शान्ति पर्व · अध्याय 203
शोक, मन और निर्गुण ब्रह्म के मार्ग पर मनु का उपदेश
भीष्म युधिष्ठिर को वह उपदेश सुनाते हैं जो मनु ने बृहस्पति को दिया था। मनु पहले कहते हैं कि जिस दुःख का उपाय नहीं, उसका बार-बार चिन्तन नहीं करना चाहिए: मन का दुःख बुद्धि से और शरीर का दुःख औषधि से दूर होता है, और यौवन, रूप, धन तथा आरोग्य सब अनित्य हैं। फिर वे बताते हैं कि बुद्धि और मन भीतर की ओर खिंचकर तथा गुणों से छूटकर ब्रह्म को कैसे जानते हैं, और देहधारी प्रकृति से कैसे उत्पन्न होते और निवृत्ति से कैसे लौटते हैं।
मनुरुवाच
श्लोक 1 (12.203.1)
दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तं नानुचिन्तयेत् ॥
duḥkhopaghāte śārīre mānase cāpyupasthite | yasminna śakyate kartuṃ yatnastaṃ nānucintayet
जब शरीर या मन का कोई दुःख आ पड़े, तो जिसके विरुद्ध कोई प्रयत्न किया ही नहीं जा सकता, उसके बारे में बार-बार नहीं सोचना चाहिए।
श्लोक 2 (12.203.2)
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् । चिन्त्यमानं हि चाभ्येति भूयश्चापि प्रवर्तते ॥
bhaiṣajyametadduḥkhasya yadetannānucintayet | cintyamānaṃ hi cābhyeti bhūyaścāpi pravartate
दुःख की यही औषधि है कि उसका चिन्तन न किया जाए; क्योंकि जिस दुःख का चिन्तन किया जाता है, वह लौट आता है और फिर बढ़ने लगता है।
श्लोक 3 (12.203.3)
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥
prajñayā mānasaṃ duḥkhaṃ hanyācchārīramauṣadhaiḥ | etadvijñānasāmarthyaṃ na bālaiḥ samatāmiyāt
मन के दुःख को बुद्धि से और शरीर के दुःख को औषधियों से दूर करना चाहिए। यही विवेक का सामर्थ्य है; मनुष्य को कभी बालकों जैसा नहीं बनना चाहिए।
श्लोक 4 (12.203.4)
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः । आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥
anityaṃ yauvanaṃ rūpaṃ jīvitaṃ dravyasaṃcayaḥ | ārogyaṃ priyasaṃvāso gṛdhyettatra na paṇḍitaḥ
यौवन, रूप, जीवन, धन का संचय, आरोग्य और प्रियजनों का साथ - ये सब अनित्य हैं; इनमें विद्वान् पुरुष लोभ नहीं करता।
श्लोक 5 (12.203.5)
न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥
na jānapadikaṃ duḥkhamekaḥ śocitumarhati | aśocanpratikurvīta yadi paśyedupakramam
जो दुःख पूरे जनसमुदाय पर आया हो, उसके लिए अकेले किसी एक को शोक नहीं करना चाहिए। यदि कोई उपाय दिखाई दे, तो शोक किए बिना उसका प्रतिकार करना चाहिए।
श्लोक 6 (12.203.6)
