शान्ति पर्व · अध्याय 27
अश्मगीता: अश्म और जनक का संवाद
युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए व्यास ब्राह्मण अश्म और विदेहराज जनक का प्राचीन आख्यान सुनाते हैं। अश्म बताते हैं कि सुख-दुःख काल और विधान से बारी-बारी आते हैं, जरा और मृत्यु से न धनी बचते हैं, न विद्वान, न वैद्य, न तपस्वी, और बन्धुजनों का मिलन राह चलते यात्रियों के मिलन जैसा है। इसलिए मन को स्थिर करके शास्त्रों का अनुसरण और कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। जनक शोकमुक्त होकर घर लौटे, और व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे भी वैसा ही करें और क्षात्रधर्म से जीती हुई पृथ्वी का भोग करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.27.1)
ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानिष्टांस्त्यजिष्यतः । ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य व्यासः शोकमपानुदत् ॥
jñātiśokābhitaptasya prāṇāniṣṭāṃstyajiṣyataḥ | jyeṣṭhasya pāṇḍuputrasya vyāsaḥ śokamapānudat
ज्ञातिजनों के शोक से तपे हुए पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर अपने प्रिय प्राणों को त्यागने को थे, तब व्यास ने उनका शोक दूर किया।
व्यास उवाच
श्लोक 2 (12.27.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अश्मगीतं नरव्याघ्र तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | aśmagītaṃ naravyāghra tannibodha yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जिसे अश्म का गीत कहते हैं। हे नरव्याघ्र युधिष्ठिर, उसे सुनो।
श्लोक 3 (12.27.3)
अश्मानं ब्राह्मणं प्राज्ञं वैदेहो जनको नृपः । संशयं परिपप्रच्छ दुःखशोकसमन्वितः ॥
aśmānaṃ brāhmaṇaṃ prājñaṃ vaideho janako nṛpaḥ | saṃśayaṃ paripapraccha duḥkhaśokasamanvitaḥ
विदेह के राजा जनक ने दुःख और शोक से भरकर प्रज्ञावान् ब्राह्मण अश्म से अपना संशय पूछा।
जनक उवाच
श्लोक 4 (12.27.4)
आगमे यदि वाऽपाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च । नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता ॥
āgame yadi vā'pāye jñātīnāṃ draviṇasya ca | nareṇa pratipattavyaṃ kalyāṇaṃ kathamicchatā
जब बन्धुजनों और धन का आना या जाना हो, तब कल्याण चाहनेवाले मनुष्य को कैसा व्यवहार करना चाहिए?
अश्मोवाच
श्लोक 5 (12.27.5)
उत्पन्नमिममात्मानं नरस्यानन्तरं ततः । तानितान्यनुवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥
utpannamimamātmānaṃ narasyānantaraṃ tataḥ | tānitānyanuvartante duḥkhāni ca sukhāni ca
मनुष्य जब इस शरीर के साथ उत्पन्न होता है, उसके बाद वे-वे दुःख और सुख एक-एक करके उसके पीछे लगे रहते हैं।
श्लोक 6 (12.27.6)
तेषामन्यतरापत्तौ यद्यदेवोपसेवते । तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिलः ॥
teṣāmanyatarāpattau yadyadevopasevate | tadasya cetanāmāśu haratyabhramivānilaḥ
उनमें से जो भी आ पड़े, उसमें वह जिस-जिसमें लग जाता है, वही उसकी चेतना को शीघ्र हर लेता है, जैसे वायु बादल को उड़ा ले जाती है।
श्लोक 7 (12.27.7)
अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः । इत्येभिर्हेतुभिस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रसिच्यते ॥
abhijāto'smi siddho'smi nāsmi kevalamānuṣaḥ | ityebhirhetubhistasya tribhiścittaṃ prasicyate
"मैं कुलीन हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं केवल साधारण मनुष्य नहीं हूँ": इन तीन कारणों से उसका चित्त अभिमान से भीग जाता है।
