शान्ति पर्व · अध्याय 23
शंख और लिखित की कथा: दण्ड का धर्म
अर्जुन के बाद व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ आश्रम है और दण्ड धारण करना क्षत्रिय का प्रधान धर्म है। राजा सुद्युम्न ने इसी धर्म के पालन से सिद्धि पाई, यह दिखाने के लिए वे कथा सुनाते हैं: लिखित ने बिना पूछे अपने भाई शंख के फल खा लिए, शंख के कहने पर वे राजा के पास दण्ड माँगने गए और राजा ने उनके हाथ कटवा दिए। बाहुदा नदी में स्नान करते ही उनके हाथ फिर प्रकट हो गए। अन्त में व्यास युधिष्ठिर को संन्यास के बजाय राज्य करने का उपदेश देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.23.1)
एवमुक्तस्तु कौन्तेयो गुडाकेशेन भारत । नोवाच किंचित्कौरव्यस्ततो द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
evamuktastu kaunteyo guḍākeśena bhārata | novāca kiṃcitkauravyastato dvaipāyano'bravīt
हे भारत! गुडाकेश अर्जुन के इस प्रकार कहने पर कुरुवंशी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब द्वैपायन व्यास बोले।
व्यास उवाच
श्लोक 2 (12.23.2)
बीभत्सोर्वचनं सौम्य सत्यमेतद्युधिष्ठिर । शास्त्रदृष्टः परो धर्मः स्मृतो गार्हस्थ्य आश्रमः ॥
bībhatsorvacanaṃ saumya satyametadyudhiṣṭhira | śāstradṛṣṭaḥ paro dharmaḥ smṛto gārhasthya āśramaḥ
हे सौम्य युधिष्ठिर! बीभत्सु (अर्जुन) की बात सत्य है। शास्त्रों में गृहस्थ आश्रम को ही परम धर्म कहा गया है।
श्लोक 3 (12.23.3)
स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि । न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते ॥
svadharmaṃ cara dharmajña yathāśāstraṃ yathāvidhi | na hi gārhasthyamutsṛjya tavāraṇyaṃ vidhīyate
हे धर्मज्ञ! शास्त्र और विधि के अनुसार अपने धर्म का पालन करो। गृहस्थाश्रम को छोड़कर तुम्हारे लिए वन में रहने का विधान नहीं है।
श्लोक 4 (12.23.4)
गृहस्थं हि सदा देवाः पितरोऽतिथयस्तथा । भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान्भरस्व महीपते ॥
gṛhasthaṃ hi sadā devāḥ pitaro'tithayastathā | bhṛtyāścaivopajīvanti tānbharasva mahīpate
देवता, पितर, अतिथि और भृत्य, ये सब सदा गृहस्थ के ही आश्रय से जीते हैं। हे पृथ्वीपति! तुम इनका भरण-पोषण करो।
श्लोक 5 (12.23.5)
वयांसि पशवश्चैव भूतानि च जनाधिप । गृहस्थैरेव धार्यन्ते तस्माच्छ्रेष्ठो गृहाश्रमी ॥
vayāṃsi paśavaścaiva bhūtāni ca janādhipa | gṛhasthaireva dhāryante tasmācchreṣṭho gṛhāśramī
हे जनाधिप! पक्षी, पशु और सभी प्राणी गृहस्थों के द्वारा ही पाले जाते हैं; इसीलिए गृहस्थ सबसे श्रेष्ठ है।
श्लोक 6 (12.23.6)
सोऽयं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचरः । तं चराद्य विधिं पार्थ दुश्चरं दुर्बलेन्द्रियैः ॥
so'yaṃ caturṇāmeteṣāmāśramāṇāṃ durācaraḥ | taṃ carādya vidhiṃ pārtha duścaraṃ durbalendriyaiḥ
इन चारों आश्रमों में यह गृहस्थाश्रम निभाने में सबसे कठिन है। हे पार्थ! दुर्बल इन्द्रियों वालों के लिए जो विधि अत्यन्त कठिन है, उसी का तुम अब पालन करो।
श्लोक 7 (12.23.7)
वेदज्ञानं च ते कृत्स्नं तपश्चाचरितं महत् । पितृपैतामहं राज्यं धुर्यवद्वोद्दुमर्हसि ॥
