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शान्ति पर्व · अध्याय 204

ब्रह्म, वासुदेव और गुणों से परे के विषय में मनु का उपदेश

भीष्म बृहस्पति को दिए गए मनु के उपदेश का वर्णन पूरा करते हैं। मनु कहते हैं कि परम तत्त्व का पूरा वर्णन नहीं हो सकता, वह अनेक नामों से जाना जाता है और 'वासुदेव' नाम से विख्यात है; मणियों में पिरोए धागे की तरह वह सब प्रकार के प्राणियों में व्याप्त है, और प्रत्येक प्राणी अपने शरीर में अपने कर्मों का फल भोगता है। वे पृथ्वी से लेकर मन, बुद्धि और काल तक का क्रम बताकर विष्णु तक पहुँचते हैं, ब्रह्म को अनादि और शरीर पर आश्रित वैदिक मन्त्रों से परे बताते हैं, और सिखाते हैं कि बुद्धि, मन और इन्द्रियों को शुद्ध करने से मुनि निर्गुण, अविनाशी ब्रह्म में प्रवेश करता है।

अध्याय 203अध्याय-सूचीअध्याय 205

मनुरुवाच

श्लोक 1 (12.204.1)

तदेव सततं मन्ये न शक्यमनुवर्णितुम् । यथा निदर्शनं वस्तु न शक्यमनुबोधितुम् ॥

tadeva satataṃ manye na śakyamanuvarṇitum | yathā nidarśanaṃ vastu na śakyamanubodhitum

उसी को मैं नित्य मानता हूँ, परन्तु उसका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता; जैसे केवल दृष्टान्त से कोई वस्तु समझाई नहीं जा सकती।

श्लोक 2 (12.204.2)

यथाहि सारं जानाति न कथंचन संस्थितम् । परकायच्छविस्तद्वद्देहेऽयं चेतनस्तथा ॥

yathāhi sāraṃ jānāti na kathaṃcana saṃsthitam | parakāyacchavistadvaddehe'yaṃ cetanastathā

जैसे दूसरे के शरीर की कान्ति के समान स्थित वस्तु के सार को कोई किसी प्रकार नहीं जान पाता, वैसे ही इस शरीर में यह चेतन आत्मा है।

श्लोक 3 (12.204.3)

विना कायं न सा च्छाया तां विना कायमस्त्युत । तद्वदेव विना नास्ति प्रकृतेरिह वर्तनम् ॥

vinā kāyaṃ na sā cchāyā tāṃ vinā kāyamastyuta | tadvadeva vinā nāsti prakṛteriha vartanam

शरीर के बिना छाया नहीं होती, परन्तु छाया के बिना शरीर रह सकता है; इसी प्रकार उसके बिना इस संसार में प्रकृति की कोई प्रवृत्ति नहीं होती।

श्लोक 4 (12.204.4)

इदं वै नास्ति नेदमस्ति परं विना । जीवात्मना त्वसौ छिन्नस्त्वेष चैव परात्मना ॥

idaṃ vai nāsti nedamasti paraṃ vinā | jīvātmanā tvasau chinnastveṣa caiva parātmanā

यह निश्चय ही अपने आप नहीं है, और परम तत्त्व के बिना भी नहीं है। जीवात्मा के रूप में यह विभक्त-सा है, और यही परमात्मा के रूप में भी है।

श्लोक 5 (12.204.5)

तत्तथेति विदुः केचिदतथ्यमिति चापरे । उभयं मे मतं विद्वन्मुक्तिहेतौ समाहितम् ॥

tattatheti viduḥ kecidatathyamiti cāpare | ubhayaṃ me mataṃ vidvanmuktihetau samāhitam

कुछ लोग उसे 'ऐसा ही है' जानते हैं और दूसरे 'ऐसा नहीं है'। हे विद्वन्, मेरा मत है कि दोनों ही मुक्ति के हेतु में समाविष्ट हैं।

श्लोक 6 (12.204.6)

