शान्ति पर्व · अध्याय 26
युधिष्ठिर का आमरण अनशन का संकल्प
पश्चाताप से भरे युधिष्ठिर व्यास और उपस्थित मुनियों से कहते हैं कि शोक उन्हें नहीं छोड़ता। वे शिखण्डी को सामने रखकर गिराए गए भीष्म, हाथी के बहाने छले गए द्रोण, मरवाए गए कर्ण और द्रोण-रक्षित सेना में भेजे गए अभिमन्यु को याद करते हैं, और घोषणा करते हैं कि वे बैठकर आमरण अनशन करेंगे। व्यास उन्हें रोकते हैं और समझाते हैं कि मिलना-बिछुड़ना और सुख-दुःख विधाता के विधान हैं, तथा मनुष्य को विधाता द्वारा दिए गए स्वभाव के अनुसार कर्म करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.26.1)
अभिमन्यौ हते बाले द्रौपद्यास्तनयेषु च । धृष्टद्युम्ने विराटे च द्रुपदे च महीपतौ ॥
abhimanyau hate bāle draupadyāstanayeṣu ca | dhṛṣṭadyumne virāṭe ca drupade ca mahīpatau
बालक अभिमन्यु के मारे जाने पर, द्रौपदी के पुत्रों के, तथा धृष्टद्युम्न, विराट और राजा द्रुपद के मारे जाने पर,
श्लोक 2 (12.26.2)
वृषसेने च धर्मज्ञे धृष्टकेतौ तु पार्थिवे । तथाऽन्येषु नरेन्द्रेषु नानादेश्येषु संयुगे ॥
vṛṣasene ca dharmajñe dhṛṣṭaketau tu pārthive | tathā'nyeṣu narendreṣu nānādeśyeṣu saṃyuge
धर्म को जाननेवाले वृषसेन और राजा धृष्टकेतु के, तथा नाना देशों के अन्य अनेक राजाओं के युद्ध में गिर जाने पर,
श्लोक 3 (12.26.3)
न च मुञ्चति मां शोको ज्ञातिघातिनमातुरम् । राज्यकामुकमत्युग्रं स्ववंशोच्छेदकारिणम् ॥
na ca muñcati māṃ śoko jñātighātinamāturam | rājyakāmukamatyugraṃ svavaṃśocchedakāriṇam
फिर भी शोक मुझे नहीं छोड़ता। मैं अपने ही बन्धुओं का घात करनेवाला, राज्य का लोभी, अत्यन्त क्रूर और अपने ही वंश का नाश करनेवाला हूँ, इसी से व्यथित हूँ।
श्लोक 4 (12.26.4)
यस्याङ्के क्रीडमानेन मया विपरिवर्तितम् । स मया राज्यलुब्धेन गाङ्गेयो युधि पातितः ॥
yasyāṅke krīḍamānena mayā viparivartitam | sa mayā rājyalubdhena gāṅgeyo yudhi pātitaḥ
जिसकी गोद में खेलते हुए मैं लोटा करता था, उन गंगापुत्र को मैंने, राज्य के लोभ में पड़कर, युद्ध में गिरा दिया।
श्लोक 5 (12.26.5)
यदा ह्येनं विघूर्णन्तं मदर्थं पार्थसायकैः । तक्ष्यमाणं यथा वज्रैः प्रेक्षमाणं शिखण्डिनम् ॥
yadā hyenaṃ vighūrṇantaṃ madarthaṃ pārthasāyakaiḥ | takṣyamāṇaṃ yathā vajraiḥ prekṣamāṇaṃ śikhaṇḍinam
जब मैंने उन्हें मेरे कारण लड़खड़ाते देखा, अर्जुन के बाणों से वज्रों की भाँति छिदते और शिखण्डी की ओर देखते हुए,
श्लोक 6 (12.26.6)
जीर्णसिंहमिव प्राज्ञं नरसिंहं पितामहम् । कीर्यमाणं शरैर्दीप्तैर्दृष्ट्वा मे व्यथितं मनः ॥
