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शान्ति पर्व · अध्याय 208

विष्णु का वराह रूप और दानवों का संहार

युधिष्ठिर पूछते हैं कि भगवान् ने पशु-योनि का रूप क्यों धारण किया। भीष्म वह कथा सुनाते हैं जो कश्यप ने मार्कण्डेय के आश्रम में ऋषियों से कही थी: हिरण्याक्ष के नेतृत्व में दानव देवताओं को सताने लगे और पृथ्वी पाताल में डूब गई। देवताओं के कहने पर अगस्त्य ने समुद्र पी लिया, तब ब्रह्मा ने बताया कि विष्णु वराह रूप में पृथ्वी के नीचे छिपे दानवों को शान्त करेंगे। विष्णु की गर्जना से दैत्य गिर पड़े, और ब्रह्मा ने भयभीत देवताओं को उस नाद का रहस्य बताकर धैर्य बँधाया।

अध्याय 207अध्याय-सूचीअध्याय 209

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.208.1)

पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम । श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन कृष्णमव्ययमीश्वरम् ॥

pitāmaha mahāprājña yudhi satyaparākrama | śrotumicchāmi kārtsnyena kṛṣṇamavyayamīśvaram

हे पितामह! हे महाप्राज्ञ! हे युद्ध में सत्य पराक्रम वाले! मैं अविनाशी ईश्वर कृष्ण के विषय में सम्पूर्ण रूप से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (12.208.2)

यच्चास्य तेजः सुमहद्यच्च कर्म पुरा कृतम् । तन्मे सर्वं यथातत्त्वं ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ ॥

yaccāsya tejaḥ sumahadyacca karma purā kṛtam | tanme sarvaṃ yathātattvaṃ brūhi tvaṃ puruṣarṣabha

हे पुरुषश्रेष्ठ! उनका जो महान् तेज है और प्राचीन काल में उन्होंने जो कर्म किया, वह सब आप मुझे यथार्थ रूप में बताइए।

श्लोक 3 (12.208.3)

तिर्यग्योनिगतो रूपं कथं धारितवान्प्रभुः । केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल ॥

tiryagyonigato rūpaṃ kathaṃ dhāritavānprabhuḥ | kena kāryanisargeṇa tamākhyāhi mahābala

प्रभु ने पशु-योनि का रूप कैसे धारण किया? और किस कार्य के लिए? हे महाबली! वह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (12.208.4)

पुराऽहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थितः । तत्रापश्यं मुनिगणान्समासीनान्सहस्रशः ॥

purā'haṃ mṛgayāṃ yāto mārkaṇḍeyāśrame sthitaḥ | tatrāpaśyaṃ munigaṇānsamāsīnānsahasraśaḥ

पहले मैं शिकार के लिए गया और मार्कण्डेय के आश्रम में ठहरा। वहाँ मैंने हजारों मुनियों को एक साथ बैठे देखा।

श्लोक 5 (12.208.5)

ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्रुरथो मयि । प्रतिगृह्य च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम् ॥

tataste madhuparkeṇa pūjāṃ cakruratho mayi | pratigṛhya ca tāṃ pūjāṃ pratyanandamṛṣīnaham

तब उन्होंने मधुपर्क देकर मेरा सत्कार किया, और उस सत्कार को स्वीकार करके मैंने ऋषियों का प्रत्युत्तर में अभिनन्दन किया।

श्लोक 6 (12.208.6)

कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा । मनः प्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु ॥

kathaiṣā kathitā tatra kaśyapena maharṣiṇā | manaḥ prahlādinīṃ divyāṃ tāmihaikamanāḥ śṛṇu

वहाँ महर्षि कश्यप ने यह कथा कही थी, जो दिव्य है और मन को आनन्द देने वाली है। उसे यहाँ एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 7 (12.208.7)

पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः । बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ॥

purā dānavamukhyā hi krodhalobhasamanvitāḥ | balena mattāḥ śataśo narakādyā mahāsurāḥ

पूर्वकाल में क्रोध और लोभ से भरे, बल के मद में चूर प्रमुख दानव थे, नरक आदि सैकड़ों महान् असुर,

श्लोक 8 (12.208.8)

तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः । न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ॥

tathaiva cānye bahavo dānavā yuddhadurmadāḥ | na sahante sma devānāṃ samṛddhiṃ tāmanuttamām

और युद्ध में उन्मत्त दूसरे बहुत-से दानव भी देवताओं की उस सर्वोत्तम समृद्धि को सहन नहीं करते थे।

श्लोक 9 (12.208.9)

नरकाद्या महाघोरा हिरण्याक्षमुपाश्रिताः । उद्योगं परमं चक्रुर्देवानां निग्रहे तदा ॥

narakādyā mahāghorā hiraṇyākṣamupāśritāḥ | udyogaṃ paramaṃ cakrurdevānāṃ nigrahe tadā

नरक आदि महाभयंकर दानव हिरण्याक्ष की शरण में गए और उन्होंने तब देवताओं को वश में करने का परम प्रयत्न किया।

श्लोक 10 (12.208.10)

नियुतं वत्सराणां तु वायुभक्षोऽभवत्तदा । हिरण्याक्षो महारौद्रो लेभे देवात्पितामहात् । वरानचिन्त्यानतुलाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

niyutaṃ vatsarāṇāṃ tu vāyubhakṣo'bhavattadā | hiraṇyākṣo mahāraudro lebhe devātpitāmahāt | varānacintyānatulāñśataśo'tha sahasraśaḥ

भयंकर हिरण्याक्ष एक नियुत वर्ष तक केवल वायु पीकर रहा, और उसने देव पितामह से सैकड़ों-हजारों अचिन्त्य और अतुलनीय वर प्राप्त किए।

श्लोक 11 (12.208.11)

दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा । न शर्म लेभिरे राजन्क्लिश्यमानास्ततस्ततः ॥

dānavairardyamānāstu devā devarṣayastathā | na śarma lebhire rājankliśyamānāstatastataḥ

दानवों से सताए जाते हुए देवता और देवर्षि, हे राजन्! जहाँ-तहाँ पीड़ित होकर कहीं शान्ति न पा सके।

श्लोक 12 (12.208.12)

पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन्दिवौकसः । दानवैरभिसंकीर्णां घोररूपैर्महाबलैः । भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् ॥

pṛthivīmārtarūpāṃ te samapaśyandivaukasaḥ | dānavairabhisaṃkīrṇāṃ ghorarūpairmahābalaiḥ | bhārārtāmaprahṛṣṭāṃ ca duḥkhitāṃ saṃnimajjatīm

स्वर्गवासियों ने देखा कि पृथ्वी दुःखी है; वह भयंकर रूप वाले महाबली दानवों से भरी हुई, भार से पीड़ित, उदास, शोकग्रस्त और डूबती जा रही है।

श्लोक 13 (12.208.13)

गृहीत्वा पृथिवी देवी पाताले न्यवसत्तदा । ततस्त्रैलोक्यमखिलं निरोषधिगणान्वितम् । निःस्वाध्यायवषट्कारमभूत्सर्वं समन्ततः ॥

gṛhītvā pṛthivī devī pātāle nyavasattadā | tatastrailokyamakhilaṃ niroṣadhigaṇānvitam | niḥsvādhyāyavaṣaṭkāramabhūtsarvaṃ samantataḥ

पकड़ ली गई पृथ्वी देवी तब पाताल में रहने लगी। तब तीनों लोक सब ओर औषधियों के समूह से रहित और स्वाध्याय तथा वषट्कार से शून्य हो गए।

श्लोक 14 (12.208.14)

अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन् । कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन्दानवैरभिमर्दनम् ॥

athāditeyāḥ saṃtrastā brahmāṇamidamabruvan | kathaṃ śakṣyāmahe brahmandānavairabhimardanam

तब भयभीत आदितेयों ने ब्रह्मा से यह कहा: "हे ब्रह्मन्! दानवों के इस उत्पीड़न को हम कैसे सह सकेंगे?"

