शान्ति पर्व · अध्याय 24
दोषरहित पुरुषार्थ करने वाला राजा: हयग्रीव की कथा
व्यास युधिष्ठिर को राज्य करने, भाइयों के साथ सुख भोगने, देवताओं, पितरों और याचकों के ऋण चुकाने तथा बड़े यज्ञ करने का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि राजा धर्म से कैसे च्युत नहीं होता: प्रमाण और शास्त्र के अनुसार चलकर, काम-क्रोध छोड़कर दण्ड देकर, विद्वान् और योग्य पुरुषों को नियुक्त करके और पुरुषार्थ करके। अन्त में वे राजर्षि हयग्रीव की कथा कहते हैं, जो युद्ध में अकेले लड़कर मारे गए और अब स्वर्ग में आनन्द कर रहे हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.24.1)
पुनरेव महर्षिस्तं कृष्णद्वैपायनोऽर्थवत् । अजातशत्रुं कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥
punareva maharṣistaṃ kṛṣṇadvaipāyano'rthavat | ajātaśatruṃ kaunteyamidaṃ vacanamabravīt
महर्षि कृष्णद्वैपायन ने फिर अजातशत्रु कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से ये अर्थपूर्ण वचन कहे।
व्यास उवाच
श्लोक 2 (12.24.2)
अरण्ये वसतां तात भ्रातॄणां ते मनस्विनाम् । मनोरथा महाराज ये तत्रासन्युधिष्ठिर ॥
araṇye vasatāṃ tāta bhrātṝṇāṃ te manasvinām | manorathā mahārāja ye tatrāsanyudhiṣṭhira
तात! वन में रहते हुए तुम्हारे मनस्वी भाइयों के मन में जो मनोरथ थे, हे महाराज युधिष्ठिर,
श्लोक 3 (12.24.3)
तानि मे भरतश्रेष्ठ प्राप्नुवन्तु महारथाः । प्रशाधि पृथिवीं पार्थ ययातिरिव नाहुषः ॥
tāni me bharataśreṣṭha prāpnuvantu mahārathāḥ | praśādhi pṛthivīṃ pārtha yayātiriva nāhuṣaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! वे महारथी भाई उन्हें प्राप्त करें, यह मेरा कथन है। हे पार्थ! तुम नहुषपुत्र ययाति की भाँति पृथ्वी का शासन करो।
श्लोक 4 (12.24.4)
अरण्ये दुःखवसतिरनुभूता तपस्विभिः । दुःखस्यान्ते नरव्याघ्र सुखान्यनुभवन्तु वै ॥
araṇye duḥkhavasatiranubhūtā tapasvibhiḥ | duḥkhasyānte naravyāghra sukhānyanubhavantu vai
तपस्वी भाइयों ने वन में दुःखमय निवास भोगा है। हे नरव्याघ्र! उस दुःख के अन्त में अब वे सुखों का उपभोग करें।
श्लोक 5 (12.24.5)
धर्ममर्थं च कामं च भ्रातृभिः सह भारत । अनुभूय ततः पश्चात्प्रस्थाताऽसि विशांपते ॥
dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca bhrātṛbhiḥ saha bhārata | anubhūya tataḥ paścātprasthātā'si viśāṃpate
हे भारत! भाइयों के साथ धर्म, अर्थ और काम का उपभोग करो; हे विशाम्पते! उसके पश्चात् तुम प्रस्थान कर सकते हो।
श्लोक 6 (12.24.6)
अर्थिनां च पितृणां च देवतानां च भारत । आनृण्यं गच्छ कौन्तेय ततः स्वर्गं गमिष्यसि ॥