vedajñānaṃ ca te kṛtsnaṃ tapaścācaritaṃ mahat | pitṛpaitāmahaṃ rājyaṃ dhuryavadvoddumarhasi
तुम्हें वेदों का पूर्ण ज्ञान है और तुमने महान तप किया है। पिता-पितामह के राज्य का भार तुम्हें जूए में जुते बैल की भाँति उठाना चाहिए।
श्लोक 8 (12.23.8)
तपो यज्ञस्तथा विद्या भैक्ष्यमिन्द्रियसंयमः । ध्यानं विद्या समुत्थानं संतोषश्च श्रियं प्रति । तथा ह्येकान्तशीलत्वं तुष्टिर्दानं च शक्तितः ॥
tapo yajñastathā vidyā bhaikṣyamindriyasaṃyamaḥ | dhyānaṃ vidyā samutthānaṃ saṃtoṣaśca śriyaṃ prati | tathā hyekāntaśīlatvaṃ tuṣṭirdānaṃ ca śaktitaḥ
तप, यज्ञ और विद्या, भिक्षा से निर्वाह, इन्द्रियसंयम, ध्यान, अध्ययन और उद्यम, धन के विषय में सन्तोष, एकान्त में रहने का स्वभाव, तुष्टि तथा सामर्थ्य के अनुसार दान।
श्लोक 9 (12.23.9)
ब्राह्मणानां महाराज चेष्टा संसिद्धिकारिका । क्षत्रियाणां तु वक्ष्यामि तवापि विदितं पुनः ॥
brāhmaṇānāṃ mahārāja ceṣṭā saṃsiddhikārikā | kṣatriyāṇāṃ tu vakṣyāmi tavāpi viditaṃ punaḥ
हे महाराज! ब्राह्मणों के सिद्धि देने वाले कर्म ये हैं। अब मैं क्षत्रियों के कर्म कहूँगा, यद्यपि वे तुम्हें पहले से ज्ञात हैं।
श्लोक 10 (12.23.10)
यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोषः श्रियं प्रति । दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ॥
yajño vidyā samutthānamasaṃtoṣaḥ śriyaṃ prati | daṇḍadhāraṇamugratvaṃ prajānāṃ paripālanam
यज्ञ, विद्या, उद्यम, ऐश्वर्य के विषय में असन्तोष, दण्ड धारण करना, उग्रता और प्रजा का पालन।
श्लोक 11 (12.23.11)
वेदज्ञानं तथा कृत्स्नं तपः सुचरितं तथा । द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रे च प्रतिपादनम् ॥
vedajñānaṃ tathā kṛtsnaṃ tapaḥ sucaritaṃ tathā | draviṇopārjanaṃ bhūri pātre ca pratipādanam
वेदों का पूर्ण ज्ञान, भली-भाँति किया हुआ तप, प्रचुर धन का उपार्जन और योग्य पात्र को उसका दान।
श्लोक 12 (12.23.12)
एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशांपते । इमं लोकममुं चैव साधयन्तीति नः श्रुतम् ॥
etāni rājñāṃ karmāṇi sukṛtāni viśāṃpate | imaṃ lokamamuṃ caiva sādhayantīti naḥ śrutam
हे विशाम्पते! ये राजाओं के सुकृत कर्म हैं। हमने सुना है कि इनसे वे इस लोक और परलोक दोनों को सिद्ध करते हैं।
श्लोक 13 (12.23.13)
एषां ज्यायस्तु कौन्तेय दण्डधारणमुच्यते । बलं हि क्षत्रिये नित्यं बले दण्डः समाहितः ॥
eṣāṃ jyāyastu kaunteya daṇḍadhāraṇamucyate | balaṃ hi kṣatriye nityaṃ bale daṇḍaḥ samāhitaḥ
हे कुन्तीपुत्र! इन सबमें दण्ड धारण करना सबसे बड़ा कहा गया है; क्योंकि क्षत्रिय में बल सदा रहता है और दण्ड बल पर ही टिका है।
श्लोक 14 (12.23.14)
एताश्चेष्टाः क्षत्रियाणां राजन्संसिद्धिकारिकाः । अपि गाथामिमां चापि बृहस्पतिरगायत ॥
etāśceṣṭāḥ kṣatriyāṇāṃ rājansaṃsiddhikārikāḥ | api gāthāmimāṃ cāpi bṛhaspatiragāyata
हे राजन्! क्षत्रियों के सिद्धि देने वाले कर्म ये ही हैं। इस विषय में बृहस्पति ने यह गाथा भी गाई थी।
श्लोक 15 (12.23.15)
भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥
bhūmiretau nigirati sarpo bilaśayāniva | rājānaṃ cāviroddhāraṃ brāhmaṇaṃ cāpravāsinam