jīrṇasiṃhamiva prājñaṃ narasiṃhaṃ pitāmaham | kīryamāṇaṃ śarairdīptairdṛṣṭvā me vyathitaṃ manaḥ
बूढ़े सिंह के समान उन प्रज्ञावान् नरसिंह पितामह को जलते हुए बाणों से बिंधता देखकर मेरा मन व्यथित हो उठा।
श्लोक 7 (12.26.7)
प्राङ्मुखं सीदमानं च रथात्पररथारुजम् । घूर्णमानं यथा शैलं तदा मे कश्मलोऽभवत् ॥
prāṅmukhaṃ sīdamānaṃ ca rathātpararathārujam | ghūrṇamānaṃ yathā śailaṃ tadā me kaśmalo'bhavat
शत्रुओं के रथों को चूर करनेवाले वे रथ से पूर्व की ओर मुख किए नीचे धँस रहे थे और पर्वत की भाँति डगमगा रहे थे; तब मुझ पर मूर्छा-सी छा गई।
श्लोक 8 (12.26.8)
यः सबाणधनुष्पाणिर्योधयामास भार्गवम् । बहून्यहानि कौरव्यः कुरुक्षेत्रे महामृधे ॥
yaḥ sabāṇadhanuṣpāṇiryodhayāmāsa bhārgavam | bahūnyahāni kauravyaḥ kurukṣetre mahāmṛdhe
जिन कुरुवंशी ने धनुष-बाण हाथ में लेकर कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में अनेक दिनों तक भार्गव परशुराम से युद्ध किया,
श्लोक 9 (12.26.9)
समेतं पार्थिवं क्षत्रं वाराणस्यां नदीसुतः । कन्यार्थमाह्वयद्वीरो रथेनैकेन संयुगे ॥
sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ vārāṇasyāṃ nadīsutaḥ | kanyārthamāhvayadvīro rathenaikena saṃyuge
जिन नदी-पुत्र वीर ने काशी में एकत्र हुए क्षत्रिय राजाओं को एक ही रथ से कन्या के निमित्त युद्ध के लिए ललकारा,
श्लोक 10 (12.26.10)
येन चोग्रायुधो राजा चक्रवर्ती दुरासदः । दग्धश्चास्त्रप्रतापेन स मया युधि पातितः ॥
yena cogrāyudho rājā cakravartī durāsadaḥ | dagdhaścāstrapratāpena sa mayā yudhi pātitaḥ
और जिन्होंने अपने अस्त्रों के तेज से दुर्जय चक्रवर्ती राजा उग्रायुध को भस्म कर दिया, उन्हीं को मैंने युद्ध में गिरा दिया।
श्लोक 11 (12.26.11)
स्वयं मृत्युं रक्षमाणः पाञ्चाल्यं यः शिखण्डिनम् । न बाणैः पातयामास सोऽर्जुनेन निपातितः ॥
svayaṃ mṛtyuṃ rakṣamāṇaḥ pāñcālyaṃ yaḥ śikhaṇḍinam | na bāṇaiḥ pātayāmāsa so'rjunena nipātitaḥ
जो स्वयं अपनी मृत्यु को बचाते हुए पांचाल शिखण्डी को बाणों से नहीं गिराते थे, वही अर्जुन के हाथों गिरा दिए गए।
श्लोक 12 (12.26.12)
यदैनं पतितं भूमावपश्यं रुधिरोक्षितम् । तदैवाविशदन्युग्रो ज्वरो मां मुनिसत्तम ॥
yadainaṃ patitaṃ bhūmāvapaśyaṃ rudhirokṣitam | tadaivāviśadanyugro jvaro māṃ munisattama
हे मुनिश्रेष्ठ, जब मैंने उन्हें रक्त से लथपथ भूमि पर पड़ा देखा, तभी मुझे भयंकर ज्वर-सा आ घेरा।
श्लोक 13 (12.26.13)
येन संवर्धिता बाला येन स्म परिरक्षिताः । स मया राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना । अल्पकालस्य राज्यस्य कृते मूढेन पातितः ॥
