शान्ति पर्व · अध्याय 21
देवस्थान: सन्तोष और राजाओं का धर्म
देवस्थान आगे बृहस्पति द्वारा इन्द्र को दी गई प्राचीन शिक्षा का स्मरण कराते हैं: सन्तोष परम सुख है, और कामनाओं को कछुए के अंगों की तरह समेट लेने पर आत्मा निर्मल हो जाती है। लोग अनेक मार्गों की प्रशंसा करते हैं, पर ज्ञानियों का निश्चय है कि जो धर्म किसी प्राणी से द्रोह नहीं करता, वही सज्जनों को मान्य है। वे न्यायपूर्वक शासन करने वाले, पुत्र को राज्य सौंपकर वन जाने वाले राजा का वर्णन करते हैं, कहते हैं कि निर्वाण कठिन है, और इसी धर्म से स्वर्ग पाने वाले रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, साध्यों और राजर्षियों का नाम लेते हैं।
देवस्थान उवाच
श्लोक 1 (12.21.1)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रेण समये पृष्टो यदुवाच बृहस्पतिः ॥
atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | indreṇa samaye pṛṣṭo yaduvāca bṛhaspatiḥ
इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — किसी समय इन्द्र के पूछने पर बृहस्पति ने जो कहा था।
श्लोक 2 (12.21.2)
संतोषो वै स्वर्गसमः संतोषः परमं सुखम् । तुष्टेर्न किंचित्परतः सा सम्यक्प्रतितिष्ठति ॥
saṃtoṣo vai svargasamaḥ saṃtoṣaḥ paramaṃ sukham | tuṣṭerna kiṃcitparataḥ sā samyakpratitiṣṭhati
सन्तोष स्वर्ग के समान है; सन्तोष परम सुख है। सन्तोष से परे कुछ नहीं; वही भली-भाँति प्रतिष्ठित होता है।
श्लोक 3 (12.21.3)
यदा संहरते कामान्कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । तदाऽऽत्मज्योतिरचिरात्स्वात्मन्येव प्रसीदति ॥
yadā saṃharate kāmānkūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | tadā''tmajyotiracirātsvātmanyeva prasīdati
जब मनुष्य कामनाओं को सब ओर से वैसे ही समेट लेता है जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, तब आत्मा की ज्योति शीघ्र ही अपने आत्मा में ही निर्मल हो जाती है।
श्लोक 4 (12.21.4)
न विभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति । कामद्वेषौ च जयति तदाऽऽत्मानं च पश्यति ॥
na vibheti yadā cāyaṃ yadā cāsmānna bibhyati | kāmadveṣau ca jayati tadā''tmānaṃ ca paśyati
जब वह किसी से नहीं डरता और उससे भी कोई नहीं डरता, जब वह काम और द्वेष को जीत लेता है, तब वह आत्मा को देख लेता है।
श्लोक 5 (12.21.5)
यदाऽसौ सर्वभूतानां न द्रुह्यति न काङ्क्षति । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
yadā'sau sarvabhūtānāṃ na druhyati na kāṅkṣati | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā
जब वह कर्म, मन और वाणी से किसी प्राणी से द्रोह नहीं करता और किसी से कुछ चाहता नहीं, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (12.21.6)
एवं कौन्तेय भूतानि तंतं धर्मं तथातथा । तदाऽऽत्मना प्रपश्यन्ति तस्माद्बुध्यस्व भारत ॥
