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शान्ति पर्व · अध्याय 25

काल ही सबका नियन्ता: सेनजित् की शोकगाथा

युधिष्ठिर व्यास से कहते हैं कि अब राज्य उन्हें प्रसन्न नहीं करता और विधवा तथा पुत्रहीन स्त्रियों का विलाप उन्हें शान्ति नहीं लेने देता। व्यास उत्तर देते हैं कि मनुष्य को सब कुछ अपने समय पर ही मिलता है, और राजा सेनजित् की गाथा सुनाते हैं: सुख-दुःख बारी-बारी से आते हैं, खोई वस्तु का शोक मोह है, और जो भी प्राप्त हो उसे अपराजित हृदय से स्वीकार करना चाहिए। अन्त में वे राजाओं के धर्म और उस राजा को मिलने वाले लोक की बात कहते हैं जिसके आचरण को लोग स्वर्ग जाने पर भी नमन करते हैं।

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.25.1)

द्वैपायनवचः श्रुत्वा कुपिते च धनञ्जये । व्यासमामन्त्र्य कौन्तेयः प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥

dvaipāyanavacaḥ śrutvā kupite ca dhanañjaye | vyāsamāmantrya kaunteyaḥ pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ

द्वैपायन के वचन सुनकर, जब धनंजय क्रोधित हो रहे थे, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने व्यास को सम्बोधित करके उत्तर दिया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (12.25.2)

न पार्थिवमिदं राज्यं न भोगाश्च पृथग्विधाः । प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य शोको मां दारयत्ययम् ॥

na pārthivamidaṃ rājyaṃ na bhogāśca pṛthagvidhāḥ | prīṇayanti mano me'dya śoko māṃ dārayatyayam

आज यह पृथ्वी का राज्य और भाँति-भाँति के भोग मेरे मन को प्रसन्न नहीं करते। यह शोक मुझे चीरे डालता है।

श्लोक 3 (12.25.3)

श्रुत्वा वीरविहीनानामपुत्राणां च योषिताम् । परिदेवयमानानां न शान्तिं मनसा लभे ॥

śrutvā vīravihīnānāmaputrāṇāṃ ca yoṣitām | paridevayamānānāṃ na śāntiṃ manasā labhe

वीरों से और पुत्रों से हीन स्त्रियों का विलाप सुनकर मेरे मन को शान्ति नहीं मिलती।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (12.25.4)

इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं व्यासो योगविदांवरः । युधिष्ठिरं महाप्राज्ञो धर्मज्ञो वेदपारगः ॥

ityuktaḥ pratyuvācedaṃ vyāso yogavidāṃvaraḥ | yudhiṣṭhiraṃ mahāprājño dharmajño vedapāragaḥ

ऐसा कहे जाने पर योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ, महाप्राज्ञ, धर्मज्ञ और वेदपारंगत व्यास ने युधिष्ठिर को यह उत्तर दिया।

व्यास उवाच

श्लोक 5 (12.25.5)

न कर्मणा लभ्यते चेज्यया वा । नाप्यस्ति दाता पुरुषस्य कश्चित् । पर्याययोगाद्विहितं विधात्रा । कालेन सर्वं लभते मनुष्यः ॥

na karmaṇā labhyate cejyayā vā | nāpyasti dātā puruṣasya kaścit | paryāyayogādvihitaṃ vidhātrā | kālena sarvaṃ labhate manuṣyaḥ

न कर्म से, न यज्ञ से वह मिलता है, और मनुष्य को देने वाला कोई है भी नहीं। विधाता के विधान किए हुए क्रम के अनुसार मनुष्य समय आने पर ही सब कुछ पाता है।

श्लोक 6 (12.25.6)

न बुद्धिशक्त्याऽऽध्ययनेन शक्यं । प्राप्तुं विशेषं मनुजैरकाले । मूर्खोऽपि चाप्नोति कदाचिदर्था । न्कालो हि सर्वं पुरुषस्य दाता ॥

na buddhiśaktyā''dhyayanena śakyaṃ | prāptuṃ viśeṣaṃ manujairakāle | mūrkho'pi cāpnoti kadācidarthā | nkālo hi sarvaṃ puruṣasya dātā

बुद्धि, बल या अध्ययन से मनुष्य असमय में कोई विशेष सिद्धि नहीं पा सकते; मूर्ख भी कभी धन पा जाता है। समय ही मनुष्य को सब कुछ देने वाला है।

श्लोक 7 (12.25.7)

