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शान्ति पर्व · अध्याय 206

सृष्टि का क्रम और श्रीकृष्ण का अवतार

युधिष्ठिर के केशव के विषय में यथार्थ सुनने की प्रार्थना पर भीष्म ऋषियों के कथनानुसार सृष्टि का क्रम बताते हैं: विष्णु जल पर शयन करते हैं, उनकी नाभि के कमल से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं और मधु मारा जाता है। फिर ब्रह्मा के पुत्र, दक्ष की कन्याएँ, देवता, दानव, चार वर्ण, युगों में प्रजा की उत्पत्ति के प्रकार तथा दक्षिण-उत्तर के जन आते हैं। अन्त में भीष्म नारद के उपदेश के अनुसार कृष्ण को मनुष्य रूप में अचिन्त्य परमात्मा बताते हैं, जिन्हें भक्ति और ध्यान से पाया जाता है।

अध्याय 205अध्याय-सूचीअध्याय 207

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.206.1)

पितामह महाप्राज्ञ पुण्डरीकाक्षमच्युतम् । कर्तारमकृतं विष्णुं भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥

pitāmaha mahāprājña puṇḍarīkākṣamacyutam | kartāramakṛtaṃ viṣṇuṃ bhūtānāṃ prabhavāpyayam

हे महाप्राज्ञ पितामह, मैं कमलनयन, अच्युत, कर्ता किन्तु स्वयं अकृत, प्राणियों की उत्पत्ति और लय के कारण विष्णु केशव के विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ;

श्लोक 2 (12.206.2)

नारायणं हृषीकेशं गोविन्दमपराजितम् । तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि केशवम् ॥

nārāyaṇaṃ hṛṣīkeśaṃ govindamaparājitam | tattvena bharataśreṣṭha śrotumicchāmi keśavam

नारायण, हृषीकेश, गोविन्द, अपराजित केशव के विषय में, हे भरतश्रेष्ठ, मैं तत्त्व से सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.206.3)

श्रुतोऽयमर्थो रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः । नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च ॥

śruto'yamartho rāmasya jāmadagnyasya jalpataḥ | nāradasya ca devarṣeḥ kṛṣṇadvaipāyanasya ca

यह बात मैंने जमदग्नि-पुत्र परशुराम के कहते समय उनसे, देवर्षि नारद से और कृष्णद्वैपायन से सुनी है;

श्लोक 4 (12.206.4)

असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः । मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥

asito devalastāta vālmīkiśca mahātapāḥ | mārkaṇḍeyaśca govinde kathayantyadbhutaṃ mahat

और हे तात, असित, देवल, महातपस्वी वाल्मीकि तथा मार्कण्डेय भी गोविन्द के विषय में महान् और अद्भुत बातें कहते हैं।

श्लोक 5 (12.206.5)

केशवस्य मया राजन्न शक्या वर्णितुं गुणाः । ईदृशोऽसौ हृषीकेशो वासुदेवः परात्परः ॥

keśavasya mayā rājanna śakyā varṇituṃ guṇāḥ | īdṛśo'sau hṛṣīkeśo vāsudevaḥ parātparaḥ

"हे राजन्, केशव के गुणों का वर्णन मैं नहीं कर सकता। ऐसे हैं ये हृषीकेश वासुदेव, जो परे से भी परे हैं।"

श्लोक 6 (12.206.6)

केशवो भरतश्रेष्ठ भगवानीश्वरः प्रभुः । पुरुषः सर्वमित्येव श्रूयते बहुधा विभुः ॥

keśavo bharataśreṣṭha bhagavānīśvaraḥ prabhuḥ | puruṣaḥ sarvamityeva śrūyate bahudhā vibhuḥ

हे भरतश्रेष्ठ, केशव भगवान्, ईश्वर और प्रभु हैं; वे सर्वव्यापी पुरुष हैं, जो "सब कुछ" हैं, ऐसा अनेक प्रकार से सुना जाता है।

श्लोक 7 (12.206.7)

किंतु यानि विदुर्लोके ब्राह्मणाः शार्ङ्गधन्वनि । महात्मनि महाबाहो शृणु तानि युधिष्ठिर ॥

kiṃtu yāni vidurloke brāhmaṇāḥ śārṅgadhanvani | mahātmani mahābāho śṛṇu tāni yudhiṣṭhira

किन्तु हे महाबाहु युधिष्ठिर, शार्ङ्गधनुषधारी उन महात्मा के जो माहात्म्य संसार में ब्राह्मण जानते हैं, उन्हें सुनो।

श्लोक 8 (12.206.8)

