शान्ति पर्व · अध्याय 18
अर्जुन द्वारा जनक और उनकी रानी की कथा
युधिष्ठिर के मौन से व्यथित अर्जुन विदेह के राजा जनक की प्राचीन कथा सुनाते हैं, जिन्होंने राज्य त्यागकर मुट्ठी भर अन्न पर जीना स्वीकार किया था। उनकी रानी उन्हें फटकारती है कि उन्होंने देवताओं, अतिथियों, पितरों और अपने आश्रित योद्धाओं को छोड़ दिया है, और सच्ची मुक्ति भीतर की अनासक्ति में है, न कि गेरुए वस्त्र और भिक्षा में। अर्जुन कहते हैं कि जनक भी मोह में पड़ गए थे, और युधिष्ठिर से आग्रह करते हैं कि वे वैसे मोह में न पड़ें, बल्कि राज्य करें, यज्ञ करें और प्रजा की रक्षा करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.18.1)
तूष्णींभूतं तु राजानं पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् । संतप्तः शोकदुःखाभ्यां राजवाक्शल्यपीडितः ॥
tūṣṇīṃbhūtaṃ tu rājānaṃ punarevārjuno'bravīt | saṃtaptaḥ śokaduḥkhābhyāṃ rājavākśalyapīḍitaḥ
राजा को मौन हुआ देखकर शोक और दुःख से संतप्त तथा राजा के वचनरूपी काँटे से पीड़ित अर्जुन ने फिर कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (12.18.2)
कथयन्ति पुरावृत्तमितिहासमिमं जनाः । विदेहराज्ञः संवादं भार्यया सह भारत ॥
kathayanti purāvṛttamitihāsamimaṃ janāḥ | videharājñaḥ saṃvādaṃ bhāryayā saha bhārata
हे भारत! लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं — विदेह के राजा और उनकी पत्नी का संवाद।
श्लोक 3 (12.18.3)
उत्सृज्य राज्यं भिक्षार्थं कृतबुद्धिं नरेश्वरम् । विदेहराजमहिषी दुःखिता प्रत्यभाषत ॥
utsṛjya rājyaṃ bhikṣārthaṃ kṛtabuddhiṃ nareśvaram | videharājamahiṣī duḥkhitā pratyabhāṣata
जब विदेह के राजा ने राज्य त्यागकर भिक्षा पर जीने का निश्चय कर लिया, तब दुःखी हुई उनकी रानी ने उनसे कहा।
श्लोक 4 (12.18.4)
धनान्यपत्यं मित्राणि रत्नानि विविधानि च । पन्थानं पावनं हित्वा जनको मौढ्यमास्थितः ॥
dhanānyapatyaṃ mitrāṇi ratnāni vividhāni ca | panthānaṃ pāvanaṃ hitvā janako mauḍhyamāsthitaḥ
धन, सन्तान, मित्र और नाना प्रकार के रत्नों को तथा पवित्र मार्ग को छोड़कर जनक मूढ़ता में पड़ गए थे।
श्लोक 5 (12.18.5)
तं ददर्श प्रिया भार्या भैक्षवृत्तिमकिंचनम् । धानामुष्टिमुपासीनं निरीहं गतमत्सरम् ॥
taṃ dadarśa priyā bhāryā bhaikṣavṛttimakiṃcanam | dhānāmuṣṭimupāsīnaṃ nirīhaṃ gatamatsaram
उनकी प्रिय पत्नी ने उन्हें भिक्षा पर जीते, अकिंचन, मुट्ठी भर भुने अन्न के पास बैठे, निस्पृह और द्वेषरहित देखा।
श्लोक 6 (12.18.6)
तमुवाच समागम्य भर्तारमकुतोभयम् । क्रुद्धा मनस्विनी भार्या विविक्ते हेतुमद्वचः ॥
tamuvāca samāgamya bhartāramakutobhayam | kruddhā manasvinī bhāryā vivikte hetumadvacaḥ
क्रोधित और स्वाभिमानिनी उस पत्नी ने निर्भय पति से एकान्त में मिलकर युक्तिपूर्ण बातें कहीं।
विदेहराजमहिष्युवाच
श्लोक 7 (12.18.7)
कथमुत्सृज्य राज्यं स्वं धनधान्यसमन्वितम् । कापालीं वृत्तिमास्थाय धान्यमुष्टिमुपाससे ॥
kathamutsṛjya rājyaṃ svaṃ dhanadhānyasamanvitam | kāpālīṃ vṛttimāsthāya dhānyamuṣṭimupāsase
धन-धान्य से भरे अपने राज्य को छोड़कर, भिक्षुकों की-सी वृत्ति अपनाकर आप मुट्ठी भर भुने अन्न की उपासना क्यों कर रहे हैं?