सुखाद्बहुतरं दुःखं जीविते नास्ति संशयः । स्निग्धस्य चेन्द्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् ॥
sukhādbahutaraṃ duḥkhaṃ jīvite nāsti saṃśayaḥ | snigdhasya cendriyārtheṣu mohānmaraṇamapriyam
इसमें संदेह नहीं कि जीवन में सुख से अधिक दुःख है; और जो इन्द्रियों के विषयों में आसक्त है, उसे मोह के कारण मृत्यु अप्रिय लगती है।
श्लोक 7 (12.203.7)
परित्यजति यो दुःखं सुखं वाऽप्युभयं नरः । अभ्येति ब्रह्म सोऽत्यन्तं न ते शोचन्ति पण्डिताः ॥
parityajati yo duḥkhaṃ sukhaṃ vā'pyubhayaṃ naraḥ | abhyeti brahma so'tyantaṃ na te śocanti paṇḍitāḥ
जो मनुष्य दुःख और सुख, दोनों को त्याग देता है, वह पूर्णतः ब्रह्म को प्राप्त होता है; ऐसे ज्ञानी शोक नहीं करते।
श्लोक 8 (12.203.8)
दुःखमर्था हि युज्यन्ते पालने न च ते सुखम् । दुःखेन चाधिगम्यन्ते नाशमेषां न चिन्तयेत् ॥
duḥkhamarthā hi yujyante pālane na ca te sukham | duḥkhena cādhigamyante nāśameṣāṃ na cintayet
धन दुःख से जुड़ा है, उसकी रक्षा करने में सुख नहीं है, और वह भी दुःख उठाकर ही पाया जाता है; इसलिए उसके नाश की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 9 (12.203.9)
ज्ञानं ज्ञेयाभिर्निवृत्तं विद्धि ज्ञानगुणं मनः । प्रज्ञाकरणसंयुक्तं ततो बुद्धिः प्रवर्तते ॥
jñānaṃ jñeyābhirnivṛttaṃ viddhi jñānaguṇaṃ manaḥ | prajñākaraṇasaṃyuktaṃ tato buddhiḥ pravartate
जानो कि ज्ञान जानने योग्य विषयों के सम्बन्ध से बनता है और मन ज्ञान के गुण वाला है। जब मन विवेक के साधनों से युक्त होता है, तब उससे बुद्धि प्रकट होती है।
श्लोक 10 (12.203.10)
यदा कर्मगुणोपेता बुद्धिर्मनसि वर्तते । तदा प्रज्ञायते ब्रह्म ध्यानयोगसमाधिना ॥
yadā karmaguṇopetā buddhirmanasi vartate | tadā prajñāyate brahma dhyānayogasamādhinā
जब कर्मों के गुणों से युक्त बुद्धि मन में स्थित होती है, तब ध्यान, योग और समाधि के द्वारा ब्रह्म का बोध होता है।
श्लोक 11 (12.203.11)
सेयं गुणवती बुद्धिर्गुणेष्वेवाभिवर्तते । अपरादभिनिः स्रौति गिरेः शृङ्गादिवोदकम् ॥
seyaṃ guṇavatī buddhirguṇeṣvevābhivartate | aparādabhiniḥ srauti gireḥ śṛṅgādivodakam
गुणों से युक्त यह बुद्धि गुणों में ही विचरती है; वह किसी दूसरे स्रोत से वैसे ही फूट निकलती है, जैसे पर्वत की चोटी से जल।
श्लोक 12 (12.203.12)
यदा निर्गुणमाप्नोति ध्यानं मनसि पूर्वजम् । तदा प्रज्ञायते ब्रह्म निकषं निकषे यथा ॥
