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शान्ति पर्व · अध्याय 17

युधिष्ठिर का भीम को उत्तर: त्याग का महत्त्व

युधिष्ठिर भीम को उत्तर देते हैं कि राज्य चाहने वाला असन्तोष, अभिमान और तृष्णा से घिरा रहता है, और सारी पृथ्वी के स्वामी का भी पेट एक ही होता है। वे उन तपस्वियों का उदाहरण देते हैं जिन्होंने नरक को जीत लिया, पितृयान और देवयान नामक दो मार्ग बताते हैं, और राजा जनक की गाथा सुनाते हैं, जिनका कुछ भी अपना न था, इसलिए मिथिला जलने पर उनका कुछ नहीं जला। वे कहते हैं कि प्रज्ञा प्राणियों की एकता का बोध है, और वह ब्रह्म तक ले जाती है।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.17.1)

असंतोषः प्रमादश्च मदो रागोऽप्रशान्तता । बलं मोहोऽभिमानश्चाप्युद्वेगश्चैव सर्वशः ॥

asaṃtoṣaḥ pramādaśca mado rāgo'praśāntatā | balaṃ moho'bhimānaścāpyudvegaścaiva sarvaśaḥ

असन्तोष, प्रमाद, मद, राग, अशान्ति, बल, मोह, अभिमान और सब ओर से उद्वेग।

श्लोक 2 (12.17.2)

एभिः पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकाङ्क्षसे । निरामिषो विनिर्मुक्तः प्रशान्तः सुसुखी भव ॥

ebhiḥ pāpmabhirāviṣṭo rājyaṃ tvamabhikāṅkṣase | nirāmiṣo vinirmuktaḥ praśāntaḥ susukhī bhava

इन पापों से घिरे हुए आप राज्य की इच्छा करते हैं। भोग-लालसा से रहित, मुक्त और शान्त होकर सुखी हो जाइए।

श्लोक 3 (12.17.3)

य इमामखिलां भूमिं शिष्यादेको महीपतिः । तस्याप्युदरमेकं वै किमिदं त्वं प्रशंससि ॥

ya imāmakhilāṃ bhūmiṃ śiṣyādeko mahīpatiḥ | tasyāpyudaramekaṃ vai kimidaṃ tvaṃ praśaṃsasi

जो एक राजा इस सारी पृथ्वी पर शासन करता है, उसका भी पेट तो एक ही है। फिर आप इसकी प्रशंसा क्यों करते हैं?

श्लोक 4 (12.17.4)

नाह्ना पूरयितुं शक्यां न मासैर्भरतर्षभ । अपूर्यां पूरयन्निच्छामायुषाऽपि न शक्नुयात् ॥

nāhnā pūrayituṃ śakyāṃ na māsairbharatarṣabha | apūryāṃ pūrayannicchāmāyuṣā'pi na śaknuyāt

हे भरतश्रेष्ठ, उसे एक दिन में या महीनों में नहीं भरा जा सकता। जो कभी न भरने वाली इच्छा को भरने में लगा रहता है, वह सारी आयु में भी उसे नहीं भर सकता।

श्लोक 5 (12.17.5)

यथेद्धः प्रज्वलत्यग्निरसमिद्धः प्रशाम्यति । अल्पाहारतयाग्निं त्वं शमयौदर्यमुत्थितम् ॥

yatheddhaḥ prajvalatyagnirasamiddhaḥ praśāmyati | alpāhāratayāgniṃ tvaṃ śamayaudaryamutthitam

जैसे अग्नि ईंधन पाकर जलती है और ईंधन के बिना बुझ जाती है, वैसे ही थोड़ा आहार करके उठी हुई उदर की अग्नि को शान्त कीजिए।

श्लोक 6 (12.17.6)

आत्मोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विशसं बहु । जयोदरं पृथिव्या ते श्रेयो निर्जितया जितम् ॥

ātmodarakṛte'prājñaḥ karoti viśasaṃ bahu | jayodaraṃ pṛthivyā te śreyo nirjitayā jitam

मूर्ख अपने पेट के लिए बहुत हिंसा करता है। उदर को जीतिए; आपके लिए पृथ्वी से यही श्रेष्ठ है, क्योंकि उसके जीत लिए जाने पर सब कुछ जीत लिया जाता है।

श्लोक 7 (12.17.7)

मानुषान्कामभोगांस्त्वमैश्वर्यं च प्रशंससि । अभोगिनोऽबलाश्चैव यान्ति स्थानमनुत्तमम् ॥

mānuṣānkāmabhogāṃstvamaiśvaryaṃ ca praśaṃsasi | abhogino'balāścaiva yānti sthānamanuttamam