यानि चाहुर्मनुष्येन्द्र ये पुराणविदो जनाः । श्रुत्वा सर्वाणि गोविन्दे कीर्तयिष्यामि तान्यहम् ॥

yāni cāhurmanuṣyendra ye purāṇavido janāḥ | śrutvā sarvāṇi govinde kīrtayiṣyāmi tānyaham

और हे नरेन्द्र, जो पुराणों को जानने वाले लोग कहते हैं, गोविन्द के विषय में वह सब सुनकर मैं उसे कहूँगा।

श्लोक 9 (12.206.9)

महाभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः । वायुर्ज्योतिस्तथा चापः खं च गां चान्वकल्पयत् ॥

mahābhūtāni bhūtātmā mahātmā puruṣottamaḥ | vāyurjyotistathā cāpaḥ khaṃ ca gāṃ cānvakalpayat

भूतों के आत्मा, महात्मा पुरुषोत्तम ने महाभूतों की रचना की: वायु, अग्नि, जल, आकाश और पृथ्वी।

श्लोक 10 (12.206.10)

स सृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः । अप्स्वेव शयनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ॥

sa sṛṣṭvā pṛthivīṃ caiva sarvabhūteśvaraḥ prabhuḥ | apsveva śayanaṃ cakre mahātmā puruṣottamaḥ

पृथ्वी की सृष्टि करके सब प्राणियों के स्वामी उन महात्मा पुरुषोत्तम ने जल पर ही अपनी शय्या बनाई।

श्लोक 11 (12.206.11)

सर्वतेजोमयस्तस्मिञ्शयानः शयने शुभे । सोऽग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमचिन्तयत् ॥

sarvatejomayastasmiñśayānaḥ śayane śubhe | so'grajaṃ sarvabhūtānāṃ saṃkarṣaṇamacintayat

उस सुन्दर शय्या पर लेटे हुए, सर्वथा तेजोमय उन्होंने सब प्राणियों के अग्रज संकर्षण का चिन्तन किया।

श्लोक 12 (12.206.12)

आश्रयं सर्वभूतानां मनसेतीह शुश्रुम । स धारयति भूतानि उभे भूतभविष्यती ॥

āśrayaṃ sarvabhūtānāṃ manasetīha śuśruma | sa dhārayati bhūtāni ubhe bhūtabhaviṣyatī

हमने ऐसा सुना है कि उन्होंने मन से उसका चिन्तन किया, जो सब प्राणियों का आश्रय है और जो भूत तथा भविष्य दोनों प्रकार के प्राणियों को धारण करता है।

श्लोक 13 (12.206.13)

प्रद्युम्नमसृजत्तस्मात्सर्वतेजः प्रकाशकम् । अनिरुद्धस्ततो जज्ञे सर्वशक्तिर्महाद्युतिः ॥

pradyumnamasṛjattasmātsarvatejaḥ prakāśakam | aniruddhastato jajñe sarvaśaktirmahādyutiḥ

"उससे उन्होंने समस्त तेज के प्रकाशक प्रद्युम्न की सृष्टि की; फिर सर्वशक्तिमान् महातेजस्वी अनिरुद्ध उत्पन्न हुए।

श्लोक 14 (12.206.14)

अप्सु व्योमगतः श्रीमान्योगनिद्रामुपेयिवान् । तस्मात्संजज्ञिरे देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । लयस्थित्यन्तकर्माणस्त्रयस्ते सुमहौजसः ॥

apsu vyomagataḥ śrīmānyoganidrāmupeyivān | tasmātsaṃjajñire devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ | layasthityantakarmāṇastrayaste sumahaujasaḥ

जल के ऊपर आकाश में स्थित श्रीमान् ने योगनिद्रा ग्रहण की। उनसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर नाम के तीन देवता उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी हैं और जिनके कर्म लय, स्थिति और अन्त हैं।"

श्लोक 15 (12.206.15)

ततस्तस्मिन्महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजायत ॥

tatastasminmahābāhau prādurbhūte mahātmani | bhāskarapratimaṃ divyaṃ nābhyāṃ padmamajāyata

तब उन महाबाहु महात्मा के प्रकट होने पर उनकी नाभि से सूर्य के समान दिव्य कमल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 16 (12.206.16)

स तत्र भगवान्देवः पुष्करे भ्राजयन्दिशः । ब्रह्मा समभवत्तात सर्वभूतपितामहः ॥

sa tatra bhagavāndevaḥ puṣkare bhrājayandiśaḥ | brahmā samabhavattāta sarvabhūtapitāmahaḥ

वहाँ उस कमल में दिशाओं को प्रकाशित करते हुए भगवान् देव ब्रह्मा हुए, हे तात, जो सब प्राणियों के पितामह हैं।