जैसे सर्प बिल में सोने वाले प्राणियों को निगल जाता है, वैसे ही पृथ्वी इन दोनों को निगल जाती है: विरोध न करने वाले राजा को और परदेश न जाने वाले ब्राह्मण को।
श्लोक 16 (12.23.16)
सुद्युम्नश्चापि राजर्षिः श्रूयते दण्डधारणात् । प्राप्तवान्परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥
sudyumnaścāpi rājarṣiḥ śrūyate daṇḍadhāraṇāt | prāptavānparamāṃ siddhiṃ dakṣaḥ prācetaso yathā
सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्न ने भी दण्ड धारण करने से प्रचेता के पुत्र दक्ष की भाँति परम सिद्धि प्राप्त की थी।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 17 (12.23.17)
भगवन्कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिपः । संसिद्धिं परमां प्राप्तः श्रोतुमिच्छामि तं नृपम् ॥
bhagavankarmaṇā kena sudyumno vasudhādhipaḥ | saṃsiddhiṃ paramāṃ prāptaḥ śrotumicchāmi taṃ nṛpam
भगवन्! पृथ्वीपति सुद्युम्न ने किस कर्म से परम सिद्धि पाई? मैं उस राजा के विषय में सुनना चाहता हूँ।
व्यास उवाच
श्लोक 18 (12.23.18)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शङ्खश्च लिखितश्चास्तां भ्रातरौ संशितव्रतौ ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śaṅkhaśca likhitaścāstāṃ bhrātarau saṃśitavratau
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं। शंख और लिखित नाम के दो भाई थे, जो कठोर व्रत का पालन करते थे।
श्लोक 19 (12.23.19)
तयोरावसथावास्तां रमणीयौ पृथक्पृथक् । नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतौ बाहुदामनु ॥
tayorāvasathāvāstāṃ ramaṇīyau pṛthakpṛthak | nityapuṣpaphalairvṛkṣairupetau bāhudāmanu
उन दोनों के आश्रम बाहुदा नदी के किनारे अलग-अलग बने हुए अत्यन्त रमणीय थे और सदा फूल-फल देने वाले वृक्षों से भरे थे।
श्लोक 20 (12.23.20)
ततः कदाचिल्लिखितः शङ्खस्याश्रममागतः । यदृच्छयाऽथ शङ्खोपि निष्क्रान्तोऽभवदाश्रमात् ॥
tataḥ kadācillikhitaḥ śaṅkhasyāśramamāgataḥ | yadṛcchayā'tha śaṅkhopi niṣkrānto'bhavadāśramāt
फिर एक बार लिखित शंख के आश्रम में आए; और संयोग से उसी समय शंख आश्रम से बाहर गए हुए थे।
श्लोक 21 (12.23.21)
सोऽभिगम्याश्रमं भ्रातुश्चंक्रमँल्लिखितस्तदा । फलानि शातयामास सम्यक्परिणतान्युत ॥
so'bhigamyāśramaṃ bhrātuścaṃkramam̐llikhitastadā | phalāni śātayāmāsa samyakpariṇatānyuta
भाई के आश्रम में पहुँचकर लिखित वहाँ घूमते हुए भली-भाँति पके फलों को तोड़-तोड़कर गिराने लगे।
श्लोक 22 (12.23.22)
तान्युपादाय विस्रब्धो भक्षयामास स द्विजः । तस्मिंश्च भक्षयत्येव शङ्खोऽप्याश्रममागतः ॥
tānyupādāya visrabdho bhakṣayāmāsa sa dvijaḥ | tasmiṃśca bhakṣayatyeva śaṅkho'pyāśramamāgataḥ
उन फलों को लेकर उस ब्राह्मण ने निःशंक होकर खा लिया; और जब वे खा ही रहे थे, तभी शंख भी आश्रम में लौट आए।
श्लोक 23 (12.23.23)
भक्षयन्तं तु तं दृष्ट्वा शङ्खो भ्रातरमब्रवीत् । कुतः फलान्यवाप्तानि हेतुना केन खादसि ॥
bhakṣayantaṃ tu taṃ dṛṣṭvā śaṅkho bhrātaramabravīt | kutaḥ phalānyavāptāni hetunā kena khādasi
उन्हें फल खाते देखकर शंख ने भाई से कहा, “ये फल तुम्हें कहाँ से मिले? तुम किस कारण से इन्हें खा रहे हो?”