विमुक्तैश्च मृगः सोऽपि दृश्यते संयतेन्द्रियः । सर्वेषां न हि दृश्यो हि तटिद्वत्स्फुरति ह्यसौ ॥

vimuktaiśca mṛgaḥ so'pi dṛśyate saṃyatendriyaḥ | sarveṣāṃ na hi dṛśyo hi taṭidvatsphurati hyasau

वह खोजा जाने वाला परम तत्त्व इन्द्रियों को वश में रखने वाले मुक्त पुरुषों को ही दिखाई देता है; सबको नहीं दिखता, वह बिजली की तरह कौंधता है।

श्लोक 7 (12.204.7)

ब्राह्मणस्य समादृश्यो वर्तते सोऽपि किं पुनः । विद्यते परमः शुद्धः साक्षिभूतो विभावसुः ॥

brāhmaṇasya samādṛśyo vartate so'pi kiṃ punaḥ | vidyate paramaḥ śuddhaḥ sākṣibhūto vibhāvasuḥ

वह ब्राह्मण को भी भली-भाँति दिखाई देने योग्य है - इससे अधिक और क्या कहा जाए? वह परम, शुद्ध, साक्षी-स्वरूप, तेजोमय सत्ता विद्यमान है।

श्लोक 8 (12.204.8)

श्रुतिरेषा ततो नित्या तस्मादेकः परो मतः । न प्रयोजनमुद्दिश्य चेष्टा तस्य महात्मनः ॥

śrutireṣā tato nityā tasmādekaḥ paro mataḥ | na prayojanamuddiśya ceṣṭā tasya mahātmanaḥ

यह श्रुति है, इसलिए नित्य है; अतः एक ही परम तत्त्व माना गया है। उस महात्मा की चेष्टा किसी प्रयोजन को लक्ष्य करके नहीं होती।

श्लोक 9 (12.204.9)

तादृशोऽस्त्विति मन्तव्यस्तथा सत्यं महात्मना । नानासंस्थेन भेदेन सदा गतिविभेदवत् । तस्य भेदः समाख्यातो भेदो ह्यस्ति तथाविधः ॥

tādṛśo'stviti mantavyastathā satyaṃ mahātmanā | nānāsaṃsthena bhedena sadā gativibhedavat | tasya bhedaḥ samākhyāto bhedo hyasti tathāvidhaḥ

महात्माओं के लिए वह वैसा ही मानने योग्य है, और सचमुच वैसा ही है। अनेक अवस्थाओं और भेदों के द्वारा, भिन्न-भिन्न गतियों के समान, उसका भेद बताया गया है; क्योंकि इस प्रकार का भेद वस्तुतः है।

श्लोक 10 (12.204.10)

एवं विद्वन्विजानीहि परमात्मानमव्ययम् । तत्तद्गुणविशेषेण संज्ञानामनुसंयुतम् ॥

evaṃ vidvanvijānīhi paramātmānamavyayam | tattadguṇaviśeṣeṇa saṃjñānāmanusaṃyutam

हे विद्वन्, इस प्रकार अविनाशी परमात्मा को जानो, जो भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार अनेक नामों से जुड़ा हुआ है।

श्लोक 11 (12.204.11)

सर्वेश्वरः सर्वमयः स च सर्वप्रवर्तकः । सर्वात्मकः सर्वशक्तिः सर्वकारणकारणम् ॥

sarveśvaraḥ sarvamayaḥ sa ca sarvapravartakaḥ | sarvātmakaḥ sarvaśaktiḥ sarvakāraṇakāraṇam

वह सबका ईश्वर, सर्वमय और सबको प्रवृत्त करने वाला है; वह सबका आत्मा, सर्वशक्तिमान् और सब कारणों का भी कारण है।

श्लोक 12 (12.204.12)

सर्वसाधारणः सर्वैरुपास्यश्च महात्मभिः । वासुदेवेति विख्यातस्तं विदित्वाऽश्नुतेऽमृतम् ॥

sarvasādhāraṇaḥ sarvairupāsyaśca mahātmabhiḥ | vāsudeveti vikhyātastaṃ viditvā'śnute'mṛtam