evaṃ kaunteya bhūtāni taṃtaṃ dharmaṃ tathātathā | tadā''tmanā prapaśyanti tasmādbudhyasva bhārata
हे कुन्तीपुत्र! इसी प्रकार प्राणी अपने-अपने आत्मा से उस-उस धर्म को भिन्न-भिन्न रूप में देखते हैं; इसलिए हे भारत! इसे समझो।
श्लोक 7 (12.21.7)
अन्ये साम प्रशंसन्ति व्यायाममपरे जनाः । नैकं न चापरं केचिदुभयं च तथाऽपरे ॥
anye sāma praśaṃsanti vyāyāmamapare janāḥ | naikaṃ na cāparaṃ kecidubhayaṃ ca tathā'pare
कुछ लोग साम (मेल-मिलाप) की प्रशंसा करते हैं, कुछ उद्योग की; कुछ न एक की न दूसरे की, और कुछ दोनों की।
श्लोक 8 (12.21.8)
यज्ञमेके प्रशंसन्ति संन्यासमपरे जनाः ॥
yajñameke praśaṃsanti saṃnyāsamapare janāḥ
कुछ यज्ञ की प्रशंसा करते हैं, कुछ संन्यास की।
श्लोक 9 (12.21.9)
दानमेके प्रशंसन्ति केचिच्चैव प्रतिग्रहम् । केचित्सर्वं परित्यज्य तूष्णीं ध्यायन्त आसते ॥
dānameke praśaṃsanti keciccaiva pratigraham | kecitsarvaṃ parityajya tūṣṇīṃ dhyāyanta āsate
कुछ दान की प्रशंसा करते हैं, कुछ दान लेने की; कुछ सब कुछ छोड़कर चुपचाप ध्यान में बैठे रहते हैं।
श्लोक 10 (12.21.10)
राज्यमेके प्रशंसन्ति प्रजानां परिपालनम् । हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च केचिदेकान्तशीलिनः ॥
rājyameke praśaṃsanti prajānāṃ paripālanam | hatvā chittvā ca bhittvā ca kecidekāntaśīlinaḥ
कुछ राज्य की प्रशंसा करते हैं, अर्थात् प्रजा के पालन की; और कुछ एक ही लीक पर चलने वाले मारते, चीरते और काटते हैं।
श्लोक 11 (12.21.11)
एतत्सर्वं समालोक्य बुधानामेव निश्चयः । अद्रोहेणैव भूतानां यो धर्मः स सतां मतः ॥
etatsarvaṃ samālokya budhānāmeva niścayaḥ | adroheṇaiva bhūtānāṃ yo dharmaḥ sa satāṃ mataḥ
यह सब विचारकर ज्ञानियों का निश्चय है कि जो धर्म किसी प्राणी से द्रोह किए बिना है, वही सज्जनों को मान्य है।
श्लोक 12 (12.21.12)
अद्रोहः सत्यवचनं संविभागो दया दमः । प्रजनं स्वेषु दारेषु मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
adrohaḥ satyavacanaṃ saṃvibhāgo dayā damaḥ | prajanaṃ sveṣu dāreṣu mārdavaṃ hrīracāpalam
द्रोह का अभाव, सत्य वचन, बाँटकर भोगना, दया, दम, अपनी पत्नियों में सन्तानोत्पत्ति, कोमलता, लज्जा और अचंचलता।
श्लोक 13 (12.21.13)
एवं धर्मं प्रधानेष्टं मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् । तस्मादेतत्प्रयत्नेन कौन्तेय प्रतिपालय ॥
evaṃ dharmaṃ pradhāneṣṭaṃ manuḥ svāyaṃbhuvo'bravīt | tasmādetatprayatnena kaunteya pratipālaya
मनु स्वायम्भुव ने इसी प्रकार धर्म को प्रधान इष्ट बताया है; इसलिए हे कुन्तीपुत्र! प्रयत्नपूर्वक इसका पालन करो।
श्लोक 14 (12.21.14)
यो हि राज्ये स्थितः शश्वद्वशी तुल्यप्रियाप्रियः । क्षत्रियो यज्ञशिष्टाशी राजा शास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥
yo hi rājye sthitaḥ śaśvadvaśī tulyapriyāpriyaḥ | kṣatriyo yajñaśiṣṭāśī rājā śāstrārthatattvavit