arthināṃ ca pitṛṇāṃ ca devatānāṃ ca bhārata | ānṛṇyaṃ gaccha kaunteya tataḥ svargaṃ gamiṣyasi
हे भारत! याचकों, पितरों और देवताओं के ऋण से उऋण हो जाओ, हे कुन्तीपुत्र; तब तुम स्वर्ग जाओगे।
श्लोक 7 (12.24.7)
सर्वमेधाश्वमेधाभ्यां यजस्व कुरुनन्दन । ततः पश्चान्महाराज गमिष्यसि परां गतिम् ॥
sarvamedhāśvamedhābhyāṃ yajasva kurunandana | tataḥ paścānmahārāja gamiṣyasi parāṃ gatim
हे कुरुनन्दन! सर्वमेध और अश्वमेध यज्ञ करो; हे महाराज! उसके बाद तुम परम गति को प्राप्त होगे।
श्लोक 8 (12.24.8)
भ्रातृंश्च सर्वान्क्रतुभिः संयोज्य बहुदक्षिणैः । संप्राप्तः कीर्तिमतुलां पाण्डवेय गमिष्यसि ॥
bhrātṛṃśca sarvānkratubhiḥ saṃyojya bahudakṣiṇaiḥ | saṃprāptaḥ kīrtimatulāṃ pāṇḍaveya gamiṣyasi
बहुत दक्षिणा वाले यज्ञों में अपने सभी भाइयों को लगाकर और अनुपम कीर्ति पाकर, हे पाण्डुपुत्र! तुम प्रस्थान करोगे।
श्लोक 9 (12.24.9)
विद्म ते पुरुषव्याघ्र वचनं कुरुसत्तम । शृणुष्वैवं यथा कुर्वन्न धर्माच्च्यवसे नृप ॥
vidma te puruṣavyāghra vacanaṃ kurusattama | śṛṇuṣvaivaṃ yathā kurvanna dharmāccyavase nṛpa
हे पुरुषव्याघ्र, कुरुश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी बात जानता हूँ। सुनो, किस प्रकार आचरण करते हुए तुम धर्म से च्युत नहीं होओगे, हे राजन्।
श्लोक 10 (12.24.10)
आददानस्य विजयं विग्रहं च युधिष्ठिर । समानधर्मकुशलाः स्थापयन्ति नरेश्वर ॥
ādadānasya vijayaṃ vigrahaṃ ca yudhiṣṭhira | samānadharmakuśalāḥ sthāpayanti nareśvara
हे नरेश्वर युधिष्ठिर! समान धर्म में कुशल लोग (दूसरों का धन) लेने वाले के लिए विजय और युद्ध की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक 11 (12.24.11)
प्रत्यक्षमनुमानं च उपमानं तथाऽऽगमः । अर्थापत्तिस्तथैतिह्यं संशयो निर्णयस्तथा ॥
pratyakṣamanumānaṃ ca upamānaṃ tathā''gamaḥ | arthāpattistathaitihyaṃ saṃśayo nirṇayastathā
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम (शास्त्र); अर्थापत्ति, ऐतिह्य, संशय और निर्णय;
श्लोक 12 (12.24.12)
आकार इङ्गितं चैव गतिश्चेष्टा च भारत । प्रतिज्ञा चैव हेतुश्च दृष्टान्तोपनयस्तथा ॥
ākāra iṅgitaṃ caiva gatiśceṣṭā ca bhārata | pratijñā caiva hetuśca dṛṣṭāntopanayastathā
आकार, इंगित, गति और चेष्टा, हे भारत; प्रतिज्ञा, हेतु, दृष्टान्त और उपनय;
श्लोक 13 (12.24.13)
उक्तिर्निगमनं तेषां प्रमेयं च प्रयोजनम् । एतानि साधनान्याहुर्बहुवर्गप्रसिद्धये ॥
uktirnigamanaṃ teṣāṃ prameyaṃ ca prayojanam | etāni sādhanānyāhurbahuvargaprasiddhaye
उक्ति और निगमन, तथा उनमें प्रमेय और प्रयोजन। ये अनेक वर्गों की सिद्धि के साधन कहे गए हैं।
श्लोक 14 (12.24.14)