श्लोक 8 (12.18.8)
प्रतिज्ञा तेऽन्यथा राजन्विचेष्टा चान्यथा तव । यद्राज्यं महदुत्सृज्य स्वल्पे लुभ्यसि पार्थिव ॥
pratijñā te'nyathā rājanviceṣṭā cānyathā tava | yadrājyaṃ mahadutsṛjya svalpe lubhyasi pārthiva
हे राजन्! आपकी प्रतिज्ञा कुछ और है और आपका आचरण कुछ और, यदि इतने बड़े राज्य को छोड़कर आप, हे पृथ्वीपति, थोड़े-से में लुब्ध हो रहे हैं।
श्लोक 9 (12.18.9)
नैतेनातिथयो राजन्देवर्षिपितरस्तथा । अद्य शक्यास्त्वया भर्तुं मोघस्तेऽयं परिश्रमः ॥
naitenātithayo rājandevarṣipitarastathā | adya śakyāstvayā bhartuṃ moghaste'yaṃ pariśramaḥ
हे राजन्! इस थोड़े-से अन्न से आज आप न अतिथियों का, न देवताओं, ऋषियों और पितरों का पोषण कर सकते हैं; आपका यह परिश्रम व्यर्थ है।
श्लोक 10 (12.18.10)
देवतातिथिभिश्चैव पितृभिश्चैव पार्थिव । सर्वैरेतैः परित्यक्तः परिव्रजसि निष्क्रियः ॥
devatātithibhiścaiva pitṛbhiścaiva pārthiva | sarvairetaiḥ parityaktaḥ parivrajasi niṣkriyaḥ
हे पृथ्वीपति! देवताओं, अतिथियों और पितरों — इन सबसे त्यागे हुए आप कर्महीन होकर भटक रहे हैं।
श्लोक 11 (12.18.11)
यस्त्वं त्रैविद्यवृद्धानां ब्राह्मणानां सहस्रशः । भर्ता भूत्वा च लोकस्य सोऽद्यान्यैर्भूतिमिच्छसि ॥
yastvaṃ traividyavṛddhānāṃ brāhmaṇānāṃ sahasraśaḥ | bhartā bhūtvā ca lokasya so'dyānyairbhūtimicchasi
आप जो तीनों वेदों के ज्ञाता हजारों वृद्ध ब्राह्मणों के और सारे संसार के पालक थे, वही आज दूसरों से जीविका चाहते हैं।
श्लोक 12 (12.18.12)
श्रियं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत्संप्रति वीक्ष्यसे । अपुत्रा जननी तेऽद्य कौसल्या चापतिस्त्वया ॥
śriyaṃ hitvā pradīptāṃ tvaṃ śvavatsaṃprati vīkṣyase | aputrā jananī te'dya kausalyā cāpatistvayā
जगमगाती लक्ष्मी को छोड़कर आप अब कुत्ते के समान दिखाई देते हैं। आज आपकी माता पुत्रहीन है, और आपने कौसल्या को पतिहीन कर दिया है।
श्लोक 13 (12.18.13)
आश्रिता धर्मकामास्त्वां क्षत्रियाः पर्युपासते । त्वदाशामभिकाङ्क्षन्तः कृपणाः फलहेतुकाः ॥
āśritā dharmakāmāstvāṃ kṣatriyāḥ paryupāsate | tvadāśāmabhikāṅkṣantaḥ kṛpaṇāḥ phalahetukāḥ
धर्म और काम में लगे क्षत्रिय आपका आश्रय लेकर आपकी सेवा करते हैं; आपसे आशा बाँधे हुए वे दीन जन फल की इच्छा रखते हैं।
श्लोक 14 (12.18.14)
तांश्च त्वं विफलान्कृत्वा कं नु लोकं गमिष्यसि । राजन्संशयिते मोक्षे परतन्त्रेषु देहिषु ॥
tāṃśca tvaṃ viphalānkṛtvā kaṃ nu lokaṃ gamiṣyasi | rājansaṃśayite mokṣe paratantreṣu dehiṣu
हे राजन्! उन सबको निराश करके आप किस लोक में जाएँगे, जबकि पराधीन देहधारियों के लिए मोक्ष स्वयं संशय में है?