श्लोक 8 (12.27.8)
संप्रसक्तमना भोगान्विसृज्य पितृसंचितान् । परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥
saṃprasaktamanā bhogānvisṛjya pitṛsaṃcitān | parikṣīṇaḥ parasvānāmādānaṃ sādhu manyate
इस प्रकार भीगे हुए मन से वह पितरों के संचित भोगों को उड़ा देता है और क्षीण हो जाने पर दूसरों का धन छीनना ही ठीक समझने लगता है।
श्लोक 9 (12.27.9)
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसांप्रतम् । प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥
tamatikrāntamaryādamādadānamasāṃpratam | pratiṣedhanti rājāno lubdhā mṛgamiveṣubhiḥ
मर्यादा लाँघकर अनुचित रूप से छीनते हुए उस मनुष्य को लोभी राजा वैसे ही रोक देते हैं जैसे व्याध बाणों से मृग को रोकते हैं।
श्लोक 10 (12.27.10)
ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः । परेण ते वर्षशतान्न भविष्यन्ति पार्थिव ॥
ye ca viṃśativarṣā vā triṃśadvarṣāśca mānavāḥ | pareṇa te varṣaśatānna bhaviṣyanti pārthiva
हे राजन्, जो मनुष्य आज बीस या तीस वर्ष के हैं, वे सौ वर्ष के बाद नहीं रहेंगे।
श्लोक 11 (12.27.11)
तेषां परमदुःखानां बुद्ध्या भैषज्यमाचरेत् । सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्ततः ॥
teṣāṃ paramaduḥkhānāṃ buddhyā bhaiṣajyamācaret | sarvaprāṇabhṛtāṃ vṛttaṃ prekṣamāṇastatastataḥ
इन अत्यन्त दुःखों की चिकित्सा बुद्धि से करनी चाहिए, और सब प्राणियों के आचरण-परिणाम को यहाँ-वहाँ देखते रहना चाहिए।
श्लोक 12 (12.27.12)
मानसानां पुनर्योनिर्दुःखानां चित्तविभ्रमः । अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपपद्यते ॥
mānasānāṃ punaryonirduḥkhānāṃ cittavibhramaḥ | aniṣṭopanipāto vā tṛtīyaṃ nopapadyate
मानसिक दुःखों के उद्गम दो ही हैं: चित्त का भ्रम, अथवा अनिष्ट का आ पड़ना; तीसरा कोई नहीं मिलता।
श्लोक 13 (12.27.13)
एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते तथा संस्पर्शजान्यपि ॥
evametāni duḥkhāni tāni tānīha mānavam | vividhānyupavartante tathā saṃsparśajānyapi
इसी प्रकार ये अनेक प्रकार के दुःख मनुष्य पर यहाँ आ पड़ते हैं, और वैसे ही वे भी जो विषयों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 14 (12.27.14)
जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ॥
jarāmṛtyū hi bhūtānāṃ khāditārau vṛkāviva | balināṃ durbalānāṃ ca hrasvānāṃ mahatāmapi
जरा और मृत्यु दो भेड़ियों की तरह प्राणियों को खा जाती हैं, चाहे वे बलवान हों या दुर्बल, छोटे हों या बड़े।
श्लोक 15 (12.27.15)
न कश्चिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानवः । अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुंधराम् ॥
na kaścijjātvatikrāmejjarāmṛtyū hi mānavaḥ | api sāgaraparyantāṃ vijityemāṃ vasuṃdharām
समुद्र तक फैली इस सारी पृथ्वी को जीत लेने पर भी कोई मनुष्य जरा और मृत्यु को कभी लाँघ नहीं सकता।
श्लोक 16 (12.27.16)
सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् । प्राप्तव्यमवशैः सर्वं परिहारो न विद्यते ॥
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ bhūtānāṃ paryupasthitam | prāptavyamavaśaiḥ sarvaṃ parihāro na vidyate
सुख हो या दुःख, जो भी प्राणियों के सामने आ जाए, वह सब विवश होकर भोगना ही पड़ता है; उससे बचने का उपाय नहीं है।