प्रत्यक्षमनुमानं च सर्वेषां योनिरुच्यते । प्रमाणज्ञो हि शक्नोति दण्डयोनौ विचक्षणः । अप्रमाणवता नीतो दण्डो हन्यान्महीपतिम् ॥
pratyakṣamanumānaṃ ca sarveṣāṃ yonirucyate | pramāṇajño hi śaknoti daṇḍayonau vicakṣaṇaḥ | apramāṇavatā nīto daṇḍo hanyānmahīpatim
प्रत्यक्ष और अनुमान ही इन सबके मूल कहे जाते हैं। प्रमाण जानने वाला विचक्षण पुरुष ही दण्ड के विषय में समर्थ होता है; प्रमाणहीन पुरुष द्वारा दिया गया दण्ड राजा का ही नाश कर देता है।
श्लोक 15 (12.24.15)
देशकालप्रतीक्षी यो दस्यून्मर्षयते नृपः । शास्त्रजां बुद्धिमास्थाय युज्यते नैनसा हि सः ॥
deśakālapratīkṣī yo dasyūnmarṣayate nṛpaḥ | śāstrajāṃ buddhimāsthāya yujyate nainasā hi saḥ
जो राजा शास्त्र से उत्पन्न बुद्धि का आश्रय लेकर देश और काल की प्रतीक्षा करता हुआ डाकुओं को (तुरन्त न मारकर) सहता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 16 (12.24.16)
आदाय बलिषड्भागं यो राष्ट्रं नाभिरक्षति । प्रतिगृह्णाति तत्पापं चतुर्थांशेन भूमिपः ॥
ādāya baliṣaḍbhāgaṃ yo rāṣṭraṃ nābhirakṣati | pratigṛhṇāti tatpāpaṃ caturthāṃśena bhūmipaḥ
जो राजा छठा भाग कर लेकर भी राष्ट्र की रक्षा नहीं करता, वह उस पाप का चौथा भाग अपने ऊपर ले लेता है।
श्लोक 17 (12.24.17)
निबोध च यथाऽऽतिष्ठन्धर्मान्न च्यवते नृपः । निग्रहाद्धर्मशास्त्राणामनुरुद्ध्यन्नपेतभीः । कामक्रोधावनादृत्य पितेव समदर्शनः ॥
nibodha ca yathā''tiṣṭhandharmānna cyavate nṛpaḥ | nigrahāddharmaśāstrāṇāmanuruddhyannapetabhīḥ | kāmakrodhāvanādṛtya piteva samadarśanaḥ
यह भी समझ लो कि राजा किस प्रकार आचरण करने से धर्म से च्युत नहीं होता: धर्मशास्त्रों के अनुसार अपराधियों का निग्रह करके, उन्हीं का अनुसरण करते हुए निर्भय होकर, काम और क्रोध की उपेक्षा करके, और पिता की भाँति सबको समान दृष्टि से देखकर।
श्लोक 18 (12.24.18)
दैवेनाभ्याहतो राजा कर्मकाले महाद्युते । न साधयति यत्कर्म न तत्राहुरतिक्रमम् ॥
daivenābhyāhato rājā karmakāle mahādyute | na sādhayati yatkarma na tatrāhuratikramam
हे महाद्युते! कर्म के समय यदि राजा दैव से आहत हो जाए और अपना कार्य सिद्ध न कर पाए, तो उसमें वे अपराध नहीं कहते।
श्लोक 19 (12.24.19)
तरसा बुद्धिपूर्वं वा निग्राह्या एव शत्रवः । पापैः सह न संदध्याद्राज्यं पुण्यं च कारयेत् ॥
tarasā buddhipūrvaṃ vā nigrāhyā eva śatravaḥ | pāpaiḥ saha na saṃdadhyādrājyaṃ puṇyaṃ ca kārayet
शत्रुओं का दमन बल से हो या बुद्धिपूर्वक, करना ही चाहिए। राजा पापियों से सन्धि न करे, और राज्य का शासन तथा पुण्य कर्म कराता रहे।
श्लोक 20 (12.24.20)
शूराश्चार्याश्च सत्कार्या विद्वांसश्च युधिष्ठिर । गोमिनो धनिनश्चैव परिपाल्या विशेषतः ॥