yena saṃvardhitā bālā yena sma parirakṣitāḥ | sa mayā rājyalubdhena pāpena gurughātinā | alpakālasya rājyasya kṛte mūḍhena pātitaḥ
जिन्होंने हम बालकों को पाला और बचाया, उन्हें मुझ राज्य-लोभी, पापी, गुरुजन के हत्यारे मूढ़ ने थोड़े दिनों के राज्य के लिए गिरवा दिया।
श्लोक 14 (12.26.14)
आचार्यश्च महेष्वासः सर्वपार्थिवपूजितः । अभिगम्य रणे मिथ्या पापेनोक्तः सुतं प्रति ॥
ācāryaśca maheṣvāsaḥ sarvapārthivapūjitaḥ | abhigamya raṇe mithyā pāpenoktaḥ sutaṃ prati
और सब राजाओं से पूजित महान् धनुर्धर आचार्य द्रोण के पास रणभूमि में जाकर मुझ पापी ने उनके पुत्र के विषय में झूठ कहा।
श्लोक 15 (12.26.15)
तन्मे दहति गात्राणि यन्मां गुरुरभाषत । सत्यमाख्याहि राजंस्त्वं यदि जीवति मे सुतः ॥
tanme dahati gātrāṇi yanmāṃ gururabhāṣata | satyamākhyāhi rājaṃstvaṃ yadi jīvati me sutaḥ
आचार्य ने जो मुझसे कहा था, वह मेरे अंगों को जलाता है: "हे राजन्, सच बताओ, मेरा पुत्र जीवित है या नहीं?"
श्लोक 16 (12.26.16)
सत्यमामर्शयन्विप्रो मयि तत्परिपृष्टवान् । कुञ्जरं चान्तरं कृत्वा मिथ्योपचरितो मया ॥
satyamāmarśayanvipro mayi tatparipṛṣṭavān | kuñjaraṃ cāntaraṃ kṛtvā mithyopacarito mayā
सत्य का निश्चय करने की इच्छा से उन ब्राह्मण ने मुझसे यही पूछा था, और मैंने 'हाथी' शब्द को बीच में रखकर उन्हें छल लिया।
श्लोक 17 (12.26.17)
सुभृशं राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना । सत्यकञ्चुकमुन्मुच्य मया स गुरुराहवे ॥
subhṛśaṃ rājyalubdhena pāpena gurughātinā | satyakañcukamunmucya mayā sa gururāhave
राज्य के लोभ में अत्यन्त डूबे हुए मुझ पापी, गुरुघाती ने सत्य का कवच उतार फेंका और युद्ध में उन गुरु से इस प्रकार कहा:
श्लोक 18 (12.26.18)
अश्वत्थामा हत इति निरुक्तः कुञ्जरे हते । काँल्लोकांस्तु गमिष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
aśvatthāmā hata iti niruktaḥ kuñjare hate | kām̐llokāṃstu gamiṣyāmi kṛtvā karma suduṣkaram
"अश्वत्थामा मारा गया" यह तब कहा गया जब हाथी मारा जा चुका था। ऐसा अत्यन्त दुष्कर कर्म करके मैं किन लोकों को जाऊँगा?
श्लोक 19 (12.26.19)
अघातयं च यत्कर्णं समरेष्वपलायिनम् । ज्येष्ठभ्रातरमत्युग्रः को मत्तः पापकृत्तमः ॥
aghātayaṃ ca yatkarṇaṃ samareṣvapalāyinam | jyeṣṭhabhrātaramatyugraḥ ko mattaḥ pāpakṛttamaḥ
और जो युद्धों में कभी पीठ नहीं दिखाता था, उस अपने उग्र पराक्रमी ज्येष्ठ भ्राता कर्ण को भी मैंने मरवा दिया। मुझसे बढ़कर पापी कौन होगा?