श्लोक 17 (12.27.17)
पूर्वे वयसि मध्ये वाऽप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्तेऽर्था वै काङ्क्षिता ये ततोऽन्यथा ॥
pūrve vayasi madhye vā'pyuttare vā narādhipa | avarjanīyāste'rthā vai kāṅkṣitā ye tato'nyathā
हे राजन्, पूर्व अवस्था में, मध्य में या अन्तिम अवस्था में, वे घटनाएँ टाली नहीं जा सकतीं, चाहे मनुष्य ने उनसे भिन्न की कामना की हो।
श्लोक 18 (12.27.18)
अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्च सुप्रियैः । अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ॥
apriyaiḥ saha saṃyogo viprayogaśca supriyaiḥ | arthānarthau sukhaṃ duḥkhaṃ vidhānamanuvartate
अप्रिय से संयोग और प्रियों से वियोग, लाभ और हानि, सुख और दुःख: विधान इन सबके पीछे चलता है।
श्लोक 19 (12.27.19)
प्रादुर्भावश्च भूतानां देहत्यागस्तथैव च । प्राप्तिव्यायामयोगश्च सर्वमेतत्प्रतिष्ठितम् ॥
prādurbhāvaśca bhūtānāṃ dehatyāgastathaiva ca | prāptivyāyāmayogaśca sarvametatpratiṣṭhitam
प्राणियों का जन्म लेना और देह का त्याग, तथा प्राप्ति और परिश्रम का योग: यह सब निश्चित है।
श्लोक 20 (12.27.20)
गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः । तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते ॥
gandhavarṇarasasparśā nivartante svabhāvataḥ | tathaiva sukhaduḥkhāni vidhānamanuvartate
गन्ध, रूप, रस और स्पर्श अपने स्वभाव से लौट जाते हैं; वैसे ही सुख और दुःख भी, और विधान उनके पीछे चलता है।
श्लोक 21 (12.27.21)
आसनं शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् । नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत ॥
āsanaṃ śayanaṃ yānamutthānaṃ pānabhojanam | niyataṃ sarvabhūtānāṃ kālenaiva bhavatyuta
बैठना, सोना, चलना, उठना, पीना और खाना: प्राणियों का यह सब नियत है और काल से ही होता है।
श्लोक 22 (12.27.22)
वैद्याश्चाप्यातुराः सन्ति बलवन्तश्च दुर्बलाः । स्त्रीमन्तश्चापरे षण्ढा विचित्रः कालपर्ययः ॥
vaidyāścāpyāturāḥ santi balavantaśca durbalāḥ | strīmantaścāpare ṣaṇḍhā vicitraḥ kālaparyayaḥ
वैद्य भी रोगी हो जाते हैं, बलवान भी दुर्बल हो जाते हैं; कुछ के स्त्रियाँ हैं और कुछ नपुंसक हैं: काल का फेर विचित्र है।
श्लोक 23 (12.27.23)
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं रूपमेव च । सौभाग्यमुपभोगश्च भवितव्येन लभ्यते ॥
kule janma tathā vīryamārogyaṃ rūpameva ca | saubhāgyamupabhogaśca bhavitavyena labhyate
उत्तम कुल में जन्म, पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और भोग: ये सब जैसा होना है वैसा ही मिलते हैं।
श्लोक 24 (12.27.24)
सन्ति पुत्राः सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् । नास्ति पुत्रः समृद्धानां विचित्रं विधिचेष्टितम् ॥
santi putrāḥ subahavo daridrāṇāmanicchatām | nāsti putraḥ samṛddhānāṃ vicitraṃ vidhiceṣṭitam
जो दरिद्र पुत्र नहीं चाहते, उनके बहुत-से पुत्र होते हैं; जो समृद्ध हैं, उनके पुत्र नहीं होता। विधाता की चेष्टा विचित्र है।
श्लोक 25 (12.27.25)
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्रं बुभुक्षाश्चापदो विषम् । ज्वरश्च मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा ॥
vyādhiragnirjalaṃ śastraṃ bubhukṣāścāpado viṣam | jvaraśca maraṇaṃ jantoruccācca patanaṃ tathā
रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, विपत्तियाँ और विष, ज्वर और प्राणी की मृत्यु, तथा ऊँचाई से गिरना भी।