śūrāścāryāśca satkāryā vidvāṃsaśca yudhiṣṭhira | gomino dhaninaścaiva paripālyā viśeṣataḥ
हे युधिष्ठिर! शूरवीरों, श्रेष्ठजनों और विद्वानों का सत्कार करना चाहिए; गौओं के स्वामियों और धनवानों की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 21 (12.24.21)
व्यवहारेषु धर्मेषु योक्तव्याश्च बहुश्रुताः । प्रमाणज्ञा महीपाल न्यायशास्त्रावलम्बिनः ॥
vyavahāreṣu dharmeṣu yoktavyāśca bahuśrutāḥ | pramāṇajñā mahīpāla nyāyaśāstrāvalambinaḥ
व्यवहार और धर्म के कार्यों में बहुश्रुत पुरुषों को नियुक्त करना चाहिए: जो प्रमाणों को जानने वाले हों, हे महीपाल, और न्यायशास्त्र का आश्रय लेने वाले हों,
श्लोक 22 (12.24.22)
वेदार्थतत्त्वविद्राजंस्तर्कशास्त्रबहुश्रुताः । मन्त्रे च व्यवहारे च नियोक्तव्या विजानता ॥
vedārthatattvavidrājaṃstarkaśāstrabahuśrutāḥ | mantre ca vyavahāre ca niyoktavyā vijānatā
और हे राजन्! जो वेदों के अर्थ और तत्त्व को जानने वाले तथा तर्कशास्त्र में बहुश्रुत हों, उन्हें समझदार राजा मन्त्रणा और न्याय-व्यवहार के कार्य में नियुक्त करे।
श्लोक 23 (12.24.23)
तर्कशास्त्रकृता बुद्धिर्धर्मशास्त्रकृता च या । दण्डनीतिकृता चैव त्रैलोक्यमपि साधयेत् ॥
tarkaśāstrakṛtā buddhirdharmaśāstrakṛtā ca yā | daṇḍanītikṛtā caiva trailokyamapi sādhayet
तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र और दण्डनीति से बनी हुई बुद्धि तीनों लोकों को भी जीत सकती है।
श्लोक 24 (12.24.24)
नियोज्या वेदतत्त्वज्ञा यज्ञकर्मसु पार्थिव । वेदज्ञा ये च शास्त्रज्ञास्ते च राजन्सुबुद्धयः ॥
niyojyā vedatattvajñā yajñakarmasu pārthiva | vedajñā ye ca śāstrajñāste ca rājansubuddhayaḥ
हे पृथ्वीपति! वेदतत्त्व के ज्ञाताओं को यज्ञकर्मों में नियुक्त करना चाहिए; और हे राजन्! जो वेदज्ञ और शास्त्रज्ञ हैं, वे उत्तम बुद्धि वाले होते हैं।
श्लोक 25 (12.24.25)
आन्वीक्षकीत्रयीवार्तादण्डनीतिषु पारगाः । ते तु सर्वत्र योक्तव्यास्ते च बुद्धेः परं गताः ॥
ānvīkṣakītrayīvārtādaṇḍanītiṣu pāragāḥ | te tu sarvatra yoktavyāste ca buddheḥ paraṃ gatāḥ
जो आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति में पारंगत हैं, उन्हें सब कहीं नियुक्त करना चाहिए, और वे बुद्धि की चरम सीमा को पहुँचे हुए हैं।
श्लोक 26 (12.24.26)
गुणयुक्तेऽपि नैकस्मिन्विश्वसेत विचक्षणः ॥
guṇayukte'pi naikasminviśvaseta vicakṣaṇaḥ
विचक्षण पुरुष को गुणवान् होने पर भी किसी एक पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए।
श्लोक 27 (12.24.27)
अरक्षिता दुर्विनीतो मानी स्तब्धोऽभ्यसूयकः । एनसा युज्यते राजा दुर्दान्त इति चोच्यते ॥
