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शान्ति पर्व · अध्याय 19

युधिष्ठिर का उत्तर: कर्म और त्याग के मार्ग

युधिष्ठिर अर्जुन के भ्रातृ-स्नेह के लिए उन्हें धन्यवाद देते हैं और उनके अप्रतिम पराक्रम की प्रशंसा करते हैं, परन्तु कहते हैं कि अर्जुन केवल युद्ध-विद्या जानते हैं और शास्त्र जानने वाले वृद्धों की सेवा उन्होंने नहीं की। वे बताते हैं कि ऋषियों ने तप, स्वाध्याय और त्याग से अपने लोक पाए, उत्तर और दक्षिण मार्गों का वर्णन करते हैं, और कहते हैं कि शास्त्रों के सार पर विद्वान् भी एकमत नहीं होते। अन्त में वे कहते हैं कि त्याग को समझाना कठिन है, पर वही सुख देता है।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.19.1)

वेदाहं तात शास्त्राणि अपराणि पराणि च । उभयं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ॥

vedāhaṃ tāta śāstrāṇi aparāṇi parāṇi ca | ubhayaṃ vedavacanaṃ kuru karma tyajeti ca

हे तात! मैं पर और अपर दोनों प्रकार के शास्त्रों को जानता हूँ। वेद का वचन दोनों प्रकार का है — 'कर्म करो' और 'त्याग दो'।

श्लोक 2 (12.19.2)

आकुलानि च शास्त्राणि हेतुभिश्चिन्तितानि च । निश्चयश्चैव यो मन्त्रे वेदाहं तं यथाविधि ॥

ākulāni ca śāstrāṇi hetubhiścintitāni ca | niścayaścaiva yo mantre vedāhaṃ taṃ yathāvidhi

शास्त्र उलझे हुए हैं और तर्कों से विचित्र बना दिए गए हैं; और वेद-मन्त्र में जो निश्चय है, उसे भी मैं यथाविधि जानता हूँ।

श्लोक 3 (12.19.3)

त्वं तु केवलशास्त्रज्ञो वीरव्रतसमन्वितः । शास्त्रार्थं तत्त्वतो गन्तुं न समर्थः कथंचन ॥

tvaṃ tu kevalaśāstrajño vīravratasamanvitaḥ | śāstrārthaṃ tattvato gantuṃ na samarthaḥ kathaṃcana

परन्तु तुम केवल पाठ के ज्ञाता और वीरव्रत से युक्त हो; शास्त्र के अर्थ को यथार्थ रूप में समझने में तुम किसी प्रकार समर्थ नहीं हो।

श्लोक 4 (12.19.4)

शास्त्रार्थतत्त्वदर्शी यो धर्मनिश्चयकोविदः । तेनाप्येवं न वाच्योऽयं यदि धर्मं प्रपश्यसि ॥

śāstrārthatattvadarśī yo dharmaniścayakovidaḥ | tenāpyevaṃ na vācyo'yaṃ yadi dharmaṃ prapaśyasi

शास्त्र के अर्थ का तत्त्व देखने वाला और धर्म के निर्णय में निपुण पुरुष भी मुझसे इस प्रकार नहीं कह सकता, यदि तुम सचमुच धर्म को देखते हो।

श्लोक 5 (12.19.5)

भ्रातृसौहृदमास्थाय यदुक्तं वचनं त्वया । न्याय्यं युक्तं च कौन्तेय प्रीतोऽहं तेन तेऽर्जुन ॥

bhrātṛsauhṛdamāsthāya yaduktaṃ vacanaṃ tvayā | nyāyyaṃ yuktaṃ ca kaunteya prīto'haṃ tena te'rjuna

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! भाई के प्रेम से प्रेरित होकर तुमने जो बात कही, वह न्यायसंगत और उचित है; इससे मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।

श्लोक 6 (12.19.6)

महेश्वरसमं सत्वं ब्रह्मणा चैव यत्समम् । वासुदेवसमं चैव न भूतं न भविष्यति ॥

maheśvarasamaṃ satvaṃ brahmaṇā caiva yatsamam | vāsudevasamaṃ caiva na bhūtaṃ na bhaviṣyati

महेश्वर के समान, ब्रह्मा के समान और वासुदेव के समान पराक्रम न कभी हुआ है, न होगा।

श्लोक 7 (12.19.7)

तथा त्वं योधमुख्येषु सत्वं परममिष्यते ॥

tathā tvaṃ yodhamukhyeṣu satvaṃ paramamiṣyate

उसी प्रकार प्रमुख योद्धाओं के बीच तुम्हारा पराक्रम सर्वोपरि माना जाता है।

श्लोक 8 (12.19.8)