श्लोक 15 (12.18.15)
नैव तेऽस्ति परो लोको नापरः पापकर्मणः । धर्म्यान्दारान्परित्यज्य यस्त्वमिच्छसि जीवितुम् ॥
naiva te'sti paro loko nāparaḥ pāpakarmaṇaḥ | dharmyāndārānparityajya yastvamicchasi jīvitum
अपनी धर्मपत्नियों को छोड़कर जो आप जीना चाहते हैं, उन आप पापकर्मी के लिए न परलोक है, न यह लोक।
श्लोक 16 (12.18.16)
स्रजो गन्धानलंकारान्वासांसि विविधानि च । किमर्थमभिसंत्यज्य परिव्रजसि निष्क्रियः ॥
srajo gandhānalaṃkārānvāsāṃsi vividhāni ca | kimarthamabhisaṃtyajya parivrajasi niṣkriyaḥ
मालाओं, सुगन्धों, आभूषणों और नाना प्रकार के वस्त्रों को छोड़कर आप किसलिए निष्क्रिय होकर भटक रहे हैं?
श्लोक 17 (12.18.17)
निपानं सर्वभूतानां भूत्वा त्वं पावनं महत् । आढ्यो वनस्पतिर्भूत्वा सोऽन्यांस्त्वं पर्युपाससे ॥
nipānaṃ sarvabhūtānāṃ bhūtvā tvaṃ pāvanaṃ mahat | āḍhyo vanaspatirbhūtvā so'nyāṃstvaṃ paryupāsase
सब प्राणियों के लिए महान् और पवित्र जलाशय तथा समृद्ध वृक्षराज होकर आप आज दूसरों की सेवा कर रहे हैं।
श्लोक 18 (12.18.18)
खादन्ति हस्तिनं न्यासे क्रव्यादा बहवोऽप्युत । बहवः कृमयश्चैव किं पुनस्त्वामनर्थकम् ॥
khādanti hastinaṃ nyāse kravyādā bahavo'pyuta | bahavaḥ kṛmayaścaiva kiṃ punastvāmanarthakam
पड़े हुए हाथी को भी बहुत-से मांसभक्षी खा जाते हैं और बहुत-से कीड़े भी; फिर आप जैसे निरर्थक की तो बात ही क्या?
श्लोक 19 (12.18.19)
य इमां कुण्डिकां भिन्द्यान्त्रिविष्टब्धं च यो हरेत् । वासश्चापि हरेत्तस्मिन्कथं ते मानसं भवेत् ॥
ya imāṃ kuṇḍikāṃ bhindyāntriviṣṭabdhaṃ ca yo haret | vāsaścāpi harettasminkathaṃ te mānasaṃ bhavet
यदि कोई आपके इस कमण्डलु को फोड़ दे, आपका त्रिदण्ड ले जाए, या आपका वस्त्र भी हर ले, तो उस समय आपके मन की क्या दशा होगी?
श्लोक 20 (12.18.20)
यस्त्वं सर्वं समुत्सृज्य धानामुष्टिमनुग्रहः । यदनेन कृतं सर्वं किमिदं मम दीयते ॥
yastvaṃ sarvaṃ samutsṛjya dhānāmuṣṭimanugrahaḥ | yadanena kṛtaṃ sarvaṃ kimidaṃ mama dīyate
आपने सब कुछ त्यागकर मुट्ठी भर अन्न को ही अपना अनुग्रह बना लिया है; उसके द्वारा जो कुछ किया गया, उसमें मुझे यह क्या दिया जा रहा है?
