Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 20

देवस्थान: सारा धन यज्ञ के लिए है

तपस्वी देवस्थान अर्जुन के इस कथन को उठाते हैं कि धन से बढ़कर कुछ नहीं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि पृथ्वी धर्म से जीती गई है और उसे व्यर्थ नहीं त्यागना चाहिए, कि चार सोपानों की सीढ़ी ब्रह्म पर टिकी है, और कि उन्हें प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने चाहिए। धन यज्ञ के लिए ही रचा गया है — इसके प्रमाण में वे इन्द्र, महादेव, मरुत्त और हरिश्चन्द्र का उदाहरण देते हैं, जो यज्ञ से ऊँचे उठे।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.20.1)

अस्मिन्वाक्यान्तरे वक्ता देवस्थानो महातपाः । अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिरम् ॥

asminvākyāntare vaktā devasthāno mahātapāḥ | abhinītataraṃ vākyamityuvāca yudhiṣṭhiram

इसी बीच कुशल वक्ता, महातपस्वी देवस्थान ने युधिष्ठिर से और भी युक्तियुक्त वचन कहे।

देवस्थान उवाच

श्लोक 2 (12.20.2)

यद्वचः फल्गुनेनोक्तं न ज्यायोऽस्ति धनादिति । अत्र ते वर्तयिष्यामि तदेकान्तमनाः शृणु ॥

yadvacaḥ phalgunenoktaṃ na jyāyo'sti dhanāditi | atra te vartayiṣyāmi tadekāntamanāḥ śṛṇu

अर्जुन ने जो कहा कि धन से बढ़कर कुछ नहीं है, उस विषय में मैं तुमसे कहूँगा; एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 3 (12.20.3)

अजातशत्रो धर्मेण कृत्स्ना ते वसुधा जिता । तां जित्वा च वृथा राजन्न परित्यक्तुमर्हसि ॥

ajātaśatro dharmeṇa kṛtsnā te vasudhā jitā | tāṃ jitvā ca vṛthā rājanna parityaktumarhasi

हे अजातशत्रु! तुमने धर्म से समस्त पृथ्वी जीती है; उसे जीतकर, हे राजन्! तुम्हें उसे व्यर्थ ही नहीं त्यागना चाहिए।

श्लोक 4 (12.20.4)

चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मण्येषा प्रतिष्ठिता । तां क्रमेण महाबाहो यथावज्जय पार्थिव । तस्मात्पार्थ महायज्ञैर्यजस्व बहुदक्षिणैः ॥

catuṣpadī hi niḥśreṇī brahmaṇyeṣā pratiṣṭhitā | tāṃ krameṇa mahābāho yathāvajjaya pārthiva | tasmātpārtha mahāyajñairyajasva bahudakṣiṇaiḥ

चार सोपानों वाली यह सीढ़ी ब्रह्म में प्रतिष्ठित है; हे महाबाहो पृथ्वीपति! उस पर क्रम से यथाविधि चढ़ो। इसलिए हे पार्थ! बहुत दक्षिणा वाले महायज्ञों से यजन करो।

श्लोक 5 (12.20.5)

स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथाऽपरे । कर्मनिष्ठाश्च बुद्ध्यर्थास्तपोनिष्ठाश्च पार्थिव ॥

svādhyāyayajñā ṛṣayo jñānayajñāstathā'pare | karmaniṣṭhāśca buddhyarthāstaponiṣṭhāśca pārthiva

कुछ ऋषि स्वाध्याय को ही यज्ञ मानते हैं, दूसरे ज्ञान को; हे राजन्! कुछ कर्मनिष्ठ हैं, कुछ बोध के अभिलाषी और कुछ तपोनिष्ठ।

श्लोक 6 (12.20.6)

वैखानसानां कौन्तेय वचनं श्रूयते यथा ॥

vaikhānasānāṃ kaunteya vacanaṃ śrūyate yathā

हे कुन्तीपुत्र! वैखानस मुनियों का वचन इस प्रकार सुना जाता है —

श्लोक 7 (12.20.7)

ईहेत धनहेतोर्यस्तस्यानीहा गरीयसी । भूयान्दोषो हि वर्धेत यस्तत्कर्म समाश्रयेत् ॥

īheta dhanahetoryastasyānīhā garīyasī | bhūyāndoṣo hi vardheta yastatkarma samāśrayet

जो धन के लिए चेष्टा करता है, उसके लिए चेष्टा न करना श्रेष्ठ है; क्योंकि जो उस कर्म का आश्रय लेता है, उसमें बहुत बड़ा दोष बढ़ता है।

श्लोक 8 (12.20.8)

कृत्स्नं च धनसंहारं कुर्वन्ति विधिकारणात् । आत्मना तृपितो बुद्ध्या भ्रूणहत्यां न बुध्यते ॥

kṛtsnaṃ ca dhanasaṃhāraṃ kurvanti vidhikāraṇāt | ātmanā tṛpito buddhyā bhrūṇahatyāṃ na budhyate

