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शान्ति पर्व · अध्याय 201

अमावस्या के चन्द्रमा की तरह अदृश्य आत्मा

मनु देहधारी आत्मा के स्वरूप की चर्चा आगे बढ़ाते हैं। इन्द्रियों के नष्ट हो जाने पर भी वह उनके दिए हुए गुणों को याद रखता है, सब विषयों को क्रम से जानता है, और इन्द्रियाँ अपने को नहीं देख सकतीं; उन्हें सर्वज्ञ क्षेत्रज्ञ ही देखता है। जैसे हिमालय का पिछला पार्श्व और चन्द्रमा का पृष्ठभाग कभी देखे नहीं गए फिर भी हैं, वैसे ही सूक्ष्म आत्मा आँखों से नहीं दीखता; वह ज्ञान से पकड़ा जाता है, जैसे मृग से मृग और हाथी से हाथी। फिर मनु आत्मा की उपमा अमावस्या के चन्द्रमा से देते हैं, जो छिपा रहता है पर नष्ट नहीं होता और नई कलाएँ पाकर फिर चमकता है, तथा सूर्य-चन्द्र से छूटे राहु से।

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मनुरुवाच

श्लोक 1 (12.201.1)

यदिन्द्रियैस्तूपगतैः पुरस्ता । त्प्राप्तान्गुणान्संस्मरते चिराय । तेष्विन्द्रियेषूपहतेषु पश्चा । त्स बुद्धिरूपः परमः स्वभावः ॥

yadindriyaistūpagataiḥ purastā | tprāptānguṇānsaṃsmarate cirāya | teṣvindriyeṣūpahateṣu paścā | tsa buddhirūpaḥ paramaḥ svabhāvaḥ

इन्द्रियों के द्वारा पहले पाए हुए गुणों को जो बहुत समय बाद भी स्मरण करता है, उन इन्द्रियों के नष्ट हो जाने पर भी — वही बुद्धिरूप परम स्वभाव है।

श्लोक 2 (12.201.2)

य इन्द्रियार्थान्युगपत्समन्ता । न्नावेक्षते कृत्स्नशस्तुल्यकालम् । यथाक्रमं संचरते स विद्वां । स्तस्मात्स एकः परमः शरीरी ॥

ya indriyārthānyugapatsamantā | nnāvekṣate kṛtsnaśastulyakālam | yathākramaṃ saṃcarate sa vidvāṃ | stasmātsa ekaḥ paramaḥ śarīrī

जो सब इन्द्रिय-विषयों को एक साथ, पूरे-पूरे और एक ही समय में नहीं देखता, बल्कि क्रम से उनमें विचरता है, वह ज्ञाता — इसीलिए वही एक परम शरीरी है।

श्लोक 3 (12.201.3)

रजस्तमः सत्त्वमथो तृतीयं । गच्छत्यसौ ज्ञानगुणान्विरूपान् । तथेन्द्रियाण्याविशते शरीरी । हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ॥

rajastamaḥ sattvamatho tṛtīyaṃ | gacchatyasau jñānaguṇānvirūpān | tathendriyāṇyāviśate śarīrī | hutāśanaṃ vāyurivendhanastham

रजस्, तमस् और फिर तीसरा सत्त्व — यह शरीरी ज्ञान के इन भिन्न-भिन्न गुणों में जाता है, और वैसे ही इन्द्रियों में प्रवेश करता है, जैसे वायु ईंधन में स्थित अग्नि में प्रवेश करती है।

श्लोक 4 (12.201.4)

न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो । न पश्यति स्पर्शनमिन्द्रियेन्द्रियम् । न श्रोत्रलिङ्गं श्रवणेन दर्शनं । तथा कृतं पश्यति तद्विनश्यति ॥

na cakṣuṣā paśyati rūpamātmano | na paśyati sparśanamindriyendriyam | na śrotraliṅgaṃ śravaṇena darśanaṃ | tathā kṛtaṃ paśyati tadvinaśyati

वह आँख से अपना रूप नहीं देखता, न स्पर्श-इन्द्रिय को देखता है, जो इन्द्रियों की भी इन्द्रिय है; और श्रवण के द्वारा श्रोत्र के लक्षण का दर्शन भी नहीं होता। इस प्रकार जो रचा हुआ है, वही दीखता है और वह नष्ट हो जाता है।

श्लोक 5 (12.201.5)

श्रोत्रादीनि न पश्यन्ति स्वंस्वमात्मानमात्मना । सर्वज्ञः सर्वदर्शी च क्षेत्रज्ञस्तानि पश्यति ॥

śrotrādīni na paśyanti svaṃsvamātmānamātmanā | sarvajñaḥ sarvadarśī ca kṣetrajñastāni paśyati

श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने आत्मा को अपने आप नहीं देखतीं; उन्हें सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा क्षेत्रज्ञ देखता है।

श्लोक 6 (12.201.6)

