Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 205

निबन्धन का दृष्टान्त और नारद को विष्णु का दर्शन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि दुःख और शोक से भरे संसारचक्र से लोगों को वैराग्य क्यों नहीं होता। भीष्म निबन्धन मुनि और उसकी माता भोगवती का संवाद सुनाते हैं, जिसमें कुएँ में लटके, मधु पीते पुरुष का दृष्टान्त आता है, और उसका अर्थ बताते हैं: वन संसार है, सर्प काल है, वृक्ष मृत्यु है। फिर वे बताते हैं कि नारद ने कन्या सावित्री को देखा, सौ वर्ष की स्तुति के बाद विष्णु का दर्शन पाया और कृष्ण की आराधना का उपदेश पाया।

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.205.1)

पितामह महाप्राज्ञ दुःखशोकसमाकुले । संसारचक्रे लोकानां निर्वेदो नास्ति किंन्विदम् ॥

pitāmaha mahāprājña duḥkhaśokasamākule | saṃsāracakre lokānāṃ nirvedo nāsti kiṃnvidam

हे महाप्राज्ञ पितामह, दुःख और शोक से भरे इस संसारचक्र में लोगों को वैराग्य क्यों नहीं होता? इसका क्या कारण है?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.205.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निबन्धनस्य संवादं भोगवत्या नृपोत्तम ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nibandhanasya saṃvādaṃ bhogavatyā nṛpottama

हे नृपश्रेष्ठ, इस विषय में लोग एक पुरानी कथा सुनाते हैं: निबन्धन और भोगवती का संवाद।

श्लोक 3 (12.205.3)

मुनिं निबन्धनं शुष्कं धमनीयाकृतिं तथा । निरारम्भं निरालम्बमसज्जन्तं च कर्मणि । पुत्रं दृष्ट्वाऽप्युवाचार्तं माता भोगवती तदा ॥

muniṃ nibandhanaṃ śuṣkaṃ dhamanīyākṛtiṃ tathā | nirārambhaṃ nirālambamasajjantaṃ ca karmaṇi | putraṃ dṛṣṭvā'pyuvācārtaṃ mātā bhogavatī tadā

अपने पुत्र निबन्धन मुनि को सूखा हुआ, नसों के ढाँचे जैसा दुबला, बिना किसी उद्यम और बिना किसी आश्रय के तथा कर्म में अनासक्त देखकर उसकी माता भोगवती ने तब दुःखी होकर उससे कहा।

भोगवत्युवाच

श्लोक 4 (12.205.4)

उत्तिष्ठ मूढ किं शेषे निरपेक्षः सुहृज्जनैः । निरालम्बो धनोपाये पैतृकं तव किं धनम् ॥

uttiṣṭha mūḍha kiṃ śeṣe nirapekṣaḥ suhṛjjanaiḥ | nirālambo dhanopāye paitṛkaṃ tava kiṃ dhanam

उठ, मूर्ख! तू सुहृदों और स्वजनों की ओर से उदासीन होकर, धन कमाने के किसी साधन के बिना, यों क्यों पड़ा है? तेरा पैतृक धन क्या है?

निबन्धन उवाच

श्लोक 5 (12.205.5)

पैतृकं मे महन्मातः सर्वदुःखालयं त्विह । अस्त्येतत्तद्विघाताय यतिष्ये तत्र मा शुचः ॥

paitṛkaṃ me mahanmātaḥ sarvaduḥkhālayaṃ tviha | astyetattadvighātāya yatiṣye tatra mā śucaḥ

माँ, मेरा पैतृक धन बहुत बड़ा है और इस संसार में वह सब दुःखों का घर है। वह है, और मैं उसके नाश के लिए प्रयत्न करूँगा; आप उसके लिए शोक न करें।

श्लोक 6 (12.205.6)

इदं शरीरमत्युग्रं पित्रा दत्तमसंशयम् । तमेव पितरं गत्वा धनं तिष्ठति शाश्वतम् ॥

idaṃ śarīramatyugraṃ pitrā dattamasaṃśayam | tameva pitaraṃ gatvā dhanaṃ tiṣṭhati śāśvatam

यह अत्यन्त उग्र शरीर निःसन्देह पिता का दिया हुआ है; किन्तु उसी पिता के पास जाने पर जो धन रहता है, वह शाश्वत है।

श्लोक 7 (12.205.7)

कश्चिन्महति संसारे वर्तमानो धनेच्छया । वनदुर्गमभिप्राप्तो महत्क्रव्यादसङ्कुलम् ॥

kaścinmahati saṃsāre vartamāno dhanecchayā | vanadurgamabhiprāpto mahatkravyādasaṅkulam

कोई पुरुष, इस विशाल संसार में धन की इच्छा से रहता हुआ, बड़े-बड़े मांसभक्षी जन्तुओं से भरे एक दुर्गम वन में जा पहुँचा।

श्लोक 8 (12.205.8)