न भूरकालेषु फलं ददाति । शिल्पानि मन्त्राश्च तथौषधानि । तान्येव कालेन समाहितानि । सिद्ध्यन्ति वर्धन्ति च भूतिकाले ॥

na bhūrakāleṣu phalaṃ dadāti | śilpāni mantrāśca tathauṣadhāni | tānyeva kālena samāhitāni | siddhyanti vardhanti ca bhūtikāle

असमय में पृथ्वी फल नहीं देती; शिल्प, मन्त्र और औषधियाँ भी नहीं देतीं। वे ही सब ठीक समय पर प्रयुक्त होकर समृद्धि के काल में सिद्ध होती और बढ़ती हैं।

श्लोक 8 (12.25.8)

कालेन शीघ्राः प्रवहन्ति वाताः । कालेन वृष्टिर्जलदानुपैति । कालेन पद्मोत्पलवज्जलं च । कालेन पुष्यन्ति वनेषु वृक्षाः ॥

kālena śīghrāḥ pravahanti vātāḥ | kālena vṛṣṭirjaladānupaiti | kālena padmotpalavajjalaṃ ca | kālena puṣyanti vaneṣu vṛkṣāḥ

समय आने पर तेज हवाएँ चलती हैं; समय आने पर बादलों से वर्षा होती है; समय आने पर जल कमल और कुमुदों से भर जाता है; समय आने पर वनों में वृक्ष फूलते हैं।

श्लोक 9 (12.25.9)

कालेन कृष्णाश्च सिताश्च रात्र्यः । कालेन चन्द्रः परिपूर्णबिम्बः । नाकालतः पुष्पफलं द्रुमाणां । नाकालवेगाः सरितो वहन्ति ॥

kālena kṛṣṇāśca sitāśca rātryaḥ | kālena candraḥ paripūrṇabimbaḥ | nākālataḥ puṣpaphalaṃ drumāṇāṃ | nākālavegāḥ sarito vahanti

समय आने पर कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष की रातें होती हैं; समय आने पर चन्द्रमा का बिम्ब पूर्ण होता है। असमय में वृक्षों में फूल-फल नहीं लगते; असमय में नदियाँ बाढ़ के वेग से नहीं बहतीं।

श्लोक 10 (12.25.10)

नाकालमत्ताः खगपन्नगाश्च । मृगद्विपाः शैलमृगाश्च लोके । नाकालतः स्त्रीषु भवन्ति गर्भा । नायन्त्यकाले शिशिरोष्णवर्षाः ॥

nākālamattāḥ khagapannagāśca | mṛgadvipāḥ śailamṛgāśca loke | nākālataḥ strīṣu bhavanti garbhā | nāyantyakāle śiśiroṣṇavarṣāḥ

संसार में पक्षी, सर्प, मृग, हाथी और पर्वतीय पशु असमय में मतवाले नहीं होते; स्त्रियों को असमय में गर्भ नहीं रहता; असमय में शीत, गर्मी और वर्षा नहीं आतीं।

श्लोक 11 (12.25.11)

नाकालतो म्रियते जायते वा । नाकालतो व्याहरते च बालः । नाकालतो यौवनमभ्युपैति । नाकालतो रोहति बीजमुप्तम् ॥

nākālato mriyate jāyate vā | nākālato vyāharate ca bālaḥ | nākālato yauvanamabhyupaiti | nākālato rohati bījamuptam

असमय में बालक न मरता है, न जन्म लेता है; असमय में वह बोलता नहीं; असमय में यौवन नहीं आता; और असमय में बोया हुआ बीज उगता नहीं।

श्लोक 12 (12.25.12)

नाकालतो भानुरुपैति योगं । नाकालतोऽस्तं गिरिमभ्युपैति । नाकालतो वर्धते हीयते च । चन्द्रः समुद्रोऽपि महोर्मिमाली ॥

nākālato bhānurupaiti yogaṃ | nākālato'staṃ girimabhyupaiti | nākālato vardhate hīyate ca | candraḥ samudro'pi mahormimālī

असमय में सूर्य अपने योग को प्राप्त नहीं होता; असमय में वह अस्ताचल को नहीं जाता; असमय में चन्द्रमा न बढ़ता है, न घटता है, और बड़ी लहरों की माला वाला समुद्र भी नहीं।

श्लोक 13 (12.25.13)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गीतं राज्ञा सेनजिता दुःखार्तेन युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | gītaṃ rājñā senajitā duḥkhārtena yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जिसे शोक से पीड़ित राजा सेनजित् ने गाया था।