यथा हिमवतः पार्श्वे पृष्ठं चन्द्रमसो यथा । न दृष्टपूर्वं मनुजैर्न च तन्नास्ति तावता ॥

yathā himavataḥ pārśve pṛṣṭhaṃ candramaso yathā | na dṛṣṭapūrvaṃ manujairna ca tannāsti tāvatā

जैसे हिमालय का पिछला भाग या चन्द्रमा का पृष्ठभाग मनुष्यों ने कभी नहीं देखा, फिर भी वह इतने से अविद्यमान नहीं हो जाता,

श्लोक 7 (12.201.7)

तद्वद्भूतेषु भूतात्मा सूक्ष्मो ज्ञानात्मवानसौ । अदृष्टपूर्वश्चक्षुर्भ्यां न चासौ नास्ति तावता ॥

tadvadbhūteṣu bhūtātmā sūkṣmo jñānātmavānasau | adṛṣṭapūrvaścakṣurbhyāṃ na cāsau nāsti tāvatā

वैसे ही प्राणियों का आत्मा, सूक्ष्म और ज्ञानस्वरूप, आँखों से कभी नहीं देखा गया — फिर भी वह इतने से अविद्यमान नहीं है।

श्लोक 8 (12.201.8)

पश्यन्नपि यथा लक्ष्म जनः सोमे न विन्दति । एवमस्ति न चोत्पन्नं न च तन्न परायणम् ॥

paśyannapi yathā lakṣma janaḥ some na vindati | evamasti na cotpannaṃ na ca tanna parāyaṇam

देखते हुए भी लोग चन्द्रमा में उसके चिह्न को नहीं पहचान पाते; वैसे ही यह है — यह उत्पन्न होने वाला नहीं है, और ऐसा भी नहीं कि वह परम आश्रय न हो।

श्लोक 9 (12.201.9)

रूपवन्तमरूपत्वादुदयास्तमने बुधाः । धिया समनुपश्यन्ति तद्गताः सवितुर्गतिम् ॥

rūpavantamarūpatvādudayāstamane budhāḥ | dhiyā samanupaśyanti tadgatāḥ saviturgatim

रूपवान् होते हुए भी, अरूप होने के कारण, उसमें लीन ज्ञानी लोग बुद्धि से उसके उदय और अस्त को, सूर्य की गति को, देखते हैं।

श्लोक 10 (12.201.10)

तथा बुद्धिप्रदीपेन दूरस्थं सुविपश्चितः । प्रत्यासन्नं निषीदन्ति ज्ञेयं ज्ञानाभिसंहितम् ॥

tathā buddhipradīpena dūrasthaṃ suvipaścitaḥ | pratyāsannaṃ niṣīdanti jñeyaṃ jñānābhisaṃhitam

इसी प्रकार बुद्धि के दीपक से सच्चे ज्ञानी दूर स्थित ज्ञेय के निकट जा बैठते हैं — उस ज्ञेय के, जो ज्ञान से जुड़ा है।

श्लोक 11 (12.201.11)

न हि खल्वनुपायेन कश्चिदर्थोऽभिसिद्ध्यति । सूत्रजालैर्यथा मत्स्यान्बध्नन्ति जलजीविनः ॥

na hi khalvanupāyena kaścidartho'bhisiddhyati | sūtrajālairyathā matsyānbadhnanti jalajīvinaḥ

उचित उपाय के बिना कोई कार्य कभी सिद्ध नहीं होता। जैसे मछुआरे सूत के जालों से मछलियाँ पकड़ते हैं,

श्लोक 12 (12.201.12)

मृगैर्मृगाणां ग्रहणं पक्षिणां पक्षिभिर्यथा । गजानां च गजैरेव ज्ञेयं ज्ञानेन गृह्यते ॥

mṛgairmṛgāṇāṃ grahaṇaṃ pakṣiṇāṃ pakṣibhiryathā | gajānāṃ ca gajaireva jñeyaṃ jñānena gṛhyate

जैसे मृगों को मृग, पक्षियों को पक्षी और हाथियों को हाथी पकड़ते हैं, वैसे ही ज्ञेय ज्ञान से पकड़ा जाता है।

श्लोक 13 (12.201.13)

अहिरेव ह्यहेः पादान्पश्यतीति निदर्शनम् । तद्वन्मूर्तिषु मूर्तिस्थं ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति ॥

ahireva hyaheḥ pādānpaśyatīti nidarśanam | tadvanmūrtiṣu mūrtisthaṃ jñeyaṃ jñānena paśyati

साँप ही साँप के पैरों को देखता है — यही उदाहरण है। वैसे ही रूपों में स्थित ज्ञेय को ज्ञान ही देखता है।

श्लोक 14 (12.201.14)

नोत्सहन्ते यथा वेत्तुमिन्द्रियैरिन्द्रियाण्यपि । तथैवेह परा बुद्धिः परं बुद्ध्या न पश्यति ॥

notsahante yathā vettumindriyairindriyāṇyapi | tathaiveha parā buddhiḥ paraṃ buddhyā na paśyati

जैसे इन्द्रियाँ इन्द्रियों के द्वारा इन्द्रियों को नहीं जान सकतीं, वैसे ही यहाँ परा बुद्धि बुद्धि के द्वारा परम को नहीं देखती।