श्लोक 17 (12.206.17)

तस्मिन्नपि महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । तमसः पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ॥

tasminnapi mahābāhau prādurbhūte mahātmani | tamasaḥ pūrvajo jajñe madhurnāma mahāsuraḥ

उन महाबाहु महात्मा के भी प्रकट हो जाने पर तमस् से पहले उत्पन्न हुआ मधु नाम का महान् असुर।

श्लोक 18 (12.206.18)

तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् । ब्रह्मणोपचितिं कुर्वञ्जघान पुरुषोत्तमः ॥

tamugramugrakarmāṇamugrāṃ buddhiṃ samāsthitam | brahmaṇopacitiṃ kurvañjaghāna puruṣottamaḥ

वह उग्र था, उग्र कर्म करता था और उग्र बुद्धि पर दृढ़ था; ब्रह्मा का मान रखते हुए पुरुषोत्तम ने उसे मार डाला।

श्लोक 19 (12.206.19)

तस्य तात वधात्सर्वे देवदानवमानवाः । मधुसूदनमित्याहुर्ऋषभं सर्वसात्वताम् ॥

tasya tāta vadhātsarve devadānavamānavāḥ | madhusūdanamityāhurṛṣabhaṃ sarvasātvatām

हे तात, उसके वध के कारण सब देवता, दानव और मनुष्य उन्हें सब सात्वतों में श्रेष्ठ "मधुसूदन" कहते हैं।

श्लोक 20 (12.206.20)

ब्रह्माऽनुससृजे पुत्रान्मानसान्दक्षसप्तमान् । मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ॥

brahmā'nusasṛje putrānmānasāndakṣasaptamān | marīcimatryaṅgirasau pulastyaṃ pulahaṃ kratum

फिर ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्र रचे, जिनमें दक्ष सातवाँ था: मरीचि, अत्रि और अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु।

श्लोक 21 (12.206.21)

मरीचिः कश्यपं तात पुत्रमग्रजमग्रजः । मानसं जनयामास तैजसं ब्रह्मवित्तमम् ॥

marīciḥ kaśyapaṃ tāta putramagrajamagrajaḥ | mānasaṃ janayāmāsa taijasaṃ brahmavittamam

ज्येष्ठ मरीचि ने अपने मन से कश्यप को अपने ज्येष्ठ पुत्र के रूप में उत्पन्न किया, जो तेजस्वी और ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ था।

श्लोक 22 (12.206.22)

अङ्गुष्ठात्ससृजे ब्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् । सोऽभवद्भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ॥

aṅguṣṭhātsasṛje brahmā marīcerapi pūrvajam | so'bhavadbharataśreṣṭha dakṣo nāma prajāpatiḥ

ब्रह्मा ने अपने अँगूठे से मरीचि से भी पूर्व उत्पन्न होने वाले को रचा; हे भरतश्रेष्ठ, वही दक्ष नाम का प्रजापति हुआ।

श्लोक 23 (12.206.23)

तस्य पूर्वमजायन्त दश तिस्रश्च भारत । प्रजापतेर्दुहितरस्तासां ज्येष्ठाऽभवद्दितिः ॥

tasya pūrvamajāyanta daśa tisraśca bhārata | prajāpaterduhitarastāsāṃ jyeṣṭhā'bhavadditiḥ

हे भारत, पहले उस प्रजापति की तेरह (दस और तीन) कन्याएँ उत्पन्न हुईं; उनमें दिति सबसे बड़ी थी।

श्लोक 24 (12.206.24)

सर्वधर्मविशेषज्ञः पुण्यकीर्तिर्महायशाः । मारीचः कश्यपस्तात सर्वासामभवत्पतिः ॥

sarvadharmaviśeṣajñaḥ puṇyakīrtirmahāyaśāḥ | mārīcaḥ kaśyapastāta sarvāsāmabhavatpatiḥ

सब धर्मों के भेदों के ज्ञाता, पुण्यकीर्ति और महायशस्वी मारीच कश्यप, हे तात, उन सबके पति हुए।

श्लोक 25 (12.206.25)

उत्पाद्य तु महाभागस्तासामवरजा दश । ददौ धर्माय धर्मज्ञो दक्ष एव प्रजापतिः ॥

utpādya tu mahābhāgastāsāmavarajā daśa | dadau dharmāya dharmajño dakṣa eva prajāpatiḥ

उन्हें उत्पन्न करके महाभाग धर्मज्ञ प्रजापति दक्ष ने उनकी छोटी दस कन्याएँ धर्म को दीं।

श्लोक 26 (12.206.26)