वह सबके लिए समान है और सभी महात्माओं का उपास्य है; 'वासुदेव' नाम से विख्यात उसे जानकर मनुष्य अमृतत्व प्राप्त करता है।

श्लोक 13 (12.204.13)

यदा ते पञ्चभिः पञ्च युक्तानि मनसा सह । अथ तद्द्रक्ष्यते ब्रह्म मणौ सूत्रमिवार्पितम् ॥

yadā te pañcabhiḥ pañca yuktāni manasā saha | atha taddrakṣyate brahma maṇau sūtramivārpitam

जब तुम्हारे पाँच पाँचों के साथ, मन सहित, संयुक्त हो जाएँगे, तब मणि में पिरोए धागे के समान उस ब्रह्म का दर्शन होगा।

श्लोक 14 (12.204.14)

तदेव च यथा सूत्रं सुवर्णे वर्तते पुनः । मुक्तास्वथ प्रवालेषु मृन्मये राजते तथा ॥

tadeva ca yathā sūtraṃ suvarṇe vartate punaḥ | muktāsvatha pravāleṣu mṛnmaye rājate tathā

वही धागा फिर सोने में, मोतियों में, मूँगों में, मिट्टी की वस्तुओं में और चाँदी में भी पिरोया रहता है।

श्लोक 15 (12.204.15)

तद्वद्गोऽश्वमनुष्येषु तद्वद्धस्तिमृगादिषु । तद्वत्कीटपतङ्गेषु प्रसक्तात्मा स्वकर्मभिः ॥

tadvadgo'śvamanuṣyeṣu tadvaddhastimṛgādiṣu | tadvatkīṭapataṅgeṣu prasaktātmā svakarmabhiḥ

वैसे ही गायों, घोड़ों और मनुष्यों में, वैसे ही हाथियों और मृगों आदि में, और वैसे ही कीड़ों और पतंगों में भी वह अपने कर्मों से आसक्त हुआ आत्मा विद्यमान है।

श्लोक 16 (12.204.16)

येनयेन शरीरेण यद्यत्कर्म करोत्ययम् । तेनतेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥

yenayena śarīreṇa yadyatkarma karotyayam | tenatena śarīreṇa tattatphalamupāśnute

यह आत्मा जिस-जिस शरीर से जो-जो कर्म करता है, उसी-उसी शरीर से उस-उस कर्म का फल भोगता है।

श्लोक 17 (12.204.17)

यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी । तथा कर्मानुगा बुद्धिरन्तरात्माऽनुदर्शिनी ॥

yathā hyekarasā bhūmiroṣadhyarthānusāriṇī | tathā karmānugā buddhirantarātmā'nudarśinī

जैसे एक ही रस वाली भूमि प्रत्येक ओषधि के प्रयोजन के अनुसार ढल जाती है, वैसे ही बुद्धि कर्म के पीछे चलती है और अन्तरात्मा उसे देखने वाला साक्षी है।

श्लोक 18 (12.204.18)

ज्ञानपूर्वोद्भवा लिप्सा लिप्सापूर्वाभिसन्धिता । अभिसन्धिपूर्वकं कर्म कर्ममूलं ततः फलम् ॥

jñānapūrvodbhavā lipsā lipsāpūrvābhisandhitā | abhisandhipūrvakaṃ karma karmamūlaṃ tataḥ phalam

ज्ञान के साथ इच्छा उत्पन्न होती है, इच्छा के बाद संकल्प होता है, संकल्प के बाद कर्म होता है, और फल की जड़ कर्म है।

श्लोक 19 (12.204.19)

फलं कर्मात्मकं विद्यात्कर्म ज्ञेयात्मकं तथा । ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् ॥

phalaṃ karmātmakaṃ vidyātkarma jñeyātmakaṃ tathā | jñeyaṃ jñānātmakaṃ vidyājjñānaṃ sadasadātmakam

फल को कर्मरूप जानो, कर्म को ज्ञेयरूप, ज्ञेय को ज्ञानरूप, और ज्ञान को सत् तथा असत् दोनों के स्वरूप वाला जानो।