श्लोक 21 (12.18.21)
धानामुष्टेरिहार्थश्चेत्प्रतिज्ञा ते विनश्यति । का वाऽहं तव को मे त्वं कश्च ते मय्यनुग्रहः ॥
dhānāmuṣṭerihārthaścetpratijñā te vinaśyati | kā vā'haṃ tava ko me tvaṃ kaśca te mayyanugrahaḥ
यदि यहाँ आपका प्रयोजन मुट्ठी भर अन्न से ही है, तो आपकी प्रतिज्ञा नष्ट हो जाती है। मैं आपकी कौन हूँ, आप मेरे कौन हैं, और मुझ पर आपका कौन-सा अनुग्रह है?
श्लोक 22 (12.18.22)
प्रशाधि पृथिवीं राजन्यत्र तेऽनुग्रहो भवेत् । प्रासादे शयनं यानं वासांस्याभरणानि च ॥
praśādhi pṛthivīṃ rājanyatra te'nugraho bhavet | prāsāde śayanaṃ yānaṃ vāsāṃsyābharaṇāni ca
हे राजन्! पृथ्वी पर शासन कीजिए, जहाँ आपका अनुग्रह फलीभूत हो सके — महल में शय्या और सवारी के साथ, वस्त्रों और आभूषणों के साथ।
श्लोक 23 (12.18.23)
श्रियां निराशैरधनैस्त्यक्तमित्रैरकिंचनैः । सौखिकैः संभृतो योऽर्थः स संत्यजति किंनु तं ॥
śriyāṃ nirāśairadhanaistyaktamitrairakiṃcanaiḥ | saukhikaiḥ saṃbhṛto yo'rthaḥ sa saṃtyajati kiṃnu taṃ
जिनकी लक्ष्मी चली गई और आशा टूट गई, जो निर्धन हैं, मित्रों से त्यागे गए और अकिंचन हैं — उनके बीच रहने वाला पुरुष क्या सुखी जनों द्वारा संचित धन को सचमुच त्याग देगा?
श्लोक 24 (12.18.24)
योऽत्यन्तं प्रतिगृह्णीयाद्यश्च दद्यात्सदैव हि । तयोस्त्वमन्तरं विद्धि श्रेयांस्ताभ्यां क उच्यते ॥
yo'tyantaṃ pratigṛhṇīyādyaśca dadyātsadaiva hi | tayostvamantaraṃ viddhi śreyāṃstābhyāṃ ka ucyate
जो सदा बहुत लेता ही रहे और जो सदा देता ही रहे — इन दोनों का अन्तर समझिए; इनमें श्रेष्ठ किसे कहा जाता है?
श्लोक 25 (12.18.25)
सदैव याचमानेषु तथा दम्भान्वितेषु च । एतेषु दक्षिणा दत्ता दावाग्नाविव दुर्हुतम् ॥
sadaiva yācamāneṣu tathā dambhānviteṣu ca | eteṣu dakṣiṇā dattā dāvāgnāviva durhutam
सदा माँगने वालों और दम्भ से भरे लोगों को दी गई दक्षिणा वैसी ही है जैसे दावानल में अनुचित रीति से डाली गई आहुति।
श्लोक 26 (12.18.26)
जातवेदा यथा राजन्नादग्ध्वैवोपशाम्यति । सदैव याचमानो वै तथा शाम्यति न द्विजः ॥
jātavedā yathā rājannādagdhvaivopaśāmyati | sadaiva yācamāno vai tathā śāmyati na dvijaḥ
हे राजन्! जैसे अग्नि बिना जलाए शान्त नहीं होती, वैसे ही सदा माँगने वाला द्विज कभी शान्त नहीं होता।
श्लोक 27 (12.18.27)
सतां वै ददतोऽन्नं च लोकेऽस्मिन्प्रकृतिर्ध्रुवा । न चेद्राजा भवेद्दाता कुतः स्युर्मोक्षकाङ्क्षिणः ॥
satāṃ vai dadato'nnaṃ ca loke'sminprakṛtirdhruvā | na cedrājā bhaveddātā kutaḥ syurmokṣakāṅkṣiṇaḥ
इस लोक में सज्जनों का यह सनातन स्वभाव है कि वे अन्न देते हैं; यदि राजा दाता न हो, तो मोक्ष चाहने वाले कहाँ से होंगे?
