शान्ति पर्व · अध्याय 200
मनु का महाभूतों, इन्द्रियों और अदृश्य आत्मा पर उपदेश
मनु बृहस्पति को अपना उपदेश आगे बढ़ाते हैं। अक्षर से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी उत्पन्न हुए और शरीर फिर उन्हीं में लय हो जाते हैं; परम स्वभाव में न उष्ण-शीत है, न रस, गन्ध या रूप, और आत्मा को न जानने वाले लोग केवल वही ग्रहण करते हैं जो इन्द्रियाँ देती हैं। जब प्रत्येक इन्द्रिय को उसके विषय से लौटा लिया जाता है, तब परम का दर्शन होता है। मनु इन्द्रियों की उपमा दीपकों, राजा के मन्त्रियों और किरणों से देते हैं, और छिपे आत्मा की उपमा अरणि की लकड़ी में छिपी अग्नि तथा स्वप्न में दीखने वाले शरीर से; आत्मा एक शरीर छोड़कर अदृश्य रूप से दूसरा धारण करता है, और इन्द्रियाँ मन के पीछे वैसे चलती हैं जैसे जलचर धारा के पीछे।
मनुरुवाच
श्लोक 1 (12.200.1)
अक्षरात्खं ततो वायुस्ततो ज्योतिस्ततो जलम् । जलात्प्रसूता जगती जगत्या जायते जगत् ॥
akṣarātkhaṃ tato vāyustato jyotistato jalam | jalātprasūtā jagatī jagatyā jāyate jagat
अक्षर से आकाश उत्पन्न हुआ, उससे वायु, वायु से तेज, और तेज से जल। जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई, और पृथ्वी से जगत् उत्पन्न होता है।
श्लोक 2 (12.200.2)
इमे शरीरैर्जलमेव गत्वा । जलाच्च तेजः पवनान्तरिक्षम् । खाद्वै निवर्तन्ति न भाविनस्ते । ये भाविनस्ते परमाप्नुवन्ति ॥
ime śarīrairjalameva gatvā | jalācca tejaḥ pavanāntarikṣam | khādvai nivartanti na bhāvinaste | ye bhāvinaste paramāpnuvanti
ये प्राणी शरीरों के साथ जल को पहुँचकर, फिर जल से तेज, वायु और आकाश को पहुँचते हैं; आकाश से वे लौट आते हैं जिनमें सद्भाव नहीं है, और जिनमें सद्भाव है वे परम को पाते हैं।
श्लोक 3 (12.200.3)
नोष्णं न शीतं मृदु नापि तीक्ष्णं । नाम्लं कषायं मधुरं न तिक्तम् । न शब्दवन्नापि च गन्धवत्त । न्न रूपवत्तत्परमस्वभावम् ॥
noṣṇaṃ na śītaṃ mṛdu nāpi tīkṣṇaṃ | nāmlaṃ kaṣāyaṃ madhuraṃ na tiktam | na śabdavannāpi ca gandhavatta | nna rūpavattatparamasvabhāvam
वह न उष्ण है, न शीत, न कोमल, न तीक्ष्ण; न खट्टा, न कसैला, न मीठा, न कड़वा; उसमें न शब्द है, न गन्ध, न रूप — वही परम स्वभाव है।
श्लोक 4 (12.200.4)
स्पर्शं तनुर्वेद रसं च जिह्वा । घ्राणं च गन्धाञ्श्रवणे च शब्दान् । रूपाणि चक्षुर्न च तत्परं य । द्गृह्णन्त्यनध्यात्मविदो मनुष्याः ॥
sparśaṃ tanurveda rasaṃ ca jihvā | ghrāṇaṃ ca gandhāñśravaṇe ca śabdān | rūpāṇi cakṣurna ca tatparaṃ ya | dgṛhṇantyanadhyātmavido manuṣyāḥ
आत्मा को न जानने वाले लोग स्पर्श को शरीर से, रस को जीभ से, गन्ध को नाक से, शब्द को कानों से और रूप को आँख से ग्रहण करते हैं — पर इनसे परे जो है, उसे नहीं पकड़ पाते।
श्लोक 5 (12.200.5)
निवर्तयित्वा रसनां रसेभ्यो । घ्राणं च गन्धाच्छ्रवणे च शब्दात् । स्पर्शात्तनुं रूपगुणात्तु चक्षु । स्ततः परं पश्यति तत्स्वभावम् ॥
nivartayitvā rasanāṃ rasebhyo | ghrāṇaṃ ca gandhācchravaṇe ca śabdāt | sparśāttanuṃ rūpaguṇāttu cakṣu | stataḥ paraṃ paśyati tatsvabhāvam