सेनजिदुवाच

श्लोक 14 (12.25.14)

सर्वानेवैष पर्यायो मर्त्यान्स्पृशति दुःसहः । कालेन परिपक्वा हि म्रियन्ते सर्वपार्थिवाः ॥

sarvānevaiṣa paryāyo martyānspṛśati duḥsahaḥ | kālena paripakvā hi mriyante sarvapārthivāḥ

यह दुःसह क्रम सभी मरणशील प्राणियों को छूता है। समय से पके हुए सभी राजा मर जाते हैं।

श्लोक 15 (12.25.15)

घ्नन्ति चान्यान्नरान्राजंस्तानप्यन्ये तथा नराः । संज्ञैषा लौकिकी राजन्न हिनस्ति न हन्यते ॥

ghnanti cānyānnarānrājaṃstānapyanye tathā narāḥ | saṃjñaiṣā laukikī rājanna hinasti na hanyate

हे राजन्! मनुष्य दूसरे मनुष्यों को मारते हैं और उन्हें भी दूसरे मनुष्य मारते हैं। यह तो केवल लोक की कहने की रीति है; वास्तव में न कोई मारता है, न कोई मारा जाता है।

श्लोक 16 (12.25.16)

हन्तीति मन्यते कश्चिन्न हन्तीत्यपि चापरः । स्वभावतस्तु नियतौ भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥

hantīti manyate kaścinna hantītyapi cāparaḥ | svabhāvatastu niyatau bhūtānāṃ prabhavāpyayau

कोई मानता है कि ‘यह मारता है’, तो दूसरा मानता है कि ‘यह नहीं मारता’। पर प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश उनके स्वभाव से ही नियत हैं।

श्लोक 17 (12.25.17)

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । अहो दुःखमिति ध्यायन्दुःखस्यापचितिं चरेत् ॥

naṣṭe dhane vā dāre vā putre pitari vā mṛte | aho duḥkhamiti dhyāyanduḥkhasyāpacitiṃ caret

धन नष्ट हो जाने पर, या स्त्री, पुत्र अथवा पिता के मर जाने पर, ‘हाय, कितना दुःख!’ ऐसा सोचते हुए मनुष्य को दुःख का प्रतिकार करना चाहिए।

श्लोक 18 (12.25.18)

स किं शोचसि मूढः सञ्शोच्यान्किमनुशोचसि । पश्य दुःखेषु दुःखानि भयेषु च भयान्यपि ॥

sa kiṃ śocasi mūḍhaḥ sañśocyānkimanuśocasi | paśya duḥkheṣu duḥkhāni bhayeṣu ca bhayānyapi

तो तुम मोह में पड़कर क्यों शोक करते हो? जो शोक के योग्य हैं, उनके लिए बार-बार क्यों रोते हो? दुःखों के भीतर दुःख और भयों के भीतर भय देखो।

श्लोक 19 (12.25.19)

आत्माऽपि चायं न मम सर्वाऽपि पृथिवी मम । यथा मम तथाऽन्येषामिति पश्यन्न मुह्यति ॥

ātmā'pi cāyaṃ na mama sarvā'pi pṛthivī mama | yathā mama tathā'nyeṣāmiti paśyanna muhyati

यह आत्मा भी मेरा नहीं है और सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है। जैसे वह मेरी है, वैसे ही दूसरों की भी है। ऐसा देखने वाला मोह में नहीं पड़ता।

श्लोक 20 (12.25.20)

शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

śokasthānasahasrāṇi harṣasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam

शोक के हजारों और हर्ष के सैकड़ों अवसर प्रतिदिन मूर्ख पर आ पड़ते हैं, पण्डित पर नहीं।

श्लोक 21 (12.25.21)

एवमेतानि कालेन प्रियद्वेष्याणि भागशः । जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥

evametāni kālena priyadveṣyāṇi bhāgaśaḥ | jīveṣu parivartante duḥkhāni ca sukhāni ca

इस प्रकार समय के अनुसार प्रिय और अप्रिय, दुःख और सुख, भागों में बँटे हुए जीवों के बीच बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं।

श्लोक 22 (12.25.22)

दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात्तदुपलभ्यते । तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ॥

duḥkhamevāsti na sukhaṃ tasmāttadupalabhyate | tṛṣṇārtiprabhavaṃ duḥkhaṃ duḥkhārtiprabhavaṃ sukham