श्लोक 28 (12.18.28)
अन्नाद्गृहस्था लोकेऽस्मिन्भिक्षवस्तत एव च । अन्नात्प्राणः प्रभवति अन्नदः प्राणदो भवेत् ॥
annādgṛhasthā loke'sminbhikṣavastata eva ca | annātprāṇaḥ prabhavati annadaḥ prāṇado bhavet
इस लोक में गृहस्थ अन्न से जीते हैं और भिक्षु भी उसी से; अन्न से प्राण उत्पन्न होता है, और अन्नदाता प्राणदाता होता है।
श्लोक 29 (12.18.29)
गृहस्थेभ्योऽपि निर्मुक्ता गृहस्थानेव संश्रिताः । प्रभवं च प्रतिष्ठां च दान्ता विन्दन्त आसते ॥
gṛhasthebhyo'pi nirmuktā gṛhasthāneva saṃśritāḥ | prabhavaṃ ca pratiṣṭhāṃ ca dāntā vindanta āsate
गृहस्थों से मुक्त हुए होकर भी वे गृहस्थों पर ही आश्रित रहते हैं; संयमी जन अपनी उत्पत्ति और अपना आधार वहीं पाते हैं।
श्लोक 30 (12.18.30)
त्यागान्न भिक्षुकं विन्द्यान्न मौढ्यान्न च याचनात् । ऋजुस्तु योऽर्थं त्यजति तं मुक्तं विद्धि भिक्षुकम् ॥
tyāgānna bhikṣukaṃ vindyānna mauḍhyānna ca yācanāt | ṛjustu yo'rthaṃ tyajati taṃ muktaṃ viddhi bhikṣukam
त्याग से, मूढ़ता से या माँगने से किसी को भिक्षु न जानो; जो सरल पुरुष धन का त्याग कर देता है, उसी को मुक्त भिक्षु समझो।
श्लोक 31 (12.18.31)
असक्तः शक्तवद्गच्छन्निः सङ्गो मुक्तबन्धनः । समः शत्रौ च मित्रे च स वै मुक्तो महीपते ॥
asaktaḥ śaktavadgacchanniḥ saṅgo muktabandhanaḥ | samaḥ śatrau ca mitre ca sa vai mukto mahīpate
हे महीपते! जो आसक्त की भाँति चलते हुए भी अनासक्त है, निःसंग है, बन्धनमुक्त है और शत्रु तथा मित्र में समान है, वही सचमुच मुक्त है।
श्लोक 32 (12.18.32)
परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः । सिता बहुविधैः पाशैः संचिन्वन्तो वृथामिषम् ॥
parivrajanti dānārthaṃ muṇḍāḥ kāṣāyavāsasaḥ | sitā bahuvidhaiḥ pāśaiḥ saṃcinvanto vṛthāmiṣam
मुण्डित सिर वाले, गेरुए वस्त्र पहने लोग दान पाने के लिए भटकते हैं; वे नाना प्रकार के पाशों में बँधे हुए व्यर्थ ही भोग-सामग्री जुटाते रहते हैं।
श्लोक 33 (12.18.33)
त्रयीं च नामवार्तां च त्यक्त्वा पुत्रान्व्रजन्ति ये । त्रिविष्टब्धं च वासश्च प्रतिगृह्णन्त्यबुद्धयः ॥
trayīṃ ca nāmavārtāṃ ca tyaktvā putrānvrajanti ye | triviṣṭabdhaṃ ca vāsaśca pratigṛhṇantyabuddhayaḥ
जो वेद, नाम और जीविका को छोड़कर तथा पुत्रों को त्यागकर निकल पड़ते हैं, वे अबोध जन त्रिदण्ड और वस्त्र ग्रहण करते हैं।
श्लोक 34 (12.18.34)
अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् । धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतिः ॥