श्लोक 24 (12.23.24)
सोऽब्रवीद्धातरं ज्येष्ठमुपसृत्याभिवाद्य च । इत एव गृहीतानि मयेति प्रहसन्निव ॥
so'bravīddhātaraṃ jyeṣṭhamupasṛtyābhivādya ca | ita eva gṛhītāni mayeti prahasanniva
लिखित ने अपने बड़े भाई के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और मानो हँसते हुए कहा, “मैंने ये फल यहीं से लिए हैं।”
श्लोक 25 (12.23.25)
तमब्रवीत्तथा शङ्खस्तीव्ररोषसमन्वितः । स्तेयं त्वया कृतमिदं फलान्याददता स्वयम् ॥
tamabravīttathā śaṅkhastīvraroṣasamanvitaḥ | steyaṃ tvayā kṛtamidaṃ phalānyādadatā svayam
तब तीव्र क्रोध से भरे शंख ने उनसे कहा, “तुमने स्वयं फल लेकर चोरी की है।”
शङ्ख उवाच
श्लोक 26 (12.23.26)
गच्छ राजानमासाद्य स्वकर्म कथयस्व वै । अदत्तादानमेवं हि कृतं पार्थिवसत्तम ॥
gaccha rājānamāsādya svakarma kathayasva vai | adattādānamevaṃ hi kṛtaṃ pārthivasattama
“जाओ, राजा के पास पहुँचकर अपना कर्म बताओ: ‘हे नृपश्रेष्ठ! मैंने बिना दिए हुए की चोरी की है।’
श्लोक 27 (12.23.27)
स्तेनं मां त्वं विदित्वा च स्वधर्ममनुपालय । शीघ्रं धारय चोरस्य मम दण्डं नराधिप ॥
stenaṃ māṃ tvaṃ viditvā ca svadharmamanupālaya | śīghraṃ dhāraya corasya mama daṇḍaṃ narādhipa
मुझे चोर जानकर अपने धर्म का पालन करो, और हे नराधिप! शीघ्र ही मुझ चोर को दण्ड दो।”
व्यास उवाच
श्लोक 28 (12.23.28)
इत्युक्तस्तस्य वचनात्सुद्युम्नं स नराधिपम् । अभ्यगच्छन्महाबाहो लिखितः संशितव्रतः ॥
ityuktastasya vacanātsudyumnaṃ sa narādhipam | abhyagacchanmahābāho likhitaḥ saṃśitavrataḥ
हे महाबाहो! इस प्रकार कहे जाने पर दृढ़ व्रत वाले लिखित भाई के कहने से उस राजा सुद्युम्न के पास गए।
श्लोक 29 (12.23.29)
सुद्युम्नस्त्वन्तपालेभ्यः श्रुत्वा लिखितमागतम् । अभ्यगच्छत्सहामात्यः पद्भ्यामेव जनेश्वरः ॥
sudyumnastvantapālebhyaḥ śrutvā likhitamāgatam | abhyagacchatsahāmātyaḥ padbhyāmeva janeśvaraḥ
सीमा के रक्षकों से लिखित का आगमन सुनकर राजा सुद्युम्न मन्त्रियों के साथ पैदल ही उनके पास गए।
श्लोक 30 (12.23.30)
तमब्रवीत्समागम्य स राजा धर्मवित्तमम् । किमागमनमाचक्ष्व भगवन्कृतमेव तत् ॥
tamabravītsamāgamya sa rājā dharmavittamam | kimāgamanamācakṣva bhagavankṛtameva tat
उनसे मिलकर राजा ने उन धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ से कहा, “भगवन्! आपके आने का कारण बताइए; उसे हुआ ही समझिए।”
श्लोक 31 (12.23.31)
एवमुक्तः स विप्रर्षिः सुद्युम्नमिदमब्रवीत् । प्रतिश्रुत्य करिष्येति श्रुत्वा तत्कर्तुमर्हसि ॥
evamuktaḥ sa viprarṣiḥ sudyumnamidamabravīt | pratiśrutya kariṣyeti śrutvā tatkartumarhasi
ऐसा कहे जाने पर उस विप्रर्षि ने सुद्युम्न से कहा, “पहले प्रतिज्ञा कीजिए कि आप करेंगे, और सुनकर आपको उसे करना ही होगा।
लिखित उवाच
श्लोक 32 (12.23.32)
अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि मनुजर्षभ । भक्षितानि महाराज तत्र मां शाधि माचिरम् ॥
anisṛṣṭāni guruṇā phalāni manujarṣabha | bhakṣitāni mahārāja tatra māṃ śādhi māciram
हे नरश्रेष्ठ! बड़े भाई के बिना दिए ही मैंने फल खा लिए हैं। हे महाराज! उसके लिए मुझे शीघ्र दण्ड दीजिए।”
सुद्युम्न उवाच
श्लोक 33 (12.23.33)
प्रमाणं चेन्मतो राजा भवतो दण्डधारणे । अनुज्ञायामपि तथा हेतुः स्याद्ब्राह्मणर्षभ ॥
pramāṇaṃ cenmato rājā bhavato daṇḍadhāraṇe | anujñāyāmapi tathā hetuḥ syādbrāhmaṇarṣabha
ब्राह्मणश्रेष्ठ! यदि दण्ड देने में आप राजा को प्रमाण मानते हैं, तो क्षमा करने में भी राजा ही कारण होना चाहिए।
श्लोक 34 (12.23.34)
स भवानभ्यनुज्ञातः शुचिकर्मा महाव्रतः । ब्रूहि कामानतोऽन्यांस्त्वं करिष्यामि हि ते वचः ॥
sa bhavānabhyanujñātaḥ śucikarmā mahāvrataḥ | brūhi kāmānato'nyāṃstvaṃ kariṣyāmi hi te vacaḥ
इसलिए अब आप क्षमा किए जा चुके हैं, आप शुद्ध कर्म वाले और महान व्रती हैं। इसके सिवा कोई और वर माँगिए; मैं आपकी बात पूरी करूँगा।”
व्यास उवाच
श्लोक 35 (12.23.35)
संछन्द्यमानो ब्रह्मर्षिः पार्थिवेन महात्मना । नान्यं स वरयामास तस्माद्दण्डादृते वरम् ॥
saṃchandyamāno brahmarṣiḥ pārthivena mahātmanā | nānyaṃ sa varayāmāsa tasmāddaṇḍādṛte varam
महात्मा राजा के इस प्रकार आग्रह करने पर भी उस ब्रह्मर्षि ने दण्ड के सिवा कोई दूसरा वर नहीं माँगा।
श्लोक 36 (12.23.36)
ततः स पृथिवीपालो लिखितस्य महात्मनः । करौ प्रच्छेदयामास धृतदण्डो जगाम सः ॥
tataḥ sa pṛthivīpālo likhitasya mahātmanaḥ | karau pracchedayāmāsa dhṛtadaṇḍo jagāma saḥ
तब राजा ने महात्मा लिखित के दोनों हाथ कटवा दिए, और दण्ड पाकर लिखित वहाँ से चले गए।
श्लोक 37 (12.23.37)
स गत्वा भ्रातरं शङ्खमार्तरूपोऽब्रवीदिदम् । धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भवांस्तत्क्षन्तुमर्हति ॥
sa gatvā bhrātaraṃ śaṅkhamārtarūpo'bravīdidam | dhṛtadaṇḍasya durbuddherbhavāṃstatkṣantumarhati
वे अपने भाई शंख के पास जाकर दुःखी स्वर में बोले, “मैं दुर्बुद्धि था; अब दण्ड भोग चुका हूँ, आप मुझे क्षमा कर दें।”
शङ्ख उवाच
श्लोक 38 (12.23.38)
न कुप्ये तव धर्मज्ञ न त्वं दूषयसे मम । सुनिर्मलं कुलं ब्रह्मन्नस्मिञ्जगति विश्रुतम् । धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृतिः कृता ॥
na kupye tava dharmajña na tvaṃ dūṣayase mama | sunirmalaṃ kulaṃ brahmannasmiñjagati viśrutam | dharmastu te vyatikrāntastataste niṣkṛtiḥ kṛtā
“हे धर्मज्ञ! मैं तुमसे क्रुद्ध नहीं हूँ, और तुम मेरा कोई अपराध भी नहीं करते। हे ब्राह्मण! तुम्हारा कुल अत्यन्त निर्मल है और इस जगत् में प्रसिद्ध है। परन्तु तुमसे धर्म का उल्लंघन हुआ था, इसलिए तुम्हारा प्रायश्चित्त हो गया।
श्लोक 39 (12.23.39)