जो क्षत्रिय राजा राज्य में स्थित रहकर सदा जितेन्द्रिय हो, प्रिय और अप्रिय को समान माने, यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाए और राजशास्त्र के अर्थ के तत्त्व को जाने —
श्लोक 15 (12.21.15)
असाधुनिग्रहरतः साधूनां प्रग्रहे रतः । धर्मवर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मतः ॥
asādhunigraharataḥ sādhūnāṃ pragrahe rataḥ | dharmavartmani saṃsthāpya prajā varteta dharmataḥ
दुष्टों का निग्रह करने और सज्जनों को सँभालने में रत होकर, प्रजा को धर्म के मार्ग पर स्थापित करके धर्मानुसार व्यवहार करे।
श्लोक 16 (12.21.16)
पुत्रसंक्रामितश्रीश्च वने वन्येन वर्तयेत् । विधानमाश्रमाणां वै कुर्यात्कर्माण्यतन्द्रितः ॥
putrasaṃkrāmitaśrīśca vane vanyena vartayet | vidhānamāśramāṇāṃ vai kuryātkarmāṇyatandritaḥ
अपनी राजलक्ष्मी पुत्र को सौंपकर वन में वन की उपज से जीवन चलाए और आश्रमों के लिए विहित कर्मों को आलस्यरहित होकर करे।
श्लोक 17 (12.21.17)
य एवं वर्तते राजन्स राजा धर्मनिश्चितः । तस्यायं च परश्चैव लोकः स्यात्संफलोदयः ॥
ya evaṃ vartate rājansa rājā dharmaniścitaḥ | tasyāyaṃ ca paraścaiva lokaḥ syātsaṃphalodayaḥ
हे राजन्! जो राजा इस प्रकार आचरण करता है, धर्म में दृढ़ वह राजा — उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों सफल होंगे।
श्लोक 18 (12.21.18)
निर्वाणं हि सुदुष्प्राप्यं बहुविघ्नं च मे मतम् ॥
nirvāṇaṃ hi suduṣprāpyaṃ bahuvighnaṃ ca me matam
किन्तु मेरे मत में निर्वाण अत्यन्त दुर्लभ और बहुत विघ्नों वाला है।
श्लोक 19 (12.21.19)
एवं धर्ममनुक्रान्ताः सत्यदानतपः पराः । आनृशंस्यगुणैर्युक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः ॥
evaṃ dharmamanukrāntāḥ satyadānatapaḥ parāḥ | ānṛśaṃsyaguṇairyuktāḥ kāmakrodhavivarjitāḥ
इस प्रकार धर्म का पालन करने वाले, सत्य, दान और तप में लगे, दयालुता के गुणों से युक्त तथा काम-क्रोध से रहित —
श्लोक 20 (12.21.20)
प्रजानां पालने युक्ता धर्ममुत्तममास्थिताः । गोब्राह्मणार्थे युध्यन्तः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥
prajānāṃ pālane yuktā dharmamuttamamāsthitāḥ | gobrāhmaṇārthe yudhyantaḥ prāptā gatimanuttamām
प्रजा के पालन में लगे, उत्तम धर्म में स्थित, गौओं और ब्राह्मणों के लिए युद्ध करते हुए वे सर्वोत्तम गति को प्राप्त हुए।
श्लोक 21 (12.21.21)
एवं रुद्राः सवसवस्तथाऽऽदित्याः परंतप । साध्या राजर्षिसङ्घाश्च धर्ममेतं समाश्रिताः । अप्रमत्तास्ततः स्वर्गं प्राप्ताः पुण्यैः स्वकर्मभिः ॥
evaṃ rudrāḥ savasavastathā''dityāḥ paraṃtapa | sādhyā rājarṣisaṅghāśca dharmametaṃ samāśritāḥ | apramattāstataḥ svargaṃ prāptāḥ puṇyaiḥ svakarmabhiḥ
हे परंतप! इसी प्रकार वसुओं सहित रुद्र, आदित्य, साध्य और राजर्षियों के समूह इस धर्म का आश्रय लेकर प्रमाद-रहित हुए और अपने पुण्य कर्मों से स्वर्ग को प्राप्त हुए।