जीभ को रसों से, नाक को गन्ध से, कानों को शब्द से, शरीर को स्पर्श से और आँख को रूप के गुण से लौटाकर वह उससे परे के तत्त्व को, उसके अपने स्वभाव में, देखता है।
श्लोक 6 (12.200.6)
यतो गृहीत्वा हि करोति यच्च । यस्मिंश्च यामारभते प्रवृत्तिम् । यस्मै च यद्येन च यश्च कर्ता । यत्कारणं तं स्वमुपेयमाहुः ॥
yato gṛhītvā hi karoti yacca | yasmiṃśca yāmārabhate pravṛttim | yasmai ca yadyena ca yaśca kartā | yatkāraṇaṃ taṃ svamupeyamāhuḥ
जिस आधार को लेकर कोई कर्म करता है, जो कर्म करता है, जिसमें वह प्रवृत्ति आरम्भ करता है, जिसके लिए, जिसके द्वारा और जो कर्ता है — इन सबका जो कारण है, उसी को लोग अपना प्राप्य कहते हैं।
श्लोक 7 (12.200.7)
यद्वाऽप्यभूद्व्यापकं साधकं च । यन्मन्त्रवत्स्थास्यति चापि लोके । यः सर्वहेतुः परमार्थकारी । तत्कारणं कार्यमतो यदन्यत् ॥
yadvā'pyabhūdvyāpakaṃ sādhakaṃ ca | yanmantravatsthāsyati cāpi loke | yaḥ sarvahetuḥ paramārthakārī | tatkāraṇaṃ kāryamato yadanyat
जो व्यापक और साधक था, जो मन्त्र की तरह लोक में स्थित रहेगा, जो सबका कारण है और परम प्रयोजन को सिद्ध करने वाला है — वही कारण है; इससे जो कुछ भिन्न है, वह कार्य है।
श्लोक 8 (12.200.8)
यथा हि कश्चित्सुकृतैर्मनुष्यः । शुभाशुभं प्राप्नुते चाविरोधात् । एवं शरीरेषु शुभाशुभेषु । स्वकर्मभिर्ज्ञानमिदं निबद्धम् ॥
yathā hi kaścitsukṛtairmanuṣyaḥ | śubhāśubhaṃ prāpnute cāvirodhāt | evaṃ śarīreṣu śubhāśubheṣu | svakarmabhirjñānamidaṃ nibaddham
जैसे कोई मनुष्य अपने सुकर्मों से बिना बाधा के शुभ और अशुभ पाता है, वैसे ही शुभ-अशुभ शरीरों में यह ज्ञान अपने-अपने कर्मों से बँधा हुआ है।
श्लोक 9 (12.200.9)
यथा प्रदीप्तः पुरतः प्रदीपः । प्रकाशमन्यस्य करोति दीप्यन् । तथेह पञ्चेन्द्रियदीपवृक्षा । ज्ञानप्रदीप्ताः परवन्त एव ॥
yathā pradīptaḥ purataḥ pradīpaḥ | prakāśamanyasya karoti dīpyan | tatheha pañcendriyadīpavṛkṣā | jñānapradīptāḥ paravanta eva
जैसे सामने जलता हुआ दीपक जलते हुए दूसरे को प्रकाश देता है, वैसे ही यहाँ दीपवृक्ष-रूप पाँच इन्द्रियाँ ज्ञान से प्रदीप्त होकर स्वयं भी किसी दूसरे के अधीन ही हैं।
श्लोक 10 (12.200.10)
यथा च राज्ञो बहवो ह्यमात्याः । पृथक् प्रमाणं प्रवदन्ति युक्ताः । तद्वच्छरीरेषु भवन्ति पञ्च । ज्ञानैकदेशाः परमः स तेभ्यः ॥
yathā ca rājño bahavo hyamātyāḥ | pṛthak pramāṇaṃ pravadanti yuktāḥ | tadvaccharīreṣu bhavanti pañca | jñānaikadeśāḥ paramaḥ sa tebhyaḥ
जैसे राजा के अनेक नियुक्त मन्त्री अलग-अलग अपना प्रमाण बताते हैं, वैसे ही शरीरों में पाँच इन्द्रियाँ हैं, जिनमें से प्रत्येक ज्ञान का एक अंश-मात्र है; और परम उनसे ऊपर है।
श्लोक 11 (12.200.11)
यथार्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगा । मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चापः । गच्छन्ति चायान्ति च संयताश्च । तद्वच्छरीराणि शरीरिणां तु ॥
yathārciṣo'gneḥ pavanasya vegā | marīcayo'rkasya nadīṣu cāpaḥ | gacchanti cāyānti ca saṃyatāśca | tadvaccharīrāṇi śarīriṇāṃ tu
जैसे अग्नि की लपटें, वायु के झोंके, सूर्य की किरणें और नदियों का जल बँधे हुए-से आते और जाते हैं, वैसे ही देहधारियों के शरीर हैं।
