajya geheṣu kalya eva sa gacchati
जो लोग दस्यु के भोजन की शंका से हमसे कुछ नहीं लेते, उनके घरों में उसे रखकर वह प्रातःकाल ही चला जाता था।
श्लोक 10 (12.135.10)
तं बहूनि सहस्राणि ग्रामणीत्वेऽभिवव्रिरे । निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशवर्तिनाम् ॥
taṃ bahūni sahasrāṇi grāmaṇītve'bhivavrire | nirmaryādāni dasyūnāṃ niranukrośavartinām
मर्यादाहीन और निर्दय कर्म करने वाले हजारों दस्युओं ने उसे अपना नायक चुन लिया।
दस्यव ऊचुः
श्लोक 11 (12.135.11)
मुहूर्तदेशकालज्ञः प्राज्ञः शूरो दृढव्रतः । ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव संमतः ॥
muhūrtadeśakālajñaḥ prājñaḥ śūro dṛḍhavrataḥ | grāmaṇīrbhava no mukhyaḥ sarveṣāmeva saṃmataḥ
उचित मुहूर्त, देश और काल को जानने वाले, बुद्धिमान, शूर और दृढ़ व्रत वाले, तुम हमारे प्रमुख नायक बनो; सब लोग तुम्हें मानते हैं।
श्लोक 12 (12.135.12)
यथायथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथातथा । पालयास्मान्यथान्यायं यथा माता यथा पिता ॥
yathāyathā vakṣyasi naḥ kariṣyāmastathātathā | pālayāsmānyathānyāyaṃ yathā mātā yathā pitā
तुम जो-जो कहोगे, हम वैसा-वैसा ही करेंगे। जैसे माता और पिता, वैसे तुम न्याय के अनुसार हमारी रक्षा करो।
कापव्य उवाच
श्लोक 13 (12.135.13)
मा वधीस्त्वं स्त्रियं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् । नायुध्यमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या बलात्स्त्रियः ॥
mā vadhīstvaṃ striyaṃ bhīruṃ mā śiśuṃ mā tapasvinam | nāyudhyamāno hantavyo na ca grāhyā balātstriyaḥ
स्त्री, डरे हुए, बालक और तपस्वी को मत मारो। जो युद्ध नहीं कर रहा, उसे नहीं मारना चाहिए, और स्त्रियों को बलपूर्वक नहीं पकड़ना चाहिए।
श्लोक 14 (12.135.14)
सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्वेषु बुध्यत । नित्यं गोब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥
sarvathā strī na hantavyā sarvasatveṣu budhyata | nityaṃ gobrāhmaṇe svasti yoddhavyaṃ ca tadarthataḥ
सब प्राणियों में यह जान लो कि स्त्री का वध किसी भी प्रकार नहीं करना चाहिए। गौओं और ब्राह्मणों का सदा कल्याण चाहो और उनके लिए युद्ध करो।
श्लोक 15 (12.135.15)
सत्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः । पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयश्च ह ॥
satyaṃ ca nāpi hartavyaṃ sāravighnaṃ ca mā kṛthāḥ | pūjyante yatra devāśca pitaro'tithayaśca ha
सत्य का हनन नहीं करना चाहिए, और जहाँ देवताओं, पितरों और अतिथियों की पूजा होती है, वहाँ के आवश्यक कार्यों में बाधा मत डालो।
श्लोक 16 (12.135.16)
सर्वभूतेष्वपि वरो ब्राह्मणो मोक्षमर्हति । कार्या चापचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि भावयेत् ॥
sarvabhūteṣvapi varo brāhmaṇo mokṣamarhati | kāryā cāpacitisteṣāṃ sarvasvenāpi bhāvayet
सब प्राणियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है और मोक्ष के योग्य है। उनका सम्मान सर्वस्व देकर भी करना चाहिए।
श्लोक 17 (12.135.17)
यस्य त्वेते संप्रदुष्टास्तस्य विद्यात्पराभवम् । न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥
yasya tvete saṃpraduṣṭāstasya vidyātparābhavam | na tasya triṣu lokeṣu trātā bhavati kaścana
जिस पर ये ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो जाएँ, उसका विनाश निश्चित जानो; तीनों लोकों में कोई उसकी रक्षा नहीं कर सकता।