श्लोक 20 (12.204.20)

तदेवमिष्यते ब्रह्म संख्यानाद्विनिभिद्यते । ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेयानां कर्मणां तथा । क्षयान्ते यत्फलं विद्याज्ज्ञानं ज्ञेयप्रतिष्ठितम् ॥

tadevamiṣyate brahma saṃkhyānādvinibhidyate | jñānānāṃ ca phalānāṃ ca jñeyānāṃ karmaṇāṃ tathā | kṣayānte yatphalaṃ vidyājjñānaṃ jñeyapratiṣṭhitam

इस प्रकार ब्रह्म माना जाता है; वह गणना (सांख्य) के विश्लेषण से अलग-अलग समझा जाता है। ज्ञानों, फलों, ज्ञेयों और कर्मों के क्षय के अन्त में जो फल जानना चाहिए, वह ज्ञेय में प्रतिष्ठित ज्ञान है।

श्लोक 21 (12.204.21)

महद्धि परमं भूतं युक्ताः पश्यन्ति योगिनः । अबुधास्तं न पश्यन्ति ह्यात्मस्थं गुणबुद्धयः ॥

mahaddhi paramaṃ bhūtaṃ yuktāḥ paśyanti yoginaḥ | abudhāstaṃ na paśyanti hyātmasthaṃ guṇabuddhayaḥ

योगी, जो समाहित हैं, उस महान् परम तत्त्व को देखते हैं; गुणों में बुद्धि लगाए रहने वाले अज्ञानी आत्मा में स्थित उसे नहीं देखते।

श्लोक 22 (12.204.22)

पृथिवीरूपतो रूपमपामिह महत्तरम् । अद्भ्यो महत्तरं तेजस्तेजसः पवनो महान् ॥

pṛthivīrūpato rūpamapāmiha mahattaram | adbhyo mahattaraṃ tejastejasaḥ pavano mahān

पृथ्वी के रूप से यहाँ जल का रूप अधिक महान् है; जल से अग्नि महान् है और अग्नि से वायु महान् है।

श्लोक 23 (12.204.23)

पवनाच्च महद्व्योम तस्मात्परतरं मनः । मनसो महती बुद्धिर्बुद्धेः कालो महान्स्मृतः ॥

pavanācca mahadvyoma tasmātparataraṃ manaḥ | manaso mahatī buddhirbuddheḥ kālo mahānsmṛtaḥ

वायु से आकाश महान् है, उससे परे मन है; मन से बुद्धि महान् है और बुद्धि से काल महान् कहा गया है।

श्लोक 24 (12.204.24)

कालात्स भगवान्विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत् । नादिर्न मध्यं नैवान्तस्तस्य देवस्य विद्यते ॥

kālātsa bhagavānviṣṇuryasya sarvamidaṃ jagat | nādirna madhyaṃ naivāntastasya devasya vidyate

काल से परे भगवान् विष्णु हैं, जिनका यह सारा जगत् है; उन देव का न आदि है, न मध्य और न अन्त।

श्लोक 25 (12.204.25)

अनादित्वादमध्यत्वादनन्तत्वाच्च सोऽव्ययः । अत्येति सर्वदुःखानि दुःखं ह्यन्तवदुच्यते ॥

anāditvādamadhyatvādanantatvācca so'vyayaḥ | atyeti sarvaduḥkhāni duḥkhaṃ hyantavaducyate

आदि, मध्य और अन्त से रहित होने के कारण वह अविनाशी है; वह सब दुःखों के पार चला जाता है, क्योंकि दुःख को ही अन्त वाला कहा जाता है।

श्लोक 26 (12.204.26)

तद्ब्रह्म परमं प्रोक्तं तद्धाम परमं पदम् । तद्गत्वा कालविषयाद्विमुक्ता मोक्षमाश्रिताः ॥

tadbrahma paramaṃ proktaṃ taddhāma paramaṃ padam | tadgatvā kālaviṣayādvimuktā mokṣamāśritāḥ