श्लोक 12 (12.200.12)
यथा च कश्चित्परशुं गृहीत्वा । धूमं न पश्येज्ज्वलनं च काष्ठे । तद्वच्छरीरोदरपाणिपादं । छित्त्वा न पश्यन्ति ततो यदन्यत् ॥
yathā ca kaścitparaśuṃ gṛhītvā | dhūmaṃ na paśyejjvalanaṃ ca kāṣṭhe | tadvaccharīrodarapāṇipādaṃ | chittvā na paśyanti tato yadanyat
जैसे कोई कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी को चीर दे तो उसमें धुआँ या अग्नि नहीं देख पाता, वैसे ही शरीर के पेट, हाथ और पैरों को काटकर भी लोग उससे भिन्न जो है उसे नहीं देख पाते।
श्लोक 13 (12.200.13)
तान्येव काष्ठानि यथा विमथ्य । धूमं च पश्येज्ज्वलनं च योगात् । तद्वत्सुबुद्धिः सममिन्द्रियार्थै । र्बुद्धः परं पश्यति तत्स्वभावम् ॥
tānyeva kāṣṭhāni yathā vimathya | dhūmaṃ ca paśyejjvalanaṃ ca yogāt | tadvatsubuddhiḥ samamindriyārthai | rbuddhaḥ paraṃ paśyati tatsvabhāvam
पर उन्हीं लकड़ियों को विधिपूर्वक मथने पर धुआँ और अग्नि दोनों दीख जाते हैं; वैसे ही शुद्ध बुद्धि वाला, जागा हुआ पुरुष, इन्द्रियों के विषयों में सम रहकर, परम को उसके अपने स्वभाव में देखता है।
श्लोक 14 (12.200.14)
यथात्मनोऽङ्गं पतितं पृथिव्यां । स्वप्नान्तरे पश्यति चात्मनोऽन्यत् । श्रोत्रादियुक्तः सुमनाः सुबुद्धि । र्लिङ्गात्तथा गच्छति लिङ्गमन्यत् ॥
yathātmano'ṅgaṃ patitaṃ pṛthivyāṃ | svapnāntare paśyati cātmano'nyat | śrotrādiyuktaḥ sumanāḥ subuddhi | rliṅgāttathā gacchati liṅgamanyat
जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना कोई अंग पृथ्वी पर गिरा हुआ देखता है और अपने से भिन्न कुछ और भी देखता है, वैसे ही श्रोत्र आदि से युक्त, सुन्दर मन और बुद्धि वाला जीव एक लिङ्ग (सूक्ष्म शरीर) से दूसरे लिङ्ग को जाता है।
श्लोक 15 (12.200.15)
उत्पत्तिवृद्धिक्षयसन्निपातै । र्न युज्यतेऽसौ परमः शरीरी । अनेन लिङ्गेन तु लिङ्गमन्य । द्गच्छत्यदृष्टः प्रतिसन्धियोगात् ॥
utpattivṛddhikṣayasannipātai | rna yujyate'sau paramaḥ śarīrī | anena liṅgena tu liṅgamanya | dgacchatyadṛṣṭaḥ pratisandhiyogāt
वह परम शरीरी जन्म, वृद्धि, क्षय और उनके संयोगों से युक्त नहीं होता। इसी लिङ्ग (सूक्ष्म शरीर) के द्वारा, अदृश्य रहकर, वह पुनर्जन्म के सम्बन्ध से दूसरे लिङ्ग को जाता है।
श्लोक 16 (12.200.16)
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो । न चापि संस्पर्शमुपैति किंचित् । न चापि तैः साधयते स्वकार्यं । ते तं न पश्यन्ति स पश्यते तान् ॥
na cakṣuṣā paśyati rūpamātmano | na cāpi saṃsparśamupaiti kiṃcit | na cāpi taiḥ sādhayate svakāryaṃ | te taṃ na paśyanti sa paśyate tān
वह आँख से अपना रूप नहीं देखता, न स्पर्श से किसी वस्तु का संस्पर्श पाता है, और न उनके द्वारा अपना कार्य सिद्ध करता है। वे उसे नहीं देखतीं — वही उन्हें देखता है।
श्लोक 17 (12.200.17)
यथा समीपे ज्वलतोऽनलस्य । संतापजं रूपमुपैति कश्चित् । न चान्तरा रूपगुणं बिभर्ति । तथैव तद्दृश्यते रूपमस्य ॥
yathā samīpe jvalato'nalasya | saṃtāpajaṃ rūpamupaiti kaścit | na cāntarā rūpaguṇaṃ bibharti | tathaiva taddṛśyate rūpamasya