वास्तव में दुःख ही है, सुख नहीं; इसी कारण सुख का अनुभव होता है। दुःख तृष्णा की पीड़ा से उत्पन्न होता है, और सुख दुःख की पीड़ा के अन्त से उत्पन्न होता है।

श्लोक 23 (12.25.23)

सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥

sukhasyānantaraṃ duḥkhaṃ duḥkhasyānantaraṃ sukham | na nityaṃ labhate duḥkhaṃ na nityaṃ labhate sukham

सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख। न दुःख सदा मिलता है, न सुख सदा मिलता है।

श्लोक 24 (12.25.24)

सुखमेव हि दुःखान्तं कदाचिद्दुःखतः सुखम् । तस्मादेतद्द्वयं जह्याद्य इच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥

sukhameva hi duḥkhāntaṃ kadācidduḥkhataḥ sukham | tasmādetaddvayaṃ jahyādya icchecchāśvataṃ sukham

सुख दुःख का अन्त ही है, और कभी दुःख से भी सुख मिलता है। इसलिए जो शाश्वत सुख चाहे, वह इन दोनों को छोड़ दे।

श्लोक 25 (12.25.25)

सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । यन्निमित्तो भवेच्छोकस्तापो वा दुःखमूर्च्छितः । आयासो वाऽपि यन्मूलस्तदेकाङ्गमपि त्यजेत् ॥

sukhāntaprabhavaṃ duḥkhaṃ duḥkhāntaprabhavaṃ sukham | yannimitto bhavecchokastāpo vā duḥkhamūrcchitaḥ | āyāso vā'pi yanmūlastadekāṅgamapi tyajet

सुख के अन्त से दुःख उत्पन्न होता है और दुःख के अन्त से सुख। जो भी शोक का कारण हो, या दुःख से भरी पीड़ा का, या परिश्रम का मूल हो, उसे मनुष्य छोड़ दे, चाहे वह अपने शरीर का अंग ही क्यों न हो।

श्लोक 26 (12.25.26)

सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥

sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ priyaṃ vā yadi vā'priyam | prāptaṃ prāptamupāsīta hṛdayenāparājitaḥ

सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो भी प्राप्त हो, उसे अपराजित हृदय से स्वीकार करना चाहिए।

श्लोक 27 (12.25.27)

ईषदप्यङ्ग दाराणां पुत्राणामाचरन्प्रियम् । ततो ज्ञास्यसि कः कस्य केन वा कथमेव च ॥

īṣadapyaṅga dārāṇāṃ putrāṇāmācaranpriyam | tato jñāsyasi kaḥ kasya kena vā kathameva ca

प्रिय मित्र! यदि तुम स्त्रियों और पुत्रों का थोड़ा-सा भी प्रिय करो, तो तुम जान जाओगे कि कौन किसका है, किस कारण और कैसे।

श्लोक 28 (12.25.28)

ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः । त एव सुखमेधन्ते मध्यमः क्लिश्यते जनः ॥

ye ca mūḍhatamā loke ye ca buddheḥ paraṃ gatāḥ | ta eva sukhamedhante madhyamaḥ kliśyate janaḥ

संसार में जो अत्यन्त मूढ़ हैं और जो बुद्धि से परे पहुँच गए हैं, वे ही सुख में बढ़ते हैं; बीच का मनुष्य क्लेश पाता है।

व्यास उवाच

श्लोक 29 (12.25.29)

इत्यब्रवीन्महाप्राज्ञो युधिष्ठिर स सेनजित् । परावरज्ञो लोकस्य धर्मवित्सुखदुःखवित् ॥

ityabravīnmahāprājño yudhiṣṭhira sa senajit | parāvarajño lokasya dharmavitsukhaduḥkhavit

हे युधिष्ठिर! महाप्राज्ञ सेनजित् ने ऐसा कहा, जो लोक के ऊँच-नीच को जानने वाले, धर्म के ज्ञाता और सुख-दुःख के जानकार थे।

श्लोक 30 (12.25.30)

परदुःखेन दुःखी यो न स जातु सुखी भवेत् । दुःखानां हि क्षयो नास्ति जायते ह्यपरात्परम् ॥

paraduḥkhena duḥkhī yo na sa jātu sukhī bhavet | duḥkhānāṃ hi kṣayo nāsti jāyate hyaparātparam

जो दूसरे के दुःख से दुःखी होता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःखों का अन्त नहीं है, एक के बाद दूसरा उत्पन्न होता ही रहता है।

श्लोक 31 (12.25.31)