देवा ऊचुः

श्लोक 15 (12.208.15)

हिरण्याक्षेण भगवन्गृहीतेयं वसुन्धरा । न शक्ष्यामो वयं तत्र प्रवेष्टुं जलदुर्गमम् ॥

hiraṇyākṣeṇa bhagavangṛhīteyaṃ vasundharā | na śakṣyāmo vayaṃ tatra praveṣṭuṃ jaladurgamam

"भगवन्! हिरण्याक्ष ने इस पृथ्वी को पकड़ लिया है। जल के कारण वहाँ पहुँचना कठिन है, इसलिए हम वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते।"

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (12.208.16)

तानाह भगवान्ब्रह्मा मुनिरेव प्रसाद्यताम् । अगस्त्योऽसौ महातेजाः पातु तज्जलमञ्जसा ॥

tānāha bhagavānbrahmā munireva prasādyatām | agastyo'sau mahātejāḥ pātu tajjalamañjasā

भगवान् ब्रह्मा ने उनसे कहा: "केवल मुनि को ही प्रसन्न किया जाए। महातेजस्वी अगस्त्य उस जल को शीघ्र पी लें।"

श्लोक 17 (12.208.17)

तथेति चोक्त्वा ते देवा मुनिमूचुर्मुदान्विताः । त्रायस्व लोकान्विप्रर्षे जलमेतत्क्षयं नय ॥

tatheti coktvā te devā munimūcurmudānvitāḥ | trāyasva lokānviprarṣe jalametatkṣayaṃ naya

"ऐसा ही हो" कहकर आनन्द से भरे देवताओं ने मुनि से कहा: "हे विप्रर्षि! लोकों की रक्षा कीजिए, इस जल का क्षय कर दीजिए।"

श्लोक 18 (12.208.18)

तथेति चोक्त्वा भगवान्कालानलसमद्युतिः । ध्यायञ्जलादनिवहं स क्षणेन पपौ जलम् ॥

tatheti coktvā bhagavānkālānalasamadyutiḥ | dhyāyañjalādanivahaṃ sa kṣaṇena papau jalam

"ऐसा ही हो" कहकर प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी भगवान् ने ध्यान लगाकर क्षण भर में जल की उस सारी राशि को पी लिया।

श्लोक 19 (12.208.19)

शोषिते तु समुद्रे च देवाः सर्षिपुरोगमाः । ब्रह्माणं प्रणिपत्योचुर्मुनिना शोषितं जलम् । इति भूयः समाचक्ष्व किं करिष्यामहे विभो ॥

śoṣite tu samudre ca devāḥ sarṣipurogamāḥ | brahmāṇaṃ praṇipatyocurmuninā śoṣitaṃ jalam | iti bhūyaḥ samācakṣva kiṃ kariṣyāmahe vibho

समुद्र के सूख जाने पर ऋषियों को आगे करके देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम करके कहा: "मुनि ने जल पी लिया है। हे प्रभो! अब आगे फिर बताइए, हम क्या करें।"

श्लोक 20 (12.208.20)

स्वयंभूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया ॥

svayaṃbhūstānuvācedaṃ nisṛṣṭo'tra vidhirmayā

स्वयंभू ने उनसे यह कहा: "यहाँ उपाय मेरे द्वारा निश्चित कर दिया गया है।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 21 (12.208.21)

ते वरेणाभिसंपन्ना बलेन च मदेन च । नावबुद्ध्यन्ति संमूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम् । वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि ॥

te vareṇābhisaṃpannā balena ca madena ca | nāvabuddhyanti saṃmūḍhā viṣṇumavyaktadarśanam | varāharūpiṇaṃ devamadhṛṣyamamarairapi

"वे वर, बल और मद से मतवाले मूढ़ अदृश्य रूप वाले विष्णु को नहीं पहचानते, जो वराह रूप धारण करने वाले देव हैं और अमरों के लिए भी दुर्धर्ष हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (12.208.22)

एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः । अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः । शमयिष्यति तच्छ्रुत्वा जहृषुः सुरसत्तमाः ॥

eṣa vegena gatvā hi yatra te dānavādhamāḥ | antarbhūmigatā ghorā nivasanti sahasraśaḥ | śamayiṣyati tacchrutvā jahṛṣuḥ surasattamāḥ

वे वेग से वहाँ जाएँगे जहाँ वे अधम दानव भयंकर रूप में हजारों की संख्या में पृथ्वी के भीतर रहते हैं, और उन्हें शान्त करेंगे।" यह सुनकर श्रेष्ठ देवता हर्षित हुए।