जैसे जलती हुई अग्नि के पास खड़ा कोई मनुष्य उसके ताप से उत्पन्न रूप पा लेता है, पर भीतर से अग्नि के रूप का गुण धारण नहीं करता, वैसे ही उसका रूप दिखाई देता है।
श्लोक 18 (12.200.18)
तथा मनुष्यः परिमुच्य काय । मदृश्यमन्यद्विशते शरीरम् । विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं । तदाश्रयं चैव बिभर्ति रूपम् ॥
tathā manuṣyaḥ parimucya kāya | madṛśyamanyadviśate śarīram | visṛjya bhūteṣu mahatsu dehaṃ | tadāśrayaṃ caiva bibharti rūpam
वैसे ही मनुष्य शरीर को छोड़कर कोई दूसरा अदृश्य शरीर धारण करता है; महाभूतों में देह को छोड़कर भी वह उन्हीं पर आश्रित रूप धारण किए रहता है।
श्लोक 19 (12.200.19)
खं वायुमग्निं सलिलं तथोर्वी । समन्ततोऽभ्याविशते शरीरी । नान्याश्रयाः कर्मसु वर्तमानाः । श्रोत्रादयः पञ्चगुणाञ्श्रयन्ते ॥
khaṃ vāyumagniṃ salilaṃ tathorvī | samantato'bhyāviśate śarīrī | nānyāśrayāḥ karmasu vartamānāḥ | śrotrādayaḥ pañcaguṇāñśrayante
देहधारी जीव आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में चारों ओर प्रवेश करता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ अपने कर्मों में लगी हुई किसी और पर आश्रित नहीं हैं; वे पाँच गुणों का ही आश्रय लेती हैं।
श्लोक 20 (12.200.20)
श्रोत्रं नभो घ्राणमथो पृथिव्या । स्तेजोमयं रूपमथो विपाकः । जलाश्रयं तेज उक्तं रसं च । वाय्वात्मकः स्पर्शकृतो गुणश्च ॥
śrotraṃ nabho ghrāṇamatho pṛthivyā | stejomayaṃ rūpamatho vipākaḥ | jalāśrayaṃ teja uktaṃ rasaṃ ca | vāyvātmakaḥ sparśakṛto guṇaśca
श्रोत्र आकाश का है और घ्राण पृथ्वी का; रूप तेजोमय है, और विपाक (पाचन) भी। जल पर आश्रित तेज और रस कहे गए हैं; और स्पर्श उत्पन्न करने वाला गुण वायुरूप है।
श्लोक 21 (12.200.21)
महत्सु भूतेषु च सन्ति पञ्च । पञ्चेन्द्रियार्थेषु तथेन्द्रियाणि । सर्वाणि चैतानि मनोनुगानि । बुद्धिं मनोऽन्वेति मतिः स्वभावम् ॥
mahatsu bhūteṣu ca santi pañca | pañcendriyārtheṣu tathendriyāṇi | sarvāṇi caitāni manonugāni | buddhiṃ mano'nveti matiḥ svabhāvam
पाँच इन्द्रियाँ महाभूतों में हैं और इन्द्रियाँ पाँच विषयों में; ये सब मन के अनुगामी हैं। मन बुद्धि का अनुसरण करता है, और मति स्वभाव का।
श्लोक 22 (12.200.22)
शुभाशुभं कर्म कृतं यदस्य । तदेव प्रेत्याददतेऽन्यदेहे । मनोऽनुवर्तन्ति परावराणि । जलौकसः स्रोत इवानुकूलम् ॥
śubhāśubhaṃ karma kṛtaṃ yadasya | tadeva pretyādadate'nyadehe | mano'nuvartanti parāvarāṇi | jalaukasaḥ srota ivānukūlam
इस जीव ने जो शुभ-अशुभ कर्म किया है, मरकर वह उसी कर्म को दूसरे शरीर में ग्रहण करता है। ऊँचे और नीचे सब मन के पीछे चलते हैं, जैसे जलचर अनुकूल धारा के पीछे।
श्लोक 23 (12.200.23)
चलं यथा दृष्टिपथं परैति । सूक्ष्मं महद्रूपमिवावभाति । तातप्यमानो न पतेच्च धीरः । परं तथा बुद्धिपथं परैति ॥
calaṃ yathā dṛṣṭipathaṃ paraiti | sūkṣmaṃ mahadrūpamivāvabhāti | tātapyamāno na patecca dhīraḥ | paraṃ tathā buddhipathaṃ paraiti
जैसे कोई चलती वस्तु दृष्टि के मार्ग में आ जाती है और सूक्ष्म वस्तु बड़े रूप की-सी दीखती है, वैसे ही धीर पुरुष अत्यन्त तप्त होकर भी नहीं गिरता, और परे बुद्धि के मार्ग को पहुँच जाता है।