आप मानवीय भोगों और ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हैं, पर जो भोगरहित और तप से दुर्बल हैं, वे सर्वोत्तम स्थान को जाते हैं।

श्लोक 8 (12.17.8)

योगः क्षेमश्च राष्ट्रस्य धर्माधर्मौ त्वयि स्थितौ । मुच्यस्व महतो भारात्त्यागमेवाभिसंश्रय ॥

yogaḥ kṣemaśca rāṣṭrasya dharmādharmau tvayi sthitau | mucyasva mahato bhārāttyāgamevābhisaṃśraya

राष्ट्र का योग और क्षेम, धर्म और अधर्म, सब आप पर टिके हैं। इस महान भार से मुक्त हो जाइए; केवल त्याग का आश्रय लीजिए।

श्लोक 9 (12.17.9)

एकोदरकृते व्याघ्रः करोति विशसं बहु । तमन्येऽप्युपजीवन्ति मन्दवेगतरा मृगाः ॥

ekodarakṛte vyāghraḥ karoti viśasaṃ bahu | tamanye'pyupajīvanti mandavegatarā mṛgāḥ

एक पेट के लिए बाघ बहुत हिंसा करता है, और उसके छोड़े पर दूसरे धीमी चाल वाले पशु जीते हैं।

श्लोक 10 (12.17.10)

विषयान्प्रतिसंगृह्य संन्यासे कुरुते मतिम् । न च तुष्यन्ति राजानः पश्य बुद्ध्यन्तरं यथा ॥

viṣayānpratisaṃgṛhya saṃnyāse kurute matim | na ca tuṣyanti rājānaḥ paśya buddhyantaraṃ yathā

विषयों को समेटकर कोई संन्यास में मन लगाता है, पर राजा सन्तुष्ट नहीं होते। देखिए, बुद्धियों में कैसा भेद है।

श्लोक 11 (12.17.11)

पत्राहारैरश्मकुट्टैर्दन्तोलूखलिकैस्तथा । अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च तैरयम् नरको जितः ॥

patrāhārairaśmakuṭṭairdantolūkhalikaistathā | abbhakṣairvāyubhakṣaiśca tairayam narako jitaḥ

जो पत्ते खाकर रहते हैं, पत्थरों से कूटकर खाते हैं, दाँतों को ही ओखली बनाते हैं, जल पर और वायु पर जीते हैं, उन्होंने इस नरक को जीत लिया है।

श्लोक 12 (12.17.12)

यस्त्विमां वसुधां कृत्स्नां प्रशासेदखिलां नृपः । तुल्याश्मकाञ्चनो यश्च स कृतार्थो न पार्थिवः ॥

yastvimāṃ vasudhāṃ kṛtsnāṃ praśāsedakhilāṃ nṛpaḥ | tulyāśmakāñcano yaśca sa kṛtārtho na pārthivaḥ

जो राजा इस सारी पृथ्वी पर शासन करता है, और जो पत्थर तथा सोने को समान देखता है, उनमें दूसरा ही कृतार्थ है, राजा नहीं।

श्लोक 13 (12.17.13)

संकल्पेषु निरारम्भो निराशीर्निर्ममो भव । अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाव्ययम् ॥

saṃkalpeṣu nirārambho nirāśīrnirmamo bhava | aśokaṃ sthānamātiṣṭha iha cāmutra cāvyayam

संकल्पों में उद्यम-रहित, आशा-रहित और ममता-रहित हो जाइए। उस शोकरहित स्थान में स्थित हो जाइए जो यहाँ और परलोक में अविनाशी है।

श्लोक 14 (12.17.14)

निरामिषा न शोचन्ति शोचन्ति त्वामिषैषिणः । परित्यज्यामिषं सर्वं मृषावादात्प्रमोक्ष्यसे ॥

nirāmiṣā na śocanti śocanti tvāmiṣaiṣiṇaḥ | parityajyāmiṣaṃ sarvaṃ mṛṣāvādātpramokṣyase

भोग की लालसा से रहित लोग शोक नहीं करते; लालसा रखने वाले शोक करते हैं। सारी लालसा त्यागकर आप मिथ्या से मुक्त हो जाएँगे।

श्लोक 15 (12.17.15)

पन्थानौ पितृयानश्च देवयानश्च विश्रुतौ । ईजानाः पितृयानेन देवयानेन मोक्षिणः ॥

panthānau pitṛyānaśca devayānaśca viśrutau | ījānāḥ pitṛyānena devayānena mokṣiṇaḥ

दो मार्ग प्रसिद्ध हैं: पितृयान और देवयान। यज्ञ करने वाले पितृयान से जाते हैं, और मोक्ष चाहने वाले देवयान से।

श्लोक 16 (12.17.16)