धर्मस्य वसवः पुत्रा रुद्राश्चामिततेजसः । विश्वेदेवाश्च साध्याश्च मरुत्वन्तश्च भारत ॥

dharmasya vasavaḥ putrā rudrāścāmitatejasaḥ | viśvedevāśca sādhyāśca marutvantaśca bhārata

हे भारत, धर्म के पुत्र वसु और अमित तेजस्वी रुद्र, विश्वेदेव, साध्य और मरुत्वान् हुए।

श्लोक 27 (12.206.27)

अपराश्च यवीयस्यस्ताभ्योऽन्याः सप्तविंशतिः । सोमस्तासां महाभागः सर्वासामभवत्पतिः ॥

aparāśca yavīyasyastābhyo'nyāḥ saptaviṃśatiḥ | somastāsāṃ mahābhāgaḥ sarvāsāmabhavatpatiḥ

और उनके अतिरिक्त जो अन्य छोटी सत्ताईस थीं, उन सबके पति महाभाग सोम हुए।

श्लोक 28 (12.206.28)

इतरास्तु व्यजायन्त गन्धर्वांस्तुरगान्द्विजान् । गाश्च किंपुरुषान्मत्स्यानुद्भिज्जांश्च वनस्पतीन् ॥

itarāstu vyajāyanta gandharvāṃsturagāndvijān | gāśca kiṃpuruṣānmatsyānudbhijjāṃśca vanaspatīn

शेष कन्याओं ने गन्धर्वों, घोड़ों, पक्षियों, गायों, किम्पुरुषों, मछलियों, अंकुर से उगने वाले पौधों और वनस्पतियों को जन्म दिया।

श्लोक 29 (12.206.29)

आदित्यानदितिर्जज्ञे देवश्रेष्ठान्महाबलान् । तेषां विष्णुर्वामनोऽभूद्गोविन्दश्चाभवत्प्रभुः ॥

ādityānaditirjajñe devaśreṣṭhānmahābalān | teṣāṃ viṣṇurvāmano'bhūdgovindaścābhavatprabhuḥ

अदिति ने देवताओं में श्रेष्ठ, महाबली आदित्यों को जन्म दिया; उनमें विष्णु वामन हुए और प्रभु गोविन्द हुए।

श्लोक 30 (12.206.30)

तस्य विक्रमणाच्चापि देवानां श्रीर्व्यवर्धत । दानवाश्च पराभूता दैतेयाश्चासुरी प्रजा ॥

tasya vikramaṇāccāpi devānāṃ śrīrvyavardhata | dānavāśca parābhūtā daiteyāścāsurī prajā

उनके विक्रम (पग) से देवताओं की श्री बढ़ी, और दानव, दैत्य तथा असुरों की प्रजा पराजित हुई।

श्लोक 31 (12.206.31)

विप्रचित्तिप्रधानांश्च दानवानसृजद्दनुः । दितिस्तु सर्वानसुरान्महासत्वानजीजनत् ॥

vipracittipradhānāṃśca dānavānasṛjaddanuḥ | ditistu sarvānasurānmahāsatvānajījanat

दनु ने विप्रचित्ति आदि प्रधान दानवों को उत्पन्न किया; दिति ने सब महाबली असुरों को जन्म दिया।

श्लोक 32 (12.206.32)

ततः ससर्ज भगवान्मृत्युं लोकभयंकरम् । हर्तारं सर्वभूतानां ससर्ज च जनार्दनः ॥

tataḥ sasarja bhagavānmṛtyuṃ lokabhayaṃkaram | hartāraṃ sarvabhūtānāṃ sasarja ca janārdanaḥ

तब भगवान् ने लोकों को भयभीत करने वाले, सब प्राणियों को हर लेने वाले मृत्यु को रचा; जनार्दन ने उसकी सृष्टि की।

श्लोक 33 (12.206.33)

अहोरात्रं च कालं च यथर्तु मधुसूदनः । पूर्वाह्णं चापराह्णं च सर्वमेवान्वकल्पयत् ॥

ahorātraṃ ca kālaṃ ca yathartu madhusūdanaḥ | pūrvāhṇaṃ cāparāhṇaṃ ca sarvamevānvakalpayat

मधुसूदन ने दिन-रात, काल और ऋतु के अनुसार सब कुछ रचा; पूर्वाह्न और अपराह्न, सबकी व्यवस्था की।

श्लोक 34 (12.206.34)

लब्ध्वापः सोऽसृजन्मेघांस्तथा स्थावरजङ्गमान् । पृथिवीं सोऽसृजद्विश्वां सहिताम् भूरितेजसा ॥

labdhvāpaḥ so'sṛjanmeghāṃstathā sthāvarajaṅgamān | pṛthivīṃ so'sṛjadviśvāṃ sahitām bhūritejasā