श्लोक 18 (12.135.18)
यो ब्राह्मणान्परिभवेद्विनाशं चापि रोचयेत् । सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥
yo brāhmaṇānparibhavedvināśaṃ cāpi rocayet | sūryodaya iva dhvānte dhruvaṃ tasya parābhavaḥ
जो ब्राह्मणों का अपमान करता है या उनके विनाश की इच्छा करता है, उसका पराभव निश्चित है, जैसे अन्धकार का सूर्योदय होने पर।
श्लोक 19 (12.135.19)
इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः । येये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥
ihaiva phalamāsīnaḥ pratyākāṅkṣeta sarvaśaḥ | yeye no na pradāsyanti tāṃstāṃstenābhiyāsyasi
यहीं बैठे-बैठे सब ओर से फल की आशा रखो; जो-जो हमें कुछ नहीं देंगे, उन-उन पर तुम इसी बल से चढ़ाई करोगे।
श्लोक 20 (12.135.20)
शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वधार्थं विधीयते । ये च शिष्टान्प्रबाधन्ते धर्मस्तेषां वधः स्मृतः ॥
śiṣṭyarthaṃ vihito daṇḍo na vadhārthaṃ vidhīyate | ye ca śiṣṭānprabādhante dharmasteṣāṃ vadhaḥ smṛtaḥ
दण्ड शिक्षा के लिए विहित है, वध के लिए नहीं। जो सज्जनों को सताते हैं, उनका वध धर्म कहा गया है।
श्लोक 21 (12.135.21)
ये च राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन । तानेवानुम्रियेरंस्ते कुणपं कृमयो यथा ॥
ye ca rāṣṭroparodhena vṛddhiṃ kurvanti kecana | tānevānumriyeraṃste kuṇapaṃ kṛmayo yathā
जो राष्ट्र को पीड़ित करके अपनी वृद्धि करते हैं, वे उसी के साथ नष्ट हो जाते हैं, जैसे शव में कीड़े।
श्लोक 22 (12.135.22)
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः । अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥
ye punardharmaśāstreṇa varteranniha dasyavaḥ | api te dasyavo bhūtvā kṣipraṃ siddhimavāpnuyuḥ
किन्तु जो दस्यु धर्मशास्त्र के अनुसार चलें, वे दस्यु होकर भी शीघ्र सिद्धि पा लेंगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.135.23)
ते सर्वमेवानुचक्रुः कापच्यस्यानुशासनम् । वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥
te sarvamevānucakruḥ kāpacyasyānuśāsanam | vṛddhiṃ ca lebhire sarve pāpebhyaścāpyupāraman
उन सबने कापव्य के उपदेश का पालन किया; उनकी वृद्धि हुई और उन्होंने पाप से भी विराम लिया।
श्लोक 24 (12.135.24)
कापच्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् । साधूनामाचरन्क्षेमं दस्यून्पापान्निवर्तयन् ॥
kāpacyaḥ karmaṇā tena mahatīṃ siddhimāptavān | sādhūnāmācarankṣemaṃ dasyūnpāpānnivartayan
उस कर्म से कापव्य ने महान सिद्धि पाई; वह सज्जनों का कल्याण करता और पापी दस्युओं को पाप से हटाता था।
श्लोक 25 (12.135.25)
इदं कापच्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् । नारण्येभ्योऽपि भूतेभ्यो भयमृच्छेत्कथंचन ॥
idaṃ kāpacyacaritaṃ yo nityamanucintayet | nāraṇyebhyo'pi bhūtebhyo bhayamṛcchetkathaṃcana
जो इस कापव्य-चरित्र का सदा स्मरण करता है, उसे वन के प्राणियों से भी कभी भय नहीं होता।
श्लोक 26 (12.135.26)
न भयं तस्य मर्त्येभ्यो नामर्त्येभ्यः कथंचन । न सतो नासतो राजन्स ह्यरण्येषु गोपतिः ॥
na bhayaṃ tasya martyebhyo nāmartyebhyaḥ kathaṃcana | na sato nāsato rājansa hyaraṇyeṣu gopatiḥ
हे राजन्, उसे न मनुष्यों से भय है, न देवताओं से, न सज्जनों से और न दुर्जनों से; क्योंकि वह वनों में रक्षक है।