सिंहव्याघ्रगजाकारैरतिघोरैर्महाशनैः । समन्तात्सुपरिक्षिप्तं स दृष्ट्वा व्यथते पुमान् ॥

siṃhavyāghragajākārairatighorairmahāśanaiḥ | samantātsuparikṣiptaṃ sa dṛṣṭvā vyathate pumān

सिंह, बाघ और हाथी के आकार वाले अत्यन्त भयंकर बड़े भक्षकों से चारों ओर घिरा हुआ देखकर वह पुरुष व्याकुल हो उठा।

श्लोक 9 (12.205.9)

स तद्वनं ह्यनुचरन्विप्रधावन्नितस्ततः । वीक्षमाणो दिशः सर्वाः शरणार्थं प्रधावति ॥

sa tadvanaṃ hyanucaranvipradhāvannitastataḥ | vīkṣamāṇo diśaḥ sarvāḥ śaraṇārthaṃ pradhāvati

उस वन में भटकता हुआ, इधर-उधर दौड़ता हुआ और सब दिशाओं में देखता हुआ वह शरण पाने के लिए भागता रहा।

श्लोक 10 (12.205.10)

अथापश्यद्वनं रूढं समन्ताद्वागुरावृतम् । वनमध्ये च तत्रासीदुदपानः समावृतः ॥

athāpaśyadvanaṃ rūḍhaṃ samantādvāgurāvṛtam | vanamadhye ca tatrāsīdudapānaḥ samāvṛtaḥ

तब उसने एक घना उगा हुआ झाड़-झंखाड़ देखा, जो चारों ओर फन्दों से घिरा था; और वन के बीच में एक कुआँ था, जो ढका हुआ था।

श्लोक 11 (12.205.11)

वल्लिभिस्तृणसंछिन्नैर्गूढाभिरभिसंवृतः । स पपात द्विजस्तत्र विजने सलिलाशये ॥

vallibhistṛṇasaṃchinnairgūḍhābhirabhisaṃvṛtaḥ | sa papāta dvijastatra vijane salilāśaye

वह एकान्त जलाशय कटी हुई घास के नीचे छिपी लताओं से ढका हुआ था; वह ब्राह्मण उसमें गिर पड़ा।

श्लोक 12 (12.205.12)

विलग्नश्चाभवत्तस्मिँल्लतासन्तानसङ्कुले । बाहुभ्यां संपरिष्वक्तस्तया परमसत्वया ॥

vilagnaścābhavattasmim̐llatāsantānasaṅkule | bāhubhyāṃ saṃpariṣvaktastayā paramasatvayā

वह लताओं के जाल में उलझकर वहीं अटक गया; एक अति बलवती लता ने उसे अपनी बाँहों से लपेट लिया।

श्लोक 13 (12.205.13)

स तथा लम्बते तत्र ऊर्ध्वपादो ह्यधश्शिराः । अधस्तत्रैव जातश्च जम्बूवृक्षः सुदुस्तरः ॥

sa tathā lambate tatra ūrdhvapādo hyadhaśśirāḥ | adhastatraiva jātaśca jambūvṛkṣaḥ sudustaraḥ

इस प्रकार वह वहाँ पैर ऊपर और सिर नीचे किए लटका हुआ है; और उसके नीचे ठीक उसी स्थान पर एक जामुन का वृक्ष उग आया, जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था।

श्लोक 14 (12.205.14)

कूपस्य तस्य वेलाया अपश्यत्सुमहाफलम् । वृक्षं बहुविधं व्योमवल्लीपुष्पसमाकुलम् ॥

kūpasya tasya velāyā apaśyatsumahāphalam | vṛkṣaṃ bahuvidhaṃ vyomavallīpuṣpasamākulam

उस कुएँ के किनारे उसने एक वृक्ष देखा, जिसमें बहुत बड़ा फल लगता था; वह अनेक प्रकार का था और आकाश तक चढ़ी लताओं तथा फूलों से भरा था।

श्लोक 15 (12.205.15)

नानारूपा मधुकरास्तस्मिन्वृक्षेऽभवन्किल । तेषां मधूनां बहुधा धारा प्रववृते तदा ॥

nānārūpā madhukarāstasminvṛkṣe'bhavankila | teṣāṃ madhūnāṃ bahudhā dhārā pravavṛte tadā

कहते हैं, उस वृक्ष पर अनेक रूपों के भौंरे-मधुमक्खियाँ थे, और उनके मधु की अनेक धाराएँ तब बह चलीं।

श्लोक 16 (12.205.16)

विलम्बमानः स पुमान्धारां पिबति सर्वदा । न तस्य तृष्णा विरता पीयमानस्य संकटे ॥

vilambamānaḥ sa pumāndhārāṃ pibati sarvadā | na tasya tṛṣṇā viratā pīyamānasya saṃkaṭe

लटका हुआ वह पुरुष उस धारा को सदा पीता रहता है; किन्तु उस संकट में पीते हुए भी उसकी प्यास कभी शान्त नहीं होती।