श्लोक 26 (12.27.26)
निर्याणे यस्य यद्दिष्टं तेन गच्छति सेतुना । दृश्यते नाप्यतिक्रामन्न निष्क्रान्तोऽथवा पुनः । दृश्यते चाप्यतिक्रामन्न निग्राह्योऽथवा पुनः ॥
niryāṇe yasya yaddiṣṭaṃ tena gacchati setunā | dṛśyate nāpyatikrāmanna niṣkrānto'thavā punaḥ | dṛśyate cāpyatikrāmanna nigrāhyo'thavā punaḥ
प्रस्थान के समय मनुष्य के लिए जो मार्ग नियत है, वह उसी सेतु से जाता है। न कोई उसे लाँघता दीखता है, न कोई जाकर फिर लौटता दीखता है; न कोई उसे अतिक्रम करता दीखता है, न फिर रोका जाता दीखता है।
श्लोक 27 (12.27.27)
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन्वसुमान्नरः । दरिद्रश्च परिक्लिष्टः शतवर्षो जरान्वितः ॥
dṛśyate hi yuvaiveha vinaśyanvasumānnaraḥ | daridraśca parikliṣṭaḥ śatavarṣo jarānvitaḥ
धनवान मनुष्य जवानी में ही नष्ट होता दीखता है, और निर्धन, दुःखी पुरुष सौ वर्ष तक जीता हुआ वृद्धावस्था से घिरा रहता है।
श्लोक 28 (12.27.28)
अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः । समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतङ्गवत् ॥
akiñcanāśca dṛśyante puruṣāścirajīvinaḥ | samṛddhe ca kule jātā vinaśyanti pataṅgavat
अकिञ्चन पुरुष दीर्घजीवी दीखते हैं, और समृद्ध कुल में जन्मे लोग पतंगों की भाँति नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 29 (12.27.29)
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । दरिद्राणां तु भूयिष्ठं काष्ठमश्मा हि जीर्यते ॥
prāyeṇa śrīmatāṃ loke bhoktuṃ śaktirna vidyate | daridrāṇāṃ tu bhūyiṣṭhaṃ kāṣṭhamaśmā hi jīryate
इस लोक में धनवानों में प्रायः खाने की शक्ति नहीं होती; निर्धन तो अधिकतर लकड़ी और पत्थर तक पचा लेते हैं।
श्लोक 30 (12.27.30)
अहमेतत्करोमीति मन्यते कालनोदितः । यद्यदिष्टमसंतोषाद्दुरात्मा पापमाचरेत् ॥
ahametatkaromīti manyate kālanoditaḥ | yadyadiṣṭamasaṃtoṣāddurātmā pāpamācaret
काल से प्रेरित मनुष्य मानता है, "यह मैं कर रहा हूँ"; और असन्तोष के कारण दुष्टात्मा जो-जो चाहता है, उसके लिए पाप कर बैठता है।
श्लोक 31 (12.27.31)
मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं प्रसङ्गा निन्दिता बुधैः । दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र संप्रयुक्ता बहुश्रुताः ॥
mṛgayākṣāḥ striyaḥ pānaṃ prasaṅgā ninditā budhaiḥ | dṛśyante puruṣāścātra saṃprayuktā bahuśrutāḥ
शिकार, जुआ, स्त्रियाँ और मद्य: ये आसक्तियाँ ज्ञानियों द्वारा निन्दित हैं, फिर भी इनमें लगे हुए बहुत-से, बहुश्रुत पुरुष भी दिखाई देते हैं।
श्लोक 32 (12.27.32)
इति कालेन सर्वार्थानीप्सितानीप्सितानिह । स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ॥
iti kālena sarvārthānīpsitānīpsitāniha | spṛśanti sarvabhūtāni nimittaṃ nopalabhyate
इस प्रकार काल के द्वारा सब इष्ट और अनिष्ट पदार्थ सब प्राणियों को छूते हैं; इसका कोई कारण नहीं मिलता।
श्लोक 33 (12.27.33)
वायुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहः क्षपे । ज्योतींषि सरितः शैलान्कः करोति बिभर्ति च ॥
vāyumākāśamagniṃ ca candrādityāvahaḥ kṣape | jyotīṃṣi saritaḥ śailānkaḥ karoti bibharti ca
वायु, आकाश और अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य, दिन और रात, ज्योतियाँ, नदियाँ और पर्वत: इन्हें कौन बनाता है और कौन धारण करता है?