सुखं च दुःखं च भवाभवौ च । लाभालाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायतः सर्वमवाप्तुवन्ति । तस्मान्न मुह्येन्न च संप्रहृष्येत् ॥

sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca bhavābhavau ca | lābhālābhau maraṇaṃ jīvitaṃ ca | paryāyataḥ sarvamavāptuvanti | tasmānna muhyenna ca saṃprahṛṣyet

सुख और दुःख, उन्नति और अवनति, लाभ और हानि, मृत्यु और जीवन, इन सबको मनुष्य बारी-बारी से पाते हैं; इसलिए न मोह में पड़ना चाहिए, न अत्यन्त हर्षित होना चाहिए।

श्लोक 32 (12.25.32)

दीक्षां राज्ञां संयुगे धर्ममाहु । र्योगं राज्ये दण्डनीतिं च सम्यक् । वित्तत्यागं दक्षिणां चैव यज्ञे । सम्यग्दानं पावनानीति विद्यात् ॥

dīkṣāṃ rājñāṃ saṃyuge dharmamāhu | ryogaṃ rājye daṇḍanītiṃ ca samyak | vittatyāgaṃ dakṣiṇāṃ caiva yajñe | samyagdānaṃ pāvanānīti vidyāt

कहते हैं कि राजाओं के लिए युद्ध में दीक्षा लेना धर्म है; इसी प्रकार राज्य में योगपूर्वक उद्योग और ठीक दण्डनीति, यज्ञ में धन का त्याग और दक्षिणा, तथा उचित दान, इन्हें पवित्र करने वाले कर्म जाने।

श्लोक 33 (12.25.33)

रक्षन्राज्यं बुद्धिपूर्वं नयेन । संत्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा । सर्वाल्लोकान्धर्मदृष्ट्यावलोक । न्नूर्ध्वं देहान्मोदते देवलोके ॥

rakṣanrājyaṃ buddhipūrvaṃ nayena | saṃtyaktātmā yajñaśīlo mahātmā | sarvāllokāndharmadṛṣṭyāvaloka | nnūrdhvaṃ dehānmodate devaloke

बुद्धिपूर्वक नीति से राज्य की रक्षा करता हुआ, अपने को न्योछावर करके, यज्ञपरायण महात्मा, धर्मदृष्टि से सब लोकों को देखता हुआ, देह के पश्चात् देवलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 34 (12.25.34)

जित्वा संग्रामान्पालयित्वा च राष्ट्रं । सोमं पीत्वा वर्धयित्वा प्रजाश्च । युक्त्या दण्डं धारयित्वा प्रजानां । पश्चात्क्षीणायुर्मोदते देवलोके ॥

jitvā saṃgrāmānpālayitvā ca rāṣṭraṃ | somaṃ pītvā vardhayitvā prajāśca | yuktyā daṇḍaṃ dhārayitvā prajānāṃ | paścātkṣīṇāyurmodate devaloke

संग्रामों को जीतकर, राष्ट्र की रक्षा करके, सोमरस पीकर, प्रजा को बढ़ाकर और प्रजा में युक्तिपूर्वक दण्ड का प्रयोग करके, वह बाद में आयु क्षीण होने पर देवलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 35 (12.25.35)

सम्यग्वेदान्प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य । सम्यग्राष्ट्रं पालयित्वा च राजा । चातुर्वर्ण्यं स्थापयित्वा स्वधर्मे । पूतात्मा वै मोदते देवलोके ॥

samyagvedānprāpya śāstrāṇyadhītya | samyagrāṣṭraṃ pālayitvā ca rājā | cāturvarṇyaṃ sthāpayitvā svadharme | pūtātmā vai modate devaloke

वेदों को भली-भाँति प्राप्त करके और शास्त्रों का अध्ययन करके, राजा के रूप में राष्ट्र का ठीक पालन करके, चारों वर्णों को अपने धर्म में स्थापित करके, पवित्र आत्मा वाला पुरुष देवलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 36 (12.25.36)

यस्य वृत्तं नमस्यन्ति स्वर्गस्थस्यापि मानवाः । पौरजानपदामात्याः स राजा राजसत्तमः ॥

yasya vṛttaṃ namasyanti svargasthasyāpi mānavāḥ | paurajānapadāmātyāḥ sa rājā rājasattamaḥ

जिस राजा के आचरण को स्वर्ग चले जाने पर भी मनुष्य (नगरवासी, देशवासी और मन्त्री) प्रणाम करते हैं, वही राजाओं में श्रेष्ठ राजा है।

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