श्लोक 20 (12.26.20)
अभिमन्युं च यद्वालं जातं सिंहमिवाद्रिषु । प्रावेशयमहं लुब्धो वाहिनीं द्रोणपालिताम् ॥
abhimanyuṃ ca yadvālaṃ jātaṃ siṃhamivādriṣu | prāveśayamahaṃ lubdho vāhinīṃ droṇapālitām
और पर्वतों में जन्मे सिंह-शावक जैसे बालक अभिमन्यु को मैंने लोभवश द्रोण से रक्षित सेना में घुसा दिया।
श्लोक 21 (12.26.21)
तदाप्रभृति वीभत्सुं न शक्नोमि निरीक्षितुम् । कृष्णं च पुण्डरीकाक्षं किल्विषी भ्रूणहा यथा ॥
tadāprabhṛti vībhatsuṃ na śaknomi nirīkṣitum | kṛṣṇaṃ ca puṇḍarīkākṣaṃ kilviṣī bhrūṇahā yathā
तभी से मैं बीभत्सु अर्जुन को और कमलनयन कृष्ण को देख नहीं पाता, जैसे भ्रूण-हत्यारा कोई अपराधी हो।
श्लोक 22 (12.26.22)
द्रौपदीं चाप्यदुःखार्हां पञ्चपुत्रैर्विनाकृताम् । शोचामि पृथिवीं हीनां पञ्चभिः पर्वतैरिव ॥
draupadīṃ cāpyaduḥkhārhāṃ pañcaputrairvinākṛtām | śocāmi pṛthivīṃ hīnāṃ pañcabhiḥ parvatairiva
और जो दुःख के योग्य नहीं थी, उस द्रौपदी के लिए मैं शोक करता हूँ, जो पाँच पुत्रों से वंचित है, जैसे पृथ्वी पाँच पर्वतों से खाली हो गई हो।
श्लोक 23 (12.26.23)
सोऽहमागस्करः पापः पृथिवीनाशकारकः । आसीन एवमेवेदं शोषयिष्ये कलेवरम् ॥
so'hamāgaskaraḥ pāpaḥ pṛthivīnāśakārakaḥ | āsīna evamevedaṃ śoṣayiṣye kalevaram
वही मैं अपराधी, पापी और पृथ्वी का नाश करनेवाला यहीं बैठे-बैठे इस शरीर को सुखा डालूँगा।
श्लोक 24 (12.26.24)
प्रायोपविष्टं जानीध्वमथ मां गुरुघातिनम् । जातिष्वन्यास्वपि यथा न भवेयं कुलान्तकृत् ॥
prāyopaviṣṭaṃ jānīdhvamatha māṃ gurughātinam | jātiṣvanyāsvapi yathā na bhaveyaṃ kulāntakṛt
आप सब जान लें कि मुझ गुरुजनों के घाती ने आमरण अनशन के लिए आसन जमा लिया है, ताकि दूसरे जन्मों में भी मैं कुल का नाश करनेवाला न बनूँ।
श्लोक 25 (12.26.25)
न भोक्ष्ये न च पानीयमुपयोक्ष्ये कथंचन । शोषयिष्ये प्रियान्प्राणानिहस्थोऽहं तपोधनाः ॥
na bhokṣye na ca pānīyamupayokṣye kathaṃcana | śoṣayiṣye priyānprāṇānihastho'haṃ tapodhanāḥ
हे तपस्वियो, मैं न भोजन करूँगा और न किसी भी प्रकार जल ग्रहण करूँगा; यहीं बैठा रहकर अपने प्रिय प्राणों को सुखा दूँगा।
श्लोक 26 (12.26.26)
यथेष्टं गम्यतां काममनुजाने प्रसाद्य वः । सर्वे मामनुजानीत त्यक्ष्यामीदं कलेवरम् ॥
yatheṣṭaṃ gamyatāṃ kāmamanujāne prasādya vaḥ | sarve māmanujānīta tyakṣyāmīdaṃ kalevaram
आप सब जहाँ चाहें जाएँ; आपको प्रसन्न करके मैं आपसे आज्ञा माँगता हूँ। आप सब मुझे अनुमति दें, मैं यह शरीर त्याग दूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (12.26.27)