श्लोक 23 (12.208.23)

ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थितः । अन्तर्भूमिं संप्रविश्य जगाम दितिजान्प्रति ॥

tato viṣṇurmahātejā vārāhaṃ rūpamāsthitaḥ | antarbhūmiṃ saṃpraviśya jagāma ditijānprati

तब महातेजस्वी विष्णु वराह रूप धारण करके पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट हुए और दिति के पुत्रों की ओर गए।

श्लोक 24 (12.208.24)

दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्वममानुषम् । प्रसह्य तरसा सर्वे संतस्थुः कालमोहिताः ॥

dṛṣṭvā ca sahitāḥ sarve daityāḥ satvamamānuṣam | prasahya tarasā sarve saṃtasthuḥ kālamohitāḥ

सब दैत्यों ने मिलकर उस अमानुष प्राणी को देखा और काल से मोहित होकर बलपूर्वक वेग से उसके सामने डट गए।

श्लोक 25 (12.208.25)

ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम् । संक्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ॥

tataste samabhidrutya varāhaṃ jagṛhuḥ samam | saṃkruddhāśca varāhaṃ taṃ vyakarṣanta samantataḥ

फिर वे सब एक साथ दौड़कर वराह को पकड़ बैठे और क्रोध में भरकर उन्हें चारों ओर खींचने लगे।

श्लोक 26 (12.208.26)

दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छ्रिताः । नाशक्नुवंश्च किंचित्ते तस्य कर्तुं तदा विभो ॥

dānavendrā mahākāyā mahāvīryabalocchritāḥ | nāśaknuvaṃśca kiṃcitte tasya kartuṃ tadā vibho

परन्तु विशाल शरीर वाले, महापराक्रमी और बल से ऊँचे उठे हुए दानव-प्रमुख उस समय उनका कुछ भी न कर सके, हे प्रभो!

श्लोक 27 (12.208.27)

ततोऽगच्छन्विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा । संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रशः ॥

tato'gacchanvismayaṃ te dānavendrā bhayaṃ tathā | saṃśayaṃ gatamātmānaṃ menire ca sahasraśaḥ

तब वे दानव-प्रमुख विस्मय और भय में पड़ गए और हजारों की संख्या में अपने को संकट में पड़ा मानने लगे।

श्लोक 28 (12.208.28)

ततो देवाधिदेवः स योगात्मा योगसारथिः । योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम ॥

tato devādhidevaḥ sa yogātmā yogasārathiḥ | yogamāsthāya bhagavāṃstadā bharatasattama

तब देवताओं के देव, योगात्मा, योग के सारथि भगवान् ने, हे भरतश्रेष्ठ! योग का आश्रय लेकर

श्लोक 29 (12.208.29)

विननाद महानादं क्षोभयन्दैत्यदानवान् । सन्नादिता येन लोकाः सर्वाश्चैव दिशो दश ॥

vinanāda mahānādaṃ kṣobhayandaityadānavān | sannāditā yena lokāḥ sarvāścaiva diśo daśa

बड़ी गर्जना की, जिससे दैत्य और दानव काँप उठे और सारे लोक तथा दसों दिशाएँ गूँज उठीं।

श्लोक 30 (12.208.30)

तेन सन्नादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत् । संश्रान्ताश्च दिशः सर्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ॥

tena sannādaśabdena lokānāṃ kṣobha āgamat | saṃśrāntāśca diśaḥ sarvā devāḥ śakrapurogamāḥ

उस गर्जना के शब्द से लोकों में खलबली मच गई, सब दिशाएँ घबरा उठीं और इन्द्र को आगे रखने वाले देवता भी।

श्लोक 31 (12.208.31)

निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा । स्थावरं जङ्गमं चैव तेन नादेन मोहितम् ॥

nirviceṣṭaṃ jagaccāpi babhūvātibhṛśaṃ tadā | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva tena nādena mohitam

तब सारा जगत् अत्यन्त निश्चेष्ट हो गया; स्थावर और जंगम सब उस नाद से मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 32 (12.208.32)