जल को लेकर उन्होंने मेघों की तथा स्थावर-जंगम की सृष्टि की; और बड़े तेज से युक्त सम्पूर्ण पृथ्वी की रचना की।

श्लोक 35 (12.206.35)

ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर । ब्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखादेवासृजत्प्रभुः ॥

tataḥ kṛṣṇo mahābhāgaḥ punareva yudhiṣṭhira | brāhmaṇānāṃ śataṃ śreṣṭhaṃ mukhādevāsṛjatprabhuḥ

फिर महाभाग कृष्ण ने, हे युधिष्ठिर, फिर से अपने मुख से सौ श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सृष्टि की।

श्लोक 36 (12.206.36)

बाहुभ्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूरुतः शतम् । पद्भ्यां शूद्रशतं चैव केशवो भरतर्षभ ॥

bāhubhyāṃ kṣatriyaśataṃ vaiśyānāmūrutaḥ śatam | padbhyāṃ śūdraśataṃ caiva keśavo bharatarṣabha

हे भरतर्षभ, केशव ने अपनी भुजाओं से सौ क्षत्रिय, जंघाओं से सौ वैश्य और चरणों से सौ शूद्र उत्पन्न किए।

श्लोक 37 (12.206.37)

स एवं चतुरो वर्णान्समुत्पाद्य महातपाः । अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत्स्वयम् ॥

sa evaṃ caturo varṇānsamutpādya mahātapāḥ | adhyakṣaṃ sarvabhūtānāṃ dhātāramakarotsvayam

इस प्रकार चारों वर्णों को उत्पन्न करके उन महातपस्वी ने स्वयं धाता को समस्त प्राणियों का अध्यक्ष बनाया।

श्लोक 38 (12.206.38)

वेदविद्याविधातारं ब्रह्माणममितद्युतिम् । भूतमातृगणाध्यक्षं विरूपाक्षं च सोऽसृजत् ॥

vedavidyāvidhātāraṃ brahmāṇamamitadyutim | bhūtamātṛgaṇādhyakṣaṃ virūpākṣaṃ ca so'sṛjat

उन्होंने वेदविद्या के विधाता, अमित तेजस्वी ब्रह्मा को और भूतमातृगणों के अध्यक्ष विरूपाक्ष को रचा।

श्लोक 39 (12.206.39)

शासितारं च पापानां पितॄणां समवर्तिनम् । असृजत्सर्वभूतात्मा निधिपं च धनेश्वरम् ॥

śāsitāraṃ ca pāpānāṃ pitṝṇāṃ samavartinam | asṛjatsarvabhūtātmā nidhipaṃ ca dhaneśvaram

सर्वभूतात्मा ने पापियों के शासक और पितरों के अधिपति यम को तथा निधियों के रक्षक धनेश्वर कुबेर को रचा।

श्लोक 40 (12.206.40)

यादसामसृजन्नाथं वरुणं च जलेश्वरम् । वासवं सर्वदेवानामध्यक्षमकरोत्प्रभुः ॥

yādasāmasṛjannāthaṃ varuṇaṃ ca jaleśvaram | vāsavaṃ sarvadevānāmadhyakṣamakarotprabhuḥ

उन्होंने जलचरों के स्वामी और जल के अधीश्वर वरुण को रचा, और प्रभु ने वासव (इन्द्र) को सब देवताओं का अध्यक्ष बनाया।

श्लोक 41 (12.206.41)

यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारयितुं नृणाम् । तावत्तावदजीवंस्ते नासीद्यमकृतं भयम् ॥

yāvadyāvadabhūcchraddhā dehaṃ dhārayituṃ nṛṇām | tāvattāvadajīvaṃste nāsīdyamakṛtaṃ bhayam

जब तक मनुष्यों में देह धारण करने की श्रद्धा रही, तब तक वे जीवित रहे; यम का किया हुआ कोई भय नहीं था।

श्लोक 42 (12.206.42)

न चैषां मैथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ । संकल्पादेव चैतेषां गर्भः समुपपद्यते ॥

na caiṣāṃ maithuno dharmo babhūva bharatarṣabha | saṃkalpādeva caiteṣāṃ garbhaḥ samupapadyate

हे भरतर्षभ, उनमें मैथुन-धर्म नहीं था; संकल्प मात्र से ही उनमें गर्भ उत्पन्न होता था।

श्लोक 43 (12.206.43)

ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाज्जायते प्रजा । न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप ॥

tatastretāyuge kāle saṃsparśājjāyate prajā | na hyabhūnmaithuno dharmasteṣāmapi janādhipa