श्लोक 34 (12.27.34)
शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते । एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ॥
śītamuṣṇaṃ tathā varṣaṃ kālena parivartate | evameva manuṣyāṇāṃ sukhaduḥkhe nararṣabha
सर्दी, गर्मी और वर्षा काल से बदलती रहती हैं; हे नरश्रेष्ठ, मनुष्यों के सुख-दुःख भी इसी प्रकार बदलते हैं।
श्लोक 35 (12.27.35)
नौषधानि न शस्त्राणि न होमा न पुनर्जपाः । त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥
nauṣadhāni na śastrāṇi na homā na punarjapāḥ | trāyante mṛtyunopetaṃ jarayā cāpi mānavam
मृत्यु या जरा से घिरे मनुष्य को न औषधियाँ बचाती हैं, न शस्त्र, न होम और न जप।
श्लोक 36 (12.27.36)
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥
yathā kāṣṭhaṃ ca kāṣṭhaṃ ca sameyātāṃ mahodadhau | sametya ca vyapeyātāṃ tadvadbhūtasamāgamaḥ
जैसे महासागर में दो लकड़ियाँ मिलती हैं और मिलकर फिर अलग हो जाती हैं, वैसे ही प्राणियों का मिलना होता है।
श्लोक 37 (12.27.37)
ये च निष्परुषैरुक्तगीतवाद्यैरुपस्थिताः । ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः ॥
ye ca niṣparuṣairuktagītavādyairupasthitāḥ | ye cānāthāḥ parānnādāḥ kālasteṣu samakriyaḥ
जो कोमल वचनों, गीतों और वाद्यों से सेवित हैं, और जो अनाथ होकर दूसरे के अन्न पर जीते हैं, काल उन सबके साथ एक-सा व्यवहार करता है।
श्लोक 38 (12.27.38)
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ॥
mātāpitṛsahasrāṇi putradāraśatāni ca | saṃsāreṣvanubhūtāni kasya te kasya vā vayam
संसार के चक्र में हज़ारों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र-पत्नियाँ भोगी जा चुकी हैं: वे किसके हैं और हम किसके?
श्लोक 39 (12.27.39)
नैवास्य कश्चिद्भविता नायं भवति कस्यचित् । पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुहृज्जनैः ॥
naivāsya kaścidbhavitā nāyaṃ bhavati kasyacit | pathi saṃgatamevedaṃ dārabandhusuhṛjjanaiḥ
न कोई इसका होगा, न यह किसी का है; पत्नी, बन्धु, मित्र और परिजनों से यह तो राह में हुआ मिलन मात्र है।
श्लोक 40 (12.27.40)
क्वासे क्व च गमिष्यामि कोऽन्वहं किमिहास्थितः । कस्मात्किमनुशोचेयमित्येवं स्थापयेन्मनः ॥
kvāse kva ca gamiṣyāmi ko'nvahaṃ kimihāsthitaḥ | kasmātkimanuśoceyamityevaṃ sthāpayenmanaḥ
"मैं कहाँ रहता हूँ और कहाँ जाऊँगा? मैं कौन हूँ और यहाँ क्यों हूँ? किसलिए और किसके लिए शोक करूँ?" इस प्रकार मन को स्थिर करना चाहिए।
श्लोक 41 (12.27.41)
अनित्ये प्रियसंवासे संसारे चक्रवद्गतौ । पथि संगतमेवैतद्भ्राता माता पिता सखा ॥
anitye priyasaṃvāse saṃsāre cakravadgatau | pathi saṃgatamevaitadbhrātā mātā pitā sakhā
इस अनित्य संसार में, जहाँ प्रियजनों का साथ क्षणिक है और गति चक्र की तरह घूमती है, भाई, माता, पिता और मित्र का मिलना राह का मिलन ही है।
श्लोक 42 (12.27.42)
न दृष्टपूर्वं प्रत्यक्षं परलोकं विदुर्बुधाः । आगमांस्त्वनतिक्रम्य श्रद्धातव्यं बुभूषता ॥
na dṛṣṭapūrvaṃ pratyakṣaṃ paralokaṃ vidurbudhāḥ | āgamāṃstvanatikramya śraddhātavyaṃ bubhūṣatā
ज्ञानी जानते हैं कि परलोक पहले कभी प्रत्यक्ष नहीं देखा गया; इसलिए उन्नति चाहनेवाले को शास्त्रों का उल्लंघन न करके श्रद्धा रखनी चाहिए।
श्लोक 43 (12.27.43)
कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्म्याणि च समाचरेत् । यजेच्च विद्वान्विधिवत्त्रिवर्गं चाप्युपाचरेत् ॥
kurvīta pitṛdaivatyaṃ dharmyāṇi ca samācaret | yajecca vidvānvidhivattrivargaṃ cāpyupācaret