बलमिन्द्रे च वायौ च बलं यच्च जनार्दने । तद्वलं भीमसेने च त्वयि चार्जुन विद्यते ॥

balamindre ca vāyau ca balaṃ yacca janārdane | tadvalaṃ bhīmasene ca tvayi cārjuna vidyate

इन्द्र और वायु में जो बल है और जनार्दन में जो बल है, हे अर्जुन! वही बल भीमसेन में और तुममें है।

श्लोक 9 (12.19.9)

त्वत्समश्चित्रयोधी च दूरपाती च पाण्डव । दिव्यास्त्रबलसंपन्नः को वाऽन्यस्त्वत्समो नरः ॥

tvatsamaścitrayodhī ca dūrapātī ca pāṇḍava | divyāstrabalasaṃpannaḥ ko vā'nyastvatsamo naraḥ

हे पाण्डव! विचित्र युद्ध करने में और दूर तक वार करने में तुम्हारे समान कोई नहीं है; दिव्य अस्त्रों के बल से सम्पन्न तुम्हारे समान दूसरा कौन पुरुष है?

श्लोक 10 (12.19.10)

युद्धधर्मेषु सर्वेषु क्रियाणां नैपुणेषु च । न त्वया सदृशः कश्चिन्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥

yuddhadharmeṣu sarveṣu kriyāṇāṃ naipuṇeṣu ca | na tvayā sadṛśaḥ kaścintriṣu lokeṣu vidyate

सब युद्ध-धर्मों में और कर्मों की कुशलता में तुम्हारे समान तीनों लोकों में कोई नहीं है।

श्लोक 11 (12.19.11)

धार्मिकं धर्मयुक्तं च निःशेषं ज्ञायते मया । धर्मसूक्ष्मं तु यद्वाच्यं तत्र दुष्प्रतरं त्वया । धनञ्जय न मे बुद्धिमतिशङ्कितुमर्हसि ॥

dhārmikaṃ dharmayuktaṃ ca niḥśeṣaṃ jñāyate mayā | dharmasūkṣmaṃ tu yadvācyaṃ tatra duṣprataraṃ tvayā | dhanañjaya na me buddhimatiśaṅkitumarhasi

जो कुछ धार्मिक और धर्मसंगत है, वह सब मैं पूरी तरह जानता हूँ। पर धर्म की सूक्ष्मता के विषय में जो कहा जाना है, उसे पार करना तुम्हारे लिए कठिन है। हे धनंजय! तुम्हें मेरी बुद्धि पर शंका नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 12 (12.19.12)

युद्धशास्त्रविदेव त्वं न वृद्धाः सेवितास्त्वया । समासविस्तरविदां न तेषां वेत्सि निश्चयम् ॥

yuddhaśāstravideva tvaṃ na vṛddhāḥ sevitāstvayā | samāsavistaravidāṃ na teṣāṃ vetsi niścayam

तुम केवल युद्धशास्त्र के ज्ञाता हो; तुमने वृद्धों की सेवा नहीं की, इसलिए संक्षेप और विस्तार दोनों के जानने वालों का निश्चय तुम नहीं जानते।

श्लोक 13 (12.19.13)

तपस्त्यागो विधिरिति निश्चयस्तात धीमताम् । परस्परं ज्याय एषामिति नः श्रेयसी मतिः ॥

tapastyāgo vidhiriti niścayastāta dhīmatām | parasparaṃ jyāya eṣāmiti naḥ śreyasī matiḥ

हे तात! बुद्धिमानों का निश्चय है कि तप, त्याग और विधि — ये तीन हैं, और इनमें एक दूसरे से बढ़कर है; ऐसी हमारी श्रेष्ठ मान्यता है।

श्लोक 14 (12.19.14)

यत्त्वेतन्मन्यसे पार्थ न ज्यायोऽस्ति धनादिति । तत्र ते वर्तयिष्यामि यथा नैतत्प्रधानतः ॥

yattvetanmanyase pārtha na jyāyo'sti dhanāditi | tatra te vartayiṣyāmi yathā naitatpradhānataḥ

हे पार्थ! तुम जो यह मानते हो कि धन से बढ़कर कुछ नहीं है, उस विषय में मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि यह प्रधान क्यों नहीं है।

श्लोक 15 (12.19.15)

