शान्ति पर्व · अध्याय 202
मनु का इन्द्रियों, मन और अव्यक्त पर उपदेश
मनु बृहस्पति को अपना उपदेश पूरा करते हैं। जैसे निर्मल जल में रूप दीखते हैं और गँदले में नहीं, वैसे ही शान्त मन ज्ञेय को देखता है और मलिन मन नहीं; तृष्णा तभी मिटती है जब भीतर का पाप दूर हो, पाप-कर्म के क्षय से ज्ञान उत्पन्न होता है, और दर्पण की तरह आत्मा में आत्मा दीखता है। संयत इन्द्रियाँ सुख देती हैं, फैली हुई दुःख। इन्द्रियों से ऊपर मन है, उससे बुद्धि, उससे ज्ञान और उससे परम; सब अव्यक्त से निकले हैं। जो कछुए की तरह इन्द्रियों को समेट लेता और आकृतियों के समूह को छोड़ देता है, वह अमृत पाता है; और आत्मा अस्त होते सूर्य की किरणों की तरह अदृश्य होकर भी अविद्यमान नहीं है।
मनुरुवाच
श्लोक 1 (12.202.1)
यथा व्यक्तमिदं शेते स्वप्ने चरति चेतनम् । ज्ञानमिन्द्रियसंयुक्तं तद्वत्प्रेत्य भवाभवौ ॥
yathā vyaktamidaṃ śete svapne carati cetanam | jñānamindriyasaṃyuktaṃ tadvatpretya bhavābhavau
जैसे यह व्यक्त शरीर सोता है और चेतन स्वप्न में विचरता है, वैसे ही इन्द्रियों से युक्त ज्ञान मरने के बाद जन्म और मृत्यु में जाता है।
श्लोक 2 (12.202.2)
यथाऽम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुषा । तद्वत्प्रसन्नेन्द्रियवाञ्ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति ॥
yathā'mbhasi prasanne tu rūpaṃ paśyati cakṣuṣā | tadvatprasannendriyavāñjñeyaṃ jñānena paśyati
जैसे निर्मल जल में मनुष्य आँख से रूप देखता है, वैसे ही प्रसन्न इन्द्रियों वाला मनुष्य ज्ञान से ज्ञेय को देखता है।
श्लोक 3 (12.202.3)
स एव लुलिते तस्मिन्यथा रूपं न पश्यति । तथेन्द्रियाकुलीभावे ज्ञेयं ज्ञाने न पश्यति ॥
sa eva lulite tasminyathā rūpaṃ na paśyati | tathendriyākulībhāve jñeyaṃ jñāne na paśyati
जैसे उसी जल के हिलने पर वह रूप नहीं देखता, वैसे ही इन्द्रियों के व्याकुल होने पर वह ज्ञान से ज्ञेय को नहीं देखता।
श्लोक 4 (12.202.4)
अबुद्धिरज्ञानकृता अबुद्ध्या दूष्यते मनः । दुष्टस्य मनसः पञ्च संप्रदुष्यन्ति मानसाः ॥
abuddhirajñānakṛtā abuddhyā dūṣyate manaḥ | duṣṭasya manasaḥ pañca saṃpraduṣyanti mānasāḥ
अबुद्धि अज्ञान से उत्पन्न होती है; अबुद्धि से मन दूषित होता है; और दूषित मन के पाँचों मानस भाव दूषित हो जाते हैं।
श्लोक 5 (12.202.5)
अज्ञानतृप्तो विषयेष्ववगाढो न पश्यति । स दृष्ट्वैव तु पूतात्मा विषयेभ्यो निवर्तते ॥
ajñānatṛpto viṣayeṣvavagāḍho na paśyati | sa dṛṣṭvaiva tu pūtātmā viṣayebhyo nivartate
अज्ञान से तृप्त, विषयों में डूबा हुआ मनुष्य नहीं देखता; पर जिसने देख लिया, वह शुद्धात्मा विषयों से लौट आता है।
श्लोक 6 (12.202.6)
तर्षच्छेदो न भवति पुरुषस्येह कल्मषात् । निवर्तते तदा तर्षः पापमन्तर्गतं यदा ॥