श्लोक 17 (12.205.17)

परीप्सति च तां नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः । एवं स वसते तत्र दुःखिदुःखी पुनः पुनः ॥

parīpsati ca tāṃ nityamatṛptaḥ sa punaḥ punaḥ | evaṃ sa vasate tatra duḥkhiduḥkhī punaḥ punaḥ

अतृप्त वह बार-बार उसी को चाहता है; इस प्रकार वह वहाँ दुःखी से भी दुःखी होकर बार-बार रहता है।

श्लोक 18 (12.205.18)

मया तु तद्धनं देयं तव दास्यामि चेच्छसि । तस्य च प्रार्थितः सोऽथ दत्वा मुक्तिमवाप सः ॥

mayā tu taddhanaṃ deyaṃ tava dāsyāmi cecchasi | tasya ca prārthitaḥ so'tha datvā muktimavāpa saḥ

"किन्तु वह धन मुझे देना है; यदि आप चाहें तो मैं आपको दूँगा।" उसके माँगने पर उसने उसे दे दिया और मुक्ति पा ली।

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (12.205.19)

सा च त्यक्त्वाऽर्थसंकल्पं जगाम परमां गतिम् ॥

sā ca tyaktvā'rthasaṃkalpaṃ jagāma paramāṃ gatim

और वह धन की कामना छोड़कर परम गति को प्राप्त हुई।

श्लोक 20 (12.205.20)

एवं संसारचक्रस्य स्वरूपज्ञा नृपोत्तम । परं वैराग्यमागम्य गच्छन्ति परमं पदम् ॥

evaṃ saṃsāracakrasya svarūpajñā nṛpottama | paraṃ vairāgyamāgamya gacchanti paramaṃ padam

हे नृपश्रेष्ठ, इस प्रकार संसारचक्र के स्वरूप को जानने वाले लोग परम वैराग्य को प्राप्त होकर परमपद को जाते हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (12.205.21)

एवं संसारचक्रस्य स्वरूपं विदितं न मे । पैतृकं तु धनं प्रोक्तं किं तद्विद्वन्महात्मना ॥

evaṃ saṃsāracakrasya svarūpaṃ viditaṃ na me | paitṛkaṃ tu dhanaṃ proktaṃ kiṃ tadvidvanmahātmanā

संसारचक्र का स्वरूप मैं इस प्रकार नहीं समझ सका। और हे विद्वान्, उस महात्मा ने जिस पैतृक धन की बात कही, वह क्या है?

श्लोक 22 (12.205.22)

कान्तारमिति किं प्रोक्तं को हस्ती स तु कूपकः । किंसंज्ञिको महावृक्षो मधु वाऽपि पितामह ॥

kāntāramiti kiṃ proktaṃ ko hastī sa tu kūpakaḥ | kiṃsaṃjñiko mahāvṛkṣo madhu vā'pi pitāmaha

"कान्तार" से क्या कहा गया है? वह हाथी कौन है और वह कुआँ क्या है? वह महावृक्ष किस नाम का है और वह मधु क्या है, हे पितामह?

श्लोक 23 (12.205.23)

एवं मे संशयं विद्धि धनशब्दं किमुच्यते । कथं लब्धं धनं तेन तथा च किमिदं त्विह ॥

evaṃ me saṃśayaṃ viddhi dhanaśabdaṃ kimucyate | kathaṃ labdhaṃ dhanaṃ tena tathā ca kimidaṃ tviha

मेरा यह संशय जान लीजिए: "धन" शब्द से क्या कहा जाता है? उसे वह धन कैसे प्राप्त हुआ, और यह सब क्या है?

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (12.205.24)

उपाख्यानमिदं सर्वं मोक्षविद्भिरुदाहृतम् । सुमतिं विन्दते येन बन्धनाशश्च भारत ॥

upākhyānamidaṃ sarvaṃ mokṣavidbhirudāhṛtam | sumatiṃ vindate yena bandhanāśaśca bhārata

हे भारत, यह सारा उपाख्यान मोक्ष को जानने वालों ने कहा है; इससे मनुष्य को सुबुद्धि मिलती है और बन्धन का नाश होता है।

श्लोक 25 (12.205.25)

एतदुक्तं हि कान्तारं महान्संसार एव सः । ये ते प्रतिष्ठिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः ॥

etaduktaṃ hi kāntāraṃ mahānsaṃsāra eva saḥ | ye te pratiṣṭhitā vyālā vyādhayaste prakīrtitāḥ

जिस वन की बात कही गई, वह यह महान् संसार ही है; वहाँ जो हिंस्र जन्तु खड़े थे, वे रोग कहे गए हैं।

श्लोक 26 (12.205.26)

या सा नारी महाघोरा वर्णरूपविनाशिनी । तामाहुश्च जरां प्राज्ञाः परिष्वक्तं यया जगत् ॥

yā sā nārī mahāghorā varṇarūpavināśinī | tāmāhuśca jarāṃ prājñāḥ pariṣvaktaṃ yayā jagat