विधि (यज्ञ) के बहाने लोग सारा धन बटोरते हैं; और अपने ही में तृप्त वह अपनी बुद्धि से भ्रूणहत्या के पाप को नहीं समझता।

श्लोक 9 (12.20.9)

अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते । अर्हानर्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥

anarhate yaddadāti na dadāti yadarhate | arhānarhāparijñānāddānadharmo'pi duṣkaraḥ

जो अपात्र को देता है और पात्र को नहीं देता — पात्र और अपात्र को न पहचानने के कारण दान का धर्म भी निभाना कठिन है।

श्लोक 10 (12.20.10)

यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा । यज्ञादिष्टः पुरुषो रक्षिता च । तस्मात्सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं । धनं ततोऽनन्तर एव कामः ॥

yajñāya sṛṣṭāni dhanāni dhātrā | yajñādiṣṭaḥ puruṣo rakṣitā ca | tasmātsarvaṃ yajña evopayojyaṃ | dhanaṃ tato'nantara eva kāmaḥ

धाता ने धन यज्ञ के लिए रचा है; यज्ञ के लिए नियुक्त पुरुष ही उसका रक्षक भी है। इसलिए सब कुछ यज्ञ में ही लगाना चाहिए; उसके बाद धन आता है, और उसके भी बाद काम।

श्लोक 11 (12.20.11)

यज्ञैरिन्द्रो विविधै रत्नवद्भि । र्देवान्सर्वानभ्ययाद्भूरितेजाः । तेनेन्द्रत्वं प्राप्य विभ्राजतेऽसौ । तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपयोज्यम् ॥

yajñairindro vividhai ratnavadbhi | rdevānsarvānabhyayādbhūritejāḥ | tenendratvaṃ prāpya vibhrājate'sau | tasmādyajñe sarvamevopayojyam

रत्नों से भरे नाना यज्ञों द्वारा महातेजस्वी इन्द्र ने सब देवताओं को पीछे छोड़ दिया; उन्हीं से इन्द्रपद पाकर वे शोभित हैं। इसलिए सब कुछ यज्ञ में ही लगाना चाहिए।

श्लोक 12 (12.20.12)

महादेवः सर्वयज्ञे महात्मा । हुत्वाऽऽत्मानं देवदेवो बभूव । विश्वाँल्लोकान्व्याप्य विष्टभ्य कीर्त्या । विराजते द्युतिमान्कृत्तिवासाः ॥

mahādevaḥ sarvayajñe mahātmā | hutvā''tmānaṃ devadevo babhūva | viśvām̐llokānvyāpya viṣṭabhya kīrtyā | virājate dyutimānkṛttivāsāḥ

सर्वमेध यज्ञ में महात्मा महादेव ने अपने को आहुति देकर देवाधिदेव का पद पाया; अपनी कीर्ति से समस्त लोकों में व्याप्त होकर और उन्हें धारण करके, चर्म धारण करने वाले वे तेजस्वी देव सुशोभित हैं।

श्लोक 13 (12.20.13)

आविक्षितः पार्थिवोऽसौ मरुत्तो । वृद्ध्या शक्रं योऽजयद्देवराजम् । यज्ञे यस्य श्रीः स्वयं सन्निविष्टा । यस्मिन्भाण्डं काञ्चनं सर्वमासीत् ॥

āvikṣitaḥ pārthivo'sau marutto | vṛddhyā śakraṃ yo'jayaddevarājam | yajñe yasya śrīḥ svayaṃ sanniviṣṭā | yasminbhāṇḍaṃ kāñcanaṃ sarvamāsīt

आविक्षित के पुत्र राजा मरुत्त ने अपनी समृद्धि से देवराज इन्द्र को जीत लिया; उनके यज्ञ में स्वयं लक्ष्मी विराजमान थीं और उनके सारे पात्र सोने के थे।

श्लोक 14 (12.20.14)

हरिश्चन्द्रः पार्थिवेन्द्रः श्रुतस्ते । यज्ञैरिष्ट्वा पुण्यभाग्वीतशोकः । ऋद्ध्या शक्रं योऽजयन्मानुषः सं । स्तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपयोज्यम् ॥

hariścandraḥ pārthivendraḥ śrutaste | yajñairiṣṭvā puṇyabhāgvītaśokaḥ | ṛddhyā śakraṃ yo'jayanmānuṣaḥ saṃ | stasmādyajñe sarvamevopayojyam

तुमने राजाओं में श्रेष्ठ हरिश्चन्द्र के विषय में सुना है, जो यज्ञों से यजन करके पुण्यात्मा और शोकरहित हुए; मनुष्य होकर भी उन्होंने अपनी समृद्धि से इन्द्र को जीत लिया। इसलिए सब कुछ यज्ञ में ही लगाना चाहिए।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21