tarṣacchedo na bhavati puruṣasyeha kalmaṣāt | nivartate tadā tarṣaḥ pāpamantargataṃ yadā
इस लोक में मल के कारण पुरुष की तृष्णा नहीं कटती; तृष्णा तब हटती है जब भीतर बैठा पाप चला जाता है।
श्लोक 7 (12.202.7)
अन्तर्गतेन पापेन दह्यमानेन चेतसा । शुभाशुभविकारेण न स भूयोऽभिजायते ॥
antargatena pāpena dahyamānena cetasā | śubhāśubhavikāreṇa na sa bhūyo'bhijāyate
भीतर गए हुए पाप के साथ, जलते हुए चित्त से, शुभ-अशुभ के विकार के द्वारा, वह फिर जन्म नहीं लेता।
श्लोक 8 (12.202.8)
विषयेषु तु संसर्गाच्छाश्वतस्य तु संश्रयात् । मनसा चान्यथा काङ्क्षन्परं न प्रतिपद्यते ॥
viṣayeṣu tu saṃsargācchāśvatasya tu saṃśrayāt | manasā cānyathā kāṅkṣanparaṃ na pratipadyate
विषयों के संसर्ग से, शाश्वत का आश्रय लेते हुए भी, जो मन से कुछ और चाहता है, वह परम को नहीं पाता।
श्लोक 9 (12.202.9)
ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः । अथादर्शतलप्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
jñānamutpadyate puṃsāṃ kṣayātpāpasya karmaṇaḥ | athādarśatalaprakhye paśyatyātmānamātmani
पाप-कर्म के क्षय से मनुष्यों में ज्ञान उत्पन्न होता है; तब दर्पण-तल के समान निर्मल आत्मा में वह आत्मा को देखता है।
श्लोक 10 (12.202.10)
प्रसृतैरिन्द्रियैर्दुःखी तैरेव नियतैः सुखी । तस्मादिन्द्रियचोरेभ्यो यच्छेदात्मानमात्मना ॥
prasṛtairindriyairduḥkhī taireva niyataiḥ sukhī | tasmādindriyacorebhyo yacchedātmānamātmanā
फैली हुई इन्द्रियों से मनुष्य दुःखी होता है और उन्हीं के संयत होने पर सुखी। इसलिए इन्द्रिय-रूपी चोरों से आत्मा को आत्मा के द्वारा रोके रखे।
श्लोक 11 (12.202.11)
इन्द्रियेभ्यो मनः पूर्वं बुद्धिः परतरा ततः । बुद्धेः परतरं ज्ञानं ज्ञानात्परतरं परम् ॥
indriyebhyo manaḥ pūrvaṃ buddhiḥ paratarā tataḥ | buddheḥ parataraṃ jñānaṃ jñānātparataraṃ param
इन्द्रियों से पहले मन है, उसके आगे बुद्धि और भी ऊँची है; बुद्धि से ऊँचा ज्ञान है, और ज्ञान से भी ऊँचा परम है।
श्लोक 12 (12.202.12)
अव्यक्तात्प्रसृतं ज्ञानं ततो बुद्धिस्ततो मनः । मनः श्रोत्रादिभिर्युक्तं शब्दादीन्साधु पश्यति ॥
avyaktātprasṛtaṃ jñānaṃ tato buddhistato manaḥ | manaḥ śrotrādibhiryuktaṃ śabdādīnsādhu paśyati
अव्यक्त से ज्ञान निकला, उससे बुद्धि और उससे मन। श्रोत्र आदि से युक्त मन शब्द आदि विषयों को भली-भाँति देखता है।
श्लोक 13 (12.202.13)
यस्तांस्त्यजति शब्दादीन्सर्वाश्च व्यक्तयस्तथा । प्रसृतानीन्द्रियाण्येव प्रतिसंहरति कूर्मवत् । विमुञ्चत्याकृतिग्रामांस्तान्मुक्त्वाऽमृतमश्नुते ॥
yastāṃstyajati śabdādīnsarvāśca vyaktayastathā | prasṛtānīndriyāṇyeva pratisaṃharati kūrmavat | vimuñcatyākṛtigrāmāṃstānmuktvā'mṛtamaśnute