फिर त्रेतायुग में प्रजा स्पर्श से उत्पन्न होती थी; हे जनाधिप, तब भी उनमें मैथुन-धर्म नहीं था।

श्लोक 44 (12.206.44)

द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप । तथा कलियुगे राजन्द्वन्द्वमापेदिरे जनाः ॥

dvāpare maithuno dharmaḥ prajānāmabhavannṛpa | tathā kaliyuge rājandvandvamāpedire janāḥ

हे राजन्, द्वापर में प्रजा में मैथुन-धर्म आया; और कलियुग में लोग जोड़े में रहने लगे।

श्लोक 45 (12.206.45)

एष भूतपतिस्तात स्वध्यक्षश्च तथोच्यते । निरपेक्षांश्च कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥

eṣa bhūtapatistāta svadhyakṣaśca tathocyate | nirapekṣāṃśca kaunteya kīrtayiṣyāmi tacchṛṇu

हे तात, यह भूतों का स्वामी है, जिसे अपने ही अध्यक्ष वाला कहा जाता है। हे कुन्तीपुत्र, अब मैं उन्हें बताऊँगा जो उसकी अपेक्षा नहीं रखते; उसे सुनो।

श्लोक 46 (12.206.46)

दक्षिणापथजन्मानः सर्वे करभृतस्तव । आन्ध्राः पुलिन्दाः शवराश्चूचुपा मद्रकैः सह ॥

dakṣiṇāpathajanmānaḥ sarve karabhṛtastava | āndhrāḥ pulindāḥ śavarāścūcupā madrakaiḥ saha

दक्षिण दिशा में जन्मे सब लोग तुम्हें कर देने वाले हैं: आन्ध्र, पुलिन्द, शबर, चूचुप और मद्रक।

श्लोक 47 (12.206.47)

उत्तरापथजन्मानः कीर्तयिष्यामि तानपि । ये तु काम्भोजगान्धाराः किराता बर्वरैः सह ॥

uttarāpathajanmānaḥ kīrtayiṣyāmi tānapi | ye tu kāmbhojagāndhārāḥ kirātā barvaraiḥ saha

उत्तर दिशा में जन्मे लोगों को भी मैं बताऊँगा: काम्भोज और गान्धार, किरात और बर्बर।

श्लोक 48 (12.206.48)

एते पापकृतस्तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् । बकश्वपाकगृध्राणां सधर्माणो नराधिप ॥

ete pāpakṛtastāta caranti pṛthivīmimām | bakaśvapākagṛdhrāṇāṃ sadharmāṇo narādhipa

हे तात, हे नराधिप, ये पापकर्म करने वाले हैं, जो इस पृथ्वी पर विचरते हैं; ये बगुलों, श्वपाकों और गिद्धों के समान धर्म वाले हैं।

श्लोक 49 (12.206.49)

नैते कृतयुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् । त्रेताप्रभृति वर्धन्ते ते जना भरतर्षभ ॥

naite kṛtayuge tāta caranti pṛthivīmimām | tretāprabhṛti vardhante te janā bharatarṣabha

हे तात, ये कृतयुग में इस पृथ्वी पर नहीं विचरते थे; हे भरतर्षभ, त्रेता से ये लोग बढ़ते गए।

श्लोक 50 (12.206.50)

ततस्तस्मिन्महाघोरे सन्ध्याकाले युगान्तिके । राजानः समसज्जन्त समासाद्येतरेतरम् ॥

tatastasminmahāghore sandhyākāle yugāntike | rājānaḥ samasajjanta samāsādyetaretaram

फिर उस अत्यन्त भयंकर युगान्त की सन्ध्या के समय राजा एक-दूसरे से मिलकर आपस में भिड़ गए।

श्लोक 51 (12.206.51)

ऐन्द्रं रूपं समास्थाय ह्यसुरेभ्यश्चरन्महीम् । स एव भगवान्देवो वेदित्वं च गता मही ॥

aindraṃ rūpaṃ samāsthāya hyasurebhyaścaranmahīm | sa eva bhagavāndevo veditvaṃ ca gatā mahī

"इन्द्र के समान रूप धारण करके वे असुरों के विरुद्ध पृथ्वी पर विचरे; वे ही भगवान् देव थे, और पृथ्वी भी जानी जाने की स्थिति को प्राप्त हुई।

श्लोक 52 (12.206.52)

एवंभूते भूतसृष्टिर्नारसिंहादयः क्रमात् । प्रादुर्भावाः स्मृता विष्णोर्जगतीरक्षणाय वै ॥

evaṃbhūte bhūtasṛṣṭirnārasiṃhādayaḥ kramāt | prādurbhāvāḥ smṛtā viṣṇorjagatīrakṣaṇāya vai