yadā nirguṇamāpnoti dhyānaṃ manasi pūrvajam | tadā prajñāyate brahma nikaṣaṃ nikaṣe yathā
जब मन में पहले उत्पन्न हुआ निर्गुण ध्यान प्राप्त होता है, तब ब्रह्म वैसे ही जाना जाता है जैसे कसौटी पर सोना परखा जाता है।
श्लोक 13 (12.203.13)
मनस्त्वसंहृतं बुद्ध्या हीन्द्रियार्थनिदर्शकम् । न समर्थं गुणापेक्षि निर्गुणस्य निदर्शने ॥
manastvasaṃhṛtaṃ buddhyā hīndriyārthanidarśakam | na samarthaṃ guṇāpekṣi nirguṇasya nidarśane
परन्तु बुद्धि के द्वारा समेटा न गया मन केवल इन्द्रियों के विषय दिखाता है; वह गुणों की अपेक्षा रखता है, इसलिए निर्गुण का निर्देश करने में समर्थ नहीं है।
श्लोक 14 (12.203.14)
सर्वाण्येतानि संवार्य द्वाराणि मनसि स्थितः । मनस्येकाग्रतां कृत्वा तत्परं प्रतिपद्यते ॥
sarvāṇyetāni saṃvārya dvārāṇi manasi sthitaḥ | manasyekāgratāṃ kṛtvā tatparaṃ pratipadyate
इन सब द्वारों को रोककर मन में स्थित हुआ पुरुष, मन में ही मन को एकाग्र करके उस परम तत्त्व को प्राप्त होता है।
श्लोक 15 (12.203.15)
यथा महान्ति भूतानि निवर्तन्ते गुणक्षये । तथेन्द्रियाण्युपादाय बुद्धिर्मनसि वर्तते ॥
yathā mahānti bhūtāni nivartante guṇakṣaye | tathendriyāṇyupādāya buddhirmanasi vartate
जैसे गुणों के क्षीण होने पर महाभूत लौट जाते हैं, वैसे ही बुद्धि इन्द्रियों को लेकर मन में स्थित हो जाती है।
श्लोक 16 (12.203.16)
यदा मनसि सा बुद्धिर्वर्ततेऽन्तरचारिणी । व्यवसायगुणोपेता तदा संपद्यते मनः ॥
yadā manasi sā buddhirvartate'ntaracāriṇī | vyavasāyaguṇopetā tadā saṃpadyate manaḥ
जब भीतर विचरने वाली वह बुद्धि निश्चय के गुण से युक्त होकर मन में स्थित होती है, तब मन सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (12.203.17)
गुणवद्भिर्गुणोपेतं यदा ध्यानगतं मनः । तदा सर्वान्गुणान्हित्वा निर्गुणं प्रतिपद्यते ॥
guṇavadbhirguṇopetaṃ yadā dhyānagataṃ manaḥ | tadā sarvānguṇānhitvā nirguṇaṃ pratipadyate
जब गुणों से युक्त मन, गुणवान् इन्द्रियों के साथ, ध्यान में प्रविष्ट होता है, तब वह सब गुणों को छोड़कर निर्गुण को प्राप्त होता है।
श्लोक 18 (12.203.18)
अव्यक्तस्येह विज्ञाने नास्ति तुल्यं निदर्शनम् । यत्र नास्ति पदन्यासः कस्तं विषयमाप्नुयात् ॥
avyaktasyeha vijñāne nāsti tulyaṃ nidarśanam | yatra nāsti padanyāsaḥ kastaṃ viṣayamāpnuyāt
अव्यक्त को जानने के लिए यहाँ कोई समान दृष्टान्त नहीं है; जहाँ पग रखने की जगह ही नहीं, उस विषय तक कौन पहुँच सकता है?