ततस्ते दानवाः सर्वे तेन नादेन भीषिताः । पेतुर्गतासवश्चैव विष्णुतेजः प्रमोहिताः ॥

tataste dānavāḥ sarve tena nādena bhīṣitāḥ | peturgatāsavaścaiva viṣṇutejaḥ pramohitāḥ

तब वे सब दानव उस नाद से भयभीत होकर और विष्णु के तेज से मोहित होकर प्राणहीन हो गिर पड़े।

श्लोक 33 (12.208.33)

त्रस्तांश्च देवानालोक्य ब्रह्मा प्राह पितामहः । योगेश्वरोऽयं भगवान्वाराहं रूपमास्थितः । नर्दमानोऽत्र संयाति मा भैष्ट सुरसत्तमाः ॥

trastāṃśca devānālokya brahmā prāha pitāmahaḥ | yogeśvaro'yaṃ bhagavānvārāhaṃ rūpamāsthitaḥ | nardamāno'tra saṃyāti mā bhaiṣṭa surasattamāḥ

देवताओं को भयभीत देखकर पितामह ब्रह्मा ने कहा: "ये योगेश्वर भगवान् हैं, जिन्होंने वराह रूप धारण किया है। ये गर्जना करते हुए यहाँ आ रहे हैं। हे श्रेष्ठ देवताओ! डरो मत।"

श्लोक 34 (12.208.34)

एवमुक्त्वा ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे पितामहः । देवता मुनयश्चैव विष्णुं वै मुक्तिहेतवे ॥

evamuktvā tato brahmā namaścakre pitāmahaḥ | devatā munayaścaiva viṣṇuṃ vai muktihetave

यह कहकर पितामह ब्रह्मा ने विष्णु को प्रणाम किया, और देवताओं तथा मुनियों ने भी मुक्ति के लिए उन्हें नमस्कार किया।

श्लोक 35 (12.208.35)

ततो हरिर्महातेजा ब्रह्माणमभिनन्द्य च । रसातलगतश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम् । खुरैर्विदारयामास मांसमेदोस्थिसंचयान् ॥

tato harirmahātejā brahmāṇamabhinandya ca | rasātalagataścāpi varāhastridaśadviṣām | khurairvidārayāmāsa māṃsamedosthisaṃcayān

तब महातेजस्वी हरि ने ब्रह्मा का अभिनन्दन किया, और रसातल में गए हुए वराह ने खुरों से देवशत्रुओं के मांस, मेदा और हड्डियों के ढेरों को चीर डाला।

श्लोक 36 (12.208.36)

नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः । पद्मनाभो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः ॥

nādena tena mahatā sanātana iti smṛtaḥ | padmanābho mahāyogī bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ

उस महान् नाद के कारण वे सनातन नाम से स्मरण किए जाते हैं: पद्मनाभ, महायोगी, भूतात्मा और भूतभावन।

श्लोक 37 (12.208.37)

ततो देवगणाः सर्वे पितामहमुपाद्रवन् । तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्चैव जगत्पतिम् ॥

tato devagaṇāḥ sarve pitāmahamupādravan | tatra gatvā mahātmānamūcuścaiva jagatpatim

तब सब देवगण पितामह के पास दौड़े और वहाँ जाकर उन महात्मा जगत्पति से बोले:

देवा ऊचुः

श्लोक 38 (12.208.38)

नादोऽयं कीदृशो देव नैनं विद्म वयं प्रभो । कोऽसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत् । देवाश्च दानवाश्चैव मोहितास्तस्य तेजसा ॥

nādo'yaṃ kīdṛśo deva nainaṃ vidma vayaṃ prabho | ko'sau hi kasya vā nādo yena vihvalitaṃ jagat | devāśca dānavāścaiva mohitāstasya tejasā

"हे देव! यह कैसा नाद है? हे प्रभो! हम इसे नहीं जानते। यह कौन है और यह किसका नाद है, जिससे जगत् विह्वल हो गया है? देवता और दानव दोनों उसके तेज से मोहित हो गए हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (12.208.39)

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्वाराहं रूपमास्थितः । उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभिः ॥

etasminnantare viṣṇurvārāhaṃ rūpamāsthitaḥ | udatiṣṭhanmahābāho stūyamāno maharṣibhiḥ