तमेवंवादिनं पार्थं बन्धुशोकेन विह्वलम् । मैवमित्यब्रवीद्व्यासो निगृह्य मुनिसत्तमः ॥
tamevaṃvādinaṃ pārthaṃ bandhuśokena vihvalam | maivamityabravīdvyāso nigṛhya munisattamaḥ
इस प्रकार बोलते हुए, बन्धुजनों के शोक से व्याकुल कुन्तीपुत्र को मुनिश्रेष्ठ व्यास ने रोकते हुए कहा, "ऐसा मत करो।"
व्यास उवाच
श्लोक 28 (12.26.28)
अतिवेलं महाराज न शोकं कर्तुमर्हसि । पुनरुक्तं तु वक्ष्यामि दिष्टमेतदिति प्रभो ॥
ativelaṃ mahārāja na śokaṃ kartumarhasi | punaruktaṃ tu vakṣyāmi diṣṭametaditi prabho
हे महाराज, तुम्हें सीमा से अधिक शोक नहीं करना चाहिए। हे प्रभु, जो पहले कह चुका हूँ वही फिर कहूँगा: यह सब दैव का विधान है।
श्लोक 29 (12.26.29)
संयोगा विप्रयोगाश्च जातानां प्राणिनां ध्रुवम् । बुद्धुदा इव तोयेषु भवन्ति न भवन्ति च ॥
saṃyogā viprayogāśca jātānāṃ prāṇināṃ dhruvam | buddhudā iva toyeṣu bhavanti na bhavanti ca
जन्म लेनेवाले सभी प्राणियों के लिए मिलना और बिछुड़ना निश्चित है; जल के बुलबुलों की तरह वे होते हैं और नहीं रहते।
श्लोक 30 (12.26.30)
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥
sarve kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ | saṃyogā viprayogāntā maraṇāntaṃ hi jīvitam
सब संचय क्षय में समाप्त होते हैं, सब ऊँचाइयाँ पतन में, सब संयोग वियोग में, और जीवन मरण में।
श्लोक 31 (12.26.31)
सुखं दुःखान्तमालस्यं दाक्ष्यं दुःखं सुखोदयम् । भूतिः श्रीर्ह्रीर्धृतिः कीर्तिर्दक्षे वसति नालसे ॥
sukhaṃ duḥkhāntamālasyaṃ dākṣyaṃ duḥkhaṃ sukhodayam | bhūtiḥ śrīrhrīrdhṛtiḥ kīrtirdakṣe vasati nālase
आलस्य ऐसा सुख है जिसका अन्त दुःख में होता है; कुशलता ऐसा दुःख है जिसका फल सुख है। ऐश्वर्य, लक्ष्मी, लज्जा, धैर्य और कीर्ति कुशल पुरुष में रहते हैं, आलसी में नहीं।
श्लोक 32 (12.26.32)
नालं सुखाय सुहृदो नाले दुःखाय शत्रवः । न च प्रज्ञालमर्थेभ्यो न सुखेभ्योऽप्यलं धनम् ॥
nālaṃ sukhāya suhṛdo nāle duḥkhāya śatravaḥ | na ca prajñālamarthebhyo na sukhebhyo'pyalaṃ dhanam
न मित्र सुख देने में समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देने में; न बुद्धि धन पाने के लिए पर्याप्त है, और न धन सुख पाने के लिए।
श्लोक 33 (12.26.33)
यथा सृष्टोऽसि कौन्तेय धात्रा कर्मसु तत्कुरु । अत एव हि सिद्धिस्ते नेशस्त्वं ह्यात्मनो नृप ॥
yathā sṛṣṭo'si kaunteya dhātrā karmasu tatkuru | ata eva hi siddhiste neśastvaṃ hyātmano nṛpa
हे कुन्तीपुत्र, विधाता ने तुम्हें जैसा बनाया है, उसी के अनुरूप कर्म करो; इसी से तुम्हें सिद्धि मिलेगी, क्योंकि हे राजन्, तुम अपने स्वामी नहीं हो।