ऐसी स्थिति में प्राणियों की सृष्टि हुई; और नृसिंह आदि विष्णु के प्रादुर्भाव क्रम से जगत् की रक्षा के लिए स्मरण किए जाते हैं।

श्लोक 53 (12.206.53)

एष कृष्णो महायोगी तत्तत्कार्यानुरूपणम् । हिरण्यकशिपुं दैत्यं हिरण्याक्षं तथैव च ॥

eṣa kṛṣṇo mahāyogī tattatkāryānurūpaṇam | hiraṇyakaśipuṃ daityaṃ hiraṇyākṣaṃ tathaiva ca

ये महायोगी कृष्ण हैं, जिन्होंने प्रत्येक कार्य के अनुरूप दैत्य हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष को,

श्लोक 54 (12.206.54)

रावणं च महादैत्यं हत्वासौ पुरुषोत्तमः । भूमेर्दुःखोपनाशार्थं ब्रह्मशक्रादिभिः स्तुतः ॥

rāvaṇaṃ ca mahādaityaṃ hatvāsau puruṣottamaḥ | bhūmerduḥkhopanāśārthaṃ brahmaśakrādibhiḥ stutaḥ

तथा महादैत्य रावण को मारा; उन्हें मारकर इन पुरुषोत्तम की ब्रह्मा, इन्द्र आदि ने पृथ्वी का दुःख दूर करने के लिए स्तुति की;

श्लोक 55 (12.206.55)

आत्मनोऽङ्गान्महातेजा उद्वबर्ह जनार्दनः । सितकृष्णौ महाराज केशौ हरिरुदारधीः ॥

ātmano'ṅgānmahātejā udvabarha janārdanaḥ | sitakṛṣṇau mahārāja keśau harirudāradhīḥ

तब महातेजस्वी उदारबुद्धि जनार्दन हरि ने, हे महाराज, अपने शरीर से दो केश उखाड़े, एक श्वेत और एक काला।

श्लोक 56 (12.206.56)

वसुदेवस्य देवक्यामेष जात इहोत्तमः । देहवानिह विश्वात्मा संबन्धी ते जनार्दनः ॥

vasudevasya devakyāmeṣa jāta ihottamaḥ | dehavāniha viśvātmā saṃbandhī te janārdanaḥ

यही उत्तम पुरुष यहाँ देवकी के गर्भ से वसुदेव के पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ है; विश्वात्मा यहाँ देहधारी हुआ है; जनार्दन तुम्हारे सम्बन्धी हैं।

श्लोक 57 (12.206.57)

आविर्वभूव योगीन्द्रो मनोतीतो जगत्पतिः । अचिन्त्यः पुरुषव्याघ्र नैव केवलमानुषः ॥

āvirvabhūva yogīndro manotīto jagatpatiḥ | acintyaḥ puruṣavyāghra naiva kevalamānuṣaḥ

योगीन्द्र, मन से परे जगत्पति प्रकट हुए हैं; हे पुरुषव्याघ्र, वे अचिन्त्य हैं और केवल मनुष्य नहीं हैं।

श्लोक 58 (12.206.58)

अव्यक्तादिविशेषान्तं परिमाणार्थसंयुतम् । क्रीडा हरेरिदं सर्वं क्षरमित्येव धार्यताम् ॥

avyaktādiviśeṣāntaṃ parimāṇārthasaṃyutam | krīḍā hareridaṃ sarvaṃ kṣaramityeva dhāryatām

अव्यक्त से लेकर विशेष तक, जो कुछ परिमाण और सीमा से युक्त है, यह सब हरि की क्रीड़ा और क्षर है, ऐसा समझो।

श्लोक 59 (12.206.59)

अक्षरं तत्परं नित्यं वैरूप्यं जगतो हरेः । तद्विद्धि रूपमतुलममृतत्वं भवज्जितम् ॥

akṣaraṃ tatparaṃ nityaṃ vairūpyaṃ jagato hareḥ | tadviddhi rūpamatulamamṛtatvaṃ bhavajjitam

अक्षर परम और नित्य है, वह जगत् से हरि की विलक्षणता है; उसे उनका अतुल रूप जानो, जो अमरत्व है और संसार को जीतने वाला है।

श्लोक 60 (12.206.60)

तदेव कृष्णो दाशार्हः श्रीमाञ्श्रीवत्सलक्षणः । न भूतसृष्टिसंस्थानं देहोऽस्य परमात्मनः ॥

tadeva kṛṣṇo dāśārhaḥ śrīmāñśrīvatsalakṣaṇaḥ | na bhūtasṛṣṭisaṃsthānaṃ deho'sya paramātmanaḥ