वर्ण और रूप को नष्ट करने वाली जो अति भयंकर स्त्री थी, उसे ज्ञानी लोग जरा (बुढ़ापा) कहते हैं; उसी ने सारे जगत् को आलिंगन में जकड़ रखा है।

श्लोक 27 (12.205.27)

यस्तत्र कूपे वसते महाहिः काल एव सः । यो वृक्षः स च मृत्युर्हि स्वकृतं तस्य तत्फलम् ॥

yastatra kūpe vasate mahāhiḥ kāla eva saḥ | yo vṛkṣaḥ sa ca mṛtyurhi svakṛtaṃ tasya tatphalam

उस कुएँ में रहने वाला महासर्प काल ही है। जो वृक्ष है, वह मृत्यु है; और उसका फल अपना किया हुआ कर्म है।

श्लोक 28 (12.205.28)

ये तु कृष्णाः सिता राजन्मूषिका रात्र्यहानि वै ॥

ye tu kṛṣṇāḥ sitā rājanmūṣikā rātryahāni vai

हे राजन्, जो काले और सफ़ेद चूहे हैं, वे रात और दिन हैं।

श्लोक 29 (12.205.29)

द्विषट्कपदसंयुक्तो यो हस्ती षण्मुखाकृतिः । स च संवत्सरः प्रोक्तः पादमासर्तवो मुखाः ॥

dviṣaṭkapadasaṃyukto yo hastī ṣaṇmukhākṛtiḥ | sa ca saṃvatsaraḥ proktaḥ pādamāsartavo mukhāḥ

बारह पैरों और छह मुखों वाला जो हाथी है, वह संवत्सर (वर्ष) कहा गया है; उसके पैर मास हैं और मुख ऋतुएँ हैं।

श्लोक 30 (12.205.30)

एतत्संसारचक्रस्य स्वरूपं व्याहृतं मया । एवं लब्धधनं राजंस्तत्स्वरूपं विनाशय ॥

etatsaṃsāracakrasya svarūpaṃ vyāhṛtaṃ mayā | evaṃ labdhadhanaṃ rājaṃstatsvarūpaṃ vināśaya

संसारचक्र का यह स्वरूप मैंने तुम्हें बताया। हे राजन्, इस प्रकार इस धन को पाकर तुम उस स्वरूप का नाश करो।

श्लोक 31 (12.205.31)

एतज्ज्ञात्वा तु सा राजन्परं वैराग्यमास्थिता । यथोक्तविधिना भूयः परं पदमवाप सः ॥

etajjñātvā tu sā rājanparaṃ vairāgyamāsthitā | yathoktavidhinā bhūyaḥ paraṃ padamavāpa saḥ

हे राजन्, यह जानकर वह परम वैराग्य में स्थित हुई; और जैसा बताया गया उस विधि से उसने फिर परमपद को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 32 (12.205.32)

धत्ते धारयते चैव एतस्मात्कारणाद्धनम् । तद्गच्छ चामृतं शुद्धं हिरण्यममृतं तपः ॥

dhatte dhārayate caiva etasmātkāraṇāddhanam | tadgaccha cāmṛtaṃ śuddhaṃ hiraṇyamamṛtaṃ tapaḥ

वह धारण करता है और पोषण करता है, इसी कारण उसे धन कहा जाता है। इसलिए उस शुद्ध अमृत (अविनाशी) धन के पास जाओ; अमर सोना तप है।

श्लोक 33 (12.205.33)

तत्स्वरूपो महादेवः कृष्णो देवकिनन्दनः । तस्य प्रसादाद्दुःखस्य नाशं प्राप्स्यसि मानद ॥

tatsvarūpo mahādevaḥ kṛṣṇo devakinandanaḥ | tasya prasādādduḥkhasya nāśaṃ prāpsyasi mānada

उसका स्वरूप महादेव देवकीनन्दन कृष्ण ही हैं; हे मान देने वाले, उनकी कृपा से तुम दुःख का नाश पाओगे।

श्लोक 34 (12.205.34)

एकः कर्ता स कृष्णश्च ज्ञानिनां परमा गतिः ॥

ekaḥ kartā sa kṛṣṇaśca jñānināṃ paramā gatiḥ

कर्ता एक वही कृष्ण हैं, और वे ज्ञानियों की परम गति हैं।

श्लोक 35 (12.205.35)

इदमाश्रित्य देवेन्द्रो देवा रुद्रास्तथाऽश्विनौ । स्वेस्वे पदे विविशिरे भुक्तिमुक्तिविदो जनाः ॥

idamāśritya devendro devā rudrāstathā'śvinau | svesve pade viviśire bhuktimuktivido janāḥ

इसी का आश्रय लेकर देवराज इन्द्र, देवता, रुद्र और अश्विनीकुमार तथा भोग और मोक्ष को जानने वाले लोग अपने-अपने पद में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 36 (12.205.36)