वह पितरों और देवताओं के कर्म करे और धर्मसम्मत आचरण करे; विद्वान् विधिपूर्वक यज्ञ करे और त्रिवर्ग का भी अनुसरण करे।
श्लोक 44 (12.27.44)
सन्निमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे । जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ॥
sannimajjejjagadidaṃ gambhīre kālasāgare | jarāmṛtyumahāgrāhe na kaścidavabudhyate
जरा और मृत्यु रूपी बड़े ग्राहों वाले काल के गहरे सागर में यह जगत् डूब रहा है, फिर भी कोई जागता नहीं।
श्लोक 45 (12.27.45)
आयुर्वेदमधीयानाः केवलं सपरिग्रहाः । दृश्यन्ते बहवो वैद्या व्याधिभिः समभिप्लुताः ॥
āyurvedamadhīyānāḥ kevalaṃ saparigrahāḥ | dṛśyante bahavo vaidyā vyādhibhiḥ samabhiplutāḥ
आयुर्वेद पढ़े हुए और साधन-सामग्री से सम्पन्न बहुत-से वैद्य भी रोगों से ग्रस्त दिखाई देते हैं।
श्लोक 46 (12.27.46)
ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पीषि विविधानि च । न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥
te pibantaḥ kaṣāyāṃśca sarpīṣi vividhāni ca | na mṛtyumativartante velāmiva mahodadhiḥ
काढ़े और अनेक प्रकार के घी पीते हुए भी वे मृत्यु को नहीं लाँघ पाते, जैसे समुद्र अपने तट को नहीं लाँघता।
श्लोक 47 (12.27.47)
रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायनाः । दृश्यन्ते जरया भग्ना नागा नागैरिवोत्तमैः ॥
rasāyanavidaścaiva suprayuktarasāyanāḥ | dṛśyante jarayā bhagnā nāgā nāgairivottamaiḥ
इसी प्रकार रसायन के जाननेवाले और उसका भली-भाँति प्रयोग करनेवाले भी जरा से टूटे हुए दिखाई देते हैं, जैसे हाथी बलवान हाथियों से।
श्लोक 48 (12.27.48)
तथैव तपसोपेताः स्वाध्यायाध्ययने रताः । दातारो यज्ञशीलाश्च न तरन्ति जरान्तकौ ॥
tathaiva tapasopetāḥ svādhyāyādhyayane ratāḥ | dātāro yajñaśīlāśca na taranti jarāntakau
वैसे ही तप से युक्त, स्वाध्याय और अध्ययन में लगे हुए, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और अन्तक को पार नहीं कर पाते।
श्लोक 49 (12.27.49)
न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः समाः । जातानां सर्वभूतानां न पुनर्वै समागमः ॥
na hyahāni nivartante na māsā na punaḥ samāḥ | jātānāṃ sarvabhūtānāṃ na punarvai samāgamaḥ
दिन नहीं लौटते, न मास, न वर्ष; जन्म लेनेवाले सब प्राणियों का फिर से मिलन नहीं होता।
श्लोक 50 (12.27.50)
सोऽयं विपुलमध्वानं कालेन ध्रुवमध्रुवः । स्रोतसैव समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम् ॥
so'yaṃ vipulamadhvānaṃ kālena dhruvamadhruvaḥ | srotasaiva samabhyeti sarvabhūtaniṣevitam
इस प्रकार यह अस्थिर मनुष्य, स्थिर-सा बना हुआ, काल के द्वारा उस लम्बे मार्ग पर, जिस पर सब प्राणी चल चुके हैं, धारा में बहते की भाँति आगे बढ़ता जाता है।
श्लोक 51 (12.27.51)
देहो वा जीविताद्व्येति देही वाऽप्येति देहतः । पथि संगतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ॥
deho vā jīvitādvyeti dehī vā'pyeti dehataḥ | pathi saṃgatamevedaṃ dārairanyaiśca bandhubhiḥ
या तो देह जीवन से अलग होती है, या देही देह से; पत्नियों और अन्य बन्धुओं के साथ यह राह का मिलन है।
श्लोक 52 (12.27.52)
नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥
nāyamatyantasaṃvāso labhyate jātu kenacit | api svena śarīreṇa kimutānyena kenacit
किसी को भी किसी के साथ सदा का सहवास कभी नहीं मिलता; अपने शरीर के साथ भी नहीं, फिर किसी और के साथ कैसे?