arakṣitā durvinīto mānī stabdho'bhyasūyakaḥ | enasā yujyate rājā durdānta iti cocyate
जो राजा रक्षा नहीं करता, अविनीत, अभिमानी, हठी और दोष खोजने वाला है, वह पाप से लिप्त होता है और दुर्दान्त कहलाता है।
श्लोक 28 (12.24.28)
येऽरक्ष्यमाणा हीयन्ते दैवेनाभ्याहता नृप । तस्करैश्चापि हीयन्ते सर्वं तद्राजकिल्विषम् ॥
ye'rakṣyamāṇā hīyante daivenābhyāhatā nṛpa | taskaraiścāpi hīyante sarvaṃ tadrājakilviṣam
हे राजन्! जो लोग रक्षा न पाने के कारण दैव से आहत होकर नष्ट होते हैं, और जो चोरों-डाकुओं के हाथ मारे जाते हैं, वह सब राजा का दोष है।
श्लोक 29 (12.24.29)
सुमन्त्रिते सुनीते च सर्वतश्चोपपादिते । पौरुषे कर्मणि कृते नास्त्यधर्मो युधिष्ठिर ॥
sumantrite sunīte ca sarvataścopapādite | pauruṣe karmaṇi kṛte nāstyadharmo yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! जब भली-भाँति मन्त्रणा हो चुकी हो, नीति का ठीक प्रयोग हुआ हो और सब ओर से साधन जुटाए गए हों, और पुरुषार्थ से कार्य किया जा चुका हो, तब अधर्म नहीं होता।
श्लोक 30 (12.24.30)
विच्छिद्यन्ते समारब्धाः सिद्ध्यन्ते चापि दैवतः । कृते पुरुषकारे तु नैनः स्पृशति पार्थिवम् ॥
vicchidyante samārabdhāḥ siddhyante cāpi daivataḥ | kṛte puruṣakāre tu nainaḥ spṛśati pārthivam
आरम्भ किए हुए काम कभी बीच में ही टूट जाते हैं और कभी दैव से सिद्ध भी हो जाते हैं; किन्तु पुरुषार्थ कर लेने पर राजा को पाप नहीं छूता।
श्लोक 31 (12.24.31)
अत्र ते राजशार्दूल वर्तयिष्ये कथामिमाम् । यद्वृत्तं पूर्वराजर्षेर्हयग्रीवस्य पाण्डव ॥
atra te rājaśārdūla vartayiṣye kathāmimām | yadvṛttaṃ pūrvarājarṣerhayagrīvasya pāṇḍava
हे राजशार्दूल! इस विषय में मैं तुम्हें यह कथा सुनाऊँगा, जो प्राचीन राजर्षि हयग्रीव के साथ घटित हुई थी, हे पाण्डव।
श्लोक 32 (12.24.32)
शत्रून्हत्वा हतस्याजौ शूरस्याक्लिष्टकर्मणः । असहायस्य संग्रामे निर्जितस्य युधिष्ठिर ॥
śatrūnhatvā hatasyājau śūrasyākliṣṭakarmaṇaḥ | asahāyasya saṃgrāme nirjitasya yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! अक्लिष्टकर्मा उस शूरवीर के विषय में, जो शत्रुओं को मारकर स्वयं युद्ध में मारा गया, जो संग्राम में असहाय और पराजित हो गया था:
श्लोक 33 (12.24.33)
यत्कर्म वै निग्रहे शात्रवाणां । योगश्चाग्र्यः पालने मानवानाम् । कृत्वा कर्म प्राप्य कीर्ति स युद्धा । द्वाजिग्रीवो मोदते स्वर्गलोके ॥
yatkarma vai nigrahe śātravāṇāṃ | yogaścāgryaḥ pālane mānavānām | kṛtvā karma prāpya kīrti sa yuddhā | dvājigrīvo modate svargaloke