इसी बीच हे महाबाहो! वराह रूप में स्थित विष्णु महर्षियों से स्तुति किए जाते हुए ऊपर उठे।

पितामह उवाच

श्लोक 40 (12.208.40)

दिव्यं------ युद्धमासीन्महात्मनोः । हिरण्याक्षस्य विष्णोश्च सर्वसंक्षोभकारणम् ॥

divyaṃ------ yuddhamāsīnmahātmanoḥ | hiraṇyākṣasya viṣṇośca sarvasaṃkṣobhakāraṇam

"हिरण्याक्ष और विष्णु, इन दो महात्माओं के बीच दिव्य युद्ध हुआ था, जो सबको क्षुब्ध कर देने वाला था।

श्लोक 41 (12.208.41)

जघान च हिरण्याक्षमन्तर्भूमिगतं हरिः । तदाकर्ण्य महातेजा ब्रह्मा मधुरमब्रवीत् ॥

jaghāna ca hiraṇyākṣamantarbhūmigataṃ hariḥ | tadākarṇya mahātejā brahmā madhuramabravīt

और हरि ने पृथ्वी के भीतर गए हुए हिरण्याक्ष को मार डाला।" यह सुनकर महातेजस्वी ब्रह्मा ने मधुर वचन कहा।

श्लोक 42 (12.208.42)

निहत्य दानवपतीन्महावर्ष्मा महाबलः । एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः ॥

nihatya dānavapatīnmahāvarṣmā mahābalaḥ | eṣa devo mahāyogī bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ

"दानवों के स्वामियों को मारकर ये विशाल देहधारी, महाबली देव, महायोगी, भूतात्मा और भूतभावन,

श्लोक 43 (12.208.43)

सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथाऽऽत्मनः । स्थिरीभवत कृष्णोऽयं सर्वविध्नविनाशनः ॥

sarvabhūteśvaro yogī munirātmā tathā''tmanaḥ | sthirībhavata kṛṣṇo'yaṃ sarvavidhnavināśanaḥ

सर्वभूतेश्वर, योगी, मुनि और आत्मा के भी आत्मा, ये कृष्ण हैं जो सब विघ्नों का नाश करने वाले हैं; आप सब स्थिर हो जाइए।

श्लोक 44 (12.208.44)

कृत्वा कर्मातिसाध्वेतदशक्यममितप्रभः । समायातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः ॥

kṛtvā karmātisādhvetadaśakyamamitaprabhaḥ | samāyātaḥ svamātmānaṃ mahābhāgo mahādyutiḥ

यह अत्यन्त उत्तम और दूसरों के लिए असम्भव कर्म करके अपार तेज वाले, महाभाग और महाद्युतिमान् प्रभु अपने स्वरूप में लौट आए हैं।

श्लोक 45 (12.208.45)

पद्मनाभो महायोगी पुराणपुरुषोत्तमः । न संतापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमैः ॥

padmanābho mahāyogī purāṇapuruṣottamaḥ | na saṃtāpo na bhīḥ kāryā śoko vā surasattamaiḥ

वे पद्मनाभ हैं, महायोगी हैं, पुराणपुरुषोत्तम हैं; श्रेष्ठ देवताओं को न सन्ताप करना चाहिए, न भय और न शोक।

श्लोक 46 (12.208.46)

विधिरेष प्रभावश्च कालः संक्षयकारकः । लोकान्धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना ॥

vidhireṣa prabhāvaśca kālaḥ saṃkṣayakārakaḥ | lokāndhārayatā tena nādo mukto mahātmanā

यह विधान है, यह उनका प्रभाव है, और यह संहार करने वाला काल है। लोकों को धारण करते हुए उन महात्मा ने यह नाद छोड़ा है।

श्लोक 47 (12.208.47)

स एष हि महाबाहुः सर्वलोकनमस्कृतः । अच्युतः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूतादिरीश्वरः ॥

sa eṣa hi mahābāhuḥ sarvalokanamaskṛtaḥ | acyutaḥ puṇḍarīkākṣaḥ sarvabhūtādirīśvaraḥ

वे ही महाबाहु हैं, जिन्हें सब लोक नमस्कार करते हैं; वे अच्युत, कमलनयन, सब भूतों के आदि और ईश्वर हैं।"

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