उसी को परम ब्रह्म कहा गया है, वही परम धाम और परम पद है; उसे प्राप्त होकर काल के क्षेत्र से मुक्त हुए लोग मोक्ष का आश्रय पा चुके हैं।

श्लोक 27 (12.204.27)

गुणेष्वेते प्रकाशन्ते निर्गुणत्वात्ततः परम् । निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽनन्त्याय कल्पते ॥

guṇeṣvete prakāśante nirguṇatvāttataḥ param | nivṛttilakṣaṇo dharmastathā''nantyāya kalpate

ये सब गुणों में ही प्रकाशित होते हैं; निर्गुण होने के कारण परम तत्त्व उनसे परे है। निवृत्ति के लक्षण वाला धर्म अनन्त की प्राप्ति के योग्य बनाता है।

श्लोक 28 (12.204.28)

ऋचो यजूंषि सामानि शरीराणि व्यपाश्रिताः । जिह्वाग्रेषु प्रवर्तन्ते यत्नसाध्याविनाशिनः ॥

ṛco yajūṃṣi sāmāni śarīrāṇi vyapāśritāḥ | jihvāgreṣu pravartante yatnasādhyāvināśinaḥ

ऋचाएँ, यजुष् और साम शरीरों के आश्रित हैं; वे जिह्वा के अग्रभाग पर चलते हैं, प्रयत्न से सिद्ध होने वाले और नाशवान् हैं।

श्लोक 29 (12.204.29)

न चैवमिष्यते ब्रह्म शरीराश्रयसंभवम् । न यत्नसाध्यं तद्ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवन् ॥

na caivamiṣyate brahma śarīrāśrayasaṃbhavam | na yatnasādhyaṃ tadbrahma nādimadhyaṃ na cāntavan

ब्रह्म शरीर के आश्रय से उत्पन्न होने वाला नहीं माना जाता; वह ब्रह्म प्रयत्न से सिद्ध नहीं होता, न उसका आदि या मध्य है और न अन्त।

श्लोक 30 (12.204.30)

ऋचामादिस्तथा साम्नां यजुषामादिरुच्यते । अन्तश्चादिमतां दृष्टो न त्वादिर्ब्रह्मणः स्मृतः ॥

ṛcāmādistathā sāmnāṃ yajuṣāmādirucyate | antaścādimatāṃ dṛṣṭo na tvādirbrahmaṇaḥ smṛtaḥ

ऋचाओं का आदि कहा गया है, सामों का भी और यजुषों का भी; जिनका आदि है उनका अन्त देखा गया है, परन्तु ब्रह्म का आदि नहीं माना गया।

श्लोक 31 (12.204.31)

अनादित्वादनन्तत्वात्तदनन्तमथाव्ययम् । अव्ययत्वाच्च निर्दुःखं द्वन्द्वाभावस्ततः परम् ॥

anāditvādanantatvāttadanantamathāvyayam | avyayatvācca nirduḥkhaṃ dvandvābhāvastataḥ param

आदि और अन्त से रहित होने के कारण वह अनन्त और अविनाशी है; अविनाशी होने से दुःख से रहित है; और उससे आगे द्वन्द्वों का अभाव है।

श्लोक 32 (12.204.32)

अदृष्टतोऽनुपायाच्च प्रतिसन्धेश्च कर्मणः । न तेन मर्त्याः पश्यन्ति येन गच्छन्ति तत्पदम् ॥

adṛṣṭato'nupāyācca pratisandheśca karmaṇaḥ | na tena martyāḥ paśyanti yena gacchanti tatpadam

अदृश्य होने से, उपाय के अभाव से और कर्म के पुनः जुड़ जाने से, मरणशील लोग उसके द्वारा नहीं देखते जिसके द्वारा उस पद तक जाया जाता है।

श्लोक 33 (12.204.33)

विषयेषु च संसर्गाच्छाश्वतस्य च संशयात् । मनसा चान्यदाकाङ्क्षन्परं न प्रतिपद्यते ॥

viṣayeṣu ca saṃsargācchāśvatasya ca saṃśayāt | manasā cānyadākāṅkṣanparaṃ na pratipadyate