त्वं गत्वा बाहुदां शीघ्रं तर्पयस्व यथाविधि । देवानृषीन्पितृंश्चैव मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥
tvaṃ gatvā bāhudāṃ śīghraṃ tarpayasva yathāvidhi | devānṛṣīnpitṛṃścaiva mā cādharme manaḥ kṛthāḥ
तुम शीघ्र बाहुदा नदी पर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करो, और अपना मन अधर्म में मत लगाओ।
श्लोक 40 (12.23.40)
ब्रह्महत्यां सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमम् । महान्ति पातकान्याहुः संयोगं चैव तैः सह ॥
brahmahatyāṃ surāpānaṃ steyaṃ gurvaṅganāgamam | mahānti pātakānyāhuḥ saṃyogaṃ caiva taiḥ saha
ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी और गुरुपत्नीगमन: ये महापातक कहे गए हैं, और इनके साथ संसर्ग करना भी महापातक है।
श्लोक 41 (12.23.41)
न स्तेयसदृशं ब्रह्मन्महापातकमस्ति हि । जगत्यस्मिन्महाभाग ब्रह्महत्यासमं हि तत् ॥
na steyasadṛśaṃ brahmanmahāpātakamasti hi | jagatyasminmahābhāga brahmahatyāsamaṃ hi tat
हे ब्राह्मण! इस जगत् में चोरी के समान कोई महापातक नहीं है; हे महाभाग! वह ब्रह्महत्या के बराबर ही है।
श्लोक 42 (12.23.42)
सर्वपातकिनां ब्रह्मन्दण्डः शारीर उच्यते । तस्करस्य विशेषेण नान्यो दण्डो विधीयते ॥
sarvapātakināṃ brahmandaṇḍaḥ śārīra ucyate | taskarasya viśeṣeṇa nānyo daṇḍo vidhīyate
हे ब्राह्मण! सभी पापियों के लिए शारीरिक दण्ड कहा गया है; चोर के लिए तो विशेष रूप से कोई दूसरा दण्ड नहीं बताया गया।
श्लोक 43 (12.23.43)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वैश्यः शूद्रोऽथवा द्विज । सर्वे कामकृते पापे हन्तव्या न विचारणा ॥
brāhmaṇaḥ kṣatriyo vā'pi vaiśyaḥ śūdro'thavā dvija | sarve kāmakṛte pāpe hantavyā na vicāraṇā
हे द्विज! ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शूद्र, जो जान-बूझकर पाप करें, वे सब मारे जाने योग्य हैं; इसमें कोई विचार नहीं।
श्लोक 44 (12.23.44)
राजभिर्धृतदण्डा वै कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥
rājabhirdhṛtadaṇḍā vai kṛtvā pāpāni mānavāḥ | nirmalāḥ svargamāyānti santaḥ sukṛtino yathā
पाप करके भी जो मनुष्य राजाओं से दण्ड पा लेते हैं, वे निर्मल होकर पुण्यात्मा सज्जनों की भाँति स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 45 (12.23.45)
उद्धृतं नः कुलं ब्रह्मन्नाज्ञादण्डे धृते त्वयि ॥
uddhṛtaṃ naḥ kulaṃ brahmannājñādaṇḍe dhṛte tvayi
हे ब्राह्मण! आज्ञा से दिया गया दण्ड तुमने भोग लिया, इससे हमारे कुल का उद्धार हो गया।”
व्यास उवाच
श्लोक 46 (12.23.46)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शङ्खस्य लिखितस्तदा । अवगाह्यापगां पुण्यामुदकार्थं प्रचक्रमे ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā śaṅkhasya likhitastadā | avagāhyāpagāṃ puṇyāmudakārthaṃ pracakrame