वही दशार्हवंशी श्रीमान् श्रीवत्सचिह्न वाले कृष्ण हैं। इस परमात्मा का शरीर भूतों की सृष्टि से बना ढाँचा नहीं है।

श्लोक 61 (12.206.61)

देहवानिह यो विष्णुरसौ मायामयो हरिः । आत्मनो लोकरक्षार्थं ध्याहि नित्यं सनातनम् ॥

dehavāniha yo viṣṇurasau māyāmayo hariḥ | ātmano lokarakṣārthaṃ dhyāhi nityaṃ sanātanam

जो विष्णु यहाँ देहधारी हैं, वे मायामय हरि हैं; वे अपने लोकों की रक्षा के लिए देह धारण करते हैं। उस सनातन का नित्य ध्यान करो।

श्लोक 62 (12.206.62)

अङ्गानि चतुरो वेदा मीमांसा न्यायविस्तरः । इतिहासपुराणानि धर्माः स्वायंभुवादयः ॥

aṅgāni caturo vedā mīmāṃsā nyāyavistaraḥ | itihāsapurāṇāni dharmāḥ svāyaṃbhuvādayaḥ

वेदांग, चारों वेद, मीमांसा, न्याय का विस्तार, इतिहास और पुराण, तथा स्वायम्भुव मनु आदि के धर्मशास्त्र,

श्लोक 63 (12.206.63)

य एनं प्रतिवर्तन्ते वेदान्तानि च सर्वशः । भक्तिहीना न तैर्यान्ति नित्यमेनं कथंचन ॥

ya enaṃ prativartante vedāntāni ca sarvaśaḥ | bhaktihīnā na tairyānti nityamenaṃ kathaṃcana

इनके द्वारा और सब प्रकार से वेदान्तों द्वारा जो उसे पाने का यत्न करते हैं, यदि वे भक्तिहीन हों तो उनसे कभी किसी प्रकार उसे नहीं पाते।

श्लोक 64 (12.206.64)

सर्वभूतेषु भूतात्मा तत्तद्बुद्धिं समास्थितः । तस्माद्बुद्धस्त्वमेवैनं ध्याहि नित्यमतन्द्रितः ॥

sarvabhūteṣu bhūtātmā tattadbuddhiṃ samāsthitaḥ | tasmādbuddhastvamevainaṃ dhyāhi nityamatandritaḥ

भूतात्मा सब प्राणियों में उनकी-उनकी बुद्धि का रूप लेकर स्थित है; इसलिए तुम सजग होकर उसका नित्य और अथक ध्यान करो।"

श्लोक 65 (12.206.65)

एवमेष कुरुश्रेष्ठ प्रादुर्भावो महात्मनः । एवं देवर्षिराचष्ट नारदः सर्वलोकदृक् ॥

evameṣa kuruśreṣṭha prādurbhāvo mahātmanaḥ | evaṃ devarṣirācaṣṭa nāradaḥ sarvalokadṛk

हे कुरुश्रेष्ठ, उन महात्मा का प्रादुर्भाव इस प्रकार है; सब लोकों को देखने वाले देवर्षि नारद ने ऐसा ही कहा था।

श्लोक 66 (12.206.66)

नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप । शाश्वतत्वं महाबाहो यथावद्भरतर्षभ ॥

nārado'pyatha kṛṣṇasya paraṃ mene narādhipa | śāśvatatvaṃ mahābāho yathāvadbharatarṣabha

और हे नराधिप, नारद ने भी कृष्ण की शाश्वतता को परम माना, जैसी वह यथार्थ में है, हे महाबाहु भरतर्षभ।

श्लोक 67 (12.206.67)

एवमेव महाबाहुः केशवः सत्यविक्रमः । अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः ॥

evameva mahābāhuḥ keśavaḥ satyavikramaḥ | acintyaḥ puṇḍarīkākṣo naiṣa kevalamānuṣaḥ

इसी प्रकार महाबाहु केशव सत्यपराक्रमी, अचिन्त्य और कमलनयन हैं; वे केवल मनुष्य नहीं हैं।

श्लोक 68 (12.206.68)

एवंविधोऽसौ पुरुषः को वैनं वेत्ति सर्वदा । एतत्ते कथितं राजन्भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

evaṃvidho'sau puruṣaḥ ko vainaṃ vetti sarvadā | etatte kathitaṃ rājanbhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

"ऐसे हैं ये पुरुष। उन्हें सदा कौन जानता है? हे राजन्, यह मैंने तुम्हें बताया; अब और क्या सुनना चाहते हो?"

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