जो शब्द आदि इन विषयों को और सब व्यक्त रूपों को भी छोड़ देता है, फैली हुई इन्द्रियों को कछुए की तरह समेट लेता है और आकृतियों के समूह को त्याग देता है, वह उन्हें छोड़कर अमृत का भोग करता है।
श्लोक 14 (12.202.14)
उद्यन्हि सविता यद्वत्सृजते रश्मिमण्डलम् । दृश्यते मण्डलं तस्य न च दृश्येत मण्डली । तद्वद्देहस्तु संदृश्य आत्माऽदृश्यः परः सदा ॥
udyanhi savitā yadvatsṛjate raśmimaṇḍalam | dṛśyate maṇḍalaṃ tasya na ca dṛśyeta maṇḍalī | tadvaddehastu saṃdṛśya ātmā'dṛśyaḥ paraḥ sadā
जैसे उदय होता हुआ सूर्य अपना किरण-मण्डल फैलाता है, उसका मण्डल दीखता है पर मण्डल वाला नहीं दीखता; उसी तरह देह तो साफ दीखता है, पर आत्मा सदा अदृश्य और परे है।
श्लोक 15 (12.202.15)
ग्रस्तं ह्युद्गिरते नित्यमुद्गीथं वेत्ति नित्यशः । बाल्ये रथाभ्यां योगेन तत्त्वज्ञानं तु संमतम् ॥
grastaṃ hyudgirate nityamudgīthaṃ vetti nityaśaḥ | bālye rathābhyāṃ yogena tattvajñānaṃ tu saṃmatam
वह निगले हुए को सदा फिर उगल देता है और उद्गीथ को निरन्तर जानता है। बाल्यावस्था में दो रथों के योग से तत्त्वज्ञान को मान्य माना गया है।
श्लोक 16 (12.202.16)
स एवास्तमुपागच्छंस्तदेवात्मनि यच्छति । आदत्ते सर्वभूतानां रसभूतं विकासवान् ॥
sa evāstamupāgacchaṃstadevātmani yacchati | ādatte sarvabhūtānāṃ rasabhūtaṃ vikāsavān
वही सूर्य अस्त की ओर जाते हुए उन्हें अपने में समेट लेता है। प्रकाशमान होकर वह सब प्राणियों का सार खींच लेता है।
श्लोक 17 (12.202.17)
अन्तरात्मा तथा देहमाविश्येन्द्रियरश्मिभिः । प्राप्येन्द्रियगुणान्पञ्च सोऽस्तमावृत्त्य गच्छति । रश्मिमण्डलहीनस्तु न चासौ नास्ति तावता ॥
antarātmā tathā dehamāviśyendriyaraśmibhiḥ | prāpyendriyaguṇānpañca so'stamāvṛttya gacchati | raśmimaṇḍalahīnastu na cāsau nāsti tāvatā
इसी तरह अन्तरात्मा इन्द्रिय-रूपी किरणों से देह में प्रवेश करके और इन्द्रियों के पाँच गुणों को पाकर लौटकर अपने अस्त को चला जाता है। किरण-मण्डल से रहित होने पर भी वह इतने से अविद्यमान नहीं है।
श्लोक 18 (12.202.18)
प्रणीतं कर्मणा मार्गं नीयमानः पुनः पुनः । प्राप्नोत्ययं कर्मफलं प्रवृत्तं धर्ममाप्तवान् ॥
praṇītaṃ karmaṇā mārgaṃ nīyamānaḥ punaḥ punaḥ | prāpnotyayaṃ karmaphalaṃ pravṛttaṃ dharmamāptavān
कर्म के द्वारा बनाए मार्ग पर बार-बार ले जाया जाता हुआ यह जीव, जिस धर्म में वह प्रवृत्त हुआ है उसे पाकर, कर्मफल को प्राप्त करता है।
श्लोक 19 (12.202.19)
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate
निराहार रहने वाले देहधारी से विषय लौट जाते हैं; केवल रस रह जाता है, और वह भी परम को देखकर उससे लौट जाता है।