भूतानामन्तरात्माऽसौ स नित्यपदसंवृतः । श्रूयतामस्य सद्भावः सम्यग्ज्ञानं यथा तव ॥

bhūtānāmantarātmā'sau sa nityapadasaṃvṛtaḥ | śrūyatāmasya sadbhāvaḥ samyagjñānaṃ yathā tava

वे समस्त प्राणियों के अन्तरात्मा हैं और अपने नित्य धाम में आवृत रहते हैं। उनके यथार्थ स्वरूप को सुनो, जिससे तुम्हें सम्यक् ज्ञान हो।

श्लोक 37 (12.205.37)

भवेदेतन्निबोध त्वं नारदाय पुरा हरिः । दर्शयित्वाऽऽत्मनो रूपं यदवोचत्स्वयं विभुः ॥

bhavedetannibodha tvaṃ nāradāya purā hariḥ | darśayitvā''tmano rūpaṃ yadavocatsvayaṃ vibhuḥ

अब इसे जानो: प्राचीन काल में सर्वव्यापी हरि ने नारद को अपना रूप दिखाकर स्वयं जो कहा था।

श्लोक 38 (12.205.38)

पुरा देवऋषिः श्रीमान्नारदः परमार्थवान् । चचार पृथिवीं कृत्स्नां तीर्थान्यनुचरन्प्रभुः ॥

purā devaṛṣiḥ śrīmānnāradaḥ paramārthavān | cacāra pṛthivīṃ kṛtsnāṃ tīrthānyanucaranprabhuḥ

पूर्वकाल में परमार्थ को जानने वाले श्रीमान् देवर्षि नारद सारी पृथ्वी पर तीर्थों का भ्रमण करते हुए विचरे।

श्लोक 39 (12.205.39)

हिमवत्पादमाश्रित्य विचार्य च पुनःपुनः । स ददर्श ह्रदं तत्र पद्मोत्पलसमाकुलम् ॥

himavatpādamāśritya vicārya ca punaḥpunaḥ | sa dadarśa hradaṃ tatra padmotpalasamākulam

हिमालय की तलहटी में ठहरकर और बार-बार विचार करके उन्होंने वहाँ कमलों और नीलकमलों से भरा एक सरोवर देखा।

श्लोक 40 (12.205.40)

ददर्श कन्यां तत्तीरे सर्वाभरणभूषिताम् । शोभमानां श्रिया राजन्क्रीडन्तीमुत्पलैस्तथा ॥

dadarśa kanyāṃ tattīre sarvābharaṇabhūṣitām | śobhamānāṃ śriyā rājankrīḍantīmutpalaistathā

हे राजन्, उसके तट पर उन्होंने सब आभूषणों से सजी, शोभा से दमकती एक कन्या को नीलकमलों से खेलते देखा।

श्लोक 41 (12.205.41)

सा महात्मानमालोक्य नारदेत्याह भामिनी । तस्याः समीपमासाद्य तस्थौ विस्मितमानसः ॥

sā mahātmānamālokya nāradetyāha bhāminī | tasyāḥ samīpamāsādya tasthau vismitamānasaḥ

उस तेजस्विनी ने महात्मा को देखकर कहा, "नारद!" वे उसके पास जाकर विस्मित मन से खड़े हो गए।

श्लोक 42 (12.205.42)

वीक्षमाणं तमाज्ञाय सा कन्या चारुवासिनी । विजजृम्भे महाभागा स्मयमाना पुनः पुनः ॥

vīkṣamāṇaṃ tamājñāya sā kanyā cāruvāsinī | vijajṛmbhe mahābhāgā smayamānā punaḥ punaḥ

उन्हें अपनी ओर देखते जानकर सुन्दर वस्त्रों वाली उस महाभागा कन्या ने बार-बार मुसकराते हुए जम्हाई ली।

श्लोक 43 (12.205.43)

तस्मात्समभवद्वक्रात्पुरुषाकृतिसंयुतः । रत्नविन्दुचिताङ्गस्तु सर्वाभरणभूषितः ॥

tasmātsamabhavadvakrātpuruṣākṛtisaṃyutaḥ | ratnavinducitāṅgastu sarvābharaṇabhūṣitaḥ

उसके मुख से एक पुरुषाकार प्राणी प्रकट हुआ, जिसके अंग रत्नों की बूँदों से जड़े थे और जो सब आभूषणों से सजा था;

श्लोक 44 (12.205.44)

आदित्यसदृशाकारः शिरसा धारयन्मणिम् । पुनरेव तदाकारसदृशः समजायत ॥

ādityasadṛśākāraḥ śirasā dhārayanmaṇim | punareva tadākārasadṛśaḥ samajāyata

वह सूर्य के समान आकार वाला था और सिर पर मणि धारण किए था; फिर उसी रूप का एक और उत्पन्न हुआ।

श्लोक 45 (12.205.45)