तपः स्वाध्यायशीला हि दृश्यन्ते धार्मिका जनाः । ऋषयस्तपसा युक्ता येषां लोकाः सनातनाः ॥

tapaḥ svādhyāyaśīlā hi dṛśyante dhārmikā janāḥ | ṛṣayastapasā yuktā yeṣāṃ lokāḥ sanātanāḥ

तप और स्वाध्याय में लगे धार्मिक जन दिखाई देते हैं, और तपस्या से युक्त ऋषि भी, जिनके लोक सनातन हैं।

श्लोक 16 (12.19.16)

अजातश्मश्रवो धीरास्तथाऽन्ये वनवासिनः । अरुणाः केतवश्चैव स्वाध्यायेन दिवं गताः ॥

ajātaśmaśravo dhīrāstathā'nye vanavāsinaḥ | aruṇāḥ ketavaścaiva svādhyāyena divaṃ gatāḥ

जिनकी दाढ़ी-मूँछ अभी नहीं उगी थी ऐसे धीर जन, तथा दूसरे वनवासी, अरुण और केतु नामक ऋषि स्वाध्याय से स्वर्ग को गए।

श्लोक 17 (12.19.17)

उत्तरेण तु पन्थानमार्या विषयनिग्रहात् । अबुद्धिजं तमस्त्यक्त्वा लोकांस्त्यागवतां गताः ॥

uttareṇa tu panthānamāryā viṣayanigrahāt | abuddhijaṃ tamastyaktvā lokāṃstyāgavatāṃ gatāḥ

उत्तर मार्ग से श्रेष्ठ जन विषयों के निग्रह द्वारा अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को छोड़कर त्यागियों के लोकों को गए।

श्लोक 18 (12.19.18)

दक्षिणेन तु पन्थानं यं भास्वन्तं प्रचक्षते । एते क्रियावतां लोका ये श्मशानानि भेजिरे ॥

dakṣiṇena tu panthānaṃ yaṃ bhāsvantaṃ pracakṣate | ete kriyāvatāṃ lokā ye śmaśānāni bhejire

दक्षिण मार्ग से, जिसे प्रकाशमान कहा जाता है, ये उन कर्म करने वालों के लोक हैं जिन्होंने श्मशानों का आश्रय लिया।

श्लोक 19 (12.19.19)

अनिर्देश्या गतिः सा तु यां प्रपश्यन्ति मोक्षिणः । तस्मात्त्यागः प्रधानेष्टः स तु दुःखं प्रवेदितुम् ॥

anirdeśyā gatiḥ sā tu yāṃ prapaśyanti mokṣiṇaḥ | tasmāttyāgaḥ pradhāneṣṭaḥ sa tu duḥkhaṃ praveditum

मोक्ष चाहने वाले जिस गति को देखते हैं, वह अनिर्वचनीय है; इसलिए त्याग को प्रधान माना गया है, पर उसे समझाना कठिन है।

श्लोक 20 (12.19.20)

अनुस्मृत्य तु शास्त्राणि कवयः समवस्थिताः । अपीह स्यादपीह स्यात्सारासारदिदृक्षया ॥

anusmṛtya tu śāstrāṇi kavayaḥ samavasthitāḥ | apīha syādapīha syātsārāsāradidṛkṣayā

शास्त्रों का अनुसरण करके भी कवि लोग यही कहते खड़े रहते हैं — "शायद यहाँ हो, शायद यहाँ हो" — सार और असार को देखने की इच्छा से।

श्लोक 21 (12.19.21)

वेदवादानतिक्रम्य शास्त्राण्यारण्यकानि च । विपाट्य कदलीस्तम्भं सारं ददृशिरे न ते ॥

vedavādānatikramya śāstrāṇyāraṇyakāni ca | vipāṭya kadalīstambhaṃ sāraṃ dadṛśire na te

वेदवादों, शास्त्रों और आरण्यकों को पार करके, केले के तने को चीरकर भी उन्होंने उसमें सार नहीं पाया।

श्लोक 22 (12.19.22)

अथैकान्तव्युदासेन शरीरे पाञ्चभौतिके । इच्छाद्वेषसमायुक्तमात्मानं प्राहुरिङ्गितैः ॥

athaikāntavyudāsena śarīre pāñcabhautike | icchādveṣasamāyuktamātmānaṃ prāhuriṅgitaiḥ

तब सब कुछ अलग छोड़कर वे इस पाँच भूतों के शरीर में संकेतों से इच्छा और द्वेष से युक्त आत्मा को बताते हैं।

श्लोक 23 (12.19.23)