विषयों में आसक्ति से, शाश्वत के विषय में संशय से और मन से किसी दूसरी वस्तु की कामना करने से मनुष्य परम को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 34 (12.204.34)

गुणान्यदिह पश्यन्ति तदिच्छन्त्यपरे जनाः । परं नैवाभिकाङ्क्षन्ति निर्गुणत्वाद्गुणार्थिनः ॥

guṇānyadiha paśyanti tadicchantyapare janāḥ | paraṃ naivābhikāṅkṣanti nirguṇatvādguṇārthinaḥ

यहाँ जिन्हें लोग गुण रूप में देखते हैं, उन्हीं को दूसरे लोग चाहते हैं; गुणों के अभिलाषी परम की आकांक्षा नहीं करते, क्योंकि वह निर्गुण है।

श्लोक 35 (12.204.35)

गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्तः कथं विद्याद्गुणानिमान् । अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवयवैः परम् ॥

guṇairyastvavarairyuktaḥ kathaṃ vidyādguṇānimān | anumānāddhi gantavyaṃ guṇairavayavaiḥ param

जो निम्न गुणों से बँधा है, वह इन गुणों को कैसे जान सकता है? परम तक अनुमान से, उसके अंगभूत गुणों के द्वारा, पहुँचना चाहिए।

श्लोक 36 (12.204.36)

सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः । मनो हि मनसा ग्राह्यं दर्शनेन च दर्शनम् ॥

sūkṣmeṇa manasā vidmo vācā vaktuṃ na śaknumaḥ | mano hi manasā grāhyaṃ darśanena ca darśanam

हम सूक्ष्म मन से उसे जानते हैं, पर वाणी से कह नहीं सकते; मन को मन से ही पकड़ा जा सकता है और दर्शन को दर्शन से।

श्लोक 37 (12.204.37)

ज्ञानेन निर्मलीकृत्य बुद्धिं बुद्ध्या मनस्तथा । मनसा चेन्द्रियग्राममक्षरं प्रतिपद्यते ॥

jñānena nirmalīkṛtya buddhiṃ buddhyā manastathā | manasā cendriyagrāmamakṣaraṃ pratipadyate

ज्ञान से बुद्धि को निर्मल करके, फिर बुद्धि से मन को, और मन से इन्द्रियों के समूह को शुद्ध करके मनुष्य अविनाशी को प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (12.204.38)

बुद्धिप्रहीणो मनसा समृद्ध । स्तथाऽनिराशीर्गुणतामुपैति । परं त्यजन्तीह विलोभ्यमाना । हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ॥

buddhiprahīṇo manasā samṛddha | stathā'nirāśīrguṇatāmupaiti | paraṃ tyajantīha vilobhyamānā | hutāśanaṃ vāyurivendhanastham

जिसकी बुद्धि नष्ट हो गई है पर जो मन से समृद्ध है, और इसलिए आशा से मुक्त नहीं है, वह गुणों की अवस्था में जा पड़ता है। प्रलोभन में पड़े लोग परम को वैसे ही छोड़ देते हैं जैसे वायु ईंधन में स्थित अग्नि को छोड़ देती है।

श्लोक 39 (12.204.39)

गुणादाने विप्रयोगे च तेषां । मनः सदा विद्धि परावराभ्याम् । अनेनैव विधिना संप्रवृत्तो । गुणादाने ब्रह्म शरीरमेति ॥

guṇādāne viprayoge ca teṣāṃ | manaḥ sadā viddhi parāvarābhyām | anenaiva vidhinā saṃpravṛtto | guṇādāne brahma śarīrameti

गुणों को ग्रहण करने में और उनसे अलग होने में सदा मन को परा और अपरा के द्वारा कार्य करने वाला जानो। इसी विधि से प्रवृत्त होकर, गुणों के ग्रहण में ब्रह्म शरीर को प्राप्त होता है।

श्लोक 40 (12.204.40)