तृतीयस्तु महाराज विविधाभरणैर्युतः । प्रदक्षिणं तु तां कृत्वा विविधध्वनयस्तु ताम् ॥

tṛtīyastu mahārāja vividhābharaṇairyutaḥ | pradakṣiṇaṃ tu tāṃ kṛtvā vividhadhvanayastu tām

हे महाराज, और तीसरा भी, जो अनेक आभूषणों से युक्त था; उसे दाहिनी ओर रखकर प्रदक्षिणा करके उन्होंने उसके सामने नाना प्रकार की ध्वनियाँ कीं।

श्लोक 46 (12.205.46)

ततः सर्वेण विप्रर्षिः कन्यां पप्रच्छ तां शुभाम् ॥

tataḥ sarveṇa viprarṣiḥ kanyāṃ papraccha tāṃ śubhām

तब उन ब्रह्मर्षि ने उस शुभ कन्या से पूछा:

नारद उवाच

श्लोक 47 (12.205.47)

का त्वं परमकल्याणि पद्मेन्दुसदृशानने । न जाने त्वां महादेवि ब्रूहि सत्यमनिन्दिते ॥

kā tvaṃ paramakalyāṇi padmendusadṛśānane | na jāne tvāṃ mahādevi brūhi satyamanindite

"हे परम कल्याणी, कमल और चन्द्रमा के समान मुख वाली, तुम कौन हो? हे महादेवी, मैं तुम्हें नहीं जानता; हे निर्दोषे, सच बताओ।"

कन्योवाच

श्लोक 48 (12.205.48)

सावित्री नाम विप्रर्षे शृणु भद्रं तवास्तु वै । किं करिष्यामि तद्ब्रूहि तव यच्चेतसि स्थितम् ॥

sāvitrī nāma viprarṣe śṛṇu bhadraṃ tavāstu vai | kiṃ kariṣyāmi tadbrūhi tava yaccetasi sthitam

"हे ब्रह्मर्षि, मेरा नाम सावित्री है। सुनिए, आपका कल्याण हो। मैं क्या करूँ? आपके मन में जो हो, वह कहिए।"

नारद उवाच

श्लोक 49 (12.205.49)

अभिवादये त्वां सावित्रि कृतार्थोऽहमनिन्दिते । एतं मे संशयं देवि वक्तुमर्हसि शोभने ॥

abhivādaye tvāṃ sāvitri kṛtārtho'hamanindite | etaṃ me saṃśayaṃ devi vaktumarhasi śobhane

"हे सावित्री, मैं आपको प्रणाम करता हूँ; हे निर्दोषे, मैं कृतार्थ हो गया। हे देवि, हे शोभने, मेरा यह संशय आप दूर करें।

श्लोक 50 (12.205.50)

यस्तु वै प्रथमोत्पन्नः कोऽसौ स पुरुषाकृतिः । बिन्दवस्तु महादेवि मूर्ध्नि ज्योतिर्मयाकृतिः ॥

yastu vai prathamotpannaḥ ko'sau sa puruṣākṛtiḥ | bindavastu mahādevi mūrdhni jyotirmayākṛtiḥ

जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ, वह पुरुषाकार कौन है? और हे महादेवि, उसके सिर पर जो ज्योतिर्मय बूँदें थीं, वे क्या हैं?"

कन्योवाच

श्लोक 51 (12.205.51)

अग्रजः प्रथमोत्पन्नो यजुर्वेदस्तथाऽपरः । तृतीयः सामवेदस्तु संशयो व्येतु ते मुने ॥

agrajaḥ prathamotpanno yajurvedastathā'paraḥ | tṛtīyaḥ sāmavedastu saṃśayo vyetu te mune

"जो प्रथम उत्पन्न हुआ, वह ज्येष्ठ है; दूसरा यजुर्वेद है और तीसरा सामवेद। हे मुने, आपका संशय दूर हो।

श्लोक 52 (12.205.52)

वेदाश्च बिन्दुसंयुक्ता यज्ञस्य फलसंश्रिताः । यत्तद्दृष्टं महज्ज्योतिर्ज्योतिरित्युच्यते बुधैः ॥

vedāśca bindusaṃyuktā yajñasya phalasaṃśritāḥ | yattaddṛṣṭaṃ mahajjyotirjyotirityucyate budhaiḥ

वेद बूँदों से युक्त हैं और यज्ञ के फल पर आश्रित हैं। जो महान् ज्योति आपने देखी, उसी को ज्ञानी लोग ज्योति कहते हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 53 (12.205.53)

ऋषे ज्ञेयं मया चाऽपीत्युक्त्वा चान्तरधीयत । ततः स विस्मयाविष्टो नारदः पुरुषर्षभ । ध्यानयुक्तः स तु चिरं न बुबोध महामतिः ॥