श्लोक 20 (12.202.20)
बुद्धिः कर्मगुणैर्हीना यदा मनसि वर्तते । तदा संपद्यते ब्रह्म तत्रैव प्रलयं गतम् ॥
buddhiḥ karmaguṇairhīnā yadā manasi vartate | tadā saṃpadyate brahma tatraiva pralayaṃ gatam
जब कर्म के गुणों से रहित बुद्धि मन में स्थित होती है, तब ब्रह्म की प्राप्ति होती है, जो वहीं लय को प्राप्त हो चुका है।
श्लोक 21 (12.202.21)
अस्पर्शनमशृण्वानमनास्वादमदर्शनम् । अघ्राणमवितर्कं च सत्त्वं प्रविशते परम् ॥
asparśanamaśṛṇvānamanāsvādamadarśanam | aghrāṇamavitarkaṃ ca sattvaṃ praviśate param
वह उस परम सत्त्व में प्रवेश करता है जिसमें न स्पर्श है, न श्रवण, न स्वाद, न दर्शन, न गन्ध और न तर्क।
श्लोक 22 (12.202.22)
अव्यक्तात्प्रसृतं ज्ञानं ततो बुद्धिस्ततो मनः । आत्मनः प्रसृता बुद्धिरव्यक्तं ज्ञानमुच्यते ॥
avyaktātprasṛtaṃ jñānaṃ tato buddhistato manaḥ | ātmanaḥ prasṛtā buddhiravyaktaṃ jñānamucyate
अव्यक्त से ज्ञान निकला, उससे बुद्धि और उससे मन। बुद्धि आत्मा से निकली है; अव्यक्त को ही ज्ञान कहा जाता है।
श्लोक 23 (12.202.23)
तस्माद्बुद्धिः स्मृता तज्ज्ञैर्मनस्तस्मात्ततः स्मृतम् । तस्मादाकृतयः पञ्च मनः परममुच्यते ॥
tasmādbuddhiḥ smṛtā tajjñairmanastasmāttataḥ smṛtam | tasmādākṛtayaḥ pañca manaḥ paramamucyate
उसी से, जानने वालों के अनुसार, बुद्धि मानी गई है; उससे मन माना गया है; उससे पाँच आकृतियाँ; और मन को परम कहा जाता है।
श्लोक 24 (12.202.24)
तस्मात्परतरा बुद्धिर्ज्ञानं तस्मात्परं स्मृतम् । ततः सूक्ष्मस्ततो ह्यात्मा तस्मात्परतरं न च । इन्द्रियाणि निरीक्षन्ते मनसैतानि सर्वशः ॥
tasmātparatarā buddhirjñānaṃ tasmātparaṃ smṛtam | tataḥ sūkṣmastato hyātmā tasmātparataraṃ na ca | indriyāṇi nirīkṣante manasaitāni sarvaśaḥ
उससे ऊँची बुद्धि है; उससे ऊँचा ज्ञान माना गया है; उससे सूक्ष्म आत्मा है, और उससे परे कुछ नहीं। इन्द्रियाँ देखती हैं, और मन से ये सब ओर से देखी जाती हैं।
श्लोक 25 (12.202.25)
मनस्याकृतयो मग्ना मनस्त्वभिगतं मतिम् । मतिस्त्वभिगता ज्ञानं ज्ञानं चाभिगतं महत् ॥
manasyākṛtayo magnā manastvabhigataṃ matim | matistvabhigatā jñānaṃ jñānaṃ cābhigataṃ mahat
आकृतियाँ मन में डूबी हैं; मन मति (बुद्धि) को प्राप्त हुआ है; मति ज्ञान को प्राप्त हुई है; और ज्ञान महत् को प्राप्त हुआ है।
श्लोक 26 (12.202.26)
नेन्द्रियैर्मनसः सिद्धिर्न बुद्धिं बुध्यते मनः । न बुद्धिर्बुध्यतेऽव्यक्तं सूक्ष्मं त्वेतानि पश्यति ॥
nendriyairmanasaḥ siddhirna buddhiṃ budhyate manaḥ | na buddhirbudhyate'vyaktaṃ sūkṣmaṃ tvetāni paśyati
इन्द्रियों से मन की सिद्धि नहीं होती; मन बुद्धि को नहीं जानता; बुद्धि अव्यक्त को नहीं जानती; पर सूक्ष्म तत्त्व इन सबको देखता है।