श्लोक 19 (12.203.19)
तपसा चानुमानेन गुणैर्जात्या श्रुतेन च । निनीषेत्परमं ब्रह्म विशुद्धेनान्तरात्मना ॥
tapasā cānumānena guṇairjātyā śrutena ca | ninīṣetparamaṃ brahma viśuddhenāntarātmanā
तप, अनुमान, गुण, जन्म और शास्त्र-ज्ञान के द्वारा, शुद्ध अन्तरात्मा से, मनुष्य को परम ब्रह्म तक पहुँचने की इच्छा करनी चाहिए।
श्लोक 20 (12.203.20)
गुणहीनो हि तं मार्गं बहिः समनुवर्तते । गुणाभावात्प्रकृत्या वा निस्तर्क्यं ज्ञेयसंमितम् ॥
guṇahīno hi taṃ mārgaṃ bahiḥ samanuvartate | guṇābhāvātprakṛtyā vā nistarkyaṃ jñeyasaṃmitam
गुणहीन पुरुष उस मार्ग पर केवल बाहर-बाहर से चलता है। गुणों के अभाव से, अथवा अपने स्वभाव से ही, वह तर्क से परे है और केवल ज्ञेय के द्वारा ही उसका माप होता है।
श्लोक 21 (12.203.21)
नैर्गुण्याद्ब्रह्म चाप्नोति सगुणत्वान्निवर्तते । गुणप्रसारिणी बुद्धिर्हुताशन इवेन्धने ॥
nairguṇyādbrahma cāpnoti saguṇatvānnivartate | guṇaprasāriṇī buddhirhutāśana ivendhane
निर्गुण होने से मनुष्य ब्रह्म को पाता है और गुणयुक्त होने से लौट आता है। गुणों में फैलने वाली बुद्धि ईंधन में लगी अग्नि के समान है।
श्लोक 22 (12.203.22)
यदा पञ्च वियुक्तानि इन्द्रियाणि स्वकर्मभिः । तदा तत्परमं ब्रह्म संमुक्तं प्रकृतेः परम् ॥
yadā pañca viyuktāni indriyāṇi svakarmabhiḥ | tadā tatparamaṃ brahma saṃmuktaṃ prakṛteḥ param
जब पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने कर्मों से अलग हो जाती हैं, तब प्रकृति से परे वह परम ब्रह्म पूर्णतः मुक्त रूप में प्रकट होता है।
श्लोक 23 (12.203.23)
एवं प्रकृतितः सर्वे संभवन्ति शरीरिणः । निवर्तन्ते निवृत्तौ च स्वर्गे नैवोपयान्ति च ॥
evaṃ prakṛtitaḥ sarve saṃbhavanti śarīriṇaḥ | nivartante nivṛttau ca svarge naivopayānti ca
इस प्रकार सभी देहधारी प्रकृति से उत्पन्न होते हैं; निवृत्ति होने पर वे लौट जाते हैं और स्वर्ग को भी नहीं जाते।
श्लोक 24 (12.203.24)
पुरुषप्रकृतिर्बुद्धिर्विशेषाश्चेन्द्रियाणि च । अहंकारोऽभिमानश्च संभूतो भूतसंज्ञकः ॥
puruṣaprakṛtirbuddhirviśeṣāścendriyāṇi ca | ahaṃkāro'bhimānaśca saṃbhūto bhūtasaṃjñakaḥ
पुरुष, प्रकृति, बुद्धि, विशेष तत्त्व और इन्द्रियाँ, अहंकार और अभिमान - इनसे 'भूत' कहलाने वाला प्राणी उत्पन्न होता है।
श्लोक 25 (12.203.25)
एतस्याद्या प्रवृत्तिस्तु प्रधानात्संप्रवर्तते । द्वितीया मिथुनव्यक्तिमविशेषान्नियच्छति ॥
etasyādyā pravṛttistu pradhānātsaṃpravartate | dvitīyā mithunavyaktimaviśeṣānniyacchati
इसकी पहली प्रवृत्ति प्रधान (मूल प्रकृति) से होती है; दूसरी अविशिष्ट (अभेद) अवस्था से जोड़ों (मिथुन) की अभिव्यक्ति कराती है।
श्लोक 26 (12.203.26)
धर्मादुत्कृष्यते श्रेयस्तथा धर्मोऽप्यधर्मतः । रागवान्प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान्भवम् ॥
dharmādutkṛṣyate śreyastathā dharmo'pyadharmataḥ | rāgavānprakṛtiṃ hyeti virakto jñānavānbhavam
धर्म से श्रेय ऊपर उठता है, और वैसे ही अधर्म से भी धर्म ऊपर खिंचता है। आसक्त पुरुष प्रकृति को प्राप्त होता है; विरक्त ज्ञानी परम सत्ता (भव) को पाता है।