aniṣkaṣāye kāṣāyamīhārthamiti viddhi tam | dharmadhvajānāṃ muṇḍānāṃ vṛttyarthamiti me matiḥ
जिसके मन के दोष धुले नहीं हैं, उसके लिए गेरुआ वस्त्र केवल कुछ पाने का साधन है — ऐसा जानो; वह धर्म की ध्वजा उठाने वाले इन मुण्डितों की जीविका के लिए ही है, मेरा ऐसा मत है।
श्लोक 35 (12.18.35)
काषायैरजिनैश्चीरैर्नग्नान्मुण्डाञ्जटाधरान् । बिभ्रत्साधून्महाराज जय लोकाञ्जितेन्द्रियः ॥
kāṣāyairajinaiścīrairnagnānmuṇḍāñjaṭādharān | bibhratsādhūnmahārāja jaya lokāñjitendriyaḥ
हे महाराज! गेरुए वस्त्रों, मृगचर्मों और वल्कल से नग्न, मुण्डित और जटाधारी साधुओं का भरण-पोषण करते हुए, जितेन्द्रिय होकर लोकों को जीतिए।
श्लोक 36 (12.18.36)
अग्न्याधेयानि गुर्वर्थं क्रतूनपि सुदक्षिणान् । ददात्यहरहः पूर्वं को नु धर्मरतस्ततः ॥
agnyādheyāni gurvarthaṃ kratūnapi sudakṣiṇān | dadātyaharahaḥ pūrvaṃ ko nu dharmaratastataḥ
जो गुरुजनों के लिए प्रतिदिन पहले की भाँति अग्न्याधान और उत्तम दक्षिणा वाले यज्ञ देता है, उससे बढ़कर धर्म में रत कौन है?
अर्जुन उवाच
श्लोक 37 (12.18.37)
तत्त्वज्ञो जनको राजा लोकेऽस्मिन्निति गीयते । सोऽप्यासीन्मोहसंपन्नो मा मोहवशमन्वगाः ॥
tattvajño janako rājā loke'sminniti gīyate | so'pyāsīnmohasaṃpanno mā mohavaśamanvagāḥ
इस लोक में राजा जनक तत्त्वज्ञानी कहे जाते हैं, फिर भी वे मोह से ग्रस्त हो गए थे। आप मोह के वश में न आइए।
श्लोक 38 (12.18.38)
एवं धर्ममनुक्रान्ताः सदा दानतपः पराः । आनृशंस्यगुणोपेताः कामक्रोधविवर्जिताः ॥
evaṃ dharmamanukrāntāḥ sadā dānatapaḥ parāḥ | ānṛśaṃsyaguṇopetāḥ kāmakrodhavivarjitāḥ
जो इस प्रकार धर्म का पालन करते आए हैं, सदा दान और तप में लगे रहने वाले, दयालुता के गुण से युक्त और काम-क्रोध से रहित हैं —
श्लोक 39 (12.18.39)
प्रजानां पालने युक्ता दममुत्तममास्थिताः । इष्ट्वा लोकानवाप्स्यामो गुरुवृद्धोपचायिनः ॥
prajānāṃ pālane yuktā damamuttamamāsthitāḥ | iṣṭvā lokānavāpsyāmo guruvṛddhopacāyinaḥ
प्रजा के पालन में लगे, उत्तम संयम में स्थित, गुरुजनों और वृद्धों की सेवा करने वाले हम यज्ञ करके लोकों को प्राप्त करेंगे —
श्लोक 40 (12.18.40)
देवतातिथिभूतानां निर्वपन्तो यथाविधि । स्थानमिष्टमवाप्स्यामो ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥
devatātithibhūtānāṃ nirvapanto yathāvidhi | sthānamiṣṭamavāpsyāmo brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ
विधिपूर्वक देवताओं, अतिथियों और आश्रितों को अर्पण करते हुए, ब्राह्मणों के भक्त और सत्यवादी हम अपना अभीष्ट स्थान पाएँगे।