शंख के वे वचन सुनकर लिखित ने पवित्र नदी में स्नान किया और जलदान आरम्भ किया।
श्लोक 47 (12.23.47)
प्रादुरास्तां ततस्तस्य करौ जलजसन्निभौ । ततः स विस्मितो भ्रातुर्दर्शयामास तौ करौ ॥
prādurāstāṃ tatastasya karau jalajasannibhau | tataḥ sa vismito bhrāturdarśayāmāsa tau karau
तभी उनके दोनों हाथ कमल के समान प्रकट हो गए; तब आश्चर्यचकित होकर उन्होंने अपने भाई को वे दोनों हाथ दिखाए।
श्लोक 48 (12.23.48)
ततस्तमब्रवीच्छङ्खस्तपसेदं कृतं मया । मा च तेऽत्र विशङ्का भूद्दैवमत्र विधीयते ॥
tatastamabravīcchaṅkhastapasedaṃ kṛtaṃ mayā | mā ca te'tra viśaṅkā bhūddaivamatra vidhīyate
तब शंख ने उनसे कहा, “यह मैंने तप से किया है। इस विषय में तुम्हारे मन में शंका न रहे; यहाँ दैव ही काम कर रहा है।”
लिखित उवाच
श्लोक 49 (12.23.49)
किंतु नाहं त्वया पूतः पूर्वमेव महाद्युते । यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम ॥
kiṃtu nāhaṃ tvayā pūtaḥ pūrvameva mahādyute | yasya te tapaso vīryamīdṛśaṃ dvijasattama
“हे महातेजस्वी! जिनके तप की ऐसी शक्ति है, ऐसे आपने मुझे पहले ही क्यों नहीं पवित्र कर दिया, हे द्विजश्रेष्ठ?”
शङ्ख उवाच
श्लोक 50 (12.23.50)
एवमेतन्मया कार्यं नाहं दण्डधरस्तव । स च पूतो नरपतिस्त्वं चापि पितृभिः सह ॥
evametanmayā kāryaṃ nāhaṃ daṇḍadharastava | sa ca pūto narapatistvaṃ cāpi pitṛbhiḥ saha
“मुझे यही करना था; मैं तुम्हें दण्ड देने वाला नहीं हूँ। वह राजा पवित्र हो गया और तुम भी पितरों सहित पवित्र हो गए।”
व्यास उवाच
श्लोक 51 (12.23.51)
स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेयान्वै तेन कर्मणा । प्राप्तवान्परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥
sa rājā pāṇḍavaśreṣṭha śreyānvai tena karmaṇā | prāptavānparamāṃ siddhiṃ dakṣaḥ prācetaso yathā
हे पाण्डवश्रेष्ठ! उस कर्म से वह राजा और भी श्रेष्ठ हुआ और प्रचेता के पुत्र दक्ष की भाँति उसने परम सिद्धि प्राप्त की।
श्लोक 52 (12.23.52)
एष धर्मः क्षत्रियाणां प्रजानां परिपालनम् । उत्पथेभ्यो महाराज मा स्म शोके मनः कृथाः ॥
eṣa dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ prajānāṃ paripālanam | utpathebhyo mahārāja mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ
प्रजा को कुमार्गों से बचाकर उसका पालन करना क्षत्रियों का धर्म है। हे महाराज! तुम अपने मन को शोक में मत डालो।
श्लोक 53 (12.23.53)
भ्रातुरस्य हितं वाक्यं शृणु धर्मज्ञसत्तम । दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ॥
bhrāturasya hitaṃ vākyaṃ śṛṇu dharmajñasattama | daṇḍa eva hi rājendra kṣatradharmo na muṇḍanam
हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ! अपने इस भाई की हितकर बात सुनो। हे राजेन्द्र! क्षत्रिय का धर्म दण्ड ही है, सिर मुँड़ाना नहीं।