श्लोक 15 (12.201.15)

यथा चन्द्रो ह्यमावास्यामलिङ्गत्वान्न दृश्यते । न च नाशोऽस्य भवति तथा विद्धि शरीरिणम् ॥

yathā candro hyamāvāsyāmaliṅgatvānna dṛśyate | na ca nāśo'sya bhavati tathā viddhi śarīriṇam

जैसे अमावस्या को चन्द्रमा चिह्न न होने से दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका नाश नहीं होता — उसी तरह शरीरी को जानो।

श्लोक 16 (12.201.16)

क्षीणकोशो ह्यमावास्यां चन्द्रमा न प्रकाशते । तद्वन्मूर्तिविमुक्तोऽसौ शरीरी नोपलभ्यते ॥

kṣīṇakośo hyamāvāsyāṃ candramā na prakāśate | tadvanmūrtivimukto'sau śarīrī nopalabhyate

अमावस्या को क्षीण कोश वाला चन्द्रमा प्रकाशित नहीं होता; वैसे ही मूर्ति (देह) से मुक्त यह शरीरी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 17 (12.201.17)

यथा कोशान्तरं प्राप्य चन्द्रमा भ्राजते पुनः । तद्वल्लिङ्गान्तरं प्राप्य शरीरी भ्राजते पुनः ॥

yathā kośāntaraṃ prāpya candramā bhrājate punaḥ | tadvalliṅgāntaraṃ prāpya śarīrī bhrājate punaḥ

जैसे चन्द्रमा दूसरा कोश पाकर फिर चमकता है, वैसे ही शरीरी दूसरा लिङ्ग (सूक्ष्म शरीर) पाकर फिर चमकता है।

श्लोक 18 (12.201.18)

जन्म वृद्धिः क्षयश्चास्य प्रत्यक्षेणोपलभ्यते । सा तु चन्द्रमसो व्यक्तिर्न तु तस्य शरीरिणः ॥

janma vṛddhiḥ kṣayaścāsya pratyakṣeṇopalabhyate | sā tu candramaso vyaktirna tu tasya śarīriṇaḥ

इसका जन्म, वृद्धि और क्षय प्रत्यक्ष दीखते हैं; पर वह चन्द्रमा की अभिव्यक्ति है, उस शरीरी की नहीं।

श्लोक 19 (12.201.19)

उत्पत्तिवृद्धिव्ययतो यथा स इति गृह्यते । चन्द्र एव त्वमावास्यां तथा भवति मूर्तिमान् ॥

utpattivṛddhivyayato yathā sa iti gṛhyate | candra eva tvamāvāsyāṃ tathā bhavati mūrtimān

जैसे उत्पत्ति, वृद्धि और क्षय से चन्द्रमा ‘यही वह है’ ऐसा पहचाना जाता है, और अमावस्या को भी वह चन्द्रमा ही रहता है, वैसे ही शरीरी रूपवान् हो जाता है।

श्लोक 20 (12.201.20)

नाभिसर्पद्विमुञ्चद्वा शशिनं दृश्यते तमः । विसृजंश्चोपसर्पंश्च तद्वत्पश्य शरीरिणम् ॥

nābhisarpadvimuñcadvā śaśinaṃ dṛśyate tamaḥ | visṛjaṃścopasarpaṃśca tadvatpaśya śarīriṇam

अन्धकार चन्द्रमा के पास आता या उसे छोड़ता दिखाई नहीं देता, यद्यपि वह उसे छोड़ता और उसके पास आता है; इसी प्रकार शरीरी को देखो।

श्लोक 21 (12.201.21)

यथा चन्द्रार्कसंयुक्तं तमस्तदुपलभ्यते । तद्वच्छरीरसंयुक्तं ज्ञानं तदुपलभ्यते ॥

yathā candrārkasaṃyuktaṃ tamastadupalabhyate | tadvaccharīrasaṃyuktaṃ jñānaṃ tadupalabhyate

जैसे चन्द्र और सूर्य से संयुक्त अन्धकार दिखाई देता है, वैसे ही शरीर से संयुक्त ज्ञान दिखाई देता है।

श्लोक 22 (12.201.22)

यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते । तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ॥

yathā candrārkanirmuktaḥ sa rāhurnopalabhyate | tadvaccharīranirmuktaḥ śarīrī nopalabhyate

जैसे चन्द्र और सूर्य से मुक्त राहु दिखाई नहीं देता, वैसे ही शरीर से मुक्त शरीरी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 23 (12.201.23)

यथा चन्द्रो ह्यमावास्यां नक्षत्रैर्युज्यते गतः । तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः फलैर्युज्यति कर्मणः ॥

yathā candro hyamāvāsyāṃ nakṣatrairyujyate gataḥ | tadvaccharīranirmuktaḥ phalairyujyati karmaṇaḥ

जैसे अमावस्या को चन्द्रमा नक्षत्रों से जा मिलता है, वैसे ही शरीर से मुक्त जीव अपने कर्मों के फलों से जुड़ता है।

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