अव्यक्तात्मा पुरुषोऽव्यक्तकर्मा । सोऽव्यक्तत्वं गच्छति ह्यन्तकाले । तैरेवायं चेन्द्रियैर्वर्धमानै । र्ग्लायद्भिर्वा वर्ततेऽकामरूपः ॥

avyaktātmā puruṣo'vyaktakarmā | so'vyaktatvaṃ gacchati hyantakāle | tairevāyaṃ cendriyairvardhamānai | rglāyadbhirvā vartate'kāmarūpaḥ

जिसका आत्मा और कर्म अव्यक्त हैं, वह पुरुष अन्तकाल में अव्यक्त अवस्था को प्राप्त होता है; इन्हीं इन्द्रियों के बढ़ते या क्षीण होते रहने पर भी यह निष्काम स्वरूप में स्थित रहता है।

श्लोक 41 (12.204.41)

सर्वैरयं चेन्द्रियैः संप्रयुक्तो । देहं प्राप्तः पञ्चभूताश्रयः स्यात् । न सामर्थ्याद्गच्छति कर्मणेह । हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ॥

sarvairayaṃ cendriyaiḥ saṃprayukto | dehaṃ prāptaḥ pañcabhūtāśrayaḥ syāt | na sāmarthyādgacchati karmaṇeha | hīnastena parameṇāvyayena

सब इन्द्रियों से युक्त होकर इसने पाँच भूतों पर आश्रित देह पाई है। यहाँ कर्म के द्वारा वह अपने बल से वहाँ नहीं पहुँचता; वह उस परम अविनाशी तत्त्व से वंचित रहता है।

श्लोक 42 (12.204.42)

पृथ्व्या नरः पश्यति नान्तमस्या । ह्यन्तश्चास्या भविता चेति विद्धि । परं न यातीह विलोभ्यमानो । यथा प्लवं वायुरिवार्णवस्थम् ॥

pṛthvyā naraḥ paśyati nāntamasyā | hyantaścāsyā bhavitā ceti viddhi | paraṃ na yātīha vilobhyamāno | yathā plavaṃ vāyurivārṇavastham

मनुष्य इस पृथ्वी का अन्त नहीं देखता, फिर भी जान लो कि इसका अन्त होगा। प्रलोभन में पड़ा हुआ वह यहाँ परम को नहीं पाता, जैसे समुद्र में वायु के वश में पड़ी नाव।

श्लोक 43 (12.204.43)

दिवाकरो गुणमुपलभ्य निर्गुणो । यथा भवेदपगतरश्मिमण्डलः । तथा ह्यसौ मुनिरिह निर्विशेषवान् । स निर्गुणं प्रविशति ब्रह्म चाव्ययम् ॥

divākaro guṇamupalabhya nirguṇo | yathā bhavedapagataraśmimaṇḍalaḥ | tathā hyasau muniriha nirviśeṣavān | sa nirguṇaṃ praviśati brahma cāvyayam

जैसे सूर्य अपने गुण को ग्रहण करके, किरणों का मण्डल हट जाने पर निर्गुण-सा हो जाता है, वैसे ही यह मुनि यहाँ सब भेदों से रहित होकर निर्गुण और अविनाशी ब्रह्म में प्रवेश करता है।

श्लोक 44 (12.204.44)

अनागतं सुकृतवतां परां गतिं । स्वयंभुवं प्रभवनिधानमव्ययम् । सनातनं यदमृतमव्ययं ध्रुवं । निचाय्य तत्परममृतत्वमश्नुते ॥

anāgataṃ sukṛtavatāṃ parāṃ gatiṃ | svayaṃbhuvaṃ prabhavanidhānamavyayam | sanātanaṃ yadamṛtamavyayaṃ dhruvaṃ | nicāyya tatparamamṛtatvamaśnute

जो अभी आने वाला है, सुकृतियों की परम गति, स्वयंभू, सब उत्पत्ति का मूल और आधार, अविनाशी, सनातन, अमृत, अव्यय और ध्रुव है, उसे भलीभाँति देखकर मनुष्य उस परम अमृतत्व को प्राप्त होता है।

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