शत्रुओं को वश में करने के लिए जो करना था, उसे करके और मनुष्यों की रक्षा में सर्वोत्तम उद्योग करके, युद्ध से कीर्ति पाकर वाजिग्रीव स्वर्गलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 34 (12.24.34)
संत्यक्तात्मा समरेष्वाततायी । शस्त्रैश्छिन्नो दस्युभिर्वध्यमानः । अश्वग्रीवः कर्मशीलो महात्मा । संसिद्धार्थो मोदते स्वर्गलोके ॥
saṃtyaktātmā samareṣvātatāyī | śastraiśchinno dasyubhirvadhyamānaḥ | aśvagrīvaḥ karmaśīlo mahātmā | saṃsiddhārtho modate svargaloke
युद्धों में अपने प्राणों का मोह छोड़कर प्रहार करने वाला, शस्त्रों से कटा हुआ और डाकुओं के हाथ मारा जाता हुआ, कर्तव्यपरायण महात्मा अश्वग्रीव सिद्धकाम होकर स्वर्गलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 35 (12.24.35)
धनुर्यूपो रशना ज्या शरः स्रु । क्स्रुवः खड्गो रुधिरं यत्र चाज्यम् । रथो वेदी कामजो युद्धमग्नि । श्चातुर्होत्रं चतुरो वाजिमुख्याः ॥
dhanuryūpo raśanā jyā śaraḥ sru | ksruvaḥ khaḍgo rudhiraṃ yatra cājyam | ratho vedī kāmajo yuddhamagni | ścāturhotraṃ caturo vājimukhyāḥ
धनुष यज्ञ-स्तम्भ था, प्रत्यंचा रस्सी, बाण स्रुक्, खड्ग स्रुवा और रक्त घी था; रथ वेदी था, कामना से उत्पन्न युद्ध अग्नि था, और चार प्रधान घोड़े चार होता (ऋत्विज) थे।
श्लोक 36 (12.24.36)
हुत्वा तस्मिन्यज्ञवह्नावथारी । न्पापान्मुक्तो राजसिंहस्तरस्वी । प्राणान्हुत्वा चावभृथे रणे स । वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥
hutvā tasminyajñavahnāvathārī | npāpānmukto rājasiṃhastarasvī | prāṇānhutvā cāvabhṛthe raṇe sa | vājigrīvo modate devaloke
उस यज्ञाग्नि में शत्रुओं की आहुति देकर, पाप से मुक्त हुआ वह तेजस्वी राजसिंह रणभूमि में अवभृथ-स्नान के समय अपने प्राणों की आहुति देकर वाजिग्रीव देवलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 37 (12.24.37)
राष्ट्रं रक्षन्बुद्धिपूर्वं नयेन । संत्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा । सर्वांल्लोकान्व्याप्य कीर्त्या मनस्वी । वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥
rāṣṭraṃ rakṣanbuddhipūrvaṃ nayena | saṃtyaktātmā yajñaśīlo mahātmā | sarvāṃllokānvyāpya kīrtyā manasvī | vājigrīvo modate devaloke
बुद्धिपूर्वक नीति से राष्ट्र की रक्षा करते हुए, अपने को न्योछावर करके, यज्ञपरायण महात्मा, कीर्ति से सब लोकों को भरकर बुद्धिमान् वाजिग्रीव देवलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 38 (12.24.38)
दैवीं सिद्धिं मानुषीं दण्डनीतिं । योगन्यासैः पालयित्वा महीं च । तस्माद्राजा धर्मशीलो महात्मा । वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥
daivīṃ siddhiṃ mānuṣīṃ daṇḍanītiṃ | yoganyāsaiḥ pālayitvā mahīṃ ca | tasmādrājā dharmaśīlo mahātmā | vājigrīvo modate devaloke
योग (उद्योग) और न्यास (अभिमान-त्याग) के द्वारा दैवी सिद्धि, मानवी दण्डनीति और पृथ्वी की रक्षा करके, इसी कारण वह धर्मशील महात्मा राजा वाजिग्रीव देवलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 39 (12.24.39)
विद्वांस्त्यागी श्रद्दधानः कृतज्ञ । स्त्यक्त्वा लोकं मानुषं कर्म कृत्वा । मेधाविनां विदुषां संमतानां । तनुत्यजां लोकमाक्रम्य राजा ॥
vidvāṃstyāgī śraddadhānaḥ kṛtajña | styaktvā lokaṃ mānuṣaṃ karma kṛtvā | medhāvināṃ viduṣāṃ saṃmatānāṃ | tanutyajāṃ lokamākramya rājā
विद्वान्, त्यागी, श्रद्धावान् और कृतज्ञ वह राजा, मनुष्यलोक में अपना कर्म करके उसे छोड़कर, बुद्धिमान्, विद्वान् और सम्मानित देहत्यागी पुरुषों के लोक में पहुँचकर,
श्लोक 40 (12.24.40)
सम्यग्वेदान्प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य । सम्यग्राज्यं पालयित्वा महात्मा । चातुर्वर्ण्यं स्थापयित्वा स्वधर्मे । वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥
samyagvedānprāpya śāstrāṇyadhītya | samyagrājyaṃ pālayitvā mahātmā | cāturvarṇyaṃ sthāpayitvā svadharme | vājigrīvo modate devaloke
वेदों को भली-भाँति प्राप्त करके, शास्त्रों का अध्ययन करके, राज्य का ठीक-ठीक पालन करके, चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म में स्थापित करके महात्मा वाजिग्रीव देवलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 41 (12.24.41)
जित्वा संग्रामान्पालयित्वा प्रजाश्च । सोमं पीत्वा तर्पयित्वा द्विजाग्र्यान् । युक्त्या दण्डं धारयित्वा प्रजानां । युद्धे क्षीणे मोदते देवलोके ॥
jitvā saṃgrāmānpālayitvā prajāśca | somaṃ pītvā tarpayitvā dvijāgryān | yuktyā daṇḍaṃ dhārayitvā prajānāṃ | yuddhe kṣīṇe modate devaloke
संग्रामों को जीतकर, प्रजा का पालन करके, सोमरस पीकर, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करके और प्रजा में युक्तिपूर्वक दण्ड का प्रयोग करके, युद्ध में क्षीण हुआ वह देवलोक में आनन्द कर रहा है।
श्लोक 42 (12.24.42)
वृत्तं यस्य श्लाघनीयं मनुष्याः । सन्तो विद्वांसोऽर्हयन्त्यर्हणीयम् । स्वर्गं जित्वा वीरलोकानवाप्य । सिद्धिं प्राप्तः पुण्यकीर्तिर्महात्मा ॥
vṛttaṃ yasya ślāghanīyaṃ manuṣyāḥ | santo vidvāṃso'rhayantyarhaṇīyam | svargaṃ jitvā vīralokānavāpya | siddhiṃ prāptaḥ puṇyakīrtirmahātmā
जिसका आचरण मनुष्यों के लिए प्रशंसनीय है और जिसे सज्जन तथा विद्वान् आदर के योग्य मानकर सम्मान देते हैं, वह पुण्यकीर्ति महात्मा स्वर्ग जीतकर और वीरों के लोकों को पाकर सिद्धि को प्राप्त हुआ है।