श्लोक 53 (12.27.53)
क्वनु तेऽद्य पिता राजन्क्वनु तेऽद्य पितामहाः । न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽनघ ॥
kvanu te'dya pitā rājankvanu te'dya pitāmahāḥ | na tvaṃ paśyasi tānadya na tvāṃ paśyanti te'nagha
हे राजन्, अब तुम्हारे पिता कहाँ हैं और अब तुम्हारे पितामह कहाँ हैं? हे निष्पाप, तुम उन्हें अब नहीं देखते और वे तुम्हें नहीं देखते।
श्लोक 54 (12.27.54)
न चैव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य च । आगमस्तु सतां चक्षुर्नृपते तमिहाचर ॥
na caiva puruṣo draṣṭā svargasya narakasya ca | āgamastu satāṃ cakṣurnṛpate tamihācara
मनुष्य स्वयं न स्वर्ग को देख सकता है, न नरक को; सज्जनों की आँख शास्त्र है। हे नरेश, यहाँ उसी का आचरण करो।
श्लोक 55 (12.27.55)
चरितब्रह्मचर्यो हि प्रजायेत यजेत च । पितृदेवमनुष्याणामानृण्यादनसूयकः ॥
caritabrahmacaryo hi prajāyeta yajeta ca | pitṛdevamanuṣyāṇāmānṛṇyādanasūyakaḥ
ब्रह्मचर्य का पालन करके वह सन्तान उत्पन्न करे और यज्ञ करे, और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों के ऋण से मुक्त होकर निर्मत्सर रहे।
श्लोक 56 (12.27.56)
स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः । प्राग्ब्रह्मचारी प्रविभक्तभैक्षः । आराधयेत्स्वर्गमिमं च लोकं । परं च मुक्त्वा हृदयव्यलीकम् ॥
sa yajñaśīlaḥ prajane niviṣṭaḥ | prāgbrahmacārī pravibhaktabhaikṣaḥ | ārādhayetsvargamimaṃ ca lokaṃ | paraṃ ca muktvā hṛdayavyalīkam
जो यज्ञशील हो, सन्तानोत्पत्ति में लगा हो, पहले ब्रह्मचारी रहा हो और भिक्षा को बाँटकर खाता हो, वह इस लोक और स्वर्ग को सिद्ध करे, तथा हृदय की पीड़ा को छोड़कर परलोक को भी।
श्लोक 57 (12.27.57)
सम्यक्स्वधर्मं चरतो नृपस्य । द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत् । प्रवृद्धचक्रस्य यशोऽभिवर्धते । सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु ॥
samyaksvadharmaṃ carato nṛpasya | dravyāṇi cābhyāharato yathāvat | pravṛddhacakrasya yaśo'bhivardhate | sarveṣu lokeṣu carācareṣu
जो राजा भली-भाँति अपने धर्म का पालन करता है और यथोचित रूप से धन जुटाता है, जिसका चक्र बढ़ चुका है, उसका यश चर और अचर सब लोकों में बढ़ता है।
व्यास उवाच
श्लोक 58 (12.27.58)
इत्येवमाकर्ण्य विदेहराजो । वाक्यं समग्रं परिपूर्णहेतुः । अश्मानमामन्त्र्य विशुद्धबुद्धि । र्ययौ गृहं स्वं प्रति शान्तशोकः ॥
ityevamākarṇya videharājo | vākyaṃ samagraṃ paripūrṇahetuḥ | aśmānamāmantrya viśuddhabuddhi | ryayau gṛhaṃ svaṃ prati śāntaśokaḥ
इस प्रकार सम्पूर्ण और युक्तियों से परिपूर्ण वचन सुनकर विदेहराज अश्म से विदा लेकर, शुद्ध बुद्धि और शान्त शोक वाले होकर अपने घर लौट गए।
श्लोक 59 (12.27.59)
तथा त्वमप्यद्य विमुच्य शोक । मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि । क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते । तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मावमंस्थाः ॥
tathā tvamapyadya vimucya śoka | muttiṣṭha śakropama harṣamehi | kṣātreṇa dharmeṇa mahī jitā te | tāṃ bhuṅkṣva kuntīsuta māvamaṃsthāḥ
वैसे ही तुम भी आज शोक छोड़ो; हे इन्द्र के समान, उठो और हर्ष को प्राप्त हो। क्षात्रधर्म से यह पृथ्वी तुमने जीती है; हे कुन्तीपुत्र, इसे भोगो, इसका अनादर मत करो।