ṛṣe jñeyaṃ mayā cā'pītyuktvā cāntaradhīyata | tataḥ sa vismayāviṣṭo nāradaḥ puruṣarṣabha | dhyānayuktaḥ sa tu ciraṃ na bubodha mahāmatiḥ

"हे ऋषि, मुझे भी जानना चाहिए" — यह कहकर वह अन्तर्धान हो गई। तब हे पुरुषश्रेष्ठ, विस्मय से भरे परम बुद्धिमान् नारद ध्यानमग्न होकर बहुत देर तक भी कुछ समझ न सके।

श्लोक 54 (12.205.54)

ततः स्नात्वा महातेजा वाग्यतो नियतेन्द्रियः । तुष्टाव पुरुषव्याघ्रो जिज्ञासुश्च तदद्भुतम् ॥

tataḥ snātvā mahātejā vāgyato niyatendriyaḥ | tuṣṭāva puruṣavyāghro jijñāsuśca tadadbhutam

तब स्नान करके महातेजस्वी पुरुषव्याघ्र नारद ने मौन रहकर और इन्द्रियों को वश में रखकर उस अद्भुत रहस्य को जानने की इच्छा से स्तुति की।

श्लोक 55 (12.205.55)

ततो वर्षशते पूर्णे भगवाँलोकभावनः । प्रादुश्चकार विश्वात्मा ऋषेः परमसौहृदात् ॥

tato varṣaśate pūrṇe bhagavām̐lokabhāvanaḥ | prāduścakāra viśvātmā ṛṣeḥ paramasauhṛdāt

तब सौ वर्ष पूरे होने पर लोकों को उत्पन्न करने वाले, विश्वात्मा भगवान् परम सौहार्द से ऋषि के सामने प्रकट हुए।

श्लोक 56 (12.205.56)

तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम् । अखिलामरमौल्यङ्गरुक्मारुणपदद्वयम् ॥

tamāgataṃ jagannāthaṃ sarvakāraṇakāraṇam | akhilāmaramaulyaṅgarukmāruṇapadadvayam

नारद ने उन्हें आया हुआ देखा, जो जगत् के स्वामी और सब कारणों के कारण थे, और जिनके दोनों चरण समस्त देवताओं के मुकुटों के स्वर्ण से लाल हो रहे थे;

श्लोक 57 (12.205.57)

वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् । पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ॥

vainateyapadasparśakiṇaśobhitajānukam | pītāmbaralasatkāñcīdāmabaddhakaṭītaṭam

जिनके घुटने गरुड़ के चरणों के स्पर्श के चिह्नों से शोभित थे, जिनकी कटि पीताम्बर और चमकती करधनी से बँधी थी;

श्लोक 58 (12.205.58)

श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम् । मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ॥

śrīvatsavakṣasaṃ cārumaṇikaustubhakandharam | mandasmitamukhāmbhojaṃ caladāyatalocanam

जिनके वक्ष पर श्रीवत्स और कण्ठ में सुन्दर कौस्तुभ मणि थी, जिनके कमल-जैसे मुख पर मन्द मुसकान थी और बड़े चंचल नेत्र थे;

श्लोक 59 (12.205.59)

नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् । नानारत्नमणीवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥

namracāpānukaraṇanamrabhrūyugaśobhitam | nānāratnamaṇīvajrasphuranmakarakuṇḍalam

जो झुके हुए धनुष की नाईं झुकी हुई दो भौंहों से शोभित थे, और जिनके मकराकार कुण्डल नाना रत्नों, मणियों और हीरों से जगमगा रहे थे;

श्लोक 60 (12.205.60)

इन्द्रनीलनिभासं तं केयूरमकुटोज्ज्वलम् । देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिसङ्घैरभिष्टुतम् ॥

indranīlanibhāsaṃ taṃ keyūramakuṭojjvalam | devairindrapurogaiśca ṛṣisaṅghairabhiṣṭutam

जिनकी आभा इन्द्रनीलमणि के समान थी, जो बाजूबन्द और मुकुट से दमक रहे थे, और इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषिसमूहों द्वारा जिनकी स्तुति हो रही थी।

श्लोक 61 (12.205.61)

नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् ॥

nārado jayaśabdena vavande śirasā harim

नारद ने जयघोष के साथ सिर झुकाकर हरि को प्रणाम किया।

श्लोक 62 (12.205.62)

ततः स भगवाञ्श्रीमान्मेघगम्भीरया गिरा । प्राहेशः सर्वभूतानां नारदं पतितं क्षितौ ॥

tataḥ sa bhagavāñśrīmānmeghagambhīrayā girā | prāheśaḥ sarvabhūtānāṃ nāradaṃ patitaṃ kṣitau

तब सब प्राणियों के स्वामी श्रीमान् भगवान् ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में भूमि पर पड़े नारद से कहा।

विष्णुरुवाच

श्लोक 63 (12.205.63)

भद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत । यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत् ॥

bhadramastu ṛṣe tubhyaṃ varaṃ varaya suvrata | yatte manasi suvyaktamasti ca pradadāmi tat