अग्राह्यं चक्षुषा सत्वमनिर्देश्यं च तद्गिरा । कर्महेतुपुरस्कारं भूतेषु परिवर्तते ॥

agrāhyaṃ cakṣuṣā satvamanirdeśyaṃ ca tadgirā | karmahetupuraskāraṃ bhūteṣu parivartate

वह आँख से ग्रहण नहीं होता और वाणी से बताया नहीं जा सकता; कर्म को ही हेतु मानकर वह प्राणियों में विचरता रहता है।

श्लोक 24 (12.19.24)

कल्याणगोचरं कृत्वा मानं तृष्णां निगृह्य च । कर्मसंततिमुत्सृज्य स्यान्निरालम्बनः सुखी ॥

kalyāṇagocaraṃ kṛtvā mānaṃ tṛṣṇāṃ nigṛhya ca | karmasaṃtatimutsṛjya syānnirālambanaḥ sukhī

कल्याण को अपना क्षेत्र बनाकर, मान और तृष्णा को रोककर, कर्मों की शृंखला छोड़कर मनुष्य निराश्रय और सुखी हो सकता है।

श्लोक 25 (12.19.25)

अस्मिन्नेवं सूक्ष्मगम्ये मार्गे सद्भिर्निषेविते । कथमर्थमनर्थाढ्यमर्जुन त्वं प्रशंससि ॥

asminnevaṃ sūkṣmagamye mārge sadbhirniṣevite | kathamarthamanarthāḍhyamarjuna tvaṃ praśaṃsasi

सज्जनों द्वारा सेवित इस सूक्ष्म और दुर्गम मार्ग के रहते, हे अर्जुन! तुम अनर्थों से भरे धन की प्रशंसा कैसे करते हो?

श्लोक 26 (12.19.26)

पूर्वशास्त्रविदोऽप्येवं जनाः पश्यन्ति भारत । क्रियासु निरता नित्यं दाने यज्ञे च कर्मणि ॥

pūrvaśāstravido'pyevaṃ janāḥ paśyanti bhārata | kriyāsu niratā nityaṃ dāne yajñe ca karmaṇi

हे भारत! प्राचीन शास्त्रों के जानकार भी ऐसा ही देखते हैं — वे लोग जो सदा क्रियाओं, दान, यज्ञ और कर्म में लगे रहते हैं।

श्लोक 27 (12.19.27)

भवन्ति सुदुरावर्ता हेतुमन्तोऽपि पण्डिताः । दृढपूर्वे स्मृता मूढा नैतदस्तीति वादिनः ॥

bhavanti sudurāvartā hetumanto'pi paṇḍitāḥ | dṛḍhapūrve smṛtā mūḍhā naitadastīti vādinaḥ

तर्क करने वाले पण्डित भी बड़ी कठिनाई से लौटाए जाते हैं; अपने पूर्व-संस्कारों में दृढ़ वे मूढ़ कहे गए लोग कहते हैं — "ऐसा कुछ नहीं है।"

श्लोक 28 (12.19.28)

अनृतस्यावमन्तारो वक्तारो जनसंसदि । चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वावदूका बहुश्रुताः ॥

anṛtasyāvamantāro vaktāro janasaṃsadi | caranti vasudhāṃ kṛtsnāṃ vāvadūkā bahuśrutāḥ

असत्य का तिरस्कार करने वाले, जन-सभा में बोलने वाले, बहुश्रुत बकवादी पूरी पृथ्वी पर घूमते फिरते हैं।

श्लोक 29 (12.19.29)

पार्थ यन्न विजानीमः कस्ताञ्ज्ञातुमिहार्हति । एवं प्राज्ञाः श्रुताश्चापि महान्तः शास्त्रवित्तमाः ॥

pārtha yanna vijānīmaḥ kastāñjñātumihārhati | evaṃ prājñāḥ śrutāścāpi mahāntaḥ śāstravittamāḥ

हे पार्थ! जिसे हम नहीं जानते, उसे यहाँ कौन जान सकता है? इसी प्रकार प्रज्ञावान्, विद्वान्, महान् और शास्त्रज्ञों में श्रेष्ठ लोग भी नहीं जानते।

श्लोक 30 (12.19.30)

तपसा महदाप्नोति बुद्ध्या वै विन्दते महत् । त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय धर्मवित् ॥

tapasā mahadāpnoti buddhyā vai vindate mahat | tyāgena sukhamāpnoti sadā kaunteya dharmavit

हे कुन्तीपुत्र! धर्म को जानने वाला पुरुष तप से महान् फल पाता है, बुद्धि से महान् को जानता है और त्याग से सुख प्राप्त करता है — सदा ऐसा ही होता है।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20