तपसा ब्रह्मचर्येण स्वाध्यायेन महर्षयः । विमुच्य देहांस्ते यान्ति मृत्योरविषयं गताः ॥

tapasā brahmacaryeṇa svādhyāyena maharṣayaḥ | vimucya dehāṃste yānti mṛtyoraviṣayaṃ gatāḥ

तप, ब्रह्मचर्य और स्वाध्याय से महर्षि देह छोड़कर मृत्यु के क्षेत्र से परे चले जाते हैं।

श्लोक 17 (12.17.17)

आमिषं बन्धनं लोके कर्मेहोक्तं तथाऽऽमिषम् । ताभ्यां विमुक्तः पापाभ्यां पदमाप्नोति तत्परम् ॥

āmiṣaṃ bandhanaṃ loke karmehoktaṃ tathā''miṣam | tābhyāṃ vimuktaḥ pāpābhyāṃ padamāpnoti tatparam

संसार में आमिष बन्धन है, और यहाँ कर्म भी आमिष ही कहा गया है। इन दोनों पापों से मुक्त होकर मनुष्य परम पद को पाता है।

श्लोक 18 (12.17.18)

अपि गाथां पुरा गीतां जनकेन वदन्त्युत । निर्द्वन्द्वेन विमुक्तेन मोक्षं समनुपश्यता ॥

api gāthāṃ purā gītāṃ janakena vadantyuta | nirdvandvena vimuktena mokṣaṃ samanupaśyatā

वे पुराने समय में जनक द्वारा गाई एक गाथा भी सुनाते हैं, जो द्वन्द्वों से रहित, मुक्त और मोक्ष को देखने वाले थे।

श्लोक 19 (12.17.19)

अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किंचन । मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचित्प्रदह्यते ॥

anantaṃ bata me vittaṃ yasya me nāsti kiṃcana | mithilāyāṃ pradīptāyāṃ na me kiṃcitpradahyate

'सचमुच मेरा धन अनन्त है, क्योंकि मेरा कुछ भी नहीं है। मिथिला के जलने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।'

श्लोक 20 (12.17.20)

प्रज्ञाप्रासादमारुह्य न शोचेच्छोचतो जनान् । जगतीस्थोऽथवाऽद्रिस्थो मन्दबुद्धिर्नचेक्षते ॥

prajñāprāsādamāruhya na śocecchocato janān | jagatīstho'thavā'dristho mandabuddhirnacekṣate

प्रज्ञा के महल पर चढ़ा हुआ मनुष्य शोक करने वाले लोगों के लिए शोक न करे। भूमि पर खड़ा हो या पर्वत पर, मन्दबुद्धि देखता नहीं।

श्लोक 21 (12.17.21)

दृश्यं पश्यति यः पश्यन्स चक्षुष्मान्स बुद्धिमान् । अज्ञातानां च विज्ञानात्संबोधाद्बुद्धिरुच्यते ॥

dṛśyaṃ paśyati yaḥ paśyansa cakṣuṣmānsa buddhimān | ajñātānāṃ ca vijñānātsaṃbodhādbuddhirucyate

जो देखने योग्य को देखता है, वही चक्षुष्मान् है, वही बुद्धिमान् है। अज्ञात के विज्ञान और बोध से ही बुद्धि कही जाती है।

श्लोक 22 (12.17.22)

यस्तु मानं विजानाति बहुमानमियात्स वै । ब्रह्मभावप्रभूतानां वैद्यानां भावितात्मनाम् ॥

yastu mānaṃ vijānāti bahumānamiyātsa vai | brahmabhāvaprabhūtānāṃ vaidyānāṃ bhāvitātmanām

जो मान को जानता है, वह उन विद्वानों में बड़ा सम्मान पाता है जो ब्रह्मभाव से सम्पन्न और शुद्ध आत्मा वाले हैं।

श्लोक 23 (12.17.23)

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

yadā bhūtapṛthagbhāvamekasthamanupaśyati | tata eva ca vistāraṃ brahma saṃpadyate tadā

जब मनुष्य प्राणियों के पृथक् भाव को एक में स्थित देखता है, और उसी एक से उनका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (12.17.24)

ते जनास्तां गतिं यान्ति नाविद्वांसोऽल्पचेतसः । नाबुद्धयो नातपसः सर्वं बुद्धौ प्रतिष्ठितम् ॥

te janāstāṃ gatiṃ yānti nāvidvāṃso'lpacetasaḥ | nābuddhayo nātapasaḥ sarvaṃ buddhau pratiṣṭhitam

वे लोग उस गति को पाते हैं; अविद्वान, अल्पबुद्धि, अज्ञानी और तपहीन नहीं। सब कुछ बुद्धि में प्रतिष्ठित है।

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