"हे ऋषि, तुम्हारा कल्याण हो; हे सुव्रत, वर माँगो। तुम्हारे मन में जो स्पष्ट है, वह मैं तुम्हें दूँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 64 (12.205.64)

स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनिः । प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥

sa cemaṃ jayaśabdena prasīdetyāturo muniḥ | provāca hṛdi saṃrūḍhaṃ śaṅkhacakragadādharam

तब उत्सुक मुनि ने जयघोष करके "प्रसन्न हों" कहते हुए हृदय में बसे हुए शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् से कहा।

नारद उवाच

श्लोक 65 (12.205.65)

विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाऽच्युत । तत्प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ॥

vivakṣitaṃ jagannātha mayā jñātaṃ tvayā'cyuta | tatprasīda hṛṣīkeśa śrotumicchāmi taddhare

"हे जगन्नाथ, मैं जो कहना चाहता था, उसे आप जान चुके हैं, हे अच्युत। इसलिए हे हृषीकेश, प्रसन्न हों; हे हरि, मैं वही सुनना चाहता हूँ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 66 (12.205.66)

ततः स्मयन्महाविष्णुरभ्यभाषत नारदम् । यद्दृष्टं मम रूपं तु वेदानां शिरसि त्वया ॥

tataḥ smayanmahāviṣṇurabhyabhāṣata nāradam | yaddṛṣṭaṃ mama rūpaṃ tu vedānāṃ śirasi tvayā

तब मुसकराते हुए महाविष्णु ने नारद से कहा: "मेरा जो रूप तुमने वेदों के शिखर पर देखा —

विष्णुरुवाच

श्लोक 67 (12.205.67)

निर्द्वन्द्वा निरहंकाराः शुचयः शुद्धलोचनाः । तं मां पश्यन्ति सततं तान्पृच्छ यदिहेच्छसि ॥

nirdvandvā nirahaṃkārāḥ śucayaḥ śuddhalocanāḥ | taṃ māṃ paśyanti satataṃ tānpṛccha yadihecchasi

जो द्वन्द्वों और अहंकार से रहित, पवित्र और शुद्ध दृष्टि वाले हैं, वे मुझे सदा उसी रूप में देखते हैं। यहाँ जो जानना चाहो, उनसे पूछो।

श्लोक 68 (12.205.68)

ये योगिनो महाप्राज्ञा मदंशा ये व्यवस्थिताः । तेषां प्रसादं देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ॥

ye yogino mahāprājñā madaṃśā ye vyavasthitāḥ | teṣāṃ prasādaṃ devarṣe matprasādamavaihi tat

जो महाप्राज्ञ योगी मेरे अंश-रूप में स्थित हैं, उनकी कृपा को मेरी ही कृपा जानो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 69 (12.205.69)

इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान्भूतभावनः । तस्माद्व्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ॥

ityuktvā sa jagāmātha bhagavānbhūtabhāvanaḥ | tasmādvraja hṛṣīkeśaṃ kṛṣṇaṃ devakinandanam

यह कहकर भूतों के रचयिता भगवान् चले गए। इसलिए तुम देवकीनन्दन हृषीकेश कृष्ण की शरण में जाओ।

श्लोक 70 (12.205.70)

एतमाराध्य गोविन्दं गता मुक्तिं महर्षयः । एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ॥

etamārādhya govindaṃ gatā muktiṃ maharṣayaḥ | eṣa kartā vikartā ca sarvakāraṇakāraṇam

इन्हीं गोविन्द की आराधना करके महर्षि मुक्ति को प्राप्त हुए। ये ही कर्ता और विकर्ता हैं, सब कारणों के कारण हैं।

श्लोक 71 (12.205.71)

मयाऽप्येतच्छ्रुतं राजन्नारदात्तु निबोध तत् । स्वयमेव समाचष्ट नारदो भगवान्मुनिः ॥

mayā'pyetacchrutaṃ rājannāradāttu nibodha tat | svayameva samācaṣṭa nārado bhagavānmuniḥ

हे राजन्, मैंने भी यह नारद से सुना है; अब इसे सुनो। भगवान् नारद मुनि ने स्वयं इसे कहा था।

श्लोक 72 (12.205.72)

समस्तसंसारविघातकारणं । भजन्ति ये विष्णुमनन्यमानसाः । ते यान्ति सायुज्यमतीव दुर्लभ । मितीव नित्यं हृदि वर्णयन्ति ॥

samastasaṃsāravighātakāraṇaṃ | bhajanti ye viṣṇumananyamānasāḥ | te yānti sāyujyamatīva durlabha | mitīva nityaṃ hṛdi varṇayanti

जो लोग समस्त संसार का नाश करने वाले कारण विष्णु की अनन्य मन से भक्ति करते हैं, वे अत्यन्त दुर्लभ सायुज्य को पाते हैं — मानो ऐसा ही वे सदा अपने